विषमता के शिकार नायकों की कथा

विषमता के शिकार नायकों की कथा

‘नेपथ्य के नायक’ सामाजिक न्याय और समता के लिए लड़ने वाले ऐसे 25 नायकों की जीवनी है, जिनको हमारे इतिहास लेखन में उचित मान-सम्मान नहीं दिया गया। यह पुस्तक सामाजिक गैर-बराबरी और ज्यादती के विरुद्ध लड़ने वाले चेतनासंपन्न योद्धाओं के संघर्षों की कहानी को सामने लाती है।

पहले उपखंड ‘सामाजिक, सांगठनिक जागरण के सूत्रधार’ के नायक हैं–जोतीराव फुले, सरदार जगदेव सिंह, चुल्हाई साहु, रामलखन चंदापुरी एवं सोनेलाल पटेल। विद्वान लेखकों डॉ. श्रीभगवान ठाकुर, मनीष रंजन, डॉ. अरुण कुमार, डॉ. दिलीप कुमार एवं अशोक प्रताप ने अपने सधे हुए कलम से इन नायकों के व्यक्तित्व पर पड़े धुंध को हटाने में कामयाब रहे हैं। दूसरे उपखंड का शीर्षक है–‘समानांतर अंतरसंघर्ष की नायिकाएँ।’ इस उपखंड की नायिकाएँ हैं–चकली अइलम्मा, ताराबाई शिंदे, रुकैया सखावत हुसैन, झलकारी बाई तथा फूलन। इन नायिकाओं पर कलम चलाया है–नरेंद्र कुमार दिवाकर, आनंद बिहारी, नसीरूद्दीन एवं डॉ. मुलायम सिंह ने। पुस्तक के तीसरे उपखंड का शीर्षक है–साम्राज्यवादी, सामंतवादी संघर्ष के योद्धा। इस भाग के लेखन में योगदान दिए हैं–संजय कृष्ण, अलखदेव प्रसाद अचल, श्रीकांत, लोहित बैंसला तथा डॉ. बिनोद पाल। इस उपखंड के नायक हैं–चुआड़ विद्रोह के नायक रघुनाथ महतो, कुँवर सिंह के पथप्रदर्शक अजायब सिंह महतो, कलम के सत्याग्रही पीर मुहम्मद मूनिस, प्रतिरोध के जीवंत प्रतीक विजय सिंह पथिक तथा अगस्त क्रांति के गुमनाम शहीद बच्चन भेड़ीहर। चौथे उपखंड का शीर्षक है–‘साहित्य, रंगमंच, प्रकाशन, संगीत और खेल के सितारे।’ इस उपखंड में रंगमंच के अमर साधक भिखारी ठाकुर, जाति व्यवस्था के जानी दुश्मन संतराम बी.ए., उत्तर भारत में प्रतिरोधी चेतना के सूत्रधार चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद तथा विरहा गायन के विद्रोही स्वर नसुड़ी को शामिल किया गया है। इस खंड के लेखक हैं, डॉ. मन्नू राय, सुरेश कुमार, डॉ. अजय कुमार, अशोक कुमार सिन्हा एवं रामजी यादव। पाँचवें और अंतिम उपखंड का शीर्षक है–‘राजनीतिक संघर्ष के अगुआ।’ इस उपखंड के नायक हैं–‘किसानों की आवाज चौधरी चरण सिंह,’ ‘कर्तव्यपरायण और अनुशासित राजनेता ज्ञानी जैल सिंह,’ ‘राजनीतिक साहस और रणकौशल का मास्टर कर्पूरी ठाकुर’ तथा ‘सामाजिक न्याय प्रयोगशाला के वैज्ञानिक एम. करुणानिधि।’ इस उपखंड को अपने लेखन से डॉ. राकेश राणा, निशिकांत राय तथा सत्यनारायण प्रसाद यादव जैसे कलमजीवियों ने समृद्ध किया है।

पुस्तक में शामिल नायकों के चयन में बहुजन समाज की जातीय, क्षेत्रीय, और भाषिक विविधता का खासा ध्यान रखा गया है। संपादक अरुण नारायण ने इनके चयन में काफी सावधानी बरती है। संपादकीय में वे लिखते हैं, ‘पुस्तक का उद्देश्य इस कोशिश में निहित है कि भारत के व्यापक बहुजन समाज की जातीय, क्षेत्रीय और भाषाई विविधता जीवंत रूप में प्रतिबिंबित हो।’ पुस्तक में संग्रहीत जीवनी नये पाठकों के जीवन दर्शन में गुणात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है। डॉ. श्रीभगवान ठाकुर ने अपने आलेख में जोतीराव फुले को उधृत करते हुए लिखा है–‘एक गुलाम को शिक्षा दे दो, वह सारे बंधनों को तोड़कर अपना रास्ता खुद चुन लेगा।’ इस आलेख के माध्यम से जोतीबा फुले जीवन दर्शन और समाज की उन्नति के लिए उनके द्वारा किये गए संघर्षों और अवदानों को जानने में सहूलियत होगी। एक असाधारण संगठनकर्त्ता सरदार जगदेव सिंह के जीवन और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध उनके संघर्षों पर रोशनी डाला है, मनीष रंजन ने। पुस्तक में चुल्हाई साहु की अग्निकथा को डॉ. अरुण कुमार ने लिखा है। इनकी जीवनी जातीय घृणा से उपजी हिंसा के विरुद्ध प्रतिशोध और प्रतिकार की अनूठी कहानी बयान करती है। स्वाभिमान की रक्षा की यह कहानी हर किसी को जानना चाहिए। एक और अग्निकथा के रूप में फुलन देवी की जीवनी को डॉ. मुलायम सिंह ने लिखा है। प्रसिद्ध चिंतक व लेखक संतराम, बी.ए. के बारे में सुरेश कुमार लिखते हैं, ‘संतराम बी.ए. ने हिंदू मनोवृत्ति को बड़ी गहराई से परख लिया था। उन्होंने अस्पृश्यता और जाति की जड़ वर्णव्यवस्था को माना था। इनकी दृष्टि में जाति और वर्णव्यवस्था सामाजिक बुराई थी, जिसने दलितों को अछूत और गुलाम के रूप में स्थापित कर दिया।’ यह पुस्तक सीरीज वंचित समाज के जीवन में आत्मविश्वास का संचार कर उनके खोये गौरव को लौटाने में मदद कर सकता है तथा समाज के बहुत बड़े हिस्से को राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदारी और योगदान के लिए चेतना संपन्न बनाने की भूमिका का निर्वहण करने की क्षमता रखती है।


Image: Portrait of Ivan Pavlov
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Artist: Mikhail Nesterov
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रामनरेश यादव द्वारा भी