‘मदर इंडिया’ उपेक्षित समाज की त्रासदी

‘मदर इंडिया’ उपेक्षित समाज की त्रासदी

समाज पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए कुटिल बुद्धि ब्राह्मण ने पहले वेद और ऋचाओं की रचना की। वेद में ब्रह्म का सृजन किया। पुरुष ब्रह्म के शरीर के अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति की। वर्णों से जातियाँ विकसित कीं और जातियों से उप-जातियाँ। जातियों, उपजातियों को एक-दूसरे से ऊँचा-नीचा तथा श्रेष्ठ और हीन बताकर समस्त समाज को विभाजित किया। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर सभी वर्णों और जातियों में सर्वोच्च स्थान पर सुशोभित किया। ब्राह्मण ने ही ईश्वर, उसके अवतार और तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की कल्पना की। स्वयं को सबसे अलग और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अपनी पृथक भाषा का निर्माण किया तथा स्वयं को देव और अपनी भाषा (संस्कृत) को देवभाषा घोषित किया। देवों के नाम पर देवभूमि, देवस्थान और देवलोक निर्धारित और परिभाषित किए और लोक-मानस में इनके प्रति श्रद्धा, विश्वास और भक्ति-भाव पैदा किया। यही सब ब्राह्मणवाद है।

इस ब्राह्मणवाद की चक्की में शूद्र और अंत्यज ही नहीं पिसे, उनके साथ-साथ स्त्री भी पिसी है। असमानता-आधारित वर्ण-जाति-व्यवस्था के कारण भारतीय समाज में स्त्री सदियों से पुरुषसत्ता के अधीन, उसके वर्चस्व और नियंत्रण में तथा गरिमा और अधिकारविहीन रहने को विवश रही है। इस कारण वह अनेक प्रकार के निषेध, वर्जना, अपमान, उपेक्षा, अन्याय, हिंसा, उत्पीड़न और शोषण की शिकार रही हैं। उसका सारा वजूद पुरुष की सेवा और उसकी आज्ञा पालन तक सीमित रहा है। अधिकार विहीनता के चलते, घर की चार दीवारी के अंदर बंद रहकर परिवार की देखभाल करने वाली स्त्री आर्थिक रूप से पूरी तरह पुरुष पर निर्भर रही है। यह सामान्य स्त्री की स्थिति रही है। दलित स्त्री की स्थिति इससे भी कहीं अधिक भयावह रही है। वह पुरुष सत्ता के साथ-साथ जाति-सत्ता का शिकार भी रही है। इसलिए उसका जीवन अधिक कष्टकर और दूर्वा रहा है। कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ भारतीय समाज में स्त्री का स्थान तथा उसके प्रति पुरुष समाज के व्यवहार और दृष्टिकोण के यथार्थ को प्रस्तुत करने के साथ-साथ उसके कारणों की यथार्थपरक एवं तार्किक पड़ताल भी प्रस्तुत करती है। पुस्तक में भारतीय समाज द्वारा धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर स्त्री के साथ किए जाने वाले अमानवीय शोषण, हिंसा और दमनात्मक व्यवहार का चित्रण है, जिनकी ओर से समाज प्रायः आँखें बंद किए रहता है। एक आठ-दस साल की छोटी बच्ची को किस तरह उसके पढ़ने-खेलने की उम्र में ही जबरन स्त्री बनाकर अमानवीय यातनाएँ सहने के लिए मजबूर किया जाता है, तथा बीमारी और दु:खों के न समाप्त होने वाले चक्रव्यूह में फेंक दिया जाता है जहाँ से उसके बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। इस चक्रव्यूह से वह बाहर निकलती है तो लाश के रूप में ही।

भारतीय समाज पुरुष सत्तात्मक है। पुरुष-सत्ता भारत में विद्यमान जाति-सत्ता का ही एक रूप है। जिस प्रकार जाति-सत्ता के अंतर्गत उच्च जातियाँ निम्न जातियों पर अपना वर्चस्व बनाकर रखती है, उसी प्रकार पुरुषसत्ता, स्त्री पर अपना वर्चस्व और नियंत्रण बनाकर रखता है। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में स्त्री की लगभग वही स्थिति है, जो समाज में दलितों की है। दोनों ही असमानता, उत्पीड़न और उपेक्षा के शिकार हैं। दलितों के शोषण और पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण उनकी अशिक्षा रही है तो स्त्रियों के शोषण और पिछड़ेपन का कारण भी उनकी आशिक्षा है। दलित शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रहे हैं तो स्त्री भी शिक्षा से वंचित रही है। खराब स्वास्थ्य के कारण दलितों की कम आयु में मृत्यु हो जाती है तो स्त्रियों के साथ भी ऐसा ही होता है। दलितों की औसत आयु 40-45 वर्ष है, जो अन्य लोगों की औसत आयु की तुलना में बहुत कम है तो स्त्रियों की औसत आयु भी पुरुषों की तुलना में काफी कम है। अशिक्षा और अज्ञानता के कारण दलित समाज अनेक रूढ़ियों और अंधविश्वासों का शिकार है। दलितों की तरह स्त्री भी अशिक्षित रही है और वैज्ञानिक ज्ञान और चेतना से प्रायः शून्य रही है। इसलिए रूढ़ियों, परंपराओं और धार्मिक अंधविश्वासों के पालन के मामले में वह पुरुष से भी कहीं आगे रही है। रूढ़ियाँ, विश्वास और मान्यताएँ उसके जीवन के सबसे बड़े आधार और उसके सभी दु:खों और परेशानियों के समाधान का केंद्र हैं। धर्म और संस्कृति की रक्षा का भार तो लगभग पूरी तरह स्त्री पर रहा ही है। पूजा-पाठ से लेकर व्रत, त्यौहार सब स्त्री करती है। पुरुष केवल सहयोगी की भूमिका में ही होता है।

अशिक्षा के कारण दलितों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता का अभाव है तो स्त्रियों में भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता का उतना ही अभाव है। दलित अनेक प्रकार के निषेध और वर्जनाओं के शिकार हैं तो स्त्री भी अनेक प्रकार के निषेध और वर्जनाओं की शिकार है। दलित अपने ही धर्म भाइयों की अस्पृश्यता के शिकार हैं तो स्त्री भी मासिक धर्म सहित कई मामलों में अपने ही परिजनों के लिए अस्पृश्य होती है। तात्पर्य यह कि स्त्रियों की स्थिति दलितों के जैसी है, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित, सामाजिक रूप से असमानता और उपेक्षा की शिकार, आर्थिक रूप से अभावग्रस्त और लगभग अधिकारविहीन। इन सब त्रासदियों को झेलना स्त्री के लिए अत्यंत पीड़ादायक रहा है। आठ-दस साल की बहुत कम और खेलने-कूदने की उम्र में अपने से कहीं बड़ी उम्र के, और कभी-कभी अपने पिता की उम्र के पुरुष के साथ शादी, यौन शोषण और प्रसव की पीड़ा का दर्द उससे भी कहीं अधिक बड़ा है, जो स्त्री को झेलना पड़ा है। अस्पतालों की सुविधा होने के उपरांत अप्रशिक्षित और अस्वास्थ्यकर तरीकों से प्रसव कराने वाली परंपरागत दाइयों से प्रसव कराने की बाध्यता, जिसमें प्रसव के पश्चात अनेक प्रकार की बीमारियाँ लग जाने का खतरा होता है और इस प्रकार से प्रसव करने वाली अधिकांश स्त्रियाँ गंभीर बीमारियों का शिकार होकर बहुत कम उम्र में मृत्यु का शिकार हो जाती हैं।

यह पुस्तक भारत भर में फैले विशाल मंदिर उद्योग और उस पर ब्राह्मणों के एकाधिकार का पर्दाफाश करती है। कोलकाता का काली मंदिर ही नहीं, देश के अधिकांश मंदिर ब्राह्मणों की निजी संपत्ति है और यदि सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा करके मंदिर बनाए गए हैं तो वे ब्राह्मणों के कब्जे में हैं। इन मंदिरों से होने वाली मोटी कमाई केवल ब्राह्मण की जेब में जाती है और वे मालामाल होते हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि लगभग सभी मंदिरों की कमाई आयकर से मुक्त है।

समाज में अंधविश्वास यहाँ तक व्याप्त है कि अभावग्रस्त लोग जिन बीमारियों का इलाज कराने में असमर्थ होते हैं अथवा जिन बीमारियों का सहज इलाज उपलब्ध नहीं है और जिन बीमारियों के कारण लोगों की अधिक मृत्यु हो जाती है, उन बीमारियों से रक्षा के लिए देवी-देवताओं का सृजन हो गया है। कुछ देवी-देवताओं को उन विशिष्ट बीमारियों का निवारक मान लिया गया है और उनसे यह कामना और अपेक्षा होती है कि उनकी पूजा करने से उस बीमारी से मुक्ति मिल जाएगी। इसी तरह की एक देवी कोलकाता के काली मंदिर में है चेचक की देवी, जिसका उल्लेख कैथरीन मेयो ने भी अपनी इस पुस्तक में किया है। इसी तरह से सर्प-दंश से रक्षा के लिए नाग देवता है। इसके अलावा, अपनी विशेष इच्छाओं या कामनाओं की पूर्ति के लिए भी अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। भूत-प्रेतों से रक्षा के लिए अथवा शारीरिक ताकत प्राप्त करने के लिए हनुमान की पूजा की जाती है। शारीरिक बल के प्रतीक हनुमान पहलवानों के देवता के रूप में स्थापित हैं। आर्थिक लाभ के लिए गणेश, शिक्षा या ज्ञान के लिए सरस्वती तो डाकुओं द्वारा अपनी रक्षा और सफलता के लिए भवानी देवी की पूजा की जाने की परंपरा है। ऐसा करने पर उसे शारीरिक-मानसिक हिंसा का शिकार होना पड़ता था।

स्त्री की अधिकांश तकलीफ और समस्याओं का कारण बहुत कम उम्र में विवाह हो जाना रहा है। निःसंदेह बाल-विवाह प्रथा भारत की एक बहुत बड़ी बुराई रही है। इस प्रथा के कारण न जाने कितनी लड़कियों का जीवन खिलने से पहले ही बर्बादी की भेंट चढ़ा है। जल्दी विवाह का परिणाम जल्दी मृत्यु में होता है। इस प्रथा का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह रहा कि अविकसित शरीर के साथ सेक्स कर गर्भवती बनने के कारण बहुत बड़ी संख्या में स्त्रियों की प्रसव के दौरान ही मृत्यु हो जाती है। कच्ची उम्र और अविकसित शरीर की अवस्था में ही सेक्स करने और गर्भवती होने से वे स्वस्थ बच्चों को जन्म देने में असमर्थ रहीं तथा कमजोर और बीमार बच्चों को जन्म दिया, जिनमें शारीरिक, मानसिक दृढ़ता का अभाव रहा। बाल विवाह की प्रथा को लंबे समय तक पनपते रहने में धर्म और सामाजिक मान-मर्यादा की बहुत बड़ी भूमिका रही है। अन्य जातियों की तो बात छोड़िए भारतीय समाज में सर्वाधिक शिक्षित और समाज-व्यवस्था के सर्वोच्च पायदान पर बैठे ब्राह्मण वर्ग में भी बाल्य-अवस्था में ही कन्याओं का विवाह कर देने की अत्यंत दृढ़ प्रथा रही है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करने को तैयार नहीं हो तो जाति से बहिष्कृत होने का डर उसे ऐसा करने को बाध्य करता था। जाति और धर्म के समक्ष व्यक्ति लगभग पराजित और लाचार प्रायः है। इतना ही पर्याप्त नहीं था। उस लड़की को घर से निकालकर जंगल में छोड़ देने और उससे जीवन भर किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रखने का सामाजिक नियम था। यहाँ तक कि जंगली जानवरों से भी कोई उसकी रक्षा नहीं कर सकता था, क्योंकि ऐसा करने से पाप लगने का भय था। यह एक प्रकार से समाज द्वारा उस प्रकार की लड़कियों की सामूहिक रूप से की गई हत्या की प्रथा थी।

कैथरीन मेयो की यह पुस्तक भारत में प्रचलित रही देवदासी प्रथा पर भी प्रकाश डालती है। देवदासी अर्थात देवताओं की वेश्या। मंदिर ही उसका घर और मंदिर का देवता ही उसका पति और स्वामी। किंतु, यथार्थ में देवता के नाम पर मंदिर के पुजारियों तथा प्रबंधकों द्वारा अपनी यौन तृप्ति के लिए उनका यौन शोषण किया जाता था। देवदासियों के बारे में सबसे ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ये प्रायः दलित-पिछड़ी जातियों की रही हैं। उच्च वर्णीय जातियों की कन्याओं के देवदासी बनाने के उदाहरण सामने नहीं आए हैं। आर.पी. शंखवार ‘समाधान आरपीएस’ में 27 मई, 2016 को प्रकाशित अपने लेख ‘देवदासी प्रथा–एक अमानवीय व्यवस्था’ में इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखते हैं कि ‘देवदासी प्रथा के अंतर्गत शूद्रों (दलितों) की पुत्रेच्छा या कोई मिन्नत पूरी होने के बाद उन्हें एक कन्या मंदिर को दान देनी होती थी जो रजस्वला होने तक मंदिरों की देख-रेख, सफाई, पूजा-पाठ की सामग्री-संयोजन, मंदिरों में नृत्य आदि कार्य सँभालती थीं। रजस्वला होने पर मंदिर के पत्थर प्रभु ‘ठाकुरजी’ को ब्याह दी जाती थी, जो ‘Servant of God’, यानी देव की दासी (देव की पत्नी) कहलाती थी। शादी के बाद उसके साथ इस विश्वास के साथ कि पुरुषों में देवी-देवता का अंश होता है, मंदिर के प्रमुख पुजारी, व्यवस्थापक मंडल के अधिकारियों के अलावा प्रभावशाली सामंत एवं कुलीन अभ्यागत संभोग करते थे। सबका जी भर जाता तो उसे गैरों को सौंप कर या यौनाचार (वेश्या) से आय का साधन बना लिया जाता था। देवदासियों को यह भी अधिकार नहीं था कि वे किसी की हवस का शिकार होने से इनकार करें या मनचाहे पुरुष से शादी करें। देवदासी से जो संतानें पैदा होती थीं, उन्हें नाजायज या अवैध कह कर फिंकवा दिया जाता था। बाद में महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘हरिजन’ नाम दिया।’

कैथरीन मेयो ने अपनी पुस्तक में भारतीय समाज की लगभग उन सभी प्रथाओं और समस्याओं का आलोचनात्मक विवरण प्रस्तुत किया है, जो स्त्री की दीनता, हीनता और गुलामी की प्रतीक, उनका आधार या कारण हैं। परदा प्रथा भी भारतीय स्त्रियों की एक अन्य बड़ी समस्या है। परदा प्रथा का सबसे अधिक नुकसान यह होता है कि परदे की प्रथा के कारण स्त्रियों को घर के अँधेरे और गंदे हिस्से में रहना पड़ता है। इससे उनमें, अन्य स्त्रियों की तुलना में तपेदिक का रोग होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। न जाने कितनी स्त्रियाँ तपेदिक की बीमारी का शिकार होकर असमय मर गईं, किंतु परदा प्रथा कई सदियों तक जारी रही। ग्रामीण क्षेत्रों में परदा प्रथा आज भी विद्यमान है।

बाबा साहब अंबेडकर का मानना था कि समाज की प्रगति स्त्रियों की शिक्षा पर निर्भर करती है। कैथरीन मेयो भी स्त्रियों की दशा के बारे में अपने सर्वेक्षण और विश्लेषण में इस निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि भारतीय समाज के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण स्त्रियों में शिक्षा की कमी है। स्त्रियों में शिक्षा की कमी वस्तुतः भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या रही है। स्वाधीनता के पश्चात बाबा साहब अंबेडकर द्वारा भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को समानता और शिक्षा का मौलिक अधिकार प्रदान की जाने के पश्चात स्त्री शिक्षा की स्थिति बेहतर हुई है। किंतु स्वाधीनता पूर्व ब्रिटिश भारत में स्त्री शिक्षा की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। इसका कारण यह रहा है कि भारतीय समाज में स्त्री का पढ़ना, लिखना अनुचित, असामाजिक और अपमानजनक समझा जाता था। हिंदू धर्म ही नहीं, इस्लाम धर्म में भी स्त्री शिक्षा को पसंद नहीं किया गया है। इसलिए हिंदू और इस्लाम, दोनों ही धर्मों के अधिकांश लोगों द्वारा स्त्री शिक्षा को प्रायः अनावश्यक, धर्म-विरुद्ध और खतरनाक माना जाता था। इसका एक कारण हो सकता है बाहर की दुनिया के समतामूलक, क्रांतिकारी और बुद्धिवादी विचारों के प्रभाव से दूर रखना। नए विचारों का प्रसार सनातन कही जाने वाली भेदभावमूलक और वर्चस्ववादी, परंपराओं के नकार और खंडन की जमीन तैयार कर सकता है।

कैथरीन मेयो की यह पुस्तक इस तथ्य पर भी प्रकाश डालती है कि हिंदू स्त्रियों की तुलना में मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति कई मायनों में बहुत अच्छी है। वे बाल विवाह की प्रथा की शिकार नहीं हैं तथा विधवा होने पर पुनर्विवाह कर सकती हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मुस्लिम स्त्रियों की तरह अस्पृश्य और निम्न जातियों में भी विधवा पुनर्विवाह का प्रचलन रहा है। उच्च जातियों की स्त्रियाँ घर की चारदीवारी के अंदर कैद रही हैं, जबकि निम्न जातियों की स्त्रियों को, आर्थिक विपन्नता के कारण अपने पति के साथ मिलकर काम करना पड़ता है, इसलिए वे दूसरी स्त्रियों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र और आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर रही हैं।

धर्म को यों तो जीवन की पद्धति अथवा उसका आधार माना जाता है, किंतु यथार्थ के धरातल पर धर्म अमानवीय परंपराओं, कुरीतियों, अंधविश्वासों, ढकोसलों और पाखंडों की एक दुनिया है, जिसका काम मनुष्य की चेतना पर कब्जा कर उसे विचार और विवेकशून्य बनाकर उसका मानसिक शोषण और आर्थिक दोहन करना है। यह सारा खेल आत्मा, परमात्मा, भाग्य, परलोक, पुनर्जन्म, पाप-पुण्य आदि पर किया जाता है। शूद्र और स्त्री भारत की सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था में सर्वाधिक शोषित हैं, किंतु यही दोनों वर्ग धर्म-संस्था का सबसे अधिक पोषण करते पाए जाते हैं। पुस्तक इस तथ्य को उद्घाटित करती है कि धार्मिक अंधविश्वास और पाखंडों का पालन स्त्री ही अधिक करती है, पुरुष कम करता है। अर्थात स्त्री ही अपने बच्चों के माध्यम से धार्मिक अंधविश्वास और पाखंडों का पोषण और संरक्षण करती है। और इसका कारण स्त्री की अशिक्षा है। किंतु, प्रश्न तो यही है कि स्त्री अशिक्षित क्यों रही है? वह स्वेच्छा से अशिक्षित नहीं रही है, उसे जबरन शिक्षा से वंचित रखा गया है। स्त्री को अशिक्षित रखने का काम उस पर धार्मिक अंधविश्वासों को पालने-पोसने का आक्षेप लगाने वाले पुरुष समाज ने किया है। स्त्री पर पुरुष वर्ग का यह उसी प्रकार का आक्षेप है, जैसा ब्राह्मणों द्वारा दलितों पर उनके बीच जातिगत भेदभाव होने और ब्राह्मणवाद के पनपने का लगाया जाता है। प्रश्न यही है कि दलितों के अंदर जातियाँ क्यों हैं? क्या ये जातियाँ दलितों ने बनाई हैं? जातिगत ऊँच-नीच और भेदभाव उन्होंने कहाँ से सीखा? ब्राह्मणवाद की प्रवृत्ति उनके अंदर कहाँ से और कैसे विकसित हुई? सब जानते हैं कि ये सब उनकी अशिक्षा का परिणाम है।

कैथरीन मेयो द्वारा भारतीय समाज के यथार्थ को जितनी सूक्ष्मता और बेबाकी से प्रस्तुत किया गया है, उसे देखते हुए इस पुस्तक को भारतीय समाज का स्केनर अथवा आई ओपनर भी कह सकते हैं। कैथरीन मेयो की इस पुस्तक ने प्रकाशित होते ही भारतीय समाज में खलबली-सी मचा दी थी। अनेक बुद्धिजीवियों, विशेष रूप से हिंदू चिंतकों एवं विचारकों ने इस पुस्तक की तीखी आलोचना की। इसके महत्त्व का पता इसी से चलता है कि गाँधी जी ने अपने अखबार ‘यंग इंडिया’ में इस पुस्तक ड्रेन अर्थात नाली रिपोर्ट कहते हुए इस पर आलोचनात्मक टिप्पणी की तो लाला लाजपत राय जैसे बड़े हिंदू नेता को इसके विरुद्ध या कहिए इसके जवाब में ‘अनहेप्पी इंडिया’ नाम से पूरी पुस्तक लिखी, जो मई, 1928 में बान्ना पब्लिशिंग कंपनी, कलकत्ता से प्रकाशित हुई। उससे भी पहले सी.एस. रंगा अय्यर ने कैथरीन मेयो की इस पुस्तक के जवाब में ‘फादर इंडिया’ नाम से पुस्तक लिखकर 1927 में ही सेलविन एंड ब्लाउंट लिमिटेड, लंदन से प्रकाशित कराई। इसके अलावा भी अनेक लोग द्वारा कैथरीन मेयो की इस पुस्तक के खंडन या जवाब में पुस्तकें और लेख लिखे गए। इन सबके उपरांत मेयो की इस पुस्तक की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है, क्योंकि मेयो ने भारतीय समाज में व्याप्त जाति और पुरुष वर्चस्ववाद, धार्मिक अंधविश्वास और पाखंडवाद, असमानता, अस्वच्छता और इन सबका मूल कारण अशिक्षा जैसी जिन समस्याओं को ‘मदर इंडिया’ के माध्यम से विश्व समाज के समक्ष प्रस्तुत किया, वे किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। स्त्री और दलितों को उन समस्याओं से आज भी जूझना पड़ रहा है।


Image : Head of a Peasant Woman
Image Source : WikiArt
Artist : James McNeill Whistler
Image in Public Domain


Notice: Undefined variable: value in /var/www/html/nayidhara.in/wp-content/themes/oceanwp-child/functions.php on line 154
जयप्रकाश कर्दम द्वारा भी