नए वर्ष का स्वागत

नए वर्ष का स्वागत

1 जनवरी, 1949

एक और ‘नया वर्ष’ फिर आया।

कोई नई आशा? नहीं।

गत एक वर्ष के अंदर यह विचार और भी दृढ़ हो गया है कि निर्बलों का देवता ‘राम’ है, बलशालियों की देवी नियति–और नियति मनमौजी है, तरंगी है। मेरे करने से कुछ नहीं होता, कुछ-न-कुछ आप ही आप होता रहता है। जो हो जाता है, वह मेरे द्वारा हो या नहीं; उस कार्य के संपादन में मेरा कुछ भी सहयोग रहा हो या नहीं, नियति चाहेगी तो मेरे सर पर जबर्दस्ती थोप देगी। देवी का आदेश है, बलशाली पुन: अपने पथ पर रेंगते हुए अग्रसर होता है। विवशता के श्राप के साथ मिला है, प्रत्येक बार एक नए कटु अनुभव का वरदान भी।

कोई नया विश्वास? नहीं।

वही पुराना विश्वास–परिश्रम को उपास्य बनाओ, भाग्य स्वयं एक दिन तुम्हारा उपासक बनेगा–डिग-डिग कर भी अटल है, हिल-डुलकर भी अचल है।

कोई नई आकांक्षा? हाँ, केवल एक–कि देवी के चरणों पर सर्वस्व होम कर देने की शक्ति मिले, प्रेरणा मिले–बस और कुछ नहीं।

एक और ‘नया वर्ष’ फिर बीत गया।

सूरज पश्चिम की ओर एक पग और आगे बढ़ा, उदयाचल से एक पग और दूर–अस्ताचल के एक पग और समीप। अंधकार का पंजा एक बित्ता और आगे बढ़ा–परऽऽऽ, दोपहर तो अभी बीता नहीं (?) कोई पुरानी निराशा?

छोड़ो इसे। मैं अपनी निराशाओं को गिनकर भी नहीं गिन सका हूँ। पग-पग पर निराशा, अरे! पग तो कुछ लंबा भी होता है, पल-पल पर निराशा। कोई पुराना अविश्वास?

मजाक तो नहीं करते? क्या तुम्हारे यहाँ विश्वास नाम की कोई चीज है भी? तो फिर अविश्वास की बात क्या पूछ रहे हो।

कोई पुरानी आकांक्षा? (जो शेष रह गई हो?) तो ऐसा बोलो न। आकांक्षा भी क्या कभी पूरी हुई है? मेरे भाग्य! काश, एक बार झूठ ही कह देते–‘हाँ’।

4 जनवरी, 1949

मुझे चारों ओर निराशा ही निराशा दिखाई पड़ती है। टिमटिमाते तारों के सदृश्य आशाएँ प्रकट होती हैं पर मैं उन्हें कोई स्थिरता प्रदान नहीं कर सकता, स्थिरता उनमें है भी कहाँ? निराशा के झोंके आते हैं और इन नन्हीं-नन्हीं आशाओं के नन्हें-नन्हें पैर उखाड़ देते हैं–मैं आँसू बहाता देखता रहता हूँ इस पैशाचिक कृत्य को। मेरी शक्ति फूत्कार उठती है, चाहती है कि एक बार परीक्षा देकर अपनी परमता सिद्ध कर दे, पर न तो कोई उपयुक्त परिस्थिति पाती है और न कोई उपयोगी वातावरण। कोई अज्ञात शक्ति, उबलते हुए दूध की तरह जोर मारती हुई मेरी इन भावनाओं पर पानी छिड़क देती है। तो क्या मेरी यह शक्ति सिर्फ उबलने और उफनाने को ही बनी है? जोर मार-मार कर पेंदे में सट जाना ही क्या इन भावनाओं का काम है? मैं निराश चारों ओर नजर दौड़ाता हूँ, न तो कोई राह बताता है और न कोई कुछ सहायता ही प्रदान करता है? मेरे भाग्य। तुमने मेरे बारे में क्या सोच रखा है?

तुम्हें विश्वास होगा? रोज सोने के पहले मैं रो लिया करता हूँ। रोज सोने के पहले मैं अपने इस पुराने कंबल को एक बार देख लिया करता हूँ जो गत वर्ष की फरवरी तक बिछावन के साथ-साथ मेरे ओढ़ने का भी दायित्व निभाया करता था। रात भर एकांत कोठरी में जग कर, खट-खट करते हुए टेलीप्रिंटर के पास प्रेस में टाँगें छितरा कर, 4 बजे भोर जाड़े में ठिठुरते हुए प्रेस से डेरा आने के समय मैं जानबूझ कर अपनी न जाने कितनी भावनाओं को दबाया करता था, उन्हें विष पिलाया करता था–गला दबा कर मार दिया करता था। ठिठुरे हाथों से इस कंबल को सर से पैर तक लपेट कर जब मैं पड़ रहता, मेरी मरी हुई भावनाएँ अपने हाथों से कफन हटा-हटा कर जाग पड़ती थीं–वे मुझे भूत-सी दिखती थीं, मुझमें डर पैदा करती थीं। मेरा बिछावन, आज भी वही पुराना कंबल है, ऊपर की रजाई जो घर गए हुए एक साथी की है, मुलायम है, गर्म है–रुईदार है। साथी का ही तकिया मेरे सर के नीचे पड़ा है और मेरा वह रबर-वाला तकिया उधर सुटका हुआ पायताने पड़ा है जिसमें पेट की गर्म हवा रोज भर दिया करता था और जो रात भर ठंढी ही रहा करती थी।

8 जनवरी, 1949

आज टेस्ट परीक्षा रोकने के लिए बिहार के बीस हजार छात्रों ने हड़ताल शुरू कर दी है। खगड़िया में पुलिस ने पचास लड़कों को गिरफ्तार किया है तथा उन्हें पीटा भी है। पटने के सभी कॉलेजों के फाटकों पर पुलिस तैनात कर दी गई है–विद्यार्थी शांतिपूर्वक हड़ताल कर रहे हैं।

मैं देखता हूँ कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद, विशेषकर शिक्षित समुदाय यह चाहने लगा है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में झटपट आमूल परिवर्तन हो जाए। परिवर्तन झटपट हो नहीं रहा है इसीलिए यह असंतोष दिनोंदिन उग्र से उग्रतर होता जा रहा है। अशिक्षित समुदाय तो खूँटे में बँधे उस विशालकाय साँढ़ के सदृश है जो अपने शरीर की शहजोरी एवं रस्सी की कमजोरी से सर्वथा अपरिचित, चुपचाप बैठकर आँखों को आधा मूँद कर जुगाली किया करता है। मक्खियों को उड़ाने कि लिए जब-तब कान फड़फड़ा देता है, पूँछ को इधर-उधर हिला-डुला देता है।

और ठीक इसके विपरीत हमारा शिक्षित समुदाय है। वह इस बछड़े को सहश है जिसके गले में एक लंबी रस्सी बाँध दी गई है। एक पतले खूँटे के चारों ओर वह हरी-भरी घासों पर घूम रहा है, कभी खड़ा होकर यों ही कुछ जोर से पुकार उठता है। साँढ़ को अपनी शक्ति का परिचय नहीं है, यह अपनी छोटी-सी शक्ति को ही बहुत अधिक समझ कर उछल-कूद मचा रहा है। साँढ़ की रस्सी छोटी और पतली है, इसकी रस्सी मोटी और लंबी। साँढ़ के पैर में रस्सी बँधी है, इसकी गरदन में। साँढ़ का खूँटा मोटा और मजबूत है, इसका पतला और कमजोर। बछड़ा यह नहीं समझता कि वह तभी खोला जाएगा जब दूध दूहने का समय आएगा। और साँढ़ तो खुलेगा ही, उसे खोलना पड़ेगा; किस किसान के पास इतना चारा है कि उसे बैठा कर बथान पर खिलाता रहे।

13 जनवरी, 1949

‘जीवन संग्राम है’–दार्शनिकों के इस कथन पर मुझे शंका हो रही है।

जीवन का जन्म आनंद से है। पुरुष और नारी, सिर्फ एक आनंद की प्राप्ति के लिए मिलते हैं, उस समय एक जीवन को जन्म देने का विचार उनके आनंदाभिभूत मस्तिष्क में उठता होगा, इसमें मुझे संहेद है। यह तो एक आकस्मिक घटना कहिए कि उस आनंद से जीवन उद्भूत हो जाता है। ऐसा देखा गया है कि जीवन को जन्म देने के लिए लालायित व्यक्तियों में जीवन को जन्म देने की शक्ति ही नहीं रहती। जीवन का जन्म, संग्राम से नहीं–संगम से है, विरोध से नहीं–समझौते से है, विग्रह से नहीं–संधि से है। आनंद से उद्भूत जीवन संग्राम नहीं हो सकता, ठीक उसी प्रकार–जिस प्रकार आदमियों से उत्पन्न संतान, जानवर नहीं हो सकती। रही उसके विकास की बात। स्वाभाविक रूप से यदि जीवन को बढ़ने दिया जाए तो जिस प्रकार उसे शिशु से किशोर और फिर युवा होने में शारीरिक रूप से कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ती, उसी प्रकार आनंद प्राप्त करने में भी उसे कोई कठिनाई नहीं होगी। यदि जीव को माँ के दूध पर ही जीवन बिताना पड़े, या उसे दूध पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे तो उसे न तो कभी चीखना पड़ेगा और न कभी चिल्लाना ही। राजा-महाराजाओं के सपूत इसके उदाहरण हैं। और हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ने तथा घुड़दौड़ में भाग लेने को हम संघर्ष नहीं कह सकते–उसे संग्राम का विशेषण नहीं दे सकते। हमारी जितनी भी सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्थाएँ हैं–सभी हमारी आनंदोपलब्धि पर ही नियंत्रण रखने के लिए बनाई गई हैं–चंद लोग खूब आनंद लूट सकें, इसी के लिए।

और जीवन का अंत तो स्वयं एक आनंद है–भौतिक दृष्टि से भी, आध्यात्मिक रूप से भी।

आप कहेंगे, मैं प्राकृतिक रूप की बातें कर रहा हूँ–प्रकृति स्वयं परिवर्तनशील है। एक दूसरे का स्वभाव परस्पर विरोधी हुआ करता है। मैं इसे मानता हूँ, और इसके साथ यह भी मानता हूँ कि प्रकृति में अंततोगत्वा एक एकरूपता है–युनिफोर्मिटी है। आप सबों को स्वतंत्र रूप से बढ़ने दीजिए, कोई व्यवधान न डालिए–मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ–संघर्ष कभी भी नहीं होगा। आप मेरी टाँगें पकड़कर खींचेंगे तो आपके सर पर लात पड़ेगी ही। मरुभूमि में बबूल को उगने दीजिए, मिथिला में रसाल को। आप भी खाइए, दूसरों को भी खाने दीजिए। आप, अपना कौर बचा कर रखने के लिए दूसरों का कौर छीनेंगे तो छीना-झपटी होगी ही। आप, अपना पेट अपने से नहीं भर सकते तो मर जाइए! आपका जीवन जीवन ही नहीं है!

जीवन, संग्राम नहीं है। शक्तिहीन व्यक्तियों के मस्तिष्क की उपज यह सामाजिक व्यवस्था–अपने आनंद की उपलब्धि के लिए शक्तिशाली मनुष्यों के जीवन को संग्राम करार देती है।

16 जनवरी, 1949

मसहरी गिरा कर देखा, उसके अंदर पचीसों मच्छर पड़े हैं। एक-एक कर मारना शुरू किया। वे भाग कर जाते कहाँ, उन्हें तो मैंने कैद कर रखा था। आखिर मच्छर मारने के पश्चात मैंने अपनी हथेली देखी तो वे खून से लाल हो गई थीं। अभी भी मैं उस लाली को देख रहा हूँ। सोचता हूँ, समाज में भी बहुत से ऐसे मच्छर पड़े हैं। वे हम से कमजोर हैं, दुर्बल हैं–हमारे मुकाबले उनकी हस्ती कुछ भी नहीं; फिर भी वे हैं, जीवित हैं–और हमारे खून पीकर जीते हैं। हम सब चादर तान कर सोए रहते हैं, वे न जानें किस राह प्रवेश कर जाते हैं और हमारा खून चूसने लगते हैं। उन्हें वे राहें मालूम हैं जिनसे वे भीतर घुस आते हैं। हमें वे राहें नहीं ज्ञात हैं, जिन्हें बंद कर देना चाहिए। हमारा ज्ञान इतना कच्चा है, वे मच्छर होकर भी अपने इस काम में इतने उस्ताद हैं। हम इतनी बड़ी-बड़ी आँखें रख कर भी नहीं देख सकते, वे अपनी सुई की नोंक से भी छोटी आँखों से छिद्र तक को देख लेने की शक्ति रखते हैं–और वह भी अंधकार में, प्रकाश की तो बात ही क्या!

और यह देखिए, अभी एक मच्छर मेरी केहुनी में डाँसें घुसा रहा है। यह आया कहाँ से इस कैदखाने में? मैंने चारों ओर से मसहरी बिछावन के नीचे दबा रखी है; इसके अंदर जो थे उन्हें मैंने खत्म ही कर दिया था–तो फिर यह एक आया कहाँ से? एक आया न, दूसरा भी आ गया और फिर रात भर में पचीसों आ जाएँगे। हम इनकी राह नहीं जान पाते हैं, नहीं जान सकते हैं। ऐसे उस्ताद हैं ये–ऐसे गए-गुजरे हैं हम और एक सत्य बताऊँ–इनका निवास-स्थान कहाँ है, जानते हैं आप? वह आलमारी है न, जिस में हमारे ज्ञान के भांडार–पुस्तकें पड़ी हैं। उसी में–इन्हीं पुस्तकों के पीछे। देखिए, यह कैसी बिडंबना है। किताबें हमें प्रकाश देती हैं और प्रकाश में ये मच्छर वहीं आश्रय पाते हैं। हम अंधकार में नहीं पढ़ पाते और इन मच्छरों को अँधेरे में भी सूझता है।