श्यौराज सिंह बेचैन दलित दृष्टि के कहानीकार

श्यौराज सिंह बेचैन दलित दृष्टि के कहानीकार

समय के अनुसार कहानियाँ भी बदलती हैं और कहानी के पात्र भी बदलते हैं। कहानी की सार्थकता भी यही है। हर युग के भीतर संघर्ष की नई दिशाएँ, अनुभव का नया शेड, नया भाष्य भी होता है। कहानी इस नएपन को टटोलती हुई बने-बनाए तमाम मापदंडों को तोड़ती है। समय और वैचारिकता के साथ-साथ ‘कथन’ और ‘कहन’ दोनों बदलते हैं। कहानी के साये के भीतर सब कुछ सिमट सकता है, बशर्ते उस ‘सब कुछ’ तक पहुँचने और ‘दखल’ देने की मंशा कहानीकार की हो।

‘मानव सभ्यताओं के नीचे यदि कहानी के खंभे और आधार-स्तंभ न होते तो वे भरभराकर गिर चुकी होतीं। कहानियों ने उन्हें लुप्त होने से बचाया है।’ (कहानी के नए प्रतितमान, पृष्ठ-85)

कमलेश्वर का यह कथन कहानी की रचनात्मक ताकत की ओर संकेत करता है। कहानी एक ऐसी रचनात्मक ताकत है, जिसमें दुनिया को बदलने की क्षमता मौजूद है। कहानीकार अपने पाठक के मन में केवल विचार नहीं बोता बल्कि परिस्थिति और घटनाक्रम का एक सिलसिला बो देता है। बदलाव की शुरुआत यहीं से हो जाती है।

एक कहानीकार के रूप में प्रो. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ इसी सिलसिले को परिचालित करते हुए दिखाई देते हैं। ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, कहानी-संकलन के अंतर्गत लेखक ने अपनी कहानियों में से अपनी पसंद की चुनिंदा कहानियों को संकलित किया है। इस संकलन में कुल नौ कहानियाँ संकलित हैं। संकलन की भूमिका में ही लेखक ने इस सवाल को उठाया है कि ये कहानियाँ लेखक को प्रिय क्यों हैं?

‘ये कहानियाँ मुझे प्रिय इसलिए हैं क्योंकि ये पाठकों के लिए केवल समय बिताने या मन बहलाने भर का साधन मात्र नहीं है। संविधान सापेक्ष सामाजिक दायित्वबोध की दिशा में रचनात्मक योगदान हैं।’ (भूमिका, V)

कहानी समय की नब्ज को टटोलने का सबसे जरूरी और उपयोगी माध्यम है। कहानियों के भीतर गुँथे किस्से समय की अनेक सिलवटों को परत-दर-परत अपने भीतर तहे होते हैं। कहानीकार की कलम समय को उघाड़कर उसके भीतर छिपी धड़कन को टटोल लेती है। अनुभवों का यह सिलसिला कहानीकार और पाठक दोनों को एक रचनात्मक तनाव के भीतर घेर लेता है जहाँ कहानीकार और पाठक एक साथ एक साँझा अनुभव से गुजरते हैं।

कहानीकार का सामाजिक दायित्व बोध, सतर्क अंतर्दृष्टि, पर्यवेक्षण, पड़ताल, विजन आदि मिलकर कहानी के भीतर एक अनुभव-संसार रचते हैं। अनुभव की पुनर्रचना जिससे स्थितियों पर संजीदा चिंतन के साथ-साथ अनुभव का विश्लेषण और समाज का साक्षात्कार भी मौजूद होता है। ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ जैसी बहुचर्चित आत्मकथा लिखने वाला रचनाकार और ‘नई फसल और कुछ अन्य कविताएँ’ लिखने वाला कवि जब कहानी के रचना-संसार में प्रवेश करता है तो कहानी के भीतर रंग औ रेखाएँ भी हैं और सामाजिक मुद्दों पर बेबाक बहसें भी हैं। लेखक का स्वयं मानना है–

‘भारतीय समाज अनुभवों की विविधताओं से भरा है। जो जीवन अनुभव अब तक के कहानी आंदोलनों से नहीं आए और जो आए वे नए नहीं थे। उन शेष नए अनुभवों को सामने लाती ये कहानियाँ समाज सुधार का साझा दायित्वबोध, अधिकार चेतना जागृत करती हैं। इसलिए ये अपनी प्रियता की सार्थकता सिद्ध करती हैं।’ (भूमिका, V)

वस्तुतः कहानी जब जनचेतना का आधार बनती है तो वह कथन के माध्यम से सीधा ज़हन में उतर जाती है और संवेदनशील पाठक के अनुभव का हिस्सा बनने लगती है। स्थितियों को लेकर कहानीकार का चिंतन पाठक की विश्लेषण क्षमता में कुछ नए विचार बिंदुओं को दाखिल कर देता है। संकलन की पहली ही कहानी ‘क्रीमीलेयर’ तर्क और संवाद के अनेक आयामों को छूती हुई चलती है। इस कहानी के विषय में लेखक ने स्वयं भूमिका में लिखा है–

‘क्रीमीलेयर कहानी के बारे में कहानी खुद बता रही है। हाँ, इसे लिखने की प्रेरणा के बारे में बताना अलग बात है। मैं देखकर दुखी था कि तथाकथित रोशन खयाल जाति बुद्धिजीवी खासकर साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में कथनी और करनी का ऐसा भेद बनाए हुए है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ जिस समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर आधारित देश बनाने के लिए स्वयं को वचनबद्ध करते हैं, उस भावना के ठीक विपरीत जाति बौद्धिक काम कर रहे हैं। उनकी सोच और साजिशें कहानी के खलनायकों के संवाद बन रहे हैं।’ (भूमिका, viii)

‘क्रीमी लेयर’ कहानी आरक्षण के भीतर क्रीमी लेयर के सवाल पर पति-पत्नी का संवाद बहुत बौद्धिक है। यह टकराहट आरक्षण के सवाल के साथ-साथ क्रीमी लेयर को सीधे-सीधे जोड़ती है साथ ही साथ जेंडर के सवाल को भी प्रकारांतर से छूती है। कहानी में पत्नी अपने बहुरूपिया पति की मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों को तर्कों की धार पर बहुत सधे हुए तरीके से उघाड़ती चली जाती है। एक बहुत संवेदनशील मुद्दे को कहानीकार ने कहानी में बहुत जिम्मेदारी से सँभाला है। कहानी के भीतर तर्क और विश्लेषण के अनेक आयाम मौजूद हैं। कहानी के भीतर एक खास तरह की विचारशीलता उभरती हुई दिखाई देती है।

कहानी में अपने पति सुधांशु को चुनौती देती हुई पत्नी प्रणीता बहुत सधी हुई भाषा में कहती है–

‘यह बढ़ती असमानता के खिलाफ लड़ना अँग्रेजों से लड़ने से भी ज्यादा मुश्किल है बल्कि मुझे उम्मीद थी कि तुम एससी/एसटी को अधिकार दिलाकर देश को आत्मनिर्भर होने में मदद करो। अब आप उलटा कर रहे हैं और चाहते हैं कि मैं आपसे समझौता करती रहूँ? वह मुझसे नहीं होगा, यह मेरे ज़मीर को गवारा नहीं है।’ (क्रीमी लेयर, पृष्ठ-17)

एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर जैसे चर्चित मुद्दे को लेखक ने अखबारों के संपादकीय और लेखों के दायरे के बाहर निकालकर कहानी का शिल्प प्रदान किया। कहानी के कलेवर में लेखक ने अधिकार चेतना और वर्चस्व की मानसिकता के द्वंद्व को पत्नी और पति के बीच संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है। पत्नी के धारदार तर्कों के बीच सिर्फ पति का दोमुँहा चरित्र ही नहीं उघड़ता बल्कि उसके माध्यम से संवेदनशील मुद्दों पर सामाजिक व्यवस्था का दोगला चरित्र भी उभर कर आता है। यहाँ पत्नी प्रणीता की संवेदनशीलता और मुखरता को भी रेखांकित किए जाने की आवश्यकता है।

कहानी के शिल्प में संवाद की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं। संवाद के माध्यम से तीखा सवाल भी खड़ा किया जा सकता है और विश्लेषण की संभावना भी निर्मित होती है। ‘क्रीमी लेयर’ कहानी इसका सटीक उदाहरण है। कहानीकार के अनुभवों के साथ-साथ तथ्यों के विश्लेषण ने कहानी के भीतर एक रचनात्मक तनाव का निर्माण किया है।

‘बस्स इत्ती-सी बात’ कहानी भारतीय समाज के भीतर लगातार विचरते जातीय तनाव के अलग आयाम को उद्घाटित करती है। कहानी का ताना-बाना स्त्री-पुरुष संबंधों के भीतर जातिगत अस्मिता के साथ-साथ वर्चस्ववादी पुरुष मानसिकता के इर्द-गिर्द विकसित होता दिखाई देता है। भारतीय समाज के जातिगत ढाँचे के भीतर परिवर्तन की संभावना के रूप में विवाह को हमेशा बहुत महत्त्व दिया गया है। कहानीकार ने इस संभावना की सच्चाई की बहुत गहरी पड़ताल करने का प्रयास किया है।

कहानी की शुरुआत ठाकुर साहब के बेटे के ब्याह की चर्चा से होती है जिसने तथाकथित छोटी जाति की लड़की से विवाह कर लिया। इस विवाह की चर्चा से शुरू होते कहानी के प्रवाह में कीर्ति और बीना, दो सहेलियों का संवाद जुड़ता है। आधुनिक शिक्षा के मुक्त आकाश में उड़ती दोनों सहेलियाँ किस तरह विवाह नामक संस्था के माध्यम से वर्चस्ववादी, पुरुष मानसिकता का शिकार होती हैं, दोनों का आपसी संवाद उनकी इस पीड़ा को उजागर करता है। बीना इस सामाजिक व्यवस्था से टकराती है और अविवाहित रह जाती है, दूसरी ओर कीर्ति ठाकुर कुँवर सिंह से विवाह के बाद अनेक तरह की शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनती है।

विवाह की दहलीज़ पर खड़ा स्त्री-शोषण का सवाल कथा को एक और मोड़ देता है। अपने पति कुँवर सिंह से प्रताड़ित और परिव्यक्त कीर्ति का दूसरा विवाह तथाकथित छोटी जाति के पुरुष से होना और उसका सुखी व फलता-फूलता ससम्मान दांपत्य जीवन उच्च जाति के पूर्व पति को स्वीकार नहीं होता। बस्स इत्ती सी बात पर वह कीर्ति की हत्या कर देता है।

‘कुँवर ने जेल जाते-जाते मीडिया से कहा था कि मुझे सजा पाने का कोई अफसोस नहीं है, जिस औरत का मेरे उच्च कुल से संबंध रहा हो वह खानदान की मान-मर्यादा की परवाह किए बगैर कोई कदम कैसे उठा सकती है? जिन जातियों के लोग हमारे आगे सिर उठाकर खड़े नहीं हो सकते, जो सपनों में भी हमारी बराबरी नहीं कर सकते, जिन्हें हम अपने बराबर होते देख नहीं सकते। जिनकी बस्तियाँ गाँव के बाहर बसती हैं, जिनकी औरतें हमारा गोबर-कूड़ा उठाती फिरती हैं, उस अछूत जाति के ऐरे-गैरे व्यक्ति ने पुनर्विवाह किया।’ (बस इत्ती सी बात, पृष्ठ-37)

यहाँ सामाजिक-व्यवस्था के सामने इंसानियत का सवाल बौना बन जाता है। स्त्री-पुरुष संबंधों के बीच विवाह एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है किंतु विवाह के साथ सामाजिक जातीय जकड़बंदी के भीतर अंततः स्त्री की ही बलि दी जाती है। उसी को मौत के मुँह में धकेला जाता है।

‘कलावती’ कहानी में संसद में उठे कलावती के प्रसंग के साथ कहानीकार ने अपनी स्मृतियों में हमेशा ताजा रहे कलावती के अभावग्रस्त जीवन के साथ जोड़ा। भारतीय लोकतंत्र स्वाधीनता आंदोलन और संघर्ष की लंबी यात्रा का स्वप्न था। लेकिन आजादी के बाद यह देश की गरीब अभावग्रस्त पीड़ित जनता के लिए एक छलावा साबित हुआ। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गुहार लगाता हुआ कलावती का परिवार गरीबी और बदहाली में दम तोड़ देता है। भारतीय संसद में लोकतंत्र की आवाज बनकर अनेक कलावतियाँ गूँजती तो हैं पर व्यवस्था के बहरे कानों तक न तो उनकी पुकार पहुँचती है और न ही उन तक कोई मदद पहुँच पाती है। कहानीकार ने संवेदना की गहराई और व्यापक सामाजिक दायित्व-बोध के साथ यह कहानी लिखी है।

संग्रह में अगली कहानी ‘शिष्या-बहू’ पुनः उच्च और निम्न जाति के बीच विवाह-संबंधों के कारण उत्पन्न होने वाले तनाव पर केंद्रित है। निम्न जाति की सुशिक्षित गुलाबों का विवाह उच्च जाति के वेद शर्मा से हो जाता है। यह एक प्रेम-विवाह है किंतु इस संबंध के इर्द-गिर्द समाज और व्यवस्था का क्रूर और शोषक ताना-बाना भी मौजूद है। जो जातीय व्यवस्था की जकड़बंदी को कहीं भी कमजोर नहीं होने देना चाहता। वेद शर्मा की माँ विद्या शर्मा का यह कथन इसी आक्रोश का परिणाम है–

‘तेरे भेजे में चतुराई की चतुराई भरी है तो तू अछूत की बेटी इस ब्राह्मण घर में बहू बनकर आ घुसी है। आखिर पढ़कर कहाँ से आई तू, यह सब? जो तू सोचती है कि वह बेवकूफ कुलद्रोही पति मिल गया तो तुझे गूँगे-बहरी गुड़िया-सी सास मिल जाएगी भोली गाय जैसी ननद भी मिल जाएगी। देवर-देवरानी सब मिल जाएँगे और इसी तरह मेरे माँ-बाप को समधी-समधिन मिल जाएँगे। पर कान खोल के सुन ले, कुछ भी न मिलेगा तुझे यहाँ।’ (शिष्या-बहू, पृष्ठ-46)

यह कथन कहानी के पूरे कलेवर को खोलकर रख देता है। प्रेम और विवाह के ताने-बाने में अनुभूति, अनुभव और अवसाद का घुला-मिला रूप पाठक के लिए एक चुनौतीपूर्ण असहज स्थिति को निर्मित कर देता है। यह कहानी भारतीय जाति-व्यवस्था की बुनावट में एक मानवीय हस्तक्षेप की तरह दिखाई देती है। नई पीढ़ी के बढ़ते कदम इस व्यवस्था को कुछ बदल पाएँगे, ऐसी उम्मीद कहानी में निर्मित होती दिखाई देती है।

‘अस्थियों के अक्षर’ कहानी बहुत मार्मिक है। भारतीय जाति व्यवस्था में अछुत मानी जाने वाली जातियों की समाजिक-व्यवस्था भी कमजोर के साथ न्याय नहीं कर पाती। बालक सौराज की पढ़ने की लालसा और माँ की लाचारी के बीच का असंतुलन दोनों की ही प्रताड़ना का कारण बनता है। सौतेले पिता और उसके भाइयों द्वारा माँ को बुरी तरह मारने-पीटने का दृश्य दर्द और पीड़ा का चरम है।

‘मैंने पीठ पर हल्दी पोतते हुए देखा कि माँ की देह पर छपे हैं अक्षर और माँ पूरी-की-पूरी किताब हो गयी है।’

यह यथार्थ का बहुत दर्दनाक और मर्मांतक चित्र है, जिसमें कराहती माँ की जख्मी देह ही बालक सौराज के लिए जीवन का सबक बन जाती है। अपने कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टिकोण से यह इस संकलन की सबसे ताकतवर कहानी है। एक ओर असहाय और अभावग्रस्त स्थितियों में बालक की पढ़ने की ललक है तो दूसरी ओर दलित स्त्री का अमानवीय शोषण भी दर्ज हुआ है। भारतीय समाज में दोहरी मार झेलती दलित स्त्री का प्रतिनिधित्व ‘माँ’ के माध्यम से हुआ है। यह अमानवीय प्रताड़ना भारतीय दलित स्त्रियों के जीवन का अनदेखा सच है।

‘सिस्टर’ और ‘लवली’ कहानियों के शीर्षकों से ही स्पष्ट है कि ये कहानियाँ स्त्री पात्रों पर केंद्रित हैं। ‘सिस्टर’ कहानी स्त्री पुरुष संबंधों के बीच अनुभूति की संश्लिष्टता के एक विशिष्ट संदर्भ को रेखांकित करती है। विवाह के बाद पति से किया गया एक मजाक स्त्री के जीवन को पूर्णतः बदल देता है। वैवाहिक जीवन से वैराग्य तक पहुँची ‘सिस्टर’ को अपने एक छोटे से मजाक की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। यह कहानी लेखक के जीवन के प्रसंग के रूप में दिखाई देती है। लवली ‘कहानी’ में अपने जीवन पथ से भटकी लवली के साथ पूरे परिवार के बिखरने की कहानी है। इस भटकाव में जाति-व्यवस्था के भीतर की कई तहों को कहानीकार ने टटोलने का प्रयास किया है।

कथानक की दृष्टि से ‘रावण’ इस संकलन की एक अन्य प्रभावशाली कहानी है। इस कहानी में लेखक ने बहुत साफगोई से भारतीय समाज की जड़ों में आज भी बैठी हुई जातिवादी मानसिकता को उघाड़ने का प्रयास किया है। कहानी में गाँव की जातिगत मानसिकता को शहर के बरक्स रखकर देखने का प्रयास है। कहानी का मुख्य पात्र मूलसिंह गाँव में होने वाली रामलीला में जब रावण का किरदार निभाता है। इस स्थिति का वर्णन करते हुए कहानीकार लिखते हैं–

‘इधर पूरे चमरियाने में खुशी और उत्साह की लहर दौड़ रही थी, रामलीला को लेकर। गाँव की नाटक-मंडली के इतिहास में पहली बार उनकी जात का एक कलाकार गाँव की रामलीला में हिस्सा लेने जा रहा था। वह भी रावण की भूमिका निभाने। बात गर्व और गौरव की थी। क्योंकि रामलीला के सभी पात्रों में रावण का पाठ सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रभावी माना जाता था।’ (रावण, पृष्ठ-94)

इस प्रसंग से कहानी प्रारंभ होकर जातिगत वैमनस्य के इस शिखर तक पहुँचती है, जहाँ रामलीला के दौरान फूल सिंह और रामलीला देखने के लिए एकत्रित हुए सभी दलितों को सामूहिक हिंसा का शिकार होना पड़ता है। ‘राक्षस और देव दोनों संस्कृतियाँ अस्पृश्यता के सवाल पर एक साथ उपस्थित थीं।’–यह कथन एक तीखे बयान की तरह कहानी में उभरता है। अंततः फूल सिंह गाँव को छोड़कर शहर में बसने का निर्णय कर लेता है। यहाँ गाँव और शहर की एक तुलना भी उभर कर सामने आती है।

‘आँच की जाँच’ कहानी के केंद्र में एक लावरिस बच्चे की जाति की जाँच का अभियान है। बच्चे को शरण देने से पहले आधुनिक शहरी भारतीय समाज की सबसे बड़ी चिंता है कि उसकी जाति क्या है? इसी चर्चा पर केंद्रित अनेक तर्कों और संवादों के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है और बच्चे की जाति ज्ञात होने के साथ ही अभियान और कहानी का अंत होता है।

कुल मिलाकर ये कहानियाँ वाद-विवाद-संवाद के रास्ते से गुजरती है। क्रिया और प्रतिक्रिया के माध्यम से मुद्दों को कहानी के भीतर से विकसित करना लेखक का अपना क्राफ्ट और शिल्प है। संवादों के माध्यम से पात्रों को भी विकसित किया गया और मुद्दों को भी। कहानी में लेखक ने वर्णनात्मक के स्थान पर संवाद को चुना है।

संवाद पात्रों को आपसी ही नहीं बल्कि लेखक का पात्रों के साथ भी है। लेखक का समाज के साथ भी है। पात्रों के भीतर खड़ा लेखक सिर्फ पाठक के भीतर इन सवालों को पैदा करना नहीं चाहता बल्कि पाठक के माध्यम से समाज की प्रतिक्रियाओं को भी संवाद के भीतर गूँथने का प्रयास है। इस तरह इन कहानियों के शिल्प में किस्सागोई को कथन के माध्यम से विकसित और स्थानांतरित करने का प्रयास है।

विमर्श के स्तर पर कहानियों के केंद्र में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को रखा गया है। चर्चा के केंद्र में दलित सवाल है लेकिन संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को भी कहानियों के कथानक में स्थान दिया गया है। इन कहानियों के माध्यम से यह धारणा निर्मित होती है कि कहानियों के कंधों पर यदि सभ्यताएँ टिकी हैं तो कहानी भी सामाजिक परिवर्तन का हथियार बन सकती है।


Image: Bodhi
Artist: Anunaya Chaubey
© Anunaya Chaubey

मंजु मुकुल द्वारा भी