समकालीन भारतीय साहित्य

समकालीन भारतीय साहित्य

साहित्य अकादमी की द्वैमासिक पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ का मई-जून प्रसिद्ध कहानीकार बलराम के संपादन में पढ़ने को मिला। उनके संपादन में पत्रिका का न केवल ले-आउट अत्याकर्षक है, बल्कि सामग्री के चयन एवं प्रस्तुति में भी उत्कृष्टता एवं नयापन है। इन्होंने पूर्ववर्ती संपादकों की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए पर्याप्त समद्ध किया है। पूरी पत्रिका के संपादन में उनका संपादन-कला-कौशल झलक रहा है।

अपने संपादकीय ‘राष्ट्रीय-आत्मा’ में उन्होंने हिंदी साहित्य की उस शक्ति की खोज की है जिससे वह कभी नहीं मरता है। उसको हर काल में संवेदनशील  एवं नवीन बनाए रखती है। यह शक्ति है लोक-जीवन, लोक-आत्मा, लोक-प्रेम, लोक-संघर्ष। जब शिष्ट साहित्य का जीवन-रक्त विचारों के रेगिस्तान में सूखने लगता है तो वह अपनी प्राण-प्रतिष्ठा के लिए स्वच्छ लोक-जल की ओर मुखातिब होता है। वहीं उन्होंने हिंदी साहित्य के रचनाकारों के साथ उनकी अनमोल कृतियों के संक्षिप्त रूप से ऐतिहासिक पड़ताल की है। सच यह है कि इन काव्य कृतियों, उपन्यासों, कहानियों, नाटकों, संस्मरणों सहित अन्य विधाओं से हिंदी साहित्य की वैश्विक पहचान बनी है। आलोचना की कसौटी की ओर संपादक संकेत करते हैं कि–‘साहित्य की आलोचना से जुड़े लोगों को याद रखना होता है कि संवेदनशील विवेक, न्यायशील ज्ञान और न्यूनतम सार्वभौमिक प्रतिमानों का स्पर्श करने वाले पाठ से ही रचना और आलोचना की मुक्ति संभव है। सच्चा और अच्छा आलोचक फकीर जैसा होता है, क्योंकि वही सच्चा और अच्छा है। इसके साथ एक सच यह भी है कि कोई आलोचक नामवर चाहे जितना हो ले, शहंशाह कभी नहीं हो सकता। शहंशाह तो सर्जक ही होता है, जो सच्चे आलोचक को आँगन कुटी छवाकर रखने का ख्वाहिशमंद होता है, जिसका फकीरी सोच साहित्य का संस्कार करता है, जिसमें संस्कृति विकसित होती है, नवीकृत और पुनर्संस्कारित भी।’ इस तरह अंक में नवीन दृष्टिकोण से युक्त सारगर्भित संपादकीय पढ़ने को मिला। ‘सृजन-संसार’ स्तंभ के अंतर्गत महान लेखक लेव तोत्सतोय की जिंदगी के संबंध में हेनरी त्रायत ने ज्ञानवर्द्धक जानकारियाँ हिंदी के पाठकों को उपलब्ध कराई हैं। खासकर उनका सन् 1895 में विस्थापति दुखाबोर्स संप्रदाय को काकेशस में अपना धन लगा कर बसाना उनकी मानवता की मिसाल है। वहीं उनके जीवन के अंतिम काम की त्रासदी का कारूणिक संस्मरण मन को छूता है। इसका अनुवाद रूपसिंह चंदेल ने किया है जो काफी सहज और बोधगम्य है। रामचंद्र शाह ने हिंदी नवजागरण के प्रणेता साहित्यकार, पत्रकार, राष्ट्रीय चिंतक एवं समाज सुधारक पंडित माधवराव सप्रे के विचारों की प्रसांगिकता और जरूरत पर अपना चिंतन प्रस्तुत किया है जो काफी प्रेरक है। वहीं मधुरेश ने सुप्रसिद्ध आलोचक देवीशंकर अवस्थी की आलोचना दृष्टि एवं साहित्यिक बोध को रेखांकित किया है।

‘आत्मस्वीकृतियाँ’ खंड में अरुणेंद्रनाथ वर्मा का लेख–‘लेखन क्यों और कैसे’, कमलेश भट्ट ‘कमल’ की यात्रा-वृतांत ‘समरकंद टूर ऑन बुलेटिन’, स्मृतिशेष के अंतर्गत उदयन वाजपेयी का ‘निरंतर प्रवासी कृष्ण बलदेव वैद’, राजेन्द्र राजन का ‘हिमाचल में कश्मीरी पंडित : काव’, स्त्री-लेखन के अंतर्गत प्रयाग शुक्ल का ‘घेरा ज्यों ध्यान स्थल का’, जयश्री सिंह का ‘नई सदी के स्त्री-स्वर में नींद’, दीप्ति गुप्ता का उत्तर स्त्री का विमर्श पर कुछ सवाल और बी.आर. सिंह का ‘कुच्ची अदभुत-अपूर्व नायिका’ जैसे स्तंभों में साहित्य के नए-नए सवालों को उठाया गया है और विद्वानों का उनमें गहन चिंतन अनुस्यूत हुआ है। ‘कविता खंड’ में दिनेश कुमार शुक्ल, विश्वनाथ सचदेव, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, विनोद खेतान, सुधीर सक्सेना, सुभाष राय, भरत प्रसाद, भारत यायावर, सतीश राठी, महेश केलुसरकर, जसवीर चावला और कस्तूरीलाल तागड़ा की समकालीन जीवन के संदर्भों का स्पर्श करती महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। सभी कविताएँ समय के यथार्थ से रू-ब-रू कराती हैं। इस अंक में कोरोना जैसे महामारी जो देश-दुनिया के लाखों-करोड़ों की जिंदगी पर मौत के बादल बन कर छा रही हैं, इसकी भयावहता को सुधीर सक्सेना ने अपनी ‘कोरोना सीरीज की कविताएँ’ में और विश्वनाथ सचदेव ने ‘सवेरा तो होगा’ कविता में इशारा किया है, वहीं वैश्विक बाजार में आज कवि किस तरह अपनी सृजनात्मक प्रतिभा को बेचने के लिए तैयार है, इसका यथार्थ चित्रण भारत यायावर की कविता ‘घर नहीं कि घर जाएँ’ प्रस्तुत करती है। उन्होंने अपनी कविता में रचनाकारों के स्वाभिमान का सवाल उठाया है। वहीं अपने कवि मित्र अनिल जनविजय की आत्मीयता, मैत्री, उसका संवेदनशील  व्यक्त्वि को ‘उन यादों के साथ’ कविता में दर्ज किया है। कहानियों में उषाकिरण खान, सच्चिदानंद जोशी, गौर हरिदास, ईशमधु तलवार, अंजली देशपांडेय, प्रेम जन्मेजय, अनघा जोगलेकर, योगराज प्रभावकर एवं लता अग्रवाल की कहानियाँ प्रकाशित हैं। ये कहानियाँ बदलते भारतीय समाज के यथार्थ को सामने लाती हैं। नए अंदाज में लिखी गई हमारे आसपास के संसार के प्रति जिज्ञासा पैदा करती हैं।

समीक्षा खंड में रामशंकर द्विवेदी, हरिमोहन शर्मा, प्रियदर्शन, प्रभात रंजन, ओमप्रकाश शर्मा, जवाहर चौधरी, माधव नागदा, प्रभात कुमार राय एवं नीलोत्पल रमेश की पुस्तक-समीक्षाएँ अंक को संतुलित करती हैं। प्रभात कुमार राय ने सुप्रसिद्ध गजलकार शिवनारायण की पुस्तक ‘झील में चाँद’ का बहुत सुंदर एवं सारगर्भित समीक्षा की है। कवि के संबंध में उनकी राय है–‘शिवनारायण अपनी गजलों में मनुष्य की पीड़ा, चिंता, अकेलापन, के साथ ही उनका जीवट भी झलकता है।’ आगे बताते हैं कि भावात्मक संवेगों से परिपूर्ण हृदय सहज ही कवित्व की पराकाष्ठा को दर्शाता है। ये भाव विविध रूपों में अभिव्यक्त होते हैं। प्रेम, समर्पण, मोह, रागात्मक, मुग्धता, हास, दैन्य, करुणा, वीरता, सौम्यता, क्रोध, प्रतिरोध, साहस, क्षमा, विदग्धता, बुद्धिमानी, कुशलता, रौद्र, भयानक, वीभत्स, वात्सल्य, भक्ति और शांति जैसी मनःस्थिति की ही अभिव्यक्ति है। शिवनारायण ने इनको बड़ी कुशलता से अपनी गजलों में रूपायित किया है। कुल मिलाकर संपादक बलराम के कुशल संपादन एवं परिश्रम से ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ का यह साफ-सुथरा अंक प्रशंसनीय बन पड़ा है।


Image: Balloons
Artist: Anunaya Chaubey
� Anunaya Chaubey

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गणेशचन्द्र राही द्वारा भी