बदरीनाथ

बदरीनाथ

“भूतपूर्व रावल साहब बतला रहे थे कि मैंने यहाँ सूर्य की एक खंडित मूर्ति देखी थी किंतु अब वह दिखाई नहीं देती। जान पड़ता है यात्रियों के साथ पुरानी मूर्तियों के व्यापारी भी आते रहे हैं, जिनके कारण एक भी खंडित मूर्ति बचने नहीं पाई।”

केदारनाथ के रास्ते में जिस तरह आसानी से घोड़े मिल जाते हैं, वही ख्याल बदरीनाथ के बारे में भी हमारे मन में था। यद्यपि इधर घोड़े कम नहीं हैं, किंतु अधिकतर वह माल ढोने का काम करते हैं, खाली घोड़े मुश्किल ही से मिलते हैं। लेकिन हम प्राय: खाली हाथ थे। पछतावा यही था, कि पीठ पर ढोने का थैला क्यों नहीं साथ लाए। फिर तो हाथ के पोर्टफेन को उसमें रखकर सीटी बजाते आनंद के साथ यात्रा कर सकते थे। हाँ, चिंता थी तो यही, कि हर जगह बनी-बनाई रोटी नहीं मिलेगी।

मठ से अगली चट्टी छिनका डेढ़ ही मील पर है। उदय सिंह ने बतलाया था, कि वह और नीतीवाले दूसरे बहुत से भोटांतिक परिवार आजकल छिनका ही में हैं। यही बात नीती, माना, नेलंग और आल्मोड़ा जिले के भोटांतिकों की है, जो जाड़ा आते ही अपने 10-11 हजार फुट ऊँचाई के गाँवों को छोड़ कर नीचे की ओर खिसकने लगते हैं। उनके गाँवों में अक्तूबर ही में सर्दी तेज हो जाती है, और वर्षा की जगह बादल बर्फ बरसते हैं। उनके गाँव भी ऐसे स्थान में हैं, जहाँ वृक्ष क्या झाड़ियाँ भी नहीं उगतीं। ऐसी जगहों में जाड़ा बिताना पशु-प्राणी के लिए संकट मोल लेना है। इसीलिए अचिंत्यकाल से उनके यहाँ परिपाटी चली आई है, शरद के अंत होते ही लोग अपने गाँवों को छोड़कर नीचे की ओर चल देते हैं। गाँव में घर पीछे एक या गाँव पीछे कुछ आदमियों को तब तक के लिए छोड़ दिया जाता है, जब तक कि बर्फ पड़कर उनके मकानों की सारी दीवारों को ढक नहीं लेती। लोग अपने घरों की सभी चीजें अपने साथ तो नीचे नहीं ले जा सकते, इसलिए उनकी रक्षा के लिए गाँवों में कुछ आदमियों को छोड़ना आवश्यक है। यदि अपने या पड़ोस के गाँवों के आदमियों के मुँह में पानी न भरे, तो भी डांडे पार तिब्बती लोग रहते हैं, जिनमें डाकुओं की संख्या कम नहीं होती।

आजकल भोटांतिक लोग अपनी भेड़-बकरियों, गायों, गदहों, घोड़ों को लिए, बच्चों को पीठ पर बाँधे या अँगुली पकड़ाए ऊपर की ओर जा रहे थे। कृषिजीवी होते हुए भी ये लोग साल में दो बार घुमंतू जीवन का आनंद लेते हैं। जिनके पास पैसा-कौड़ी है, उनकी स्त्रियाँ अपने सारे जेवरों को पहने अच्छे कपड़े-लत्ते के साथ चल रही थीं। यहाँ की भोटांतिक स्त्रियों में सूती कपड़े की शोभार्थ एक ओढ़नी ओढ़ने का रेवाज है। यह लड़कों के कंटोप (कुलबारे) की तरह शिर से पैरों तक पहुँचती है। शिर के अगले भाग में बहुत अच्छा सुई का काम भी होता है।

हमें मंजिल मारनी थी, इसलिए उदय सिंह के बारे में पूछताछ नहीं की। उन्होंने जोशीमठ में मिलने के लिए कहा था और इस बात का बहुत आग्रह किया था, कि मैं उनके साथ बांपा (नीती) चलूँ। साढ़े चार मील चलकर सिया सैंण चट्टी में कुछ साफ-सुथरी एक दूकान में प्याले रखे देखकर सोचा, चाय पी लें। चाय पीने से भी ज्यादा इच्छा थी घोड़े के बारे में पुछ-ताछ करने की। तरुण दूकानदार ने ताजी चाय बनाकर के पिलाई और बतलाया, कि एक मील आगे हाट गाँव में अलकनंदा के लोहे के पुल के पास के दूकानदार के पास बहुत अच्छा घोड़ा है। थोड़ी देर में मैं पुल पार करके उस दूकान पर पहुँच गया। चलते हुए सोच रहा था, कारण कुछ भी हो, कुमाऊ गढ़वाल में हाट ऐसे गाँव को कहते हैं, जो कि कभी किसी सामंत की राजधानी रहा हो। ऐसे गाँव में किसी पुराने मंदिर का मिलना आवश्यक है। सड़क के ऊपर गाँव है। देखा उसके एक छोर पर एक कत्यूरी मंदिर खड़ा है। दूकानदार (केदार दत्त) से बहुत मोल-भाव नहीं करना पड़ा। उन्होंने रुपया मील पर घोड़ा देना स्वीकार कर लिया। शायद मोल-भाव करने पर बारह आना मील भी हो जाता, लेकिन मुझे उसकी इच्छा नहीं हुई और पीछे जब देखा, कि अन्न छोड़कर एक रात में घोड़े को खाने के लिए तीन-तीन रुपये की घास लग जाती है, तो यह कोई महँगा सौदा नहीं मालूम हुआ।

थोड़ी देर ठहरना पड़ा, क्योंकि घोड़ा पहाड़ पर चर रहा था। घोड़े की मजूरी में आदमी की मजूरी भी शामिल थी, लेकिन हमें तो आदमी से रसोइये का काम भी लेना था और इस श्रम के लिए भोजन में साझीदार बनाना था। मुझे यह विश्वास नहीं था, कि केदारदत्त जी के भाई वाचस्पति भोजन बनाने में इतने निपुण होंगे। मुझे उतने प्रकार की तो आवश्यकता नहीं थी, लेकिन देखता था, रोटी, दाल, भात, तरकारी सभी चीजें वह बहुत स्वादिष्ट बनाते थे और फुर्ती के बारे में कहना ही क्या। वाचस्पति 26-27 वर्ष के तरुण होंगे, किंतु इसी उमर में मसूरी और दूसरी जगह में कई साल रसोई बनाने का काम कर चुके हैं। घोड़े पर चढ़ते ही मालूम हुआ, कि अब दिन में बीस-पचीस मील चलने में मुश्किल नहीं होगा। पुल पर से ही, चढ़ाई शुरू हो जाती है जो दो मील चलकर पीपलकोटि ही में खतम होती है। पीपलकोटि बड़ी चट्टी नहीं, बल्कि इसे बाजार कहना चाहिए। यहाँ सभी तरह की चीजें मिलती हैं। हमको जब वहाँ माल्टा के सुंदर और स्वादिष्ट फल मिले, तो ख्याल आया, सचमुच हिमालय की यह भूमि स्वादिष्ट फलों की खान है, यदि अकल से थोड़ा काम लिया जाए। पीपलकोटि में अच्छी जात की भेड़ पैदा करने के लिए भी सरकार की ओर से इंतजाम है, लेकिन जिसका लाभ धीरे-धीरे होता है, उसकी ओर हमारे ग्रामीणों का ध्यान भी धीरे-धीरे जाता है।

रास्ते में हर जगह मील-मील, दो-दो मील पर चट्टियाँ और टिकान हैं। वाचस्पति से सलाह हो चुकी थी, कि आज जोशीमठ चल के रहा जाए। अब तो यह भी ख्याल आ रहा था, कि घोड़े से निश्चित हो जाने के कारण नीती की यात्रा भी निश्चित है। पीपलकोटि से साढ़े तीन मील पर टँगनी चट्टी मिली, जो ईसा की पहली सदी में भी प्रसिद्ध इस जनपद के तंगण नाम को बतला रही थी। इसी ने छोटी जात के मजबूत और फुर्तीले घोड़ों को टांघन नाम दिया; किंतु आजकल यहाँ घोड़ों के पालन का विशेष रेवाज नहीं है। अभी कुछ सबेरा था, इसलिए तीन मील आगे पाताल गंगा चट्टी में भोजन बनाने-खाने के लिए दोपहर को ठहरे। चट्टी के पास प्राय: आधा मील तक बरसात में बराबर पहाड़ गिरता रहता है। ढीले किस्म की मट्टी अधिक और पत्थर कम है, इसी कारण बरसात में यहाँ सड़क बह जाती है। बरसात के लिए चक्कर काटकर के ऊपर से एक सड़क निकाली गई है। मोटर सड़क तो इससे बचने के लिए अलकनंदा पार से घुमाई गई है।

चमोली से जोशीमठ साढ़े 28 मील है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने जोशीमठ तक मोटर की सड़क बनवाने का संकल्प ही नहीं कर लिया, बल्कि आखिरी 4-5 मील छोड़कर सड़क बन भी गई है। बीच में पुल नहीं बन पाए हैं, लेकिन हमारी सरकारें कितनी सूझ-बूझ रखती हैं, यह सड़क उसका उदाहरण है। दो-दो चार-चार मील हर साल बढ़ाने की जगह सरकार ने एक ही बार सारी सड़क को बना लेना चाहा। जब जेब की हालत देखी, तो जैसे और कितने ही काम छानकर छोड़ दिए गए, वैसे ही यह सड़क भी छोड़ दी गई। चलते हुए काम को, कहते हैं, तार देकर रुकवाया गया। कोई पूछे कि जनता की गाढ़ी कमाई के दस-बारह लाख रुपये जो वर्षा से बहने के लिए छोड़ दिए गए हैं, उसकी जिम्मेवारी किस पर है? यह पहले ही ख्याल कर लेना चाहिए था, कि पैसे की कमी के कारण कोई बाधा तो नहीं होगी। पैसे की कमी के बारे में क्या पूछते हैं? जहाँ फजूल खर्ची में लखनऊ के नवाबों को मात किया जाता हो, वहाँ पैसा रहेगा कैसे?

दोपहर को दो ढाई घंटे के लिए पाताल गंगा में ठहरे। हमारे चूल्हे के पास ही हरियाणा की तीन-चार ग्रामीण स्त्रियाँ रोटी बना रही थीं। अभी उनका घर का लाया आटा खतम नहीं हुआ था। वह 20-25 रुपए में सारी यात्रा करके घर लौट जाना चाहती थीं। अगर रेल और मोटर का सवाल न होता, तो शायद और भी कम खर्च करतीं। एक तरफ हमारे देश में 100 में से 90 ऐसे लोग हैं, जिनके लिए पैसा अब भी अशर्फी का मोल रखता है और दूसरी तरफ हमारे प्रधान-मंत्री हैं, जिनको अशर्फी भी पैसे-जैसी मालूम होती है। भोजनोपरांत फिर चले। घोड़े की सवारी मैं चढ़ाई में ही पसंद करता हूँ, उतराई में चढ़ना अपनी और घोड़े दोनों की साँसत करना है।

मुझे मालूम नहीं था, कि पाताल गंगा में एक अच्छी टोली साथ के लिए तैयार है। नागपुर के पंडित ऋषीकेश शर्मा की बीवी मिलीं। वह चार-पाँच सहयात्री स्त्री-पुरुषों के साथ बदरीनाथ जा रही थीं। उनका आग्रह देखकर ही नहीं, वैसे भी मेरा मन कर रहा था, यदि घोड़ा न होता, तो पैदल यात्रा बड़ी अच्छी रहती। दिन में तीन-तीन बार स्वादिष्ट भोजन तैयार मिलता और बात करने के लिए शिक्षित भद्र पुरुषों और देवियों का साथ। लेकिन अब तो बदरीनाथ तक के लिए घोड़ा किराया कर चुका था। घोड़े को उनकी चाल से चलाने में वाचस्पति को दुख होता और उन्हें घोड़े की चाल से चलाना, यदि संभव भी होता, तो भारी अत्याचार होता। मैंने केवल अफसोस ही नहीं प्रकट किया, बल्कि साथ ही अकाल-दर्शन के लिए प्रसन्नता भी जाहिर की। आगे दो मील पर गुलाबकोटि और उससे दो मील पर हेलङ् चट्टी थी। हेलङ्! यह विचित्र-सा शब्द शायद प्राचीन किरात भाषा का अवशेष है। यहाँ से कुछ आगे बढ़ने पर अलकनंदा के परले पार ऊँचाई पर एक विस्तृत ढालुवाँ पर्वतभूमि दिखाई पड़ी, वहाँ कई गाँव और लहलहाते खेत थे। मुझे मालूम था, उस गाँव में कई कत्यूरीकालीन प्राचीन मंदिर हैं। वहाँ ऐतिहासिक सामग्री काफी होगी, इसमें संदेह नहीं, किंतु इतनी उतराई-चढ़ाई करके दो-तीन दिन लगाने के लिए मेरे पास समय कहाँ था? मैंने तो पहले ही समझ लिया था, कि केदारखंड के ऐतिहासिक स्थानों में से हाँड़ी के चावलों की तरह मैं कुछ ही को देख सकूँगा। जोशीमठ आधा मील रह गया, जब सिंहधारा चट्टी मिली! शंकराचार्य का फिर से स्थापित हुआ नया मठ यहीं पास में है। साइनबोर्ड भी संस्कृत में था, जो नारा लगा रहा था, “चलो वेदों की ओर”! सिंहधार में एक दूकान में मुसंबी के फल देखे। दूकानदार ने पूछा; सेब को कैसे साल भर रखा जा सकता है? इधर हाल में फलों की ओर लोगों का ध्यान गया। फलों के लिए यह अत्यंत अनुकूल भूमि हैं, यदि मोटर यहाँ तक आ जाए, तो यहाँ के फल जल्दी और सस्ते नीचे के शहरों में पहुँच सकते हैं। उस समय हाट से ऊपर-ऊपर गोपेश्वर तक की भूमि सेब, नासपाती, नारंगी, माल्टा आदि के बगीचों से ढँक सकती है। इस वक्त तो लोग सोचते हैं, यदि हम इसी तरह फलों को सात-आठ महीने रख सकते, तो यात्रा के वक्त इनकी अच्छी बिक्री होती। मुश्किल यह है, कि फल तैयार होते हैं जुलाई के बाद (सेब आदि तो सितंबर में पकते हैं) लेकिन यात्रा जून ही में करीब-करीब खतम हो जाती है।

अभी कुछ दिन था जबकि हम जोशीमठ पहुँचे। जोशीमठ का उल्लेख जोशिका के नाम से नवीं-दसवीं शताब्दी के कत्यूरी-शिलालेखों में आया है। बदरीनाथ मंदिर की बहियों में गाँव का नाम ‘जोशी’ है। यहाँ के पुराने निवासी जोशियाल कहे जाते हैं। जोशिका कत्यूरियों की राजधानी थी। कत्यूरी राज्य किसी समय सारे कुमाऊं-गढ़वाल तक नहीं, बल्कि शिमले तक फैला हुआ था। इतने बड़े राज्य की जोशिका इसीलिए रही होगी, क्योंकि वह उक्त राजवंश की पुरानी राजधानी थी। यद्यपि इस जगह पहाड़ बहुत कुछ ढालुवाँ है, जिस पर बस्ती काफी बढ़ाई जा सकती थी, लेकिन किसी विशाल राज्य की राजधानी के लिए यह स्थान अनुकूल नहीं हो सकता। नीचे गोचर या श्रीनगर में अच्छे-खासे नगर बसाने के लिए काफी समतल-सी भूमि है। हो सकता है, श्रीनगर में भी एक राजधानी रही हो, जहाँ जाड़ों में कत्यूरी दरबार लगता हो। यह तो मालूम है, कि श्रीनगर में पहले भी नगर था, लेकिन वहाँ कभी कत्यूरियों की राजधानी रही, इसका कोई प्रमाण नहीं। 1894 ई. की बाढ़ में श्रीनगर के पुराने ध्वंसांवशेष बहाए जा चुके हैं, इसलिए वहाँ से कोई नया प्रमाण मिलने की संभावना नहीं है।

जोशीमठ अच्छा-खासा गाँव है। चारों तरफ पहाड़ों का परकोटा-सा घिरा मालूम होता है, लेकिन वह शत्रु नहीं केवल दृष्टि रोकने के लिए ही है। 6150 फुट की ऊँचाई होने के कारण मेरे मसूरी के निवास स्थान (6500 फुट) से कम होते भी हिमालय के नजदीक होने के कारण यहाँ बर्फ अधिक पड़ती है। कम से कम जोशीमठ के पास की भूमि अलकनंदा के किनारे से ऊपर पहाड़ की रीढ़ तक तो मेवे की बागों से ढँक जानी चाहिए। कत्यूरियों के वक्त फलों की ओर कितना ध्यान था, यह नहीं कह सकते। शराब के लिए अंगूर की लताएँ तो यहाँ अवश्य होती होंगी। उनकी लाल शराब की कन्नौज के महलों में भी कम माँग नहीं रही होगी। जोशीमठ के 8-9 सौ वर्ष पुराने वैभव के अवशेष अब कुछ मंदिर रह गए हैं, जिनमें एक नरसिंह का मंदिर है और दूसरा वासुदेव का। यह दोनों मंदिर बदरीनाथ मंदिर के ही अधीन हैं। जाड़ों में बदरीनाथ का पट बंद होने पर कर्मचारी यहीं चले आते हैं। नरसिंह की मूर्ति छोटी है और उसके चमत्कारों की तरह-तरह के कथाएँ कही जाती हैं। वासुदेव मंदिर अधिक पुरातात्विक महत्त्व रखता है। मुख्य मंदिर में वासुदेव की प्राय: पुरुष प्रमाण पत्थर की मूर्ति है। मंदिर के चारों तरफ कई और छोटे-छोटे मंदिर हैं, जिनमें से कुछ में मूर्तियाँ ही हैं। दाहिनी ओर नवदुर्गा के मंदिर में नवदुर्गा की मूर्तियाँ हैं। यह आश्चर्य की बात है, कि जोशीमठ में टूटी या साबित मूर्तियाँ बहुत कम हैं। लेकिन इसका कारण मूर्तियों का वास्तविक अभाव होना नहीं है, बल्कि पिछले सवा-सौ वर्षों से उनके ग्राहकों की संख्या जिस प्रकार बढ़ती रही, उसके कारण किसी भी खंडित मूर्ति का बच रहना संभव नहीं था। भूतपूर्व रावल साहब बतला रहे थे, कि मैंने यहाँ सूर्य की एक खंडित मूर्ति देखी थी, किंतु अब वह दिखाई नहीं पड़ती। जान पड़ता है कि यात्रियों के साथ पुराने मूर्ति व्यापारी भी आते रहे हैं, जिनके कारण एक भी खंडित मूर्ति बचने नहीं पाई। अब जो वासुदेव जैसी थोड़ी-सी मूर्तियाँ हैं, वे अखंडित हैं। 1741-42 ई. में रुहेलों के हाथों से यह कैसे बच गईं। हो सकता है, रुहेला टुकड़ी को पुजारियों ने अच्छी रिश्वत दे दी अथवा मूर्ति ही को छिपा दिया।

आज रात को यहीं विश्राम किया। जोशीमठ से तिब्बत के दो रास्ते जाते हैं–एक नीती डांडा होकर जिसमें भोटांतिक लोगों के दस-ग्यारह गाँव हैं और दूसरा भाणा होकर। इस तरह बदरीनाथ अर्थात् भाणा डांडे की ओर पुराने अवशेष पांडुकेश्वर और बदरीनाथ के रूप में हैं, उसी तरह नीती के रास्ते में भी भविष्यबदरी, तपोवन आदि प्राचीन मंदिरों के स्थान हैं। यद्यपि तपोवन के पास भविष्यबदरी को बतलाया जाता है, लेकिन संभव है वहाँ वास्तविक बदरी (अर्थात् भूतबदरी) रहा हो। 9वीं-10वीं शताब्दी के कत्यूरी ताम्रपत् में तपोवनीय बदरिकाश्रम भगवान लिखा हुआ है, जिससे मालूम होता है, कि बदरिकाश्रम आज के बदरीनाथ नहीं, बल्कि तपोवन के पास था। तपोवन आज भी इसी नाम से प्रसिद्ध है और नीती के रास्ते पर जोशीमठ से सात मील पर अवस्थित है। वहाँ पुराने मंदिर भी हैं और गर्मकुंड भी, जिसके कारण उसका नाम तपोवन पड़ा। क्या जाने, भाणावालों की प्राचीन परंपरा सच्ची हो, जिसमें कहा जाता है, कि वर्तमान बदरीनाथ पहले लामाओं (तिब्बतवालों) के देवता थे। जोशीमठ का महत्त्व इसलिए भी बढ़नेवाला है, कि यही बारहों महीना रहने लायक ऐसी बड़ी बस्ती है, जहाँ नीती और भाणा से तिब्बत जानेवाले दोनों रास्ते मिलते हैं। तिब्बत में कम्यूनिस्टों के आ जाने का यह तो फल हुआ, कि नीती के बड़े गाँव बाम्पा और भाणा गाँव में अब सीमांतीय पुलिस-थाने बन गये, जो जाड़ों में जोशीमठ ही में आयेंगे। इसके अतिरिक्त हिमालय पार बहती हुई कम्यूनिज्म की बाढ़ को रोकने के लिए भारत इधर जो कुछ प्रबंध करेगा, उसका केंद्र जोशीमठ ही होगा। जोशीमठ तक मोटर सड़क आ जाने पर, इसमें संदेह नहीं, कि यहाँ फलों के बगीचों की अच्छी उन्नति हो सकेगी।