तो लिखा जाता है

दिल में जब दर्द जगा हो, तो लिखा जाता है घाव सीने पे लगा हो, तो लिखा जाता हैखुशी के दौर में लब गुनगुना ही लेते हैं गम-ए-फुरकत में भी गाओ, तो लिखा जाता हैहाल-ए-दिल खोल के रखना, तो बहुत आसाँ है हाल-ए-दिल दिल में छुपा हो, तो लिखा जाता है

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मेरी मजबूर सी यादों को

ये जो तुम मुझको मुहब्बत में सजा देते हो मेरी खामोश वफाओं का सिला देते होमेरे जीने की जो तुम मुझको दुआ देते हो फासले लहरों के साहिल से बढ़ा देते होअपनी मगरूर निगाहों की झपक कर पलकें मेरी नाचीज सी हस्ती को मिटा देते हो

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दिल से संसद तक तेजेंद्र ही तेजेंद्र

तेजेंद्र शर्मा–यह नाम मस्तिष्क में आते ही मानो हलचल सी होने लगती है। उसकी याद के साथ साथ उससे मिलने की बेचैनी मन में बढ़ने लगती है। उसकी सुंदर, गहरे बेधने वाली आँखें और होंठों की भोली मुस्कान नटखट कान्हा की तर्ज पर ही बनी है। द्वापर के उस महानायक से यह हमारा नायक कुछ मिलता जुलता सा लगता है। याद नहीं कब से उसे जानता हूँ, लगता है कई युग बीत गए हैं।

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सहमे सहमे आप हैं

मस्जिदें खामोश हैं, मंदिर सभी चुपचाप हैं कुछ डरे से वो भी हैं, और सहमे सहमे आप हैं वक्त है त्यौहार का, गलियाँ मगर सुनसान हैं धर्म और जाति के झगड़े बन गए अब पाप हैं

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संवेदना के विस्तार की कहानियाँ

तेजेंद्र शर्मा हिंदी के एक ऐसे प्रवासी कहानीकार हैं जो दो देशों के बीच वैश्विक स्तर पर आ रहे बदलावों के बीच जीवन की ऊष्मा, संवेदना और मानवीय रिश्तों की अंतरतहों तक दृष्टि डालते हुए उनका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कथा के रूप में सामने लाते हैं। तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में सामाजिक विषयों की विविधता है। उनकी कहानियों के केंद्र में परिवार है खासकर मध्यमवर्गीय परिवार। पारिवारिक संबंधों का, मानवीय इच्छाओं का आख्यान करती इन कहानियों में भाषा सहज और प्रवाहमयी है।

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