मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में स्त्री विमर्श
इन दिनों हमारे घर में एक नया मुहावरा निर्मित हुआ है–‘मैत्रेयी का जाग जाना’। जब भी मैं किसी बात का विरोध करती हूँ तो घरवाले कहते हैं, “इसके अंदर की मैत्रेयी जाग गई।”
इन दिनों हमारे घर में एक नया मुहावरा निर्मित हुआ है–‘मैत्रेयी का जाग जाना’। जब भी मैं किसी बात का विरोध करती हूँ तो घरवाले कहते हैं, “इसके अंदर की मैत्रेयी जाग गई।”
‘एक ऐसी भी निर्भया’ उपन्यास नारी जीवन के दर्दनाक चित्र का अक्षर रूप है। लेखिका अपने सहज रूप में सामाजिक विसंगतियों के प्रति आक्रोश जाहिर करनेवाली और पीड़ित, शोषित नारी के प्रति संवेदनशील एवं मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा रखनेवाली हैं।
बात काफी पुरानी है। टाइप राइटर चलन के बाहर नहीं हुए थे। कचहरी, नगरपालिका के बाहर और दफ्तरों में इनकी खटखटाहट गूँजती रहती थी।
उम्र बहुत दयावान होती है। आदमी के बालों को सफेद कर देती है ताकि लोग उसको बुजुर्ग और तजुर्बेदार समझें। नजर को धुंधला कर देती है
जोरावर सिंह का दिमाग एकबारगी खाली हो गया। डी.वाई.एस.पी. के रूप में यह उनका पहला छापा था और पहला ही फुस्स!
हिंदी कहानी की जब भी चर्चा होती है तब यह भी विचार-विमर्श का केंद्र हो जाता है कि उसकी उम्र क्या है? कुछ विचारक उसका उत्स वेदों उपनिषदों तक ले जाते हैं तो कुछ उसे मात्र शतायु मानते हैं।