मुझे याद है (चौथी कड़ी)
पिताजी के श्राद्ध में मेरे मामाजी बेनीपुर पधारे थे। उन्होंने मेरे बाबा से आग्रह किया कि मुझे ननिहाल जाने दें। बाबा ने इस आग्रह को मान लिए।
पिताजी के श्राद्ध में मेरे मामाजी बेनीपुर पधारे थे। उन्होंने मेरे बाबा से आग्रह किया कि मुझे ननिहाल जाने दें। बाबा ने इस आग्रह को मान लिए।
गाड़ी से उतर कर भोला पैदल ही घर की ओर चल पड़ा। स्टेशन से थोड़ी ही दूर पर तो उसका गाँव है, जहाँ चारों ओर लहलहाते अरहर के खेत हैं, पीली-पीली सरसों फैली है
याद आ रहा है हमें आज वह दिन जब हमने मुनि की रेती के पड़ोस में स्वर्गाश्रम के किनारे केवल कोपीन पहने दो ऐसे अँग्रेजों के दर्शन पाए जो हिमालय की तराई में जाने कितने साल से योग साधना की ऊँचाइयों को, दुनिया से मुँह मोड़, हल करने में लवलीन थे।
प्राक्-गोदान युग के उपन्यासों में तथा गोदान में कोई विचारधारागत मौलिक प्रभेद नहीं है। दोनों अवस्थाओं में वे जनवादी हैं
फ्रांस के इस प्रसिद्ध और आदरणीय कलाकार का बचपन पेरिस की संकीर्ण गलियों में व्यतीत हुआ। जवानी कला की आराधना और जीविका कमाने में गुज़री।
“क्या कर रही हो बेटा ?” बुड्ढे ने खाँसते हुए कहा । उसकी आवाज़ में थरथराहट थी।