दु:ख

दु:ख

दु:ख भीतर ही रहता है
सुख की चाह के भीतर
छिपकर घात लगाये
एक घाव भरता नहीं कि अगला
प्रहार करने से नहीं चूकता

जब कोई डूबा होता है सुख में
उस समय हमला करके दु:ख को
मिलती है सबसे ज्यादा खुशी

बुद्ध ने कहा था कि सुख चाहोगे
तो दु:ख चला आयेगा उसके पीछे-पीछे
बुद्ध हुए बिना भी तो
उपेक्षा की जा सकती है दु:ख की
बस किसी से कुछ
पाने की अपेक्षा त्याग कर
धरती और सूर्य से भी

जैसे साँस चलती रहती है
लगातार किसी अपेक्षा के बिना
नदी बहती रहती है किसी दबाव के बिना
क्या जीवन भी उसी तरह नहीं चल सकता
देते हुए सबको जो भी है देने लायक।


Image: Despair
Image Source: WikiArt
Artist: Frank Holl
Image in Public Domain

सुभाष राय द्वारा भी