महर्षि रमण और उनकी ‘मैं’ की खोज (चिंतन : मनन)

महर्षि रमण और उनकी ‘मैं’ की खोज (चिंतन : मनन)

गाँधी-हत्या-कांड के बाद जब समाजवादी नेता श्री जयप्रकाश नारायण ने देश को आध्यात्मिक नेतृत्व देने के लिए महर्षि रमण का नामोल्लेख किया, तो संभवत: ही इस मनीषी की ओर लोगों की जिज्ञासा जगी! प्रस्तुत लेख उस जिज्ञासा की तृप्ति कर सकेगा, ऐसी आशा है।

महर्षि रमण की ख्याति अब सारे संसार में फैल चुकी है। दूर देशों से अनेक जिज्ञासु स्त्री-पुरुष आपके दर्शन के लिए और आपसे ज्ञान पाने के लिए रमणाश्रम में आकर महीनों ठहरते हैं। आश्रम मद्रास से प्राय: 100 मील दक्षिण-पश्चिम तिरुवनमले नगर के पास है। मद्रास से रामेश्वर जाने वाले रास्ते पर विलूपुरम् जंक्शन से ब्रांच लाइन पूरब की ओर पाँडुचेरी श्री अरविंद के आश्रम को जाती है और पश्चिम तरफ रमण-आश्रम को। तिरुवनमलाई स्टेशन से रमणाश्रम प्राय: दो मील है। मद्रास से बस भी सीधे तिरुवनमले जाती है और किराया सिर्फ तीन रुपया लगता है। स्टेशन के पास ही अरुणाचल महादेव का ज्योतिर्लिंग है। आश्रम पहाड़ के पास ही है। आश्रम के सामने सरकारी रास्ता है और रास्ते के उस पार छोटे-बड़े पक्के तथा फूस के मकान हैं, जिनमें महर्षि के भक्त रहते हैं।

निस्संदेह, आधुनिक भारत में रमण महर्षि सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी संत समझे जाते हैं।

आपका जन्म 30 दिसंबर 1879 को मदुरा से 30 मील दक्षिण तिरुचुली ग्राम में हुआ। इसके निकट कौडिंया नदी बहती है। कौडिंया को पापहरी भी कहते हैं। तिरुचुली एक पवित्र तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। तिरुचुली शब्द का अर्थ ओम्कार है। आपके पिता श्री सुंदरमय्यर सफल वकील थे और चचा संन्यासी हो गए थे।

बचपन में आपमें कोई विशेषता न दीख पड़ी। प्रतिभा भी साधारण-सी थी। पढ़ाई में भी कोई विशेषता न थी। हाँ, खेल-कूद में आप बहुत दिलचस्पी लेते थे। कुस्ती लड़ने, दंड-बैठक आदि में विशेष अभिरुचि थी। फुटबॉल खेलने और तैरने में बहुत मन लगता था। साधारण विद्यार्थियों की तरह झगड़ा-फसाद, मारपीट में भी रहते थे । अल्प-भाषी थे किंतु सोने में कुम्भकरण।

ग्यारह वर्ष की अवस्था तक तिरुचुली में तमिल का अध्ययन करते रहे। 1895 में पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई और चचा के साथ मदुरा रहने लगे। अमेरिकन मिशन हाई स्कूल की दसवीं श्रेणी तक उनकी शिक्षा हुई। इस समय भी इनमें आध्यात्मिकता का कोई चिह्न दिखाई नहीं पड़ता था, न भक्ति की ओर ही झुकाव था।

1895 के नवंबर में आपको तिरुचुली का एक आदमी मिला। वह तीर्थ-यात्रा से लौटा था। पूछने पर उसने कहा–“अरुणाचल से आ रहा हूँ”। न जाने क्या बात थी कि अरुणाचल का नाम सुनते ही महर्षि की नसों में बिजली दौड़ गई। लगभग इसी समय आपको ‘परिय पुराणम्’ की एक प्रति मिल गई। इस पुस्तक में द्राविड देश के तिरसठ शिवोपासक नायरों की वार्ता लिखी गई है। इस ग्रंथ को पढ़ते-पढ़ते आपके मानस में भक्ति की लहरें उठने लगीं। ऐसा तल्लीन हुए कि भूख-प्यास तक भूल गए।

एक वर्ष बाद 1896 में एक ऐसी घटना हुई कि उसने आपके जीवन की दिशा बदल दी। उन दिनों आप पूर्ण रूप से स्वस्थ थे। बीमारी का नामोनिशान न था। अचानक आपको डर लगा कि मरने वाले हैं। जान पड़ा कि मर रहे हैं। शरीर में किसी प्रकार का परिवर्तन दिखाई नहीं दिया, किंतु भावों का वेग इतना तेज था कि मृत्यु का भय और उसका अनुभव एक-सा होने लगा। शरीर सुन्न-सा हो गया। साँस रुक गई और होंठ बंद हो गए। किसी प्रकार की ध्वनि नहीं निकलती थी। आपको ऐसा भास हुआ कि शरीर वहीं लाश के समान पड़ा है। आपको विश्वास हो गया कि मृत्यु इसी को ही कहते हैं। इस घटना का गहरा प्रभाव आप पर पड़ा। आपकी दृष्टि अंतर्मुखी होने लगी, इष्ट-मित्रों का साथ छूटने लगा। खेल-कूद में जी नहीं लगने लगा। लड़ाई-झगड़े, मानापमान का भाव बिल्कुल बदल गया। एकांत-प्रिय हो गए। नियमित रूप से मदुरा के प्रसिद्ध मीनाक्षी देवी के मंदिर में जाने लगे। वहाँ एकांत में बैठकर भगवद्भक्ति की याचना करते। पढ़ाई में अब ध्यान न था और इसके परिणाम-स्वरूप सर्वत्र आपका तिरस्कार होने लगा। एक बार बड़े भाई ने रमण को आसन मारे ध्यान करते देखकर तानों में कुछ कटु वाक्य कह दिए। यह कटु वाणी तीर-सी चुभ गई। सहसा आपको अरुणाचल का स्मरण हो आया। उसी दिन घर से निकल पड़े। कुछ दूर गाड़ी पर, कुछ दूर पैदल, रास्ते की कठिनाई को झेलते हुए अरुणाचल पहुँचे। अरुणाचल के ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते आपने संसार से सब नाता तोड़ अपने-आपको श्री अरुणाचल के चरणों में समर्पित कर दिया और इसी 1 सितंबर 1896 को इनके भावी दिव्य जीवन का आरंभ हुआ। इस चिरस्मरणीय दिन की स्वर्ण-जयंती, तीन साल हुए, आपके भक्तों ने बड़े धूमधाम से मनाई और उस अवसर पर संसार के भिन्न-भिन्न देशों के अनेक महानुभावों के द्वारा प्राप्त महर्षि संबंधी आत्मोद्गार एवं श्रद्धांजलि के संग्रह-रूप में जो स्मारक-ग्रंथ प्रकाशित किया है, वह अति उपादेय और पठनीय है।

तपश्चर्या के विचार से आपने संन्यास ग्रहण किया। मंदिर में रहने लगे और मौन धारण किया। महर्षि का कथन है कि जीव और ईश्वर का भेद मिटने पर जो सहज समाधि प्राप्त होती है, उसी में स्थित रहने का नाम मौन है। मंदिर के भीतर एक जगह बैठकर आप तप करने लगे। कोई खाने को देता, तो खा लेते। किसी से माँगने न जाते। लड़के और ऊधमी युवक सिर्फ 17 वर्ष के नवयुवक को तपश्चर्या में लीन देख कर कौतूहलवश अथवा शरारत से निंदा और हँसी-मजाक करते और पागल कहते। कुछ दुष्ट तो ईंट-पत्थर भी फेंकने से बाज नहीं आते। इससे तपश्चर्या में बाधा पड़ने लगी। अतएव मंदिर के एक घोर तहखाने में चले गए, जहाँ कीड़े-मकोड़ों का राज्य था। कीड़े उनके पैर और जाँघों को काटते; किंतु आप इस प्रकार ध्यान में मग्न रहते कि उसका ज्ञान भी नहीं होता। बेंकटाचल गोदली नामक एक सहृदय सज्जन का ध्यान उधर आकृष्ट हुआ और उसने एक साधु की सहायता से घाव और पीव से भरे इनके शरीर को उठाकर सुब्रह्मण्य स्वामी के गोपुर में लिटा दिया। उठाकर ले जाते समय भी आपकी समाधि नहीं टूटी। इससे लोगों की श्रद्धा बढ़ गई और आपका नाम ब्राह्मणस्वामी पड़ गया। यहाँ प्राय: बराबर ध्यानमग्न रहते। आँखें न खुलती थीं। इसके बाद महर्षि मंदिर के दक्षिण-पूर्व ओर स्थित बगीचे में चले गए और तत्पश्चात् वाहन मंडप में रहने लगे। लड़कों ने पुन: छेड़-छाड़ शुरू कर दी और महर्षि दूसरी जगह एकांत तपस्या में रत हुए। एक दिन एक लड़के ने महर्षि की पीठ पर पेशाब कर दिया। तदनंतर तंविरान नाम के एक शैव साधु ने महर्षि से अपने गुरुमूर्तम् मंदिर में रहकर तपस्या करने का अनुरोध किया जिसको महर्षि ने स्वीकार किया। आपने यहाँ कठोर तपस्या की। महर्षि की ख्याति दूर-दूर फैल गई। आप यहाँ डेढ़ वर्ष रहे। जब भीड़ बढ़ने लगी, तब आप बेंकटराम के निकटस्थ बगीचे में रहने लगे। यहाँ आने पर समाधि सहज, नित्य हो गई। बाद में महर्षि पवलकुन्नु अथवा प्रवालगिरी पर रहने लगे। उनकी माताजी पता लगाते-लगाते वहाँ पहुँचीं और घर वापस ले जाने का निष्फल प्रयत्न किया। फिर रोते-रोते घर लौट गईं। कुछ काल के बाद माताजी ने महर्षि के आश्रम में ही रहकर भगवद्भक्ति में मग्न रहते हुए प्राण त्याग किया।

1899 में महर्षि अरुणाचल पर्वत के तिरुपक्षि गुफा में रहने लगे। इस गुफा के उत्तर में मूलैपाल तीर्थ है और वहाँ भी एक गुफा है। कुछ और ऊपर जाकर स्कंदाश्रम है, जिसके पास पानी का एक सोता बहता है। बड़ा सुंदर और रमणीक स्थान है। यदा-कदा महर्षि इन स्थानों में भी रहते थे। पहाड़ पर साँप, बंदर, मोर आदि थे। आश्रम के साँप और मोर को स्वाभाविक बैर-भाव छोड़कर मित्र के ऐसा विचरण करते और साथ-साथ नाचते देखकर लोगों को कौतूहल होता था।

सितंबर 1896 को महर्षि ने मौन धारण किया था और प्राय: 11 वर्ष बाद 1907 में आपने सर्वप्रथम गणपति मुनींद्र को उपदेश दिया था। गणपति मुनींद्र असाधारण प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। 18 वर्ष की आयु में विद्या में असाधारण क्षमता प्राप्त की थी। निरंतर मंत्र-जप में लगे रहते थे। शिव पंचाक्षरी का कोटि-जाप किया था; किंतु शिव का साक्षात्कार न हुआ। अतएव शंका-निवारणार्थ महर्षि के पास आए और अपने को महर्षि के चरणों में समर्पित कर दिया। 15 मिनट तक महर्षि स्थिर दृष्टि से गणपति मुनींद्र की ओर देखते रहे। फिर धीरे-धीरे तमिल में इस प्रकार उपदेश दिया–

“अहमता का बोध जहाँ से निकलता है, उसी का परिशीलन करें तो मन उसी में लीन हो जाता है–यह तप है।”

“मंत्र के जपते समय मंत्र का नाद जहाँ से फूटता है, उसका परिशीलन करें, तो मन उसी में लीन हो जाता है–यह तप है।”

इस उपदेश से गणपति मुनींद्र की समस्त शंकाएँ दूर हुईं और मुमुक्षुओं के लिए सर्वदर्शन एवं योग के एक सरल महामंत्र की घोषणा हुई। तभी से महर्षि विख्यात हुए।

कुछ दिन के बाद भक्तों के आग्रह पर महर्षि पालितीर्थ के पास आकर रहने लगे। धीरे-धीरे यहाँ एक आश्रम बन गया। आश्रम की व्यवस्था तथा दिनचर्या अत्यंत सुंदर और सुविधा-जनक है। प्राय: आठ घंटे महर्षि के सान्निध्य में रहने का अवसर मिलता है।

प्रात:काल सूर्योदय के पूर्व प्राय: एक घंटे तक महर्षि के सम्मुख वेदपाठ एवं भजन होता है। ठीक सात बजे भोजन-गृह में महर्षि जाकर निर्दिष्ट स्थान पर बैठ जाते हैं। आश्रमवासी एवं अतिथि अगल-बगल और सामने बैठते हैं। यहाँ बड़ा-छोटा, राजा-रंक का भेद नहीं रहता। अपनी इच्छानुसार, जो जहाँ पाता, बैठ जाता है। जो-जो वस्तुएँ औरों को परोसी जाती हैं, वे अंत में महर्षि के पत्तल में दी जाती हैं। ऐसा ही महर्षि का आदेश है। आठ बजे से ग्यारह बजे तक महर्षि बड़े कमरे में सोफे पर एक बड़े तकिए के सहारे बैठ जाते हैं और दर्शनार्थी तथा मुमुक्ष इर्द-गिर्द बैठते हैं। यहाँ भी भेद-भाव नहीं हैं। महर्षि या तो सहज समाधि में रहते हैं अथवा कुछ लिखते-पढ़ते रहते हैं। 11 बजे भोजन की घंटी बजती है और भोजन के बाद 2:30 बजे तक विश्रामकाल रहता है। 2:30 से 5 तक तथा 6 से 7 तक महर्षि का सान्निध्य पुन: दर्शनार्थी को प्राप्त होता है। 7 बजे संध्या में भोजन की घंटी होती है। इस प्रकार 7 बजे जलपान, 11 बजे एवं 7 बजे संध्या के भोजन के अतिरिक्त 5 से 6, 8 से 11, 2:30 से 5 तथा 6 से 7 तक दर्शकों एवं आश्रम वासियों को महर्षि के सत्संग का अवसर मिलता है। यदि किसी को महर्षि से शंका-समाधान के उद्देश्य से कुछ पूछना होता है, तो वह खड़े होकर अंग्रेजी में पूछता है और महर्षि तमिल भाषा में समझाते हैं, जिसे योग्य दुभाषिया अंग्रेजी में समझा देता है।

महर्षि ने वैसे तो कोई शिष्य नहीं बनाया। आप आडंबर से दूर भागते हैं। मंत्र, तंत्र, योग-सिद्धियों इत्यादि की साधना को उत्तेजन नहीं देते। चमत्कारों को बिलकुल महत्त्व नहीं देते। फिर भी अनेक आध्यात्मिक साधक एवं मुमुक्षु भारतीय तथा विदेशी उनके आते रहते हैं, उनसे प्रभावित होते हैं और बगैर दीक्षा पाए अपने को शिष्य समझने लगते हैं। इनमें हिंदू, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, मुस्लिम आदि धर्म के अनुयाई हैं–विदेशी एवं भारतीय हैं। अपने-अपने धर्म पर आस्था रखते हुए महर्षि के उपदेशानुसार आत्मिक-शोध में निरंतर लीन रहते हैं। विदेशियों में हम्फ्रे, पालब्रंटन, फ्रेडरिक-फ्लेयर (भिक्षु प्रज्ञानंद) हैरी डिकमैन, राफेल हर्स्ट, मर्स्टन मीज (साधु एकरसा) रिचर्डसन, वर्नोसिया इदन, डाक्ट जंग, ग्रण्ट डफ, ओलिवर लाकुंबी, विलियम स्पौलडिंग, मेजर चाडविक, इला मेलर्ट, इलेनर पौलनी नोयी, डंकन ग्रीनलेस और भारतीयों में स्वामी सिद्धेश्वरानंद, सर राधाकृष्णन, प्रिंसिपल संजीवराव, कुपुस्वामी शास्त्री, मनुसूबेदार, दिलीप कुमार राय, जस्टिस चंद्रशेखर आयर, सरदार रुद्रराज पांडेय (नेपाल), सर अल्ल्पाचेटियर, सर सी. पी. रामस्वामी आयर, डाक्ट मोहम्मद सईद आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। पालब्रंटन का ‘गुप्त भारत की खोज’ (Search after Secret India) ने तथा अन्य पुस्तकों ने पाश्चात्य संसार का ध्यान विशेष रूप से महर्षि की ओर आकृष्ट किया।

महर्षि उपदेश नहीं देते, किंतु उनके संपर्क में आने से ही मनुष्य अपने में आध्यात्मिक उन्नति पाने लगता है। मन में शांत और प्रतिरोधहीन परिवर्तन होने लगता है। बड़ी निश्चिंतता के साथ पूछने के लिए तैयार प्रश्न एक-एक करके हल होने लगते हैं। जिन समस्याओं और उलझनों से मुमुक्षु चिंतित रहता है, उनका अंत होने लगता है और विचारत्रस्त मस्तिष्क को शांति मिलती है। सारांश, जैसे– पुष्प-पराग से सुगंध उठती है, वैसे ही महर्षि से आध्यात्मिक शांति की सुगंध निकलकर फैलती है, जिससे दर्शनार्थी मुमुक्षु प्रभावान्वित हुए बिना नहीं रह सकते।

भारत में इस समय जितने महात्मा, सिद्ध और योगी हैं, उनमें महर्षि रमण का स्थान बहुत ऊँचा है। जीवनमुक्त होने के कारण प्रदर्शन की वृत्ति लेश-मात्र नहीं है। आश्रम की ओर से किसी को प्रचार करने की अनुमति नहीं है। किसी को शिष्य नहीं बनाते। आपका विचार है कि मनुष्य को यदि गुरु करना है, तो स्वयं अपने ही अंदर अपनी आध्यात्मिक चेतना में गुरु की खोज करे। महर्षि कहते हैं कि अत्मा ही गुरु है । उसी को खोजो। आप आत्मानुभूति के उपदेष्टा हैं, समाजसेवा पर जोर देते हैं और सेवामार्ग में आगे बढ़ने के बाद ही एकांत में साधना करने की सलाह देते हैं। आपका विचार है कि भगवान में दृढ़-विश्वास ही सच्चा आसन है और कर्त्तव्य-पालन ही वास्तविक पूजा है। एकांत मनुष्य के चित्त की वृत्ति पर निर्भर है। सांसारिक वस्तुओं की ममता में फँसे हुए मनुष्य को निर्जन अरण्य में भी एकांतता का अनुभव नहीं होता; किंतु संसार के झमेलों में रहकर भी शांत चित्तवाले व्यक्ति को निर्जनता का बोध होता है। आसक्तिहीन चित्त के लिए हर जगह एकांत है। जो अवस्था, वाणी एवं विचार को भी अतिक्रमण करती है, वह मौन अवस्था है। यही ध्यान का रूप है। यह अवस्था चित्त को तीव्रता के संपूर्णतया अभाव होने पर ही प्राप्त होती है। चित्त का दमन ही ध्यान है। गंभीर ध्यान ही अनंत वाणी है। मौन ही भाषा का अविरोध प्रवाह है। उपदेश ज्ञान-प्रसार का एक साधारण तरीका है। यह सम्यकरूप से मौन द्वारा ही संभव है, अर्थात् मूक भाषा द्वारा ज्ञान का वितरण अधिक प्रभावशाली होता है। पवित्र संतों के सत्संग का जैसा मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है, वैसा व्याख्यान का नहीं। इस कथन की वास्तविकता का आभास हमें महर्षि के साथ सात दिनों के सत्संग से मिला।

यदि मनुष्य ईश्वर का ध्यान करे अथवा अपने शुद्ध स्वरूप का ध्यान करे, दोनों में भेद नहीं है। क्योंकि दोनों की परिणति (मकसद) एक ही है। ईश्वररूप हुए बिना ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हो सकता है। अपने शुद्ध-स्वरूप में अनंत, अटूट और स्वाभाविक रूप से मग्न रहने की अवस्था होना है। अपने स्वरूप में लीन होने के पूर्व अपने स्वरूप में प्रेम होना आवश्यक है। ईश्वर ही वह शुद्ध स्वरूप है। अपने स्वरूप का प्रेम ईश्वर का प्रेम है और, वही भक्ति है। ज्ञान और भक्ति एक ही वस्तु है। एक ही विचार में भिक्षा का लय रहना जप है। जप का एकमात्र उद्देश्य चित्त में उठने वाले अनेक विचारों का दमन है। जप से ध्यान होता है, जिसकी परिणति आत्मानुभूति अथवा ज्ञान में होती है। नाम-जप में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मभाव से करना और अनन्यभाव से आत्मसमर्पण अनिवार्य है। आत्म-समर्पण के बाद ही ईश्वर का नाम निरंतर मनुष्य के चित्त में व्याप्त रहता है। ज्ञान और पूर्ण आत्म-समर्पण में भेद नहीं है। इस पूर्ण आत्म-समर्पण में सब कुछ ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और प्रेम व्याप्त है।

आत्मा ही गुरु है अतएव ईश्वर गुरु का रूप धारण कर सत्य की शिक्षा देता है और अपने सत्संग से भक्त के चित्त को पवित्र कर देता है। भक्त का चित्त दृढ़ हो जाता है और अंतर्मुख होने में समर्थ होता है। ध्यान द्वारा यह और भी परिष्कृत हो जाता है। और, चंचलता शांत हो जाती है। वह शांत विस्तार ही आत्मा है।

गुरु एक ओर चित्त को अंतर्मुखी बनाता है और दूसरी ओर चित्त को आत्मा की ओर आकृष्ट करता है तथा चित्त को शांति प्राप्त करने में सहयोग देता है। यही गुरु-कृपा है। गुरु, ईश्वर और आत्मा में कोई भेद नहीं है। ईश्वर जो अंतरस्थ है, प्रेमी भक्त पर दया करके भक्त की चित्तवृत्ति के अनुसार अपने को प्रकट करता है। भक्त समझता है कि गुरु के रूप में ईश्वर मनुष्य है और उसके साथ मनुष्य का-सा संबंध रखना चाहता है। किंतु गुरु, जो स्वयं ईश्वर ही है, भक्त की गलतियों को आत्मबोध द्वारा सुझाते हुए सन्मार्ग पर आत्मानुभूति की अवस्था प्राप्त करने तक चलाता रहता है। अहम् भाव बहुत बलवान हाथी के सदृश है और उसका दमन सिर्फ शक्तिशाली शेर द्वारा ही हो सकता है। वह गुरु ही है, जिसके दृष्टिमात्र से अहम् भाव विलीन होने लगता है। अहम् भाव की शांति में ही मनुष्य की शोभा है और इसे प्राप्त करने के लिए हमें आत्म-समर्पण करना होगा। तभी ईश्वर समझेगा कि वह शिक्षा पाने का अधिकारी है और मार्ग प्रदर्शन करेगा। जब पूर्ण आत्मसमर्पण हो जाता है, आत्मभाव सर्वथा नष्ट हो जाता है, तब न शोक रह जाता है और न दुःख ही।

आत्मानुभूति की धार्मिक शक्ति समस्त गुप्त (जादू की) शक्तियों से बढ़कर है। आत्मानुभूति से आनंद होता है, जो शांति की परिणति है। चित्त के उपद्रव के अभाव में ही शांति हो सकती है और उपद्रव चित्त में उठते हुए विचारों के कारण ही होता है। जब चित्त की वृत्ति बंद हो, तब पूर्ण शांति होगी। जब तक मनुष्य चित्त का पूर्णतया दमन नहीं कर देता, वह शांति प्राप्त कर ही नहीं सकता और न सुखी हो सकता है। यदि मनुष्य स्वयं सुखी नहीं है, तो दूसरों पर सुख की वर्षा करने में कैसे समर्थ हो सकता है? जिस संत की चित्तवृत्ति पूर्णतया शांत है, वह अपनी आत्मानुभूति से दूसरों को सुखी बना सकता है।

महर्षि के उपदेश का केन्द्र “मैं” की खोज है। पहले ‘मैं’ को जानो। फिर तुम सत्य को जान सकोगे। तुमको केवल एक ही काम करना है। तुम अपने भीतर देखो और तुम्हें अपनी सारी उलझनों का जवाब मिल जाएगा। आत्मा के विषय में गंभीर विचार और सतत् ध्यान करो, प्रकाश मिलेगा।

जब मन आत्म-स्वरूप से बहिर्मुख होता है, तब जगत भासमान होता है। इस प्रकार जब जगत दीखता है, तब आत्मस्वरूप दिखाई नहीं देता और जब आत्मस्वरूप का दर्शन होता है, तब जगत नहीं दीखता। अपने स्वरूप की विचारणा करते करते मन निजी स्वरूप में पलट जाता है। वस्तुत: मन का निजी स्वरूप आत्मस्वरूप ही है। मन हमेशा किसी स्थूल वस्तु का आश्रय लेकर ही टिक सकता है। वह अपने आप नहीं टिक सकता। मन को ही सूक्ष्म शरीर वा जीव कहा जाता है। इस देह में जो “मैं” रूप से पैदा होता है, वही मन है। हृदय में अहम् विचार का प्रथम स्फुरण होता है, अतएव हृदय ही मन का जन्मस्थान है। मन में उठने वाले तमाम विचारों में अहम् विचार ही प्रथम विचार है।

“मैं कौन हूँ?”–की विचारणा द्वारा निश्चय ही मन का लय होता है। जिस प्रकार चिता की अग्नि को प्रदीप्त करने वाला बाँस अंत में खुद भी जल जाता है, उसी प्रकार अहम् विचार दूसरे सब विचारों का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाता है। “मैं कौन हूँ” की विचारणा की जाए, तो मन अपने जन्मस्थान में लौट जाता है और साथ ही उठा हुआ विचार भी नष्ट हो जाता है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों अभ्यास बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों अपने जन्मस्थान में स्थिर होने की मन की शक्ति बढ़ती जाती है। जब सूक्ष्म मन, बुद्धि और इंद्रियों द्वारा बहिर्मुख होता है, तब स्थूल नामरूप दृश्यमान होते हैं। जब मन बहिर्मुख होने नहीं पाता और हृदय में स्थिर हो जाता है, तब वह अहंमुख वा अंतर्मुख मन कहलाता है। जब मन हृदय के बाहर भटकने लगता है, तब वह बहिर्मुख मन कहा जाता है। यदि मन हृदय में स्थिर हो जाए तो “मैं”, जो सब विचारों का मूल है, अदृश्य हो जाता है। जिस दशा में अहम् विचार का लेश भी नहीं उसे स्वरूप-स्थिति कहते हैं। वास्तव में वही मौन कहलाता है। मौन की दशा का दूसरा नाम ज्ञान दृष्टि है और उसका अर्थ है आत्म-स्वरूप में मन का लय करना। इसके विपरीत दूसरों के विचारों को जानना, तीनों काल का ज्ञान होना, दूर देशों की घटनाओं को जान लेना आदि को ज्ञान-दृष्टि नहीं कह सकते। केवल आत्मस्वररूप ही सत्य है।

मन का लय करने के लिए आत्मविचार से अन्य कोई योग्य उपाय नहीं है। प्राणायाम से भी मन का निग्रह होता है। परंतु जब तक प्राण का निग्रह जारी रहता है, तभी तक मनोनिग्रह टिकता है। जब प्राणायाम बंद किया जाता है, तब मन बहिर्गामी होकर वासनावश हो जाता है और इधर-उधर भटकने लगता है। मन एवं प्राण का जन्म स्थान एक ही है। विचार ही मन का प्रथम विचार है और वही अहंकार है। मनोनिग्रह करने में प्राणायाम सहायक होता है; परंतु इसके द्वारा मनोनाश नहीं हो सकता।

प्राणायाम की तरह मूर्ति ध्यान, मंत्र-जप और आहार-नियम भी सहायक है। मूर्ति ध्यान और मंत्र-जप से मन एकाग्रता को प्राप्त होता है। नियमों में सबसे बड़ा सात्विक मिताहार का नियम है। इससे मन में सत्वगुण की वृद्धि होती है, जो आत्म-विचार में सहायक है। ज्यों-ज्यों स्वरूप ध्यान बढ़ता जाता है त्यों-त्यों वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। अतएव स्वरूप ध्यान में ही एकाग्र होने का अभ्यास निरंतर जारी रखना चाहिए।

जब तक मन में विषय-वासना भटक रही हो, तब तक “मैं कौन हूँ” की विचारणा आवश्यक है। किसी चीज की आशा न करना वैराग्य वा आशा त्याग है। आत्मस्वरूप का त्याग न करना ज्ञान है। वास्तव में वैराग्य और ज्ञान एक ही है। प्रत्येक साधक वैराग्य को धारण करके स्वस्वरूप के अंदर गहरी डुबकी लगाकर आत्ममुक्ति पा सकता है। आत्मस्वरूप की प्राप्ति न होने तक यदि आत्मस्वरूप का निरंतर स्मरण चालू रखा जाए, तो वही एक साधन काफी है।

आत्म-विचार के अलावा अन्य जो विचार पैदा हो, उनको जरा भी जगह न देते हुए, आत्मनिष्ठा में मग्न होकर रहना अपने-आपको ईश्वरार्पण करना, ईश्वर की शरणागति है। ईश्वर पर चाहे कितना भी भार रखा जाए, वह सारे बोझ का वहन करता है। अतः इस प्रकार की चिंता हम क्यों करें?

जो सुख कहलाता है, वह आत्मस्वरूप ही है। सुख एवं आत्मस्वरूप अलग नहीं है, आत्म-सुख ही एक मात्र सत्य है।

शुभ मन और अशुभ मन–इस प्रकार के दो मन नहीं है; मन एक ही है। सिर्फ वासनाएँ शुभ और अशुभ, इन दो प्रकारों की होती हैं। दूसरे लोग चाहे कितने ही बुरे मालूम हों, फिर भी उनका तिरस्कार मत करो, राग-द्वेष दोनों का त्याग करो, मन को सांसारिक विषय में अधिक मत बहाओ। जहाँ तक हो सके, दूसरों के कार्य में दखल मत दो।

यदि अहंकार जाग उठे, तो उसके साथ ही सब कुछ जाग उठता है। यदि अहंकार का नाश हो जाए, तो सब कुछ विलीन हो जाता है। हमारा बर्ताव जितना अधिकाधिक विनम्र होगा, उतना अधिकाधिक हमारा श्रेय होगा। मन वश में आ जाए, तो फिर चाहें कहीं भी हम रह सकते हैं।

बंधन में कौन है?–इस बात का विचार करके अपने यथार्थ स्वररूप को पहचानना ही मुक्ति है। मन को सदा आत्मा में टिकाए रखना आत्मविचार कहलाता है और अपने सच्चिदानंद ब्रह्म के रूप की भावना करना ध्यान है। “मैं कौन हूँ”–की विचारणा करनी चाहिए। वास्तव में अपने-आपको ज्ञान-नेत्र द्वारा ही जानना चाहिए।