अपने भीतर झाँकने का मन
अपनी कमियाँ भी नज़र आएँगी ही उसमें आदमी मन को अगर दर्पण करे तब तोकुछ भी तो बचपन सरीखा है नहीं निश्छल अपनी हर इक उम्र वह बचपन करे तब तो
अपनी कमियाँ भी नज़र आएँगी ही उसमें आदमी मन को अगर दर्पण करे तब तोकुछ भी तो बचपन सरीखा है नहीं निश्छल अपनी हर इक उम्र वह बचपन करे तब तो
उसे ये कौन बताए कि खींचा-तानी में किसी भी रिश्ते की हो डोर टूट जाती हैसभी के हाथ में ख़ंजर दिखाई देते हैं मगर ये भीड़ कहाँ सच को देख पाती हैजो देखना हो तो देखो बरसते पानी में तभी सड़क की हक़ीक़त समझ में आती है
जिक्र तेरा मेरे शहर में नहीं आईने में है तू नजर में नहीं वो महाजन भी रोज आता है मैं भी कहता हूँ कह दो घर में नहीं सारी दुनिया…
पतझरों का मौसम है पत्तियाँ नहीं मिलतीं गुल नजर नहीं आते तितलियाँ नहीं मिलतीबस्तियों में दहशत है लोग हैं डरे सहमे अब खुली हुईं घर की खिड़कियाँ नहीं मिलतीं
ख्वाब है तो ख्वाब जैसा ही रहे भीड़ का बन जाए ये परचम नहींखुद पे जाने कब तुझे हँसना पड़े गम निभा लेने का तुझमें दम नहींतेरा कहलाने का मतलब ये न था तू ही तू में ही रहें, हम, हम नहीं
कैसी भी हो विपदा चाहे उम्मीद दुआओं की उसको बिना थके ही बहते रहना सौगंध हवाओं की उसको चंदा-सा उगने से पहले सूरज जैसी ढलती अम्मा!