बर्बर सभ्यता का जवाब प्रकृति की पूजा

Chains of the Caucasus Mountains by Ivan Aivazovsky- WikiArt

बर्बर सभ्यता का जवाब प्रकृति की पूजा

राष्ट्रकवि दिनकर जी एवं नेहरु जी एक बार साथ एक मंच की ओर जा रहे थे। चलते हुए नेहरु जी के पाँवों में ठोकर सी लगी। वे लड़खड़ाये ही थे कि दिनकर जी ने तत्काल उन्हें सँभाल लिया। नेहरु जी के धन्यवाद देने पर दिनकर जी मुस्कुरा कर बोले–‘यह कोई बड़ी बात नहीं…जब सत्ता के कदम डगमगाते हैं, साहित्य ही उसे सँभालता आया है।’

तो सत्ता ही नहीं, व्यक्ति, समाज और जीवन की धुरी भी डगमगाती है तो उसे सँभालने, संतुलित करने का दायित्व और चुनौती साहित्य ही स्वीकारता है और आज तो भयावह आपदा का समय है। हर स्तर पर कठिन संघर्ष करता हुआ आज का व्यक्ति, अंदर-बाहर पूरी तरह से लस्त-पस्त है। यद्यपि उसकी जिजीविषा ने हार नहीं मानी है। फिर भी चुनौतियों की अक्षौहिणी सेना के बीच हताहत खड़ा है वह, अपने जीवन और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए। सबसे ज्यादा डर और असंभव उसका धैर्य, उसकी हिम्मत छूट जाने का है और इसी को सँभालना साहित्य का पहला सरोकार है।

मुझे ‘मानस’ की एक चौपाई याद आ रही है–‘धीरज, धर्म, मित्र अरू नारी।/आपत काल परखिये चारी।

साहित्य इन चारों की भूमिकाएँ एक साथ निभाहता चलता है। इन दिनों के लेखन का सबसे पहला सरोकार हताशा से घिरा यह व्यक्ति ही है जिसके ऊपर हर क्षण जिंदगी और मौत की दुधारी तलवारें लटक रही है। दो गज की दूरी, सोशल डिस्टेंसिंग और उसी के बीच जीवनयापन के लिये काम पर जाने की लाचारी…ऑनलाइन पढ़ाई करते, न करते बच्चों, किशोरों से लेकर युवाओं, वृद्ध-नागरिकों तक की। सुबह चार बजे घर से निकलकर रात ग्यारह तक घर लौटने वाले युवक, युवतियों की हताहत कर देने वाली टूटन और दुश्चिंताएँ अनिश्चितताएँ…इन सबके साथ टूटते उनके भरोसे को कायम रखना आज के साहित्य की पहली चुनौती है। हमें बहुत गहरा, बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं सूझ रहा, नहीं रच पा रहे तो भी कोई बात नहीं, हमें सामयिक हो जाना है। इस आदमी का खोता जा रहा आत्मविश्वास लौटाना है। क्योंकि सबसे ज्यादा जरूरी आदमी का खुद पर के भरोसे का बने रहना है।

सोशल मीडिया पर प्रायः बहुत गंभीर चीजें नहीं आती, लेकिन पिछले महीनों जब लॉकडाउन में हजारों की संख्या में जत्थ के जत्थ गरीब, बदहाल, मजदूर भूखे-प्यासे अपने गाँवों, अंचलों की ओर पलायन कर रहे थे तो सोशल मीडिया लगातार उनके हालातों की जानकारी भी दे रहा था, मदद के लिये बढ़े हाथों को अपनी खुली सराहना से प्रोत्साहित भी कर रहा था, और लोगों को आगे आने के लिये आजीवंत प्रेरित भी कर रहा था ।

सचमुच शब्दों से बड़ा कोई उपचार नहीं। लेकिन इसका बहुत आवेगी, अफवाही किस्म का उपयोग भी घातक है। शक्ति और सामर्थ्य का गलत इस्तेमाल उतना ही हानिकारक भी सिद्ध होता है। त्वरित और अतिरैली प्रचार के दुष्परिणाम भी देखने को मिल चुके हैं और सबसे बढ़कर इस आपदा से जुड़े सकारात्मक पहलुओं पर भी बातें होती रहनी हैं। प्रकृति और पर्यावरण को मिला स्वच्छता और सुरक्षा का वरदान भी इसी आपदा की देन है। धुंध छट गई है, उत्तराखंड के गहरों से हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाएँ दीख रही हैं, यह भी किसी चमत्कार से कम नहीं। तो पूर्णतः बर्बर और अमानवीय हो गयी इस सभ्यता के लिये प्रकृति द्वारा दी जाती इस चेतावनी को भी लोगों के सामने बार-बार दुहराया जाना चाहिए। बर्बर और अमानवीय सभ्यता का जवाब प्रकृति की पूजा के द्वारा ही दिया जा सकता है, यही आज के साहित्य का संदेश है।


Image: Chains of the Caucasus Mountains
Image Source: WikiArt
Artist: Ivan Aivazovsky
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सूर्यबाला द्वारा भी