हूँ उम्मीद की लौ बुझाओगे कैसे

हूँ उम्मीद की लौ बुझाओगे कैसे उजाला हूँ मुझको मिटाओगे कैसेचलन देश का भ्रष्ट जब हो गया है बता नौजवानों मिटाओगे कैसेअगर आरजू हौसला खो दिया तो

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जिंदगी दाव पर

जिंदगी दाँव पर, मैं लगाती रही देश हित में कदम, मैं बढ़ाती रहीगाँव घर शहर शिक्षा से परिपूर्ण हो ज्ञान का दीप मैं तो जलाती रहीहर घड़ी नारियों को दे कर हौसला नारी सम्मान को मैं जगाती रही

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वो दिल मुझसे लगाना चाहता है

वो दिल मुझसे लगाना चाहता है वो अब अपना बनाना चाहता हैनजर भर देख कर जीने लगा वो नजर में अब बसाना चाहता हैमेरी वो माँग हाथों से सजाकर मुझे दुल्हन बनाना चाहता है

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कभी तपती हुई

कभी तपती हुई सी धूप हूँ मैं नारी हूँ पेय शीतल रूप हूँ मैंकभी हूँ अंत तो आरंभ भी हूँ काली, चंडी, कई स्वरूप हूँ मैंसदा मिहनत कि रोटी तोड़ती हूँ लबालब स्वेद की इक कूप हूँ मैं

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सही गलत पर अड़ा हुआ है

सही गलत पर अड़ा हुआ है जो रातभर में बड़ा हुआ हैअभाव में जब स्वभाव बदला उदार दिल भी कड़ा हुआ हैवो दौड़ने का सिखाता नुसखा अभी-अभी जो खड़ा हुआ हैधरा बताती उखाड़ लेना

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पाँव जमीं पर रख देने से

पाँव जमीं पर रख देने से, घरती-पुत्र नहीं होताचंदन को घसना पड़ता है, पौधा इत्र नहीं होतादुनिया चाहे कुछ भी कर ले, कह ले

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