फूलों-पत्तों ने मिल-जुल कर क्या-क्या साज सजाए हैं

फूलों-पत्तों ने मिल-जुल कर क्या-क्या साज सजाए हैं ये क्या जाने इन पेड़ों ने कितने पत्थर खाए हैं

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जिस्म से बिछड़ी हवा यानी हवा में मिल गए

जिस्म से बिछड़ी हवा यानी हवा में मिल गए टूट पुर्जो में जो बेग़ाने हवा में मिल गए

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विश्वास तुम्हीं पर कर पाया

जब जब सम्मुख तम गहराया, मन सदा तुम्हारी शरण गया संघर्षों में, तूफानों में, तुमसे ही मन का मरण गया,

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भारत दुर्दशा का चित्रहार

‘मुझे कहते हैं सब रिश्वत लाल मैंने कर डाला सबको हलाल, कि तेरा-मेरा साथ रहेगा। बरसों से पहचाने मुझको जमाना घूस, दस्तूरी, सलामी, नजराना, घूस दिए बिना चले नहीं जाना सारी दुनिया को करता बेहाल, मैं करता हूँ हरदम कमाल

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हवा में लहलहा रही ‘कलगी बाजरे की’

यह कविता अज्ञेय की काव्य यात्रा के पूर्वार्द्ध की कविता है। उस दौर में उन्होंने पूर्ववर्ती काव्य आंदोलनों की रूढ़ और अप्रासंगिक हो चुकी प्रवृत्तियों से विद्रोह किया था और साहित्य की दुनिया में नये,

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हर कदम पर बाज देखिए

है मसीहा रहगुजर मगरबस गिराता गाज देखिए भूख में जनता यहाँ वहाँ ख्वाब यूँ स्वराज देखिए नाच गाना जश्न आजकलमौज में है ताज देखिए

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