खु़शबू के शिलालेख

आज दिनभर एक नदी बहती रही थी मेरे भीतर। मन फुँकता रहा था आवेग की तरह और भीतर में एक सन्नाटा पसरा हुआ था, रहम की तरह। फिर शाम दर्द से टूटी हुई लकड़ी की तरह आई थी और मेरे करीब बैठ गई थी।

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अस्तित्व

तभी रोहित के जायज-नाजायज हर तरह के ताने यूँ अनसुना कर देती मानो पी-एच.डी. की डिग्री मैंने मेहनत से नहीं वरन कहीं से मोल ली हो!

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ऐसी कोई बात नहीं

ऐसी कोई बात नहीं कि मैं दुःखी हूँ पर इतनी सुखी भी नहीं कि अपने देश के अपमान का‘जय हो’ करूँ। मैं कॉन्फिडेंट हूँ

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सच

मैंने देखा सच रो रहा था दुहाई दे रहा थाअपने रहनुमाओं को! आवाज दे-देकर थक गया था–हारकर चुप्पी की चादर तान सो गया था

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एक अदद जिंदगी

अगस्त महीने की यह एक ऐसी सुबह थी जिसकी पूर्व कल्पना किसी ने नहीं की थी। बारिश रुक-रुक कर होती थी या नहीं होती थी। हफ्ते-दस दिनों बाद जोर की वर्षा होती और कॉलोनी का निचला हिस्सा पानी से भर जाता।

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