बतलाऊँ क्या-क्या न हुआ

बतलाऊँ क्या-क्या न हुआ  मैं खु़द भी अपना न हुआ  अब तक तो बिक जाता ही  मैं लेकिन सस्ता न हुआ मंज़िल मेरी ज़द में थी बस आगे रस्ता न हुआ

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हर दिन युद्ध-क्षेत्रे

जो लड़े और युद्ध-क्षेत्रे मरे सचमुच वे ही वीर कहलाए मैं, अपने सिर ऊपर तीर रखता हूँ और सीने में अपार हौसला भरता हूँ मैं, हर दिन एक युद्ध लड़ता हूँ और हर दिन एक नए जीवन के लिए

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वह जो एक शब्द है

वह जो एक वाक्य है मैं उसे एक अच्छे वक्तव्य में हूबहू बदल देना चाहता हूँ  मेरे पास वाक्य नहीं है।वह जो एक वक्तव्य है मैं उसे एक अच्छी भाषा में हूबहू बदल देना चाहता हूँ 

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आवाज़

जंगल में मोर नाचा, किसने देखा? कभी-कभी, गंजे को भी खाज़ होती है और सिर्फ़ नगाड़े की ही नहीं, तूती की भी आवाज़ होती है लो, देख लो, वहाँ, उधर सुर्ख-स्वर्णिम सुबह हो रही है और एक बार फिर

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अहं से वयं की यात्रा

अपना होना तब बनती है सागर जब धरती खोती हैअपना सूक्ष्म अस्ति भाव तब बनती है सुगंध और रंग इस जगत में सुगंध होने के लिए

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भारत बनाम इंडिया

मैं रात-रातभर करवट बदलता बिस्तर की सिलवटों से बने  इंडिया के मानचित्र में भारत को ढूँढ़ता हूँभारत और इंडिया के बीच  चल रही बहस में शामिल इंडिया की वकालत करते लोगों

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