ज़िंदगी का राज़

ज़िंदगी का राज़

[प्रस्तुत नाटक खुले रंगमंच के लिए एक प्रयोग है। रंगमंच की व्यवस्था में जो कठिनाइयाँ होती हैं उन्हें ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुले रंगमंच का यह प्रयास एक हद तक रंगमंच और नाट्य साहित्य के बीच की खाई पाट सकेगा। –सं.]

नाटक खुले रंगमंच का है। दो चौकियों को मिला कर मंच-सा बना लिया गया है जिसके तीन ओर दर्शक हैं और एक ओर पात्र-पात्रियाँ तथा साज-संगीत वाले। मंच पर एक छोटी-सी, एक आदमी के सोने के लायक चौकी है जिस पर सफेद चादर और मशनद पड़ा है। नाटक शुरू होते समय नेपथ्य से बाँसुरी पर दरबारी का आलाप बजता है और धीरे-धीरे लाठी के सहारे चलता हुआ बूढ़ा शाहजहाँ प्रवेश करता है। आकर वह दो एक क्षण चौकी पर बैठता है, फिर धीरे-धीरे उठ कर मंच के सामने वाले हिस्से में आ जाता है। उसकी आँखें दूर अतीत को देख रही हैं और शरीर निश्चेष्ट है। स्मरण रहे कि उन दिनों शाहजहाँ को लकवा मार गया था इसलिए पूरे नाटक में वह अपने शरीर के आधे भाग से कोई भावभंगिमा नहीं दिखला सकता। बीच-बीच में उसका लकड़ी वाला हाथ धीरे-धीरे हिल जाता है और उसी ओर के होठ फड़क उठते हैं। आँखों से आँसू जारी हो जाते हैं और वह निरुपाय, हतबुद्धि-सा दर्शकों को देखता है। पीछे से नारी कंठ की आवाज आती है–अब्बाजान! शाहजहाँ हिलता तक नहीं।

जहान्आरा–(प्रवेश कर) अब्बाजन! (और नजदीक आकर) अब्बाजान!!

[शाहजहाँ का ध्यान टूटता है और वह धीरे से कहता है–]
शाहजहाँ–इधर आओ बेटा!

[जहान्आरा पास आ जाती है और शाहजहाँ की आँखों में देखती है। शाहजहाँ मुँह छिपा लेता है पर जहान्आरा की आँखों से नहीं बच सकता।]

जहान्आरा–आप फिर रो रहे थे न!
[शाहजहाँ चुप रहता है।]

जहान्आरा–आपकी उम्र और सेहत में इस तरह दिन-दिन भर चुपके-चुपके रोना…
[शाहजहाँ हाथ से मना करता है और फिर आँखों से आँसू बह निकलते हैं]

जहान्आरा–अब्बाजान! (करुण स्वर में) अब्बाजान!!
[शाहजहाँ घूम कर जहान्आरा को देखता है और जहान्आरा अपनी ओढ़नी से उसके आँसू पोंछ देती है।]

शाहजहाँ–बुढ़ापे में किसी पर काबू नहीं रह सकता बेटा। आँसू निकल पड़ते हैं! अब पी नहीं सकता!
[शाहजहाँ तिमिला उठता है और जहान्आरा का कंधा पकड़ कर सम्हलता है। जहान्आरा उसे सहारा देकर ले जाती है और कैदखाने के ही एक कोने में पड़ी चौकी पर लिटा देती है।]

जहान्आरा–दुनिया से दिल हटाकर अब अल्लाह में लगाइए अब्बाजन! अब इस नमकहराम दुनिया से क्या लेना-देना! जहाँ बेटा बेटा न रह सके, भाई भाई न रह सके उसके पीछे रात-दिन सर खपाने में क्या रखा है!

[शाहजहाँ के होठों पर हल्की-सी मुस्कान फैल जाती है। वह धीरे-धीरे सम्हलता है।]
शाहजहाँ–बेटा, जिंदगी में सिर्फ काँटे ही याद रखने की चीज नहीं है। फूल भी तो हमें नसीब हुए। उन्हें नहीं भूलना चाहिए।

जहान्आरा–(प्रसंग को चलाते रखने की कोशिश करते हुए) वह तो ठीक है। लेकिन कौन जानता था कि शाहंशाह शाहजहाँ को अपनी औलाद के हाथों चौदह वर्ष की सजा भुगतनी पड़ेगी। जाने कितने दिन यह…

शाहजहाँ–मेरे ले तो फिर भी कुछ तसल्ली की बात है। जिंदगी के कई पहलू देखे, एक यह भी देख रहा हूँ। पर तुमने क्यों अपने ऊपर इसी उम्र में यह फकीरी डाल ली बेटा! जिंदगी से कतराना नहीं चाहिए।

जहान्आरा–नहीं अब्बाजन! मैं जिंदगी से कतराने वाली नहीं हूँ। मैं उस बाप की बेटी हूँ जिसने सारी उम्र शाहंशाहियत करने के बाद कैद को भी उसी तरह निबाहा जिस तरह सल्तनत को। मैं किसी कायर की औलाद नहीं हूँ!
[शाहजहाँ प्रेम से उसे पास बुला कर उसका सर चूम लेता है।]

शाहजहाँ–मैं चाहता तो किसी भी दिन अपनी जान दे सकता था। पर इंसान की जिंदगी बड़ी नेमत है और अल्लाह को इसी हाल में रखना मंजूर है तो मैं क्यों भागूँ।

जहान्आरा–(प्रसंग बदलते हुए) अब्बाजान! आपको अपनी वह शरीर बेटी याद है जिसके सर दर्द पर आप आगरे में तहलका मचा देते थे।

शाहजहाँ–(खोई हुई आँखों से अतीत को देखता हुआ) हाँ! (सर हिलाता है)

जहान्आरा–उसकी एक-एक बात पूरी करने के लिए आप आसमान और जमीन एक कर देते थे!

शाहजहाँ–हाँ बेटा और आज वही बेटी मेरे साथ भिखारिन की तरह जिंदगी बसर कर रही है।

जहान्आरा–देखिए अब्बाजान। मैं जो पूछती हूँ सिर्फ वही कहिए। आप तो हमेशा अपनी कहते हैं, कभी मेरी भी तो सुनिए।

शाहजहाँ–अच्छा! जो तुम कहो, सिर्फ उसी का जवाब दूँगा।

जहान्आरा–वादा कीजिए!

शाहजहाँ–अब मैं किस वादे के लायक रह गया हूँ।

जहान्आरा–आप चाहे किसी लायक नहीं हों, मैं आपकी बेटी तो हूँ।
[आँखें नम हो जाती हैं और शाहजहाँ आस्तीन से आँख पोछता है।]
आपके दिल में कौन ऐसा काँटा है जो इस तरह रोते रहते हैं।

शाहजहाँ–इस चर्चा से क्या फायदा?

जहान्आरा–नहीं अब्बा! मैंने उम्र भर इसकी कोशिश की कि आपकी हर तकलीफ को…

शाहजहाँ–किसी से शिकायत नहीं है मुझे बेटा!

जहान्आरा–पुरानी जिंदगी की ऐशो-इशरत, शान-शौकत की याद सताती है?

शाहजहाँ–शाहजहाँ के आँसुओं का क्या मोल है जो इतना परेशान होती हो। छोड़ो इस चर्चा को!
जहान्आरा–आप नहीं समझते अब्बाजान! मैंने आपके ही आँसू पोछने के लिए यह सब कुछ किया और जब आप ही इस तरह…

शाहजहाँ–मैंने सोचा था कि ये मेरे आँसू और उनका राज मेरे साथ खत्म हो जाएँगे। पर तुमने जिद ठान ली। दुनिया तो यही समझेगी कि शाहजहाँ अपने बीते दिनों की याद में रोता होगा। खैर मुझे, इसकी कोई परवाह भी नहीं है।

जहान्आरा–तो क्या बात है? शाहंशाहियत के नाम पर ये आँसू…

शाहजहाँ–मुझे सब कुछ याद है बेटा!…लेकिन उन दिनों की याद में इतनी ताकत नहीं कि बुढ़ापे की आँखों से पानी खींच सके। उनकी याद से तो दिल बहल जाता है, दिमाग का स्वाद बदल जाता है।

जहान्आरा–यह पहेली और न बुझाइए अब्बाजान!

शाहजहाँ–मुझे मुमताज बेगम की वह कसम भी याद है बेटी, पर उससे भी यह दिल नहीं हिलता! दारा की मौत भी याद है लेकिन वह भी मेरे दिल को इस तरह नहीं कुरेदती। (जोश में आकर आधा बैठ जाता है)

जहान्आरा–भैया की मौत! (आँखें पोछ लेती है)

शाहजहाँ–दारा के लिए मत रोओ बेटी। वह बहादुर बेटा था, बेइंसाफी के खिलाफ लड़कर उसने शहादत पाई है। वह सिर्फ हमलोगों की खानदान का ही नहीं था जो हमीं उसके लिए उम्र भर रोते रहे। उसके लिए तो सारा हिंदोस्तान रोता होगा। कैद में भी मैं उनकी रुलाई की आवाज सुन रहा हूँ। जिसने कभी किसी का बुरा नहीं किया, जिसने इल्म और इल्मदाँ की हमेशा इज्जत की उसके लिए रोने की जरूरत नहीं। (कुछ रुक कर) शुजा और मुराद निकम्मे थे इसलिए अल्लाह ने उन्हें अपने पास बुला लिया।

जहान्आरा–(गरम साँस लेकर) आप ठीक कहते हैं।

शाहजहाँ–इतनी लंबी-चौड़ी जिंदगी में इतनी तरह की बातें आईं कि इंसान किस-किस को याद रखे और किस-किस को भूले और वह भी तब जब कब्र में जाने की तैयारियाँ पूरी होने को हैं।

जहान्आरा–ऐसा मत कहिए अब्बाजान!

शाहजहाँ–इस जिंदगी में क्या रखा है जो…

जहान्आरा–फिर भी…

शाहजहाँ–आदमी के चाहने से क्या होता है। शरीर जवाब दे रहा है, किसी दिन गाड़ी रुक जाएगी।

जहान्आरा–लेकिन आपके का दिल काँटा नहीं निकल सकेगा, उसे निकालने का मौका भी आप नहीं दीजिएगा। और आपके बाद इसी काँटे को दिल में पाल कर मैं रोती-रोती मरूँगी।

शाहजहाँ–(फीकी हँसी हँस कर) अल्लाह मेरी जैसी तकदीर दुश्मन को भी न दे, लेकिन मेरी जैसी बेटी सभी को बख्शे। मेरी अच्छी बेटी, इधर आ! जरा हाथ ठीक कर दे। लकवा वाला हाथ दब गया है।

जहान्आरा–आज आपने दर्दवाला तेल भी नहीं मालिश करवाया?

शाहजहाँ–बेटा, अब मेरी बीमारी मेरा बुढ़ापा है। इसका इलाज किसी हकीम के पास नहीं है!

जहान्आरा–आपने अपनी मर्जी से कब इलाज करवाया था? मैं अभी मालिश करूँगी।
[जहान्आरा उठ कर चली जाती है और शाहजहाँ एक अजीब दर्दभरी हँसी हँसता हुआ उसे देखता है। दो ही एक क्षण के बाद जहान्आरा मिट्टी के बर्तन में तेल लेकर आती है और शाहजहाँ के बाँह पर मलती है।]

जहान्आरा–दक्खिन वालों ने फिर औरंगजेब के खिलाफ सर उठाया है। वह बहुत परेशान हो रहे हैं।

शाहजहाँ–शाहंशाह की सलाहियत नहीं है उस आदमी में। उसे सिपहसालार या सूबेदार होना चाहिए जो हुक्म बजा लाया करे। मुल्क की तकदीर का फैसला उसके हाथों में न हो। लेकिन अल्लाह की मर्जी के खिलाफ किसी की चली है।

जहान्आरा–अजीब बदशौक आदमी है। सिर्फ लड़ने-झगड़ने से मतलब है, किसी अच्छे काम में उसका दिल नहीं लगता। अल्लाह जाने कैसी तबियत पाई है।

शाहजहाँ–जिस मुगल सल्तनत की नींव इतनी गहरी डाली गई थी उसे मेरी ही औलाद के हाथों मिटना बदा था! (दर्द भरी हँसी हँसता है।)

जहान्आरा–आप सल्तनत की हालत क्या इतनी नाजुक समझते हैं?

शाहजहाँ–मुगल बादशाहों ने अपने को हमेशा इसी मुल्क, इसी जमीन का समझा। इसलिए इस मुल्क में रहनेवाले हर किसी को भरसक बराबरी का दर्जा देते रहे। लेकिन औरंगजेब ने इस कायदे को बदल दिया। मुगल सल्तनत की इमारत जिन कंधों पर टिकती थी उनमें कई हिंदू थे। औरंगजेब के लिए वे बेगाने हो गए। वे ही क्यों, शिया लोगों को भी इसने काफी तंग किया है!

जहान्आरा–जी हाँ, कभी-कभी उड़ती-पुड़ती खबरें आ जाती हैं।

शाहजहाँ–और फिर किसी पर इसका भरोसा भी तो नहीं है। नतीजा यह है कि कोई इस पर भी भरोसा नहीं करता! पनपनेवाली सल्तनत का यह रवैया नहीं होता! यह तो मिटने वालों का सिलसिला है।

जहान्आरा–जरा-सा और बगल हो जाइए (थोड़ा और तिरछा कर देती है और केहुनी के ऊपर तेल मालिश शुरू करती है।)

शाहजहाँ–इस बुढ़ापे में इतनी दवाओं से भी फायदा नहीं होगा बेटी। इंसान की एक हालत ऐसी होती है जब उसके सारे मर्जी की एक ही दवा रह जाती है और वह है मौत! फिर मेरे लिए तू औरंगजेब का इतना एहसान क्यों लेती है?

जहान्आरा–(नेपथ्य की ओर देखती हुई दो-एक क्षण चुप रहती है, उसका हाथ भी रुका रहता है।) आपने कुछ देखा अभी? (मुस्कुराती है)

शाहजहाँ–आँखों की रोशनी काफी धीमी पड़ गई है। क्यों क्या बात है?

जहान्आरा–जेल में भी हम लोगों पर खुफिया लगे हैं। चौदह साल बीत गए फिर भी जाने किस साजिश की इतनी तैयारियाँ चल रही हैं।

शाहजहाँ–कैसी तैयारियाँ?

जहान्आरा–यही खुफियों की तैनाती, कड़ा पहरा वगैरह!

शाहजहाँ–अपनी आदत से लाचार है। क्या करेगा! शक और साजिश की बदौलत इस जगह पर पहुँचा है। इसके अलावा भी कोई रास्ता है दुनिया में, उसे मालूम ही नहीं।

जहान्आरा–एक खुराक दवा पी लीजिए और आराम से सो जाइए। काफी थके-से लगते हैं आप!

शाहजहाँ–चाहता तो हूँ सो जाना। अजीब थकान-सी महसूस हो रही है। शायद परावाना आ रहा हो। खैर, लाओ दवा!

[जहान्आरा नेपथ्य में जाती है और ग्लास में दवा लिए हुए प्रवेश करती है हाथ का सहारा देकर ऊपर उठाती है और दवा पिलाती है।]
शाहजहाँ–पलकें कुछ भारी मालूम पड़ती हैं। मैं सोता हूँ।

[शाहजहाँ लेटा रहता है और जहान्आरा धीरे-धीरे तलवा सहलाती है। दो-ही एक मिनट में शाहजहाँ बेखबर सो जाता है। जहान्आरा धीरे-से खारल लाकर उसमें कोई दवा हाल करने लगती है। रह-रह कर यह देख भी लेती है कि शाहजहाँ की नींद तो नहीं उचट रही है। इसी समय नेपथ्य से एक युवक प्रवेश करता है। कपड़े-लत्ते हिंदू के-से हैं। आते ही वह जहान्आरा को बाकायदा सलाम करता है।]

युवक–हकीम साहब ने फर्माया है कि इस पुड़िया को सफूफ खिलाने के थोड़ी देर बाद खिलाइयेगा। जरूर खाँसी में आराम पहुँचेगा।

जहान्आरा–(जमीन की तरफ इशारा करते हुए) अच्छा रख दो!

युवक–(चौकन्ना होकर इधर-उधर देखते हुए) आपने मुझे पहचाना शाहजादी साहिबा?

जहान्आरा–युवक, मेरा नाम जहान्आरा है। मेरे अब्बा अब शाहंशाह नहीं रहे इसलिए मैं भी शाहजादी नहीं रही। समझे। हाँ, पहचान तो नहीं सकी।

युवक–मेरे बाप शाहंशाह शाहजहाँ के सबसे नामी संगतराश निशानचंद थे।

जहान्आरा–आहिस्ता बोलो (शाहजहाँ की ओर उँगली दिखाकर इशारा करती है कि वह सोए हैं) तो तुमने अपना पुश्तैनी पेशा छोड़ दिया, हकीम साहब के यहाँ रह रहे हो?

युवक–वही बिपता की कहानी कहने आया हूँ। बाबूजी जब मरे मैं छोटा-सा बच्चा था। शाहंशाह की तरफ से जो जायदाद मिली थी वह छिन गई। माँ ने किसी तरह भीख माँग कर मुझे बड़ा किया। पुश्तैनी पेशा किस बूते पर अपनाता, हकीम साहब के यहाँ नौकरी कर ली!

जहान्आरा–तो मुझसे क्या कहना चाहते हो, कहो!

युवक–(सकुचाते हुए) माँ हमेशा कहती थीं कि किसी तरह शाहंशाह को हम लोगों की खबर मिल जाती तो इस हालत में भी हम लोगों को उबार देते। वह यहाँ तक कैसे आतीं इसलिए मैं ही चला आया।

जहान्आरा–आगरे के निशानचंद की बीवी और औलाद की यह हालत! लेकिन इस हालत में शाहंशाह क्या कर सकते हैं। [सोए हुए शाहजहाँ की बेचारगी की तरफ इशारा करती है। युवक इशारे के सहारे शाहजहाँ की ओर देखता है और सहसा फफक कर रोने लगता है। जहान्आरा भी अपनी ओढ़नी से आँखें पोछ लेती है। शाहजहाँ की खाँसी सुनाई देती है।]

युवक–शाहजादी, मैं जाता हूँ (आँखें पोछ कर जाना चाहता है।)

जहान्आरा–सुनो। (युवक नहीं मुड़ता है। जहान्आरा दबंग आवाज में फिर पुकारती है) सुनो। (युवक घूम जाता है) तुम जानते हो कि तुम शाहजहाँ के घर माँगने के लिए आए हो।

युवक–(हकलाते हुए) शाऽहजाऽदी! शाहंशाह की ऐसी हालत का मुझे सपने में भी ख्याल न था।

जहान्आरा–कोई बात नहीं। शाहंशाह और निशानचंद ने अपने पुश्त का फर्ज अदा किया। अब मैं अपने पुश्त का फर्ज अदा करूँगी। निशानचंद मुझे हमेशा बेटी ही कहा करते थे और एक जमाने में थोड़ी-बहुत संगतराशी भी सिखाई थी। इधर आओ।

[गले से मोतियों की माला निकाल कर युवक की ओर फेंकती है।]
जहान्आरा–उसमें से पाँच दाने निकाल लो। ये असली मोती हैं, दो-तीन सौ मुहर से कम कीमत नहीं होगी एक-एक की। समझे। अपनी अम्माँ से मेरा सलाम कहना! और कहना कि उनकी बेटी की तरफ से यह भेंट है।

युवक–(हतप्रभ होकर) शाहजादी!
जहान्आरा–जो मैं कहती हूँ वह करो। मेरा हाथ दवा से सना है। निकालो दाने (युवक माले से दाने निकालता है) तसबीह को बाँध दो। (युवक बाँधता है और वापस कर देता है) कभी कोई जरूरत पड़े तो आना!

युवक–(सामने पैर पर गिरते हुए) बहन, देवी! प्रणाम।
[चुपचाप चला जाता है और जहान्आरा दवा हल करने में फिर जुट पड़ती है।]

शाहजहाँ–(नींद से जागकर) बेटा!

जहान्आरा–आई अब्बाजान!
[उठ कर जाती है और शाहजहाँ को सहारा देती है। शाहजहाँ उठ कर बैठ जाता है और जहान्आरा घुटने टेक कर पास बैठ जाती है।]

शाहजहाँ–दवा ने तो वाकई बड़ा फायदा किया है बेटा! खाँसी से थोड़ी राहत मिली है।

जहान्आरा–बिल्कुल अच्छे हो जाएँगे आप!
शाहजहाँ–मैं मौत से नहीं डरता हूँ, मैं इस झूठमूठ की परेशानी से डरता हूँ। मौत को आना है तो सीधी चली आवे। मैं हमेशा तैयार हूँ।

जहान्आरा–दुश्मन के सीने पर इसलिए भी साँप लोटना है कि हमलोग इतने सब्र से दुर्दिन काट रहे हैं।

शाहजहाँ–मेरा कोई दुश्मन नहीं। जिसने जो किया अच्छा ही किया। ठीक से बैठ जाओ बेटा। (कुछ सोचकर) परसों तुम जिस राज के बारे में पूछते-पूछते हार गई, उसको तुमसे कह जाऊँ। अब किसलिए छिपाए रखूँ दिल में!

जहान्आरा–अब्बाजान, आपकी बड़ी मेहरबानी है।

[सहसा जहान्आरा ओढ़नी ठीक कर लेती है और उसी तरफ फर्श पर बैठी रहती है। औरंगजेब प्रवेश करता है। उसके साथ कई फौजी अफसर भी हैं। वह इशारे से उनलोगों को विदा कर शाहजहाँ की चौकी के पास अकेला खड़ा रहता है। दो-तीन मिनट तक कोई बोलता नहीं। आखिर औरंगजेब ही मौन भंग करता है–]
औरंगजेब–बहन, अब्बाजान की तबियत कैसी है!

जहान्आरा–शाहंशाह का क्या हुक्म है? अब्बाजान पहले से कुछ अच्छे हैं।

औरंगजेब–इस तरह क्यों बात करती हो बहन?

जहान्आरा–शाहंशाह औरंगजेब की न तो कोई बहन है और न कोई बाप। हमलोग कैदी हैं और आप शाहंशाह। हुक्म जहाँपनाह!

औरंगजेब–गलती हुई है बहन लेकिन माफी भी तो इंसान को ही मिलती है!

जहान्आरा–हाँ, माफी इंसान देता है और इंसान पाता है। शाहंशाह नहीं।

औरंगजेब–अब्बाजान कुछ बोलते नहीं!

जहान्आरा–क्या बोलें? उन्हें कुछ नहीं कहना है।

औरंगजेब–मैं यह कहने आया हूँ कि सब सामान आप लोगों ने क्यों भेज दिया? बर्तन तक नहीं रखा।

जहान्आरा–कोई खास बात नहीं है। बुढ़ापे में अब्बाजान को सादगी ज्यादा पसंद है।

औरंगजेब–अपने लिए भी कुछ नहीं रखा?

जहान्आरा–मैं तो बहुत पहले से मिट्टी के बर्तन काम में लाती हूँ।

औरंगजेब–नौकर-दाइयों को भी रूखसत कर दिया गया है!

जहान्आरा–अब्बाजान की सेवा-टहल की खुशकिस्मती मैं क्यों छोड़ूँ?

औरंगजेब–बहन, मैंने बहुत ज्यादती की है। बहुत! लेकिन फिर भी माफी दे दो। भाई हूँ।

जहान्आरा–अब्बाजान के सामने मैं कौन होती हूँ!

औरंगजेब–(सर नीचा कर) उनसे किस मुँह से माफी माँगूँ!

जहान्आरा–शाहंशाह, आपको किसी से माफी माँगने की जरूरत नहीं है। आपने जो कुछ किया, जो कुछ कर रहे हैं सब कुरान शरीफ हाथ में लेकर, इस्लाम के लिए। आपका किया गलत नहीं हो सकता!

औरंगजेब–(टहलता हुआ कहता है) हाँ, मैंने जो कुछ किया वह इस्लाम के लिए ही किया। (रुक कर जहान्आरा से) अगर मैं इस तरह पेश न आता तो दारा ही तख्त पर बैठता। उसकी तरह जादू मेरे पास नहीं। मैं उसे इसी तरह हरा सकता था। और उसे छोड़ भी देता या नजरबंद भी कर देता तो वह मेरे खिलाफ साजिश करता। (बड़ी दर्दीली आवाज में) मैं दूसरा क्या कर सकता था?

जहान्आरा–आपसे कोई जवाब तलब नहीं कर रहा है शाहंशाह!

औरंगजेब–जवाब तलब करने की बात नहीं है बहन! तुमलोगों ने मुझे शुरू से आखिर तक गलत समझा है,–ओछा, कमीना और बदमाश! लेकिन बात वह नहीं है। मैं भी तुम लोगों की ही तरह का हाड़-मांस वाला आदमी हूँ। सिर्फ मैंने अपनी जिंदगी का मकसद दूसरा बना लिया है।

जहान्आरा–ठीक है। हर आदमी अपनी जिंदगी को बनाने का पूरा हक रखता है।

औरंगजेब–और मेरी जिंदगी आज से सौ-हजार साल बाद नीची नजर से नहीं देखी जाएगी। बहन, मुझे जरा समझने की कोशिश करो।

शाहजहाँ–बेटी, मैं जरा शांति चाहता हूँ।

[औरंगजेब शाहजहाँ के इस इशारे को समझता है और जाने को तैयार होता है।]
औरंगजेब–(जाने को तैयार होते हुए) मैं फिर हाजिर होऊँगा। [प्रस्थान]

शाहजहाँ–मेरी बनवाई हुई इमारतों में तुझे सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन-सी मालूम होती है बेटी?

जहान्आरा–ताजमहल तो दुनिया के चेहरे पर आपकी अमर निशानी है ही।

शाहजहाँ–तुझे इसमें कुछ ऐब नजर आता है!

जहान्आरा–ताजमहल में भला क्या ऐब हो सकता है?

शाहजहाँ–मैंने चाहा था कि ऐसी इमारत बनवाऊँ जिसे देखकर मालूम हो कि चाँदनी को ही जमा कर बनाई गई है। ताजमहल की शक्ल से वह बात नहीं झलकती। इसकी शक्ल दूसरी तरह की होनी चाहिए थी।

जहान्आरा–अब्बाजान। मकान बनवाने की कला में आपसे बात कर सकने की भी सलाहियत मुझमें नहीं है।
[शाहजहाँ धीरे-धीरे मुस्कुराता है और बिस्तर पर से उठ कर आगे आना चाहता है। जहान्आरा आगे बढ़कर उसे सहारा देती है और मंच के सामने वाले हिस्से में ले आती है।]

शाहजहाँ–(नेपथ्य की ओर देखते हुए) दिन की रोशनी में ताजमहल दूसरी ही चीज मालूम होता है!

जहान्आरा–इससे आपकी बड़ी ममता है न अब्बाजान!

शाहजहाँ–माँ नौ महीने बच्चे को पेट में रखती है, मैंने इसे जाने कितने साल दिमाग में रखा है और 20 वर्ष में पूरी तरह दिमाग से जमीन पर उतारा है। (घूमकर जहान्आरा के सामने कहते हुए) तुम्हें याद है, मैंने अपने आँसुओं का राज खोलने के लिए तुम्हें कहा था!

जहान्आरा–मैंने वह चर्चा ही छोड़ दी। उससे आपको चोट लगती है।

शाहजहाँ–नहीं बेटी! चोट की कोई बात नहीं है! (धीरे-धीरे आकर चौकी पर बैठ जाता है) इंसान हमेशा अपनी जिंदगी को ऐसा बनाना चाहता है कि सभी उसकी हस्ती महसूस करे। अगर वह कुछ हद तक भी बना लेता है तो तसल्ली हो जाती है।

जहान्आरा–अब्बाजान, आदमी को सबसे बड़ी नेमत यह जिंदगी मिली है।

शाहजहाँ–हाँ बेटा, और इस जिंदगी में जिसने कुछ कर लिया वह तो सचमुच जिया। वरना…

जहान्आरा–(अपनी ही रौ में) कुछ लोगों ने इस जिंदगी में बड़े-बड़े काम किए–सल्तनत खड़ी की, इमारतें बनवाईं-बनाईं, तस्वीरें बनाईं-बनवाईं, गाया-बजाया। आपने ताजमहल जैसी नायाब चीज तैयार करवाई!

शाहजहाँ–वही तो कसक है बेटा, उसी की याद में रात-दिन रोता हूँ। ताजमहल तो ठूँठा है। मैंने सोचा था कि जमुना के उस पार ताजमहल के सामने हरे पत्थर का अपना मकबरा बनवाऊँगा। (उठकर फिर मंच के सामने आ जाता है और नेपथ्य की ओर उँगली से बताता है) वहीं पर मैंने नींव भी खुदवाई थी। फिर इन दोनों इमारतों को एक पुल से जोड़ देने का इरादा था। लेकिन वह सब कहाँ हो सका! जवानी में हवस ज्यादा थी, सूझ-बूझ कम। तब तो यह ताजमहल बनवाया। अब जब सूझ हुई है तो हाथ-पाँव में फंदे हैं। काश मैं अपने दिल के सभी अरमान निकाल पाता।

जहान्आरा–यह ताजमहल ही क्या कम है?

शाहजहाँ–बेटा, दुनिया की आँखों के लिए कम नहीं है पर शाहजहाँ की आँखों के लिए बहुत कम है, बहुत कम!

जहान्आरा–आपके जैसा…

शाहजहाँ–आदमी में कुछ ऐसा होता है जो उसे हमेशा काम करने पर मजबूर करता है, उसे आगे ढकेलता है। उस समय उसे जो भी हमदर्द मिल जाए वही काम करने का बहाना हो जाता है। लोग यही कहते हैं न कि शाहजहाँ ने मुमताज बेगम के लिए ताजमहल बनवाया। मैं पूछता हूँ कि शाहजहाँ ने तख्त ताऊस किसके लिए बनवाया। दुनिया भर की और इमारतें किसकी याद ताजा रखने के लिए बनवाई? (जहान्आरा चुप रहती है) शाहजहाँ के अंदर जो काम करने वाला इंसान था उसने अपनी भूख मिटाने के लिए यह सब कुछ किया। कभी मुमताज इसका बहाना बनी। कभी कोई बहाना नहीं भी मिला। लेकिन इससे बात बदल नहीं गई न!

जहान्आरा–आज तो आप बिल्कुल नई बात कह रहे हैं!

शाहजहाँ–नई बात नहीं। जिंदगी के इस छोर पर खड़े होने के बाद ही यह समझ में आता है। चढ़ती सिन में तो आदमी हमेशा यही सोचता है कि मैंने उसके लिए यह किया, उसके लिए वह किया। वह करता हमेशा अपने लिए है और सोचता है कि दूसरे के लिए कर रहा है।
[धीरे-धीरे जहान्आरा के सहारे जाकर चौकी पर बैठता है]
इसीलिए जब लोग मेरी चर्चा मेरे सामने करते हैं तो मुझे हँसी आती है–इन नासमझों से दिल का हाल क्या कहूँ। सल्तनत, ऐशो-इशरत, आराम और जश्न सभी जिंदगी में अपनी जगह रखती हैं लेकिन इंसान की जिंदगी में सबसे बड़ी जगह है उस काम की जिससे उसका नाम मरने के बाद भी जिंदा रहे। अब मेरा दिमाग पका था, सुझबूझ गहरी हुई थी। बनाने के दिन तो अब आए थे और अब घिरौंदा बनाने के लायक भी नहीं रह गया हूँ। मेरे आँसू शाहंशाह के आँसू, ऐयाश के आँसू नहीं हैं। ये आँसू उसी कलाकार के हैं, उसी कलाकार के, उसी कलाकार के। (आँसू जारी हो जाते हैं।)

जहान्आरा–लेकिन इसके लिए रोने की क्या जरूरत है?

शाहजहाँ–जरूरत हो गई है। (दर्द भरी आवाज में) मेरे दिमाग में एक-से-एक नायाब इमारतें भरी पड़ी हैं, वे अपनी जगह माँगती हैं। मैं उन्हें क्या जवाब दूँ! अपनी नन्हीं-नन्हीं हस्तियों से वे मेरा कलेजा मसलती हैं और आँसू छलक पड़ते हैं। कोई ऐसा वारिस भी नहीं जिसे सब कुछ सौंप जाऊँ। मेरे साथ उनकी भी कब्र बनेगी।
[सिसकने लगता है।]

जहान्आरा–अब्बाजान! इतने अधीर मत होइए। दो घड़ी ठंढे दिल से सोचिए। जिंदगी के एक हिस्से में आपने कुछ इमारतें बनवाईं, कुछ बनवाना चाहते थे। लेकिन जरा उस आदमी के बारे में सोचिए जो इस जिंदगी को ही एक खूबसूरत चीज बनाने के लिए हर क्षण कोशिश कर रहा है। उसकी बनाई हुई चीज कितनी बड़ी, कितनी महान…

शाहजहाँ–उतनी बड़ी चीज को शुरू करने वाला भी कौन है बेटा! दारा होता तो मुगल सल्तनत की शान निभाता। उसे पढ़ने-लिखने का शौक था। वह अपनी दुनिया अलग बनाता!
जहान्आरा–लेकिन मैंने जैसे लोगों की चर्चा की है उन्हें सल्तनत और तख्त नहीं चाहिए। हजरत मोहम्मद उन्हीं लोगों में थे अब्बाजान! इस जिंदगी को ही एक नायब चीज बनाने वालों में!

शाहजहाँ–(गद्गद हो कर) बेटा!

जहान्आरा–और अब्बाजान, इस परंपरा को निभाने के लिए खून का रिश्ता भी जरूरी नहीं है। कोई भी आदमी, किसी की भी औलाद ऐसे परिवार में शामिल हो सकती है। इसका घेरा बहुत बड़ा है, बहुत बड़ा।

[शाहजहाँ बढ़ कर जहानआरा के सर पर हाथ फेरता है!]
शाहजहाँ–तूने आज बड़ी तसल्ली दी। औलाद से भी बढ़ कर एक हमराही की तसल्ली दी। अल्लाह तेरा भला करे। जिंदगी के साज पर नया ही नगमा छेड़ दिया। इस नए सुर में मन-प्राण डूब-उतर रहा है। जिंदगी की इमारत, जिंदगी की इमारत!
[शून्य में देखने लगता है नेपथ्य से सितार पर दरबारी का आलाप शुरू होता है।]

जहान्आरा–सबसे बड़ी पहेली और सबसे बड़ा वरदान, दोनों ही हमारी यह जिंदगी है। मैंने शाहजादी की जिंदगी गुजार कर भी देखी और अब यह जिंदगी भी गुजार कर देख रही हूँ। एक में मुफ्त की परेशानी और तबाही थी। दूसरे में जिंदगी का सही मानी में कुछ काम! इंसान…

शाहजहाँ–(उत्साहित होकर) हाँ, इंसानियत बहुत बड़ी बात है, ताजमहल से भी बड़ी। और आखिरी साँस तक आदमी का काम खतम नहीं होता। जिंदगी के हर क्षण को सँवारना है, बनाना है। है न बेटा!

जहान्आरा–हाँ अब्बा! जिसके नाम को चंद किताबी कीड़े याद करें, उस जिंदगी में क्या धरा है। जिंदगी वह है जिसके खतम होने पर लोग हैरत में डूब जाएँ और दाँतों तले उँगली दबा कर कहें–वह वाकई इंसान था! जिसको अपने नाम के लिए चंद इमारत, चंद कामों का मुँह नहीं जोहना पड़े, जिंदगी वह है जो खुद चमके!

शाहजहाँ–पूरी जिंदगी बेकार गई। इसे पहले…

जहान्आरा–बेकार नहीं गई है। आपकी ही जिंदगी को देखकर तो मुझे इस बात की प्रेरणा मिली। आप अपने को ताजमहल का बनाने वाला या लुटा हुआ शाहंशाह समझें, मैं तो आपको जिंदगी का कलाकार समझती हूँ। वह कलाकार नहीं जिसने अपनी जिंदगी के कुछ हिस्से में बड़ी खूबसूरत चीजें तैयार कीं और बाकी जिंदगी कीचड़ में सना रहा। मैं तो आपको वह कलाकार मानती हूँ जिसने अपनी जिंदगी को ही कला का एक नमूना बना दिया। ऐसे कलाकार के लिए पस्तहिम्मती और मायूसी नहीं है। ऐसा कलाकार तो हर हाल में खुश रहता है।

शाहजहाँ–तूने आज मेरे दिल से काँटा निकाल दिया। आज से मेरी जिंदगी का नया हिस्सा शुरू हुआ। थोड़े-से दिन रह गए हैं, लेकिन कोई बात नहीं। उन्हीं को सजा-सँवार लूँगा।

जहान्आरा–(बाल सुलभ सरलता से) अब कभी नहीं रोइएगा न?

शाहजहाँ–कभी नहीं। अब रोने की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है! एक काम और रह गया है। चलो, औरंगजेब को बुलाकर उसे समझा दूँ कि मेरे दिल में किसी के खिलाफ कोई दाग नहीं।
[उत्साह से शाहजहाँ उठता है। उसके चेहरे से आंतरिक उल्लास बरस रहा है। वह जहान्आरा का सहारा लेता हुआ चला जाता है। नेपथ्य से सितार पर झाला बजता होता है जो शाहजहाँ के जाते ही रुक जाता है और नाटक की समाप्ति की सूचना भी दे देता है।]

धन्वंतरि शरण द्वारा भी