स्याम का कला-पक्ष

स्याम का कला-पक्ष

(विशेष लेख)

[स्याम पूर्व की दो महान संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है। जहाँ उसके भवनों में भारतीयता का प्रभाव छलक पड़ता है वहाँ उसके नाटकों में चीनी प्रभाव काफी जोरदार दीखता है। भारत और चीन की कला के मेल से स्याम ने क्या-क्या रंग दिखाए हैं यह प्रस्तुत रचना बताएगी!–सं.]

थाई लोग कला के बड़े प्रेमी हैं। उनके जीवन से यह सत्य स्वयं प्रकट होता है। सुरुचि और व्यवस्था इनके जीवन के अंग बन गए हैं। खुलकर सोमपान के अभ्यासी होने पर भी इनके इस कला प्रेम में कोई अंतर नहीं पड़ा है। जहाँ तक वास्तु कला और मूर्ति कला का संबंध है स्याम में भारत और चीन के प्रभाव से एक नई कला की सृष्टि हुई है। एक प्रकार से जीवन के कई पक्षों में स्याम भारत और चीन का संगम है। मूर्ति कला के क्षेत्र में सुखोलाई काल की हजारों मूर्तियाँ आज भी अजुध्या और लवपुरी के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं जिन पर हिंदू-संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव लक्षित होता है। अजुध्या-काल से पूर्व की विष्णु, बह्मा एवं शंकर और नटराज की सैंकड़ों धातु प्रतिमाएँ भी इस देश में देखी जा सकती हैं। अजुध्या-काल में बौध-धर्म का प्रभाव आरंभ हो गया था अत: उस काल की मूर्तियों में बुद्ध-मूर्ति को ही प्रधानता मिली है। परंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं हैं कि इस काल में हिंदू देवताओं की मूर्तियों या प्रतिमाओं का निर्माण एकदम बंद हो गया था। बैंकाक म्यूज़ियम में मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अति श्रेष्ठ कोटि की ब्रह्मा और विष्णु की प्रतिमाएँ सैंकड़ों की संख्या में यहाँ रखी हैं। बारीकी, स्थायित्व और चेष्टा या मुद्रा के विचार से इन्हें प्रथम श्रेणी में रखा जा सकता है।

गृह-निर्माण या वास्तु कला के विचार से स्यामी मंदिरों और घरों की रचना की एक अपनी विशेषता है। बाट (मंदिर), विहार और स्तूप के आकार एक दूसरे से सर्वदा भिन्न होते हैं। वास्तुकला पर खमेट राजाओं की कृतियों का प्रभाव भी कम नहीं है। बाट की बनावट की विशेषता यह होती है कि इसमें नीचे से ऊपर की ओर ढालू छतों के 3-4 खंड ऊपर को उठते चले जाते हैं। ऐसा दोनों ओर से होता है। लंबाई में चलने वाली इन छतों का सबसे ऊपरी भाग एक कोणाकार शकल में दोनों ओर की ढाल बनाता हुआ खतम हो जाता है। प्रत्येक छत के दोनों छोरों पर फणाकार सुर्रियाँ ऊपर को निकली रहती हैं। इस प्रकार प्रत्येक बाट में 10-12 फणाकार सुर्रियाँ हो जाती हैं। जो ऊपर से देखने में जमीन में गड़े हुए भालों के सदृश प्रतीत होती है। प्रधान द्वार के ऊपर के भाग को गोलाकार नुकीली चोटी के रूप में छतों से अधिक ऊँचा उठाते चले जाते हैं। छतें चमकीली और रंगीन खपरैल की होती हैं। इनके भीतर मुख-द्वार के ठीक सम्मुख वाले भाग में एक ऊँची पीठ पर भगवान तथागत की प्रतिमा या मूर्ति प्रतिष्ठित की जाती है। मंदिरों से भिन्न ऐसे प्राचीन स्तूप भी यहाँ देखने को मिलेंगे जिनके भीतर तथागत या किसी महापुरुष के अवशेष सुरक्षित हैं। लवपुरा और अजुध्या में ऐसे बहुत से स्तूप अपनी ध्वंसावस्था में खड़े हैं। इन्हें प्राय: बौद्ध धर्म के स्मारक के रूप में भी बनाया जाता था। निर्माण और उद्देश्य की भिन्नता के आधार पर स्याम की इन इमारतों को नीचे लीखे नाम दिए गए हैं–बाट, स्तूप, प्रैंग, मंडप, फ्रासाद।

बाट–एक विशेष निर्माण शैली का नाम है। इसका उद्गम-स्थान हिंदेशिया माना जाता है। यह एक आयताकार इमारत होती है। इसकी छतों आदि का वर्णन ऊपर किया जा चुका है। ऊपर को जाता हुआ छतों का क्रम देखने में बड़ा सुंदर प्रतीत होता है। इसका उपयोग शुद्ध धार्मिक है।

स्तूप–स्तूप के पीछे धार्मिक भावना निहित रहती है। यह एक धार्मिक-स्थल होता है जिसका मूलरूप से निर्माण महात्मा बुद्ध के अवशेष रखने के लिए हुआ। बाद में स्याम के राजाओं के चिह्न भी इसके भीतर रखे जाने लगे।

फ्रा-प्रैंग–यह भी स्तूप का ही एक प्रकार है। इसमें खमेर के हिंदू राजाओं के मंदिरों के शिखरों का असर पड़ा है। इसकी नींव एक वर्गाकार क्षेत्र में रखी जाती है। इसका ऊपरी भाग बिल्कुल हिंदू-मंदिर के समान ही होता है। ऊपर कुछ ऊँचाई पर एक गर्भगृह होता है जिसमें भगवान बुद्ध की प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती है।

मंडप–इसका निर्माण वर्गाकार भूमि पर किया जाता है। इनका उपयोग स्याम में विहार के रूप में होता है। इस पर उत्तर भारत के मंदिरों का प्रभाव पड़ा है। इसमें उपदेश प्रकोष्ट के साथ-साथ भिक्षुओं के रहने के लिए छोटी-छोटी कोठरियाँ भी रहती हैं।

फ्रा-साद–यह शब्द ‘प्रासाद’ का अपभ्रंश है। इस भवन का व्यवहार धार्मिक एवं भौतिक दोनों प्रयोजनों से होता है। इनकी दीवारों पर भित्ति-कला के अच्छे नमूने देखने को मिलते हैं। इनके सामने एक ‘पोर्च’ होता है। इस प्रकार की निर्माण-शैली स्यामी राजाओं के महलों में व्यवहृत हुई है। इसी से ऐसा प्रतीत होता है कि ‘फ्रा-साद’ ‘प्रासाद’ का ही बिगड़ा रूप है। क्योंकि आज भी स्याम में राजमहल को फ्रा-साद ही कहते हैं। वास्तु कला की विविधता, रूप की मौलिकता, रंगों का मेल और अनेक प्रकार की वस्तुओं के प्रयोग के कारण स्यामी इमारतों को देखने से मन कभी ऊबता नहीं।

जहाँ तक मूर्ति-कला का संबंध है, स्याम में सर्व प्रथम इस कला का श्रीगणेश बुद्ध की प्रतिमाएँ ढालने या बनाने तक ही सीमित था। स्याम ने इस कला में भाव और मुद्रा नैपुण्य की दृष्टि से अपूर्व सफलता प्राप्त की है। मूर्तिकला की कुछ उत्कृष्ट रचनाओं को दूसरे देश की कला-कृतियों के समकक्ष रखा जा सकता है।

चित्रकला का मुख्य उपयोग इस देश में सर्व प्रथम स्याम के मंदिरों की दीवारों को सजाने के निमित्त हुआ। अलग केनवास या कागज पर चित्र बनाने के उदाहरण यहाँ पहले नहीं के बराबर थे। इस चित्रकला की प्रेरणा का मूल केंद्र रामायण और महाभारत रहे हैं। आज भी स्याम के सभी श्रेष्ठ मंदिरों की दीवारों पर रामायण की पूरी और महाभारत की कुछ-कुछ घटनाएँ चित्रित की हुई मिलेंगी। ऐसा बौद्ध-मंदिरों की दीवारों पर भी होता है। श्रेष्ठ कलाकारों ने अपनी कूची और रंग के सहारे रामायण का संपूर्ण बोलता कथानक दर्शकों के सामने बड़ी सफलता से प्रस्तुत कर दिया है। रंगों के मेल, भावों के स्पष्टीकरण और पक्केपन के विचार से इसे प्रथम श्रेणी में रखा जा सकता है। विस्तार की दृष्टि से देखें, तो अजंता को छोड़ कर इतना लंबा चित्रांकन आपको बहुत कम मिलेगा। ऐसी सैकड़ों चित्र-गेलरियाँ स्याम में आज भी देखी जा सकती हैं। और इन भित्ति चित्रों में प्राचीन स्याम की मुखरित कला आज भी अपना स्थान रखती है।

स्यामी लोग नाच-गान एवं नाटक के बड़े शौकीन होते हैं। स्यामी रंगमंच के आरंभिक पृष्ठों को यदि उलट कर देखा जाए, तो पता चलेगा कि अन्य कलाओं के समान ही रंगमंच का श्रीगणेश भी धर्म के पोषक और प्रचारक साधन के रूप में ही हुआ था। अपने शैशव काल में स्यामी-काव्य-कला पर भारतीय काव्य-परंपरा की गहरी छाप पड़ी। रंगमंच और पोशाक आदि के क्षेत्र में कंबोडिया की हिंदू संस्कृति ने भी कम प्रभाव नहीं डाला है। नाटक के आरंभ में भारतीय छाप पड़ने के बावजूद स्याम ने अपनी मौलिकता का इसमें सम्यक समावेश कर दिया है। वर्गीकरण के विचार से संपूर्ण रंगमंच को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है–शास्त्रीय एवं आधुनिक।

शास्त्रीय रंगमंच की कथा वस्तु का मूलस्त्रोत स्यामी (रामाकेती) रामायण रही है। साथ ही साथ कुछ प्रसंग महाभारत से भी लिए गए हैं। सावित्री-सत्यवान और शकुंतला नाटकों का यहाँ बड़ा सफल अभिनय किया जाता है और लोकप्रियता के विचार से इन दोनों नाटकों का प्रथम स्थान है। अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के हाव-भाव बड़े धीमे किंतु सुंदर होते हैं। शिल्पकॉन (सरकार द्वारा संचालित बैंकाक का एक कला-केंद्र) द्वारा संचालित रंगमंच के सिवा सभी छोटे-छोटे शहरों में रामायण की घटनाओं के आधार पर नाटक करती हुई छोटी-मोटी काव्य मंडलियाँ सदा घूमा करती हैं। परंतु शिल्पकॉन में केवल शास्त्रीय नाटकों का अभिनय ही किया जाता है। शास्त्रीय नाटक के एक प्रकार में लगभग सभी पात्र-पात्रियाँ अपने मुँह पर नकली चेहरे लगा कर मंच पर आते हैं। शायद यह कल्पना भारतीय रामलीला से ली गई हो। ऐसे नाटकों को स्याम में (masked play) खोन, (Dance in character) रबाम और (operative ballet) लाखोन कहते हैं। ऐसे नाटकों में हाव-भाव और मुद्राओं की ही प्रधानता रहती है। पर नकली चेहरे की मुद्राएँ उस चेहरे की सूरत पर ही निर्भर करती हैं। नाटकों में संगीत और सुंदर प्राकृतिक दृश्यों की प्रधानता रहती है। कथोपकथन में कभी-कभी अस्वाभाविकता बढ़ जाती है। शायद स्यामी लोग यह समझते हैं कि महत्त्वपूर्ण बात जोर से ही कही जाती है। इस संबंध में प्राचीन स्याम के प्रिय छाया-चित्र (shadow play) का उल्लेख करना भी असंगत न होगा। सुखो भाई और अजुध्या काल में तो इनका बड़ा रेवाज था। अपने देश के पुतली के तमाशे के समान ये छाया-चित्र गाँव-गाँव में घूमकर लोगों का विनोद किया करते थे, पर आज तो ये केवल म्यूज़ियम की शोभा बढ़ाते हैं। बहुत बारीक किसी धातु की चादर पर या किसी मसाले की पतली चादर पर आकृतियाँ काट ली जाती थीं जैसा कि आजकल ‘स्टेंसिल्स’ में होता है। और इन आकृतियों के द्वारा ही कथा पूर्ण कर दी जाती थी। मूक-बोलपट के समान इन चादरों के पीछे रोशनी रखकर उनकी छाया को एक सफेद कपड़े पर डाला जाता था। सफेद पर्दे पर पड़कर ये छाया-चित्र सजीव से हो उठते थे। आज यह प्रथा लगभग बंद-सी हो गई है।

आधुनिक रंगमंच की अपनी मौलिकता होते हुए भी इस पर चीनी प्रभाव बहुत पड़ा है। एक प्रकार से चीनी पृष्ठभूमि पर पश्चिम की कला को उतार कर आधुनिक स्यामी रंगमंच की सृष्टि की गई है। इसलिए उसमें तेजी और तीव्रता अधिक आ गई है। भावों में उभार अधिक है, संकेत और ध्वनि कम। आजकल तो बैंकाक जैसे शहरों में आपको स्यामी और चीनी दोनों मंच काम करते दिखलाई देंगे। आधुनिक-नाटकों की प्रेरणा इतिहास या धर्म से प्राप्त नहीं की गई है वरन् सामाजिक जीवन पर ही सुंदर-सुंदर नाटक आज लिखे जा रहे हैं। इनके पात्र और कथानक दोनों आज सामान्य समाज के हैं, राज महल के नहीं, पर पश्चिम का प्रभाव और सिनेमा का चलन आज बड़ी तीव्र गति से बढ़ रहा है। अत: शिल्पकॉन से अधिक भीड़ किसी आधुनिक सिनेमा हॉल में रहती है फिर भी कठिनाइयों से भिड़कर अपने प्राचीन की रक्षा और प्रचार का जो काम शिल्पकॉन कर रहा है, वह सर्वदा स्तुत्य है।

प्रो. रंजन द्वारा भी