रंग जमाना

रंग-बिरंगी इस दुनिया में अपना भी रंग जमाना मौसम चाहे जैसा भी हो तुम खिलना और खिलाना! अनुपम है यह देश हमारा अनुपम इसकी माटी है अनुपम है हर राग…

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एक कहानी

थोड़ी बरसात हुई जाने फिर भी भारी अफड़ा-तफड़ी मुखिया जी का कुनबा चौकस बता रहे सब लफड़ा-लफड़ीशोर मचा है गाँव नगर में चौकन्ने हैं गली-मोहल्ले!

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मुश्किलों की तोड़कर जंजीर

छेड़िए मत गाँव की दुखती रगों को यूँ उसकी रग-रग में युगों की पीर निकलेगीवह भले धनवान हो जाए मगर उसमें लोभ के प्राचीर की तामीर निकलेगीसच तो ये है जानते हैं जितना हम, उससे देश की हालत कहीं गंभीर निकलेगी

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लोग कद से खासे लंबे जा रहे है

जिंदगी में लोग हैं बिल्कुल अकेले फेसबुक पर दोस्त जुड़ते जा रहे हैं आगे बढ़ने की ललक में किसने देखा लोग कितना पीछे छूटे जा रहे हैं

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मैंं जब-तब सोचकर डरता हूँ

उदासी के समंदर में डुबो दे उसका भारीपन अगर रो-रो के थोड़ा खुद को वह हल्का न कर डालेगरीबी खत्म कर डाले जरा-सी देर में खाना करे क्या माँ, अगर उसको तनिक तीखा न कर डालेकमा कर रख लिया है खूब सारा तुमने भी पैसा तुम्हारा भी शिकार इक दिन यही पैसा न कर डाले

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सच मिटाने से कभी मिटता नहीं

सच मिटाने से कभी मिटता नहीं झूठ ज्यादा दिन तलक टिकता नहींआँख में थोड़ी हया रक्खा करो तेरे घर भी बेटी है दिखता नहींजो खुदा को भूल बैठे उसका सिर फिर कभी दरगाह पर झुकता नहीं

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