अफ्रीका

अफ्रीका

उस पागलपन-भरे आदिम युग में
जब विधाता खुद अपने से असंतुष्ट होकर
नई सृष्टि को बार-बार तोड़-फोड़ रहा था,
अधीरता के उस सायँ सायँ मस्तक हिलाने वाले दिनों में
रुद्र समुद्र की भुजाएँ
पूरब की पृथ्वी की छाती से
छीन कर ले गईं तुम्हें, ओ अफ्रीके!
बाँध दिया तुम्हें वनस्पतियों के कड़े पहरे में
कृपण किरणों के अंत:पुर में।
उस जगह निभृत अवकाश में तुमने
संग्रह किए दुर्गम के रहस्य,
पहचाने जल, थल, आकाश के दुर्बोध संकेत;
प्रकृति के अनदेखे जादू ने
मंत्र जगाया तुम्हारे चेतनाहीन मन में।

तुमने भीषण का भी विद्रप किया
विरूप के छद्मवेश में,
शंका को तुमने हरा देना चाहा
अपने को उग्र बना कर विभीषिका की प्रचंड महिमा में
तांडव के दुंदुभि-निनाद में।
हाय री छाया से ढँकी
काली घूँघट के नीचे
अपरिचित था तुम्हारा मानव रूप
उपेक्षा की आविल दृष्टि से।
इतने में आए वे लोहे की हथकड़ी लेकर
जिनके नाखून तेज़ थे तुम्हारे मगरों के संत से भी ज़्यादा,
आए आदमी फाँसने वालों के दल,
घमंड से जो अंधे थे तुम्हारे सूर्यहीन अरण्यों से भी अधिक।

सभ्यों के बर्बर लोभ ने
नंगी की अपनी निर्लज्ज अमानुषिकता।
तुम्हारी भाषाहीन क्रंदन की भाप से आकुल जंगल के रास्तों पर
धूल तुम्हारे खून और आँसू से मिल कर कीचड़ बन गई।
लुटेरों के काँटेदार जूते की तल्ली की
वीभत्स कीचड़
चिरस्थाई चिह्न दे गई तुम्हारे अपमानित इतिहास पर।
उस समय भी, समुद्र के उस पार, उनके गाँव-गाँव में
मंदिरों में पूजा के घंटे बज रहे थे
भोर में, शाम में, दयामय देवताओं के नाम पर।
बच्चे खेल रहे थे माताओं की गोद में,
कवियों के संगीत से झंकृत हो रही थी
सुंदर की आराधना।

आज जब पश्चिम के क्षितिज में
संध्या का दम घुट रहा है आँधी-तूफान में,
जब गुप्त गुफाओं से पशु बाहर निकल आए हैं
और अशुभ ध्वनि में घोषणा कर रहे हैं दिन के अंतिम काल की,
आओ हे युगांत के कवि,
आसन्न संध्या की अंतिम किरणों में
खड़ा होओ इन मानहीन मानवों के द्वार पर,
बोलो–“क्षमा करो!”
हिंसक प्रलापों के बीच
यही बने तुम्हारी सभ्यता की शेष पुण्य वाणी।


Image: African boy
Image Source: WikiArt
Artist: Kuzma Petrov-Vodkin
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कवीन्द्र रवीन्द्र द्वारा भी