रंंग रूप
कोई-न-कोई रंग है हरा काला उजला नीला बैंगनी चंपई गेहूँवा भंटई रंग
कोई-न-कोई रंग है हरा काला उजला नीला बैंगनी चंपई गेहूँवा भंटई रंग
इन अभागे दिनों में कलाकार के कपड़े फटे हों जब मैं कैसे जगा दूँ सोई हुई पृथ्वी को सपने देखते पहाड़ को और यह भी कि मेरा समय रेत से घिरा है पानी से नहीं
तमस-आवरण भेद देता है अँधेरे का अंतस्तल निर्निमेष झाँकता बढ़ता है किंतु अँधेरे का राज्य अब भी बना हुआ अप्रमेय
यहाँ आरा मशीन चलती है तो लकड़ी के चीरने की आवाज़ इसके-उसके कानों तक पहुँचती रहती है निरंतर जिस तरह रेलगाड़ी के गुजरने की आवाज़
सबने सामूहिक गान किया खाई कसमें सबने कुछ कवि के पैर पड़े थे जहाँ-तहाँ वहाँ शुद्धता बची थी
मेरे संगीतज्ञ ने एक रोज मुझे बताया धूप है तो बारिश है बारिश है तो धूप है