तेलुगु शतक-साहित्य

तेलुगु शतक-साहित्य

तेलगु के भक्ति-साहित्य में ‘शतकों’ का विशिष्ट स्थान है। एक जमाना ऐसा भी था जब भक्तगण इसी प्रणाली में अपने उद्गार प्रकट करना श्रेयस्कर समझते थे। शतक-साहित्य के विभिन्न प्रकार की बानगी के साथ-साथ उसके विकास और ह्रास का लेखाजोखा इस लेख में देखिए –संपादक

शतक-साहित्य तेलुगु वाङ्मयोद्यान की एक सुंदर क्यारी है, जिसकी अनुपस्थिति में उक्त उद्यान की शोभा अपूर्ण ही रह जाएगी। तेलुगु में उपलब्ध शतक-रचनाओं की झाँकी पाने के पूर्व ‘शत’ व ‘शतक’ शब्दों का महत्त्व समझ लेना आवश्यक हो जाता है।

हिंदू धर्म में ‘शत’ शब्द तथा उस संख्या को बड़ा ही महत्त्व दिया जाता है। श्रुति तथा स्मृतियों तक में उसको काफी मान मिल चुका है। ‘शतयात’, ‘शतरुद्रीय’, ‘शतपथब्राह्मण’ वगैरह अनेक शब्द हम उपनिषदों में देखते हैं। यह शब्द या इससे बनने वाले अन्य यौगिक शब्द अधिकतर भगवान की उपासना व भक्ति-क्षेत्र से संबंध रखते हैं। प्राय: ईश्वर की प्रशंसा, स्तुति, नाम-जप आदि करना उनका उद्देश्य रहता है। ‘शत’ शब्द का मंगलप्रद समझा जाना ही उसके प्रचार व प्रसिद्धि का कारण रहा होगा। मनुष्य की आयु की अवधि हमारे यहाँ ‘शत-वर्ष’ मानी जाती है। ‘शतमान भवति, शतायु: पुरुष:’ इस आशीर्वचन से यह स्पष्ट हो जाता है। शत की तरह अष्टोत्तरशत (108) भी हमारे यहाँ पवित्र संख्या मानी जाती है। कहा जाता है कि प्रत्येक मंत्र का पुंचरण कम से कम 108 बार होना चाहिए। इसी आवश्यकता को ध्यान में रख कर सुमिरनियों में एक सौ आठ मनकोंवाला विधान चल पड़ा है। उसी संख्या के अनुरूप भगवान के स्तोत्र-पाठ बनाए गए हैं। अष्टोत्तर शतनामावलियों तथा सहस्रनामावलियों की, हिंदू पुराणों के अंतर्गत, बहुलता सर्वविदित है। इस प्रकार जमाने से चली आती हुई परंपरा को परवर्ती पंडित तथा काव्य-निर्माता भी अपना बैठे। इन बातों से साफ हो जाता है कि शतक साहित्य भवन का निर्माण भक्ति, उपासना अथवा अध्यात्म-चिंतन की बुनियाद पर ही हुआ है। ‘शतक’ शब्द के प्रति लोगों के मोह तथा झुकाव यहाँ तक बढ़ गए कि कभी-कभी शताधिक संख्यावाली रचनाओं को भी वही नाम दिया जाने लगा। यही कारण है कि आज तेलुगु साहित्य में महाकवि वेमना के पद्य हजारों की संख्या में बिखरे रहने पर भी उनके संग्रह का नाम तो ‘वेमन शतकमु’ ही पड़ा है।

सबसे पहले हमें प्राकृत भाषा में ‘अवदानशतक’ का दर्शन होता है, जिसमें बौद्ध धर्म के हीनयान शाखा के एक सौ अवदान-कथानक वर्णित हैं। धर्म नीति एवं बुद्धदेव के गुणगान का प्रचार करना ही उनका उद्देश्य रहा। प्राकृत का एक दूसरा ग्रंथ, जिसका कि भारतीय साहित्य में बहुत ऊँचा स्थान है और जो बाद की कई ‘सप्तशती’ या सतसइयों का आधार बना ‘गाथा सप्तशती’ है जिसके स्रष्टा आंध्र सातवाहन महाराजा हाल थे। उस ग्रंथ में नीति तथा भक्ति से शृंगार भावना को अपेक्षाकृत प्रधानता मिली। हिंदी के रीतिकालीन कवि-सिरमौर बिहारी लाल के कृति-रत्न की पृष्ठभूमि वही मालूम पड़ती है।

प्राकृत के अलावा संस्कृत में भी शतकों की बाढ़-सी चल पड़ी है। ‘लोकेश्वरशतक’, ‘भर्तृहरि का शतक-त्रय’, ‘अमरुशतक’ आदि कई भक्ति, नीति एवं शृंगार का बोध कराने वाले ग्रंथ वहाँ मौजूद हैं। जैसे कि भारत के सभी भाषा-साहित्यों के अन्य अंग–काव्य, नाटक आदि, संस्कृत तथा प्राकृत वाङ्मय से प्रभावित हैं, यह शतक-रचना भी उनके निकट अत्यंत ऋणी है। विभिन्न देशी भाषाओं के कवियों में शतक-रचना की प्रवृत्ति जागृत कराने का श्रेय निस्संदेह इन्हीं को प्राप्त था। साहित्य के और क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी सर्वप्रथम संस्कृत शतकों के अनुवाद, द्राविड भाषाओं में निकले हैं। फिर धीरे-धीरे अनुवाद से अनुकरण और उससे मौलिकता की तरफ यहाँ के कवियों का रुख होता गया। भर्तृहरि के शतक-त्रय के तीन-तीन सरस व सुंदर अनुवाद तेलुगु में हो पड़े हैं। ‘अमरुशतक’ के भी रूपांतर कम नहीं हैं। तेलुगु के प्रसिद्ध कवि श्री धूर्जटि कृत ‘कालहस्तीश्वर शतक’ में संस्कृत स्तोत्र-रत्न ‘शिवानंदलहरी’ का अनुसरण स्पष्ट लक्षित होता है। इनके अतिरिक्त असंख्य मौलिक रचनाए तेलुगु साहित्य के लिए अपूर्व अलंकरण बने विराजमान हैं। अनुवाद व अनुकरणों से तो इन्हीं की संख्या अधिक है। तेलुगुवालों की सर्वतोमुखी प्रतिभा का अन्यत्र दुर्लभ प्रसार इस शतक साहित्य में साफ परिलक्षित होता है। एक जमाना था जबकि तेलुगु कवियों के श्रीमुख से प्रहर भर में एक तथा चौबीस घंटों में दसों छंदोबद्ध शतकों की आशुधाराएँ प्रवाहित होती थीं! स्त्री-पुरुष, ब्राह्मण एवं शूद्र, सभी श्रेणियों के कवि शतक रचना करते थे। कम से कम दस-बीस शतक लिख डालना साधारण कवि का लक्षण माना जाता था! कुल मिला कर, कहा जाता है कि तेलुगु में लक्षाधिक शतकों का निर्माण हुआ था जिनमें से अब तक केवल एक हजार प्राप्त हैं। इतिहास प्रसिद्ध विजयनगर साम्राज्य के विध्वंस के बाद जाने कितने ग्रंथ-रत्नों का अस्तित्व ही उठ गया है। और आज भी, क्या पता कितने गौरव-ग्रंथ देश के कोने-कोने में, गँवई-गाँवों की झोपड़ियों के आलों में, दिवा के आलोक से दूर दीमकों के सहयोगी बन अपने जीवन के अंतिम क्षण गिन रहे हैं। दुर्भाग्य से आधुनिक तेलुगु विद्वानों में प्राचीन ग्रंथों का अनुसंधान करने की ओर पर्याप्त मात्रा में रुचि अभी नहीं जगी है और न सरकार अथवा विश्वविद्यालयों के अधिकारी ही इस कार्य में लगन के साथ प्रवृत्त हैं। वह दिन निस्संदेह बहुत ही शोभनप्रद तथा जीवनप्रद होगा जबकि हमारी गुप्त साहित्य-निधियों का कम से कम एक चतुर्थांश अनावृत होकर, अन्य सहोदर-साहित्यों के समक्ष अपनी विशिष्ट विभूतियों का प्रदर्शन कर पाएगा।

अद्यावधि उपलब्ध रचनाओं के आधार पर तेलुगु शतक-साहित्य का निर्माण-समय ईसा की 12वीं शती से प्रारंभ होता है! श्री कविप्रवर पालकुरिकि सोमनाथ कृत ‘वृषाधि-शतक’ (ई. सन् 1195) ही अब तक प्राचीनतम माना जाता है। श्री सोमनाथ के गुरु शैव धर्म के प्रचारक पंडिताराध्य ने भी ‘शिव तत्वसारमु’ नामक एक ग्रंथ सन् 1170 के आसपास बनाया था, जिसमें शतक काव्य के प्राय: सभी लक्षण मौजूद हैं। सभी लक्षणों की विद्यमानता के बावजूद शतक रचना के अपरिहार्य अंग ‘मकुटविधान’ के अभाव ने, उक्त ग्रंथ को ‘शतक’ नाम से वंचित कर रखा। यहाँ पर शतक साहित्य के प्रधान लक्षण ‘मकुट विधान’ का परिचय कराना अप्रासंगिक न होगा।

प्रत्येक शतककार अपनी रचना के प्रत्येक छंद या पद्य की समाप्ति एक विशिष्ट शब्द या शब्द समुदाय के साथ कर देता है। सभी पद्यों के अंतिम भाग का एक-सा रहना आवश्यक होता है जो प्राय: कवि के इष्ट-देव, आश्रयदाता, अथवा स्वयं अपने प्रति संबोधन हुआ करता है। ऐसे शब्द या शब्द-समुदाय को ‘मकुट’ कहते हैं। यह विधान कतिपय संस्कृत स्तोत्रों में भी पाया जाता है। आचार्य बिल्वमंगल तथा शंकर कृत गोविंददामोदर स्तोत्र तथा लक्ष्मीनृसिंह स्तवन इस श्रेणी के हैं। फिर तेलुगु में तो यह विधान शतक रचना के लिए अनिवार्य-सा हो चला है। प्राचीन हिंदी के मुक्तक काव्यकारों में भी हम कुछ-कुछ इसी प्रकार की प्रवृत्ति देखते हैं। उनमें और तेलुगु वालों में यह अंतर है कि, जबकि हिंदी कवि अपना नाम प्रत्येक छंद में किसी न किसी जगह टाँक देते थे, तेलुगु शतककार निज इष्टदेव का, पोषक-राज्य का अथवा अपना ही नाम संबोधन के रूप में, पद्यों के अंत ही में लगा लेते हैं।

शतक रचना का प्रारंभ, इस प्रकार, तेलुगु साहित्य में ई. सन् 12वीं शती से माना जाता है। तब से लेकर बराबर हर शताब्दी में, उसमें हम उन्नति देखते हैं। किंतु ई. 16 से लेकर 18वें तक का जमाना इस साहित्य का स्वर्ण-युग माना जाता है जबकि सैंकड़ों व हजारों की तादाद में धड़ाधड़ शतक रचे गए थे और उस दिशा में प्रकृष्ट रचना-शैलियाँ भी चल पड़ी थीं। तब तक अनुकरण की केंचुली हटाकर कलाकारों की प्रतिभा एवं मौलिकता महानाग की भाँति अपनी मणिच्छवि दर्शाती हुई विहार करने लगीं। कुछ शतक ऐसे बने, जिनका प्रत्येक पद्य, एक-एक संपूर्ण इतिवृत्त का संग्रह-रूप पाठकों के सामने सुंदर ढंग से प्रस्तुत करने लगा। ‘प्रसन्न राघव शतक’ ऐसी रचनाओं में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कतिपय कृतियों में इष्टदेव की स्तुति निंदा की आड़ में की जाती थी। ऐसी रचनाएँ ध्वनिप्रधान रहने के कारण उत्तम-काव्य की श्रेणी में आ जाती हैं। इस प्रकार की पद्य-रचना बहुत ही जटिल तथा कठिन हुआ करती है। इसमें सफल होने के लिए कवि में उच्चकोटि की भावुकता, भाषा पर असाधारण अधिकार तथा श्लिष्ट आलंकारिक विन्यास आदि गुणों का होना अनिवार्य हो जाता है। उसे वस्तु-विषयक ज्ञान तथा कल्पना का अक्षय भंडार बनना पड़ता है। अत: अपूर्व प्रतिभा-संपन्न लेखक ही ऐसे प्रयासों में उत्तीर्ण हो सकते हैं। किंतु अजंता के अमर शिल्पी आंध्र कलाकार के लिए तो कुछ भी असंभव नहीं है। वह कलम तथा कूची दोनों की करामात बराबर दर्शाने वाला जादूगर है। जहाँ एक ओर वह परुष प्रस्तर खंडों से प्रशस्त कला-स्रोत बहा लाने में सिद्धहस्त है, दूसरी ओर अपार शब्द-रत्नाकर को मथ कर चौमुखी चमक वाले रत्न उगाहने तथा अपने काव्य गहनों में उन्हें उचित रीति से प्रतिस्थापित करने में समर्थ है। तभी तो इस साहित्य में श्लिष्ट और द्विअर्थी काव्य भरे पड़े हैं। इससे पाठक यह न समझें कि ऐसी रचनाएँ कोरी शाब्दिक कलाबाजी के पर्यायमात्र रह जाएँगी। शब्द-सौंदर्य के साथ ही साथ उत्तम भावों तथा अनुभूतियों की विदग्धतापूर्ण व्यंजना का अनोखा समावेश इनकी विशेषता है। ‘राघव पांडवीयमु’ एक ऐसा ही सर्ग-बद्ध काव्य है जिसका प्रत्येक पद्य एक साथ राम तथा पांडवों की कथाओं का भाव-मधुर वर्णन प्रस्तुत करता है! इसी प्रकार शतक-क्षेत्र में भी ‘श्री कासुल पुरुषोत्तम कवि’ नामक सहृदय कलाकार ने ‘आंध्र नायक शतकमु’ की रचना की, जो आद्योपांत ‘निंदास्तुति’ की अपूर्व छटा लिए है। कृष्णा नदी किनारे ‘श्री काकुलम्’ नगर स्थित विष्णु-मंदिर की मूर्ति का नाम ‘आंध्र विष्णु’ है। उन्हीं भगवान की प्रशंसा, उक्त शतक में, निंदा के रूप में की गई है। शतक की पद्य-संख्या वही 108 है। एक-एक पद्य एक-एक अभृत चषक है, जिसमें भक्ति व भावुकता की मिठास के साथ ही भाषा की स्निग्धता, प्रांजल-श्लिष्टता छलकती रहती है। बाहर से मालूम पड़ता है कि कवि भगवान के सामने गालियों का खजाना खोले बैठे हैं; चुनौती पर चुनौती उन सर्वशक्तिमान् को देते जा रहे हैं; उनकी सारी विरुदावली उतरवा कर ही काम लेंगे! लेकिन उस वाच्यार्थगत निंदा के आवरण से छन कर, उत्तम व्यंग्य के रूप में निकलने वाले आत्म-समर्पण, दैन्य, निज-लघुत्व-निवेदन, भगवान का महत्त्व-प्रदर्शन, शिष्ट-हास्य, मधुर उपालंभ, अनन्यता, रूपासक्ति आदि भाव-मयूख अत्यंत हृदयहारी एवं त्रिविध ताप-निवारक हैं! एक उदाहरण लीजिए–

“सकलंबु नीवयै योक मर्रियाकुपै

निच्च बरुंडु नाडेंत गलवो?

तन बिड्डडनि यशोदादेवि पोत्तुल

निडुक मुद्दाडुनाडेंत गलवो?

तक्कुल मारत्त देक्किंचु कोनग

निन्नेत्त क पेंचु नाडेंत गलवो?

भयलेश मेरुगक बल्पामु पडगपै

गंतुलु वैचुनाडेंत गलवो?

परुवुगल वाडवेमि? प्राबल्कुलंदु

देलिय वरिमुक्कु मुल्लंत गलवो लेवो?

चित्र-चित्र स्वभाव! दाक्षिण्य भाव!

हतविमत जीव! श्रीकाकुलंध्रदेव?”

“हे विचित्र स्वभाववाले श्रीकाकुलेश्वर! दाक्षिण्य भाव वाले प्रभु! विमत (दुर्मतिवाले) प्राणियों के लिए तुम मृत्युरूपी हो!”–

“विमति (दुर्मतिवाले) प्राणियों के लिए तुम मृत्युरूपी हो!”–अंतिम दोनों पंक्तियों (मकुट) द्वारा इस प्रकार भगवान को संबोधित करने के बाद कवि उनकी सर्वशक्तिमानता की हँसी किस सफाई के साथ उड़ाते हैं, वह देखते ही बनता है।

“सब कुछ तुम होकर भी एक छोटे से वट-पत्र पर शायन करते समय (भला तुम) कितने रहे?

(जिन दिनों) अपना लाल समझ कर, यशोदा तुम्हें सौर में प्यार से खिलाती रहती (तब) तुम कितने रहे?

(जिन दिनों) नखरो-नाजवाली फूफी (राधा) अपना बना लेने की ललक से तुम्हें गोद लिए फिरती थी, (तब) कितने रहे?

(शिशुपन के कारण) निडर हो कर भारी नाग के फन पर उछल-कूद मचाते समय, भला, तुम कितने रहे?

फिर पुराने वचनों (उपनिषदों) में ही तुम कहाँ के प्रतिष्ठावान् रह चुके हो, प्रभु?

(वहाँ तो) जानकार लोग तुम्हारे धान के बीज के काँटे (नीवार शूक) की बराबरी कर सकने में भी शंका कर बैठे हैं?”

इतने सबल एवं तर्कसंगत प्रमाणों के बावजूद भगवन भक्त के आगे अपने ‘विराट पुरुष’ ‘त्रिविक्रम’ ‘विश्वरूप’ आदि होने का दम भर सकेंगे भला? पतितपावन उपनिषत्सार से सिंचित निगूढ़ भक्ति-भावना को कैसी मनोहारिणी व्यंजना है! यही भक्ति की स्फीत अंतर्वर्तिनी धारा माला के मनकों में बिंधे सूत्र की तरह, शतक के प्रत्येक पद्य में, निंदा की आड़ में, निहित रहती है।

तेलुगु में प्रबंध काव्यों के नाम से जो कृतियाँ प्रसिद्धि पा चुकी हैं, उनमें तथा इन शतकों में भाषा व शैली की दृष्टि से बड़ा अंतर रहता है। प्रबंध काव्यों की रचना या तो निज पांडित्य प्रदर्शन के लिए या आश्रयदाता राजा-रइसों के मन बहलाव के लिए कवि लोग किया करते थे। अत: उन्हें शाब्दिक-चमत्कार, लंबी-लंबी समास-योजना का दंगल ही कहा जा सकता है। उनमें तत्कालीन मानव जीवन का अमलिन प्रतिबिंब बहुत कम दिखाई देता है। किंतु शतक-साहित्य की प्रत्येक पंक्ति अपने में जीवन की सच्चाई व गहराई लिए रहने के कारण सीधे जा कर पाठकों के अंतस्तल छू लेती है। दुरूह समास व अलंकारिक योजना एवं कठिन शब्द-विन्यास को ही यदि काव्य का प्राण कहा जाए, जैसा कि प्रबंध-कालीन कवियों का उद्देश्य रहा था, और सारल्य, सादगी, प्रासादिकता, जीवन-स्पर्शी घरेलूपन आदि गुणों का कोई मूल्य ही न आँका जाए तो यही कहना पड़ेगा कि प्रबंध-काव्य सजीव प्रेत है और शतक-काव्य निर्जीव चैतन्य!

एक दूसरा अंतर जो शतक-काव्य को प्रबंध काव्य से अलग कर रखता है, यह है कि ये शतक मुक्तक रचनाओं के अंतर्गत आते हैं। उनके पद्यों में पूर्वापर संबंध का सर्वथा अभाव रहता है; प्रत्येक पद्य अपने में समग्र एवं संपूर्ण होता है। यही कारण है कि ऐसी रचनाओं में प्रकृति-वर्णनों (बाह्य अथवा आंतरिक) के विकास का क्रम गोचर नहीं होता। ये रचनाएँ बाह्य प्रकृति (जड़) के वर्णनों से तो प्राय: रहित रहती हैं। कारण स्पष्ट है। अधिकतर शतककार भक्त, उपदेशक, सूक्तिकार या संसार से विरक्त प्राणी रह चुके, जिनका मन जड़ प्रकृति-सौंदर्य की तरफ जा नहीं पाता था। प्रकृति में लीन हुए बिना कवि उसका सजीव-चित्र प्रस्तुत नहीं कर सकता है।

भक्ति, नीति एवं विराग-प्रधान शतकों के अतिरिक्त शृंगार को वर्ण्य-विषय का सर्वस्व बनाए चलनेवाली रचनाएँ भी तेलुगु में अनेक पाई जाती हैं। फिर भी प्रचुरता तो निस्संदेह भक्ति एवं नीति संबंधी रचनाओं ही की है। इस संक्षिप्त विवरण के बाद दो-चार प्रसिद्ध शतककारों की रचनाओं से बानगी के तौर पर एक-एक पद्य सानुवाद प्रस्तुत करके यह लेख समाप्त किया जाएगा।

  1. परम भक्त पोतना के नारायण-शतक का एक अत्यंत लोकप्रिय उदाहरण लीजिए–

“घर सिहासनमैं, नंबु गोडुगै, तद्देवतल भ्रुत्युलै,

वरमाम्नायमु लेल्ल वंदि गणमैं, ब्रह्मांड मागारमै,

सिरि भार्यामणियैं विरिंचि कोडुकैं श्री गंग सत्पुत्रियै,

वरुसन्नी घनराजसंबु निजमैं वर्द्धिल्लु नारायणा!”

हे नारायण! तुम्हारी राज्यश्री नित्य एवं सत्य सुंदर बन कर अनोखे ठाठ के साथ प्रगति कर रही है। देखो, यह (विशाल) धरा ही तुम्हारा सिंहासन है; नभ छत्र है; वहाँ के देवता लोग नौकर-चाकर हैं; श्रेष्ठ आम्नाय (वेद) ही बंदीजन हैं; यह समस्त ब्रह्मांड (घर) है; माता लक्ष्मी पटरानी हैं; ब्रह्मा पुत्र हैं; पतित-पावनी जाह्नवी ही उत्तम पुत्री है!

अहा! कैसी भव्य भावना है! कैसी विराट कल्पना है!

  1. तेलुगु साहित्य के कबीर महान योगी वेमना के नीति, विराग एवं तत्व प्रधान शतक का एक उदाहरण–

“भूमि नादियन्न, भूमि पक्कुन नव्वु,

दानहीन जूचि धनमु नव्वु,

कदन भीतु जूचि कालुडु नव्वुरा!

विश्वदाभिराम विनुर वेमा!!”

हे समस्त विश्व को आनंदित करने वाले वेमन्ना! सुनो। (यदि कोई कहे कि) भूमि मेरी संपत्ति है, तो (उसकी मूर्खता पर) भूमि ठठाकर हँस देती है! दान हीन (कंजूस) को देखकर धन हँस पड़ता है! रण से डरने वाले को देख कर काल (यमराज) अट्टहास कर बैठता है!

  1. महाकवि धूर्जटि कृत ‘कालहस्तीश्वर शतकं’ का एक पद्य–

“रोसी रोयदु कामिनी जनुल तारुण्योरु सौख्यंबुलन्

बासी बायदु पुग मिज जन संपद्भ्रांति, वांछालतल।

कोसी कोयदु नामनंबकट नीकुं ब्रीतिगा सत्क्रियल

चेसी चेयदु दीनि त्रल्लणपवे श्री कालहस्तीश्वरा!”

हे भगवन कालहस्तीश्वर महादेव! मेरा मन कामिनी जनों के सुखों के संतत-भोग से ऊब कर भी विरत नहीं होता है; पुत्र, मित्र कलत्र व संपत्ति से दूर रह कर भी उस भ्रम से छुटकारा नहीं पाता; कामनालताओं का विच्छेद करके भी उनके आकर्षण से निस्तार नहीं पाता; हाय! हाय! तुम्हें संपूर्ण रूप से संतुष्ट बनाने के लिए अनेक सत्कर्म अनुष्ठित करने पर भी यह ज्यों का त्यों उद्धत बना हुआ है! प्रभो! इस (बिगड़ैल मन) का दर्पदलन कर दो न!

  1. ‘भास्कर शतक’ के नाम से प्रसिद्ध रचना का एक उदाहरण–

“वंचन यिंतलेक येटुवंटि महात्मुल नाश्रयिंचिनन्

कोंचेमे कानि मेलु समकूडददृष्टमु लेनि वानिकिन्

संचित बुद्धि ब्रह्मननिशंबुनु वीपुन मोचुनट्टि रा–

यंचकु दुंप तूंड्लु तिननाये गदा फलमेमि भास्करा?”

हे भास्कर! तकदीर नहीं खुलने पर आदमी, कितने ही महिमावाले व्यक्तियों की, सच्चे दिल से कैसी ही सेवा कर ले, उसका रत्तीभर भी फायदा नहीं होता। देखो, हंस तो बड़ी लगन तथा सचाई के साथ दिन-रात ब्रह्मा जी को अपनी पीठ पर ढोता रहता है। किंतु फिर भी उसके भाग्य में (कमल) कंद तथा (कमल) नाल ही खा कर रह जाना बदा है!

  1. श्री ताडेपल्लि पानकालराय कृत ‘मानस बोध’ शतक का एक पद्य–

“तनु बेनु बामु पट्टकोन दद्वदनंबुन नुंडि योगलन्

गनि तिननेगु कप्प गति, गालभुजंगमु तन्नु भ्रिगंगा

घन विषयालि गोरेडि जगंबिदि, नित्यमु गानिदंचुनी

वनिशमु गांचि बेग मनसा हरि पादमुलाश्रयिंपुमा!”

हे मन! हरिचरणों की शरण में जाओ! (दुनियावालों की मूर्खता से उपदेश ग्रहण कर लो।) देखो, एक मेढक भयंकर सर्प के जबड़ों में फँस गया है। (उसके प्राण निकलना चाहते हैं) किंतु उस दशा में भी वह चारों ओर भिनभिनाने वाली मक्खियों को निगल जाना चाहता है! ठीक इसी प्रकार यह जग (प्राणी) काल-भुजंग के जबड़ों में पिसते रहने पर भी क्षुद्र विषय वासनाओं की चाह नहीं छोड़ता!

इन प्राचीन कवियों के अलावा कई आधुनिक कलाकार भी शतक-साहित्य को सजा-सँवारने में तत्पर हैं। उनकी लगन के फल-स्वरूप इधर बीसों शतक ग्रंथ निकल पड़े हैं। ‘भक्त चिंतामणि शतक’ तो अन्य शतकों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय बन गया है। स्व. श्री वड्डादि सुब्बारायुडु इस सुंदर भक्ति प्रधान शतक के लेखक रहे। स्व. मधुर कवि मा. बुच्चिसुंदररामशास्त्री जी का ‘मृत्युंजय शतक’, श्री मु. वीरभद्रमूर्ति कृत ‘मूकपंचशती1’ का सरस अनुवाद वगैरह कितनी ही अन्य रचनाएँ वर्तमान शतक-साहित्य की श्री–वृद्धि कर रही हैं।


1. प्रसिद्ध मूक महाकवि ने भगवती कामाक्षी के कृपा-बल से संस्कृत में यह उत्तम रचना बनाई, जो भाव-सौंदर्य एवं भाषा-सौष्टव में अपना सानी नहीं रखती है।


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