बँधे बँधाए साँचे को तोड़ती कहानियाँ

बँधे बँधाए साँचे को तोड़ती कहानियाँ

जिसे आमतौर पर हम हिंदी की मुख्यधारा कहते हैं उसकी सीमा कसिया गोरखपुर से शुरू होकर इलाहबाद के पुराने मोहल्लों तक आते आते समाप्त होने लगती है। लखनऊ, बनारस…इसके बाहर के लेखक बहिष्कृत से कर दिए गए या कमतर करके आँके गए। शायद यही वजह है कि ‘नेशनल एलिगरी’ लिखने वाले फणीश्वरनाथ रेणु आंचलिक के खाँचे में डाल दिए गए, निर्मल वर्मा हिंदू राष्ट्रवादियों से जोड़ दिए गए। देश की भौगोलिक सीमाओं से बाहर के लेखक तो जैसे बाहरी ही मान लिए गए।
आखिर क्या कारण है कि अभिमन्यु अनत के उपन्यास ‘लाल पसीना’ का जिक्र हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासों में नहीं हुआ, जिसके बारे में इंडियन डायस्पोरा लेखन पर शोध करने वाले एक युवा इतिहासकार ने मुझसे कहा था–यह एक महान उपन्यास है। उन्होंने अमिताभ घोष के उपन्यास ‘सी ऑफ पौपीज’ से उसकी तुलना करते हुए कहा था कि अमिताभ घोष के उपन्यास में आरंभ से ही उसकी कृत्रिमता सामने आने लगती है जबकि अभिमन्यु अनत के उपन्यास में आरंभ से ही उसका आत्मीय आवेग पाठकों को बाँध लेता है। आप बताइए कि आपने हिंदी की महत्त्वपूर्ण कही जाने वाली पत्रिकाओं में कितने लेख इस उपन्यास को लेकर पढ़े हैं? बावजूद इसके कि यह उपन्यास उस जमाने में ‘सारिका’ जैसी पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित हुआ था जब उस साहित्यिक पत्रिका के पाठक लाखों में थे।
हाल में जब प्रसिद्ध डायस्पोरा लेखक तेजेंद्र शर्मा के कहानी संग्रह ‘कब्र का मुनाफा’ की कहानियाँ पढ़ रहा था तो यही अहसास बार-बार उभर रहा था कि आखिर हिंदी की समकालीन कहानियों की दुनिया में इस कथाकार को वह ऊँचाई क्यों नहीं मिली जिसका वह हकदार है? यह बात मैं पूरी गंभीरता से, पूरी शिद्दत के साथ कह रहा हूँ। वो भी इस संग्रह की बारह कहानियों को पढ़ने के बाद। हालाँकि सभी कहानियों की जमीन परदेस नहीं है, न ही देस-परदेस का द्वंद्व हर कहानी में है, लेकिन विस्थापन उनकी कई कहानियों में बार बार आता है। अपनी जमीनों से उजड़े हुए लोगों की संवेदना, उस तरह की अमानवीय परिस्थितियाँ जिनमें अपनी पहचान खोने के बाद कई बार हमको रहना पड़ता है, जीना पड़ता है, मरना पड़ता है।
संग्रह की पहली ही कहानी ‘देह की कीमत’ में अवैध रूप से विदेशों में रह रहे लोगों के जीवन का कितना दर्दनाक चित्रण है। बीमार होने पर इलाज भी नहीं करवा सकते क्योंकि पकड़ लिए जाने का खतरा रहता है। इस तरह अवैध रूप से विदेश जाने का कारण भी पैसा होता है और मर जाने के बाद भी पैसा ही रह जाता है। हरदीप सिंह की मौत के बाद उसकी पत्नी और बच्ची के लिए पैसा भेज दिया जाता है और उसकी लाश को वहीं दफना दिया जाता है। किस तरह पूँजीवादी समय में समाज की संवेदनाएँ मर रही हैं, इस भूमंडलीय उत्तर-आधुनिक सच को लेखक ने बड़ी सफाई से कहानी में सँवारा है। कहानी का यह संवाद कि ‘अगर कुलदीप पम्मी पर चादर डाल दे, तो कैसा रहे? घर की इज्जत भी घर में रह जाएगी और…’ राजिंदर सिंह बेदी की महान कहानी ‘एक चादर मैली सी’ की याद दिलाती है। साथ ही, यह भी याद दिलाती है कि इतने बरसों बाद भी समाज का सच वही का वही है, रूढ़ियाँ वही हैं। कुछ बदला है तो संवेदना का वह रूप जो पूँजी-केंद्रित समाज का वह चेहरा जिसने हमें बाजार में नंगा खड़ा कर दिया है। मुझे नहीं लगता है इस विषय पर इतनी अच्छी कहानी मैंने पहले कहीं पढ़ी हो। ‘देह की कीमत’ कहानी महज तेजेंद्र शर्मा के लेखन की उपलब्धि नहीं है बल्कि वह हिंदी कहानी की एक उपलब्धि है। उस हिंदी कहानी की जिसको आलोचकों ने एक बने बनाए साँचे में कैद कर रखा है और जो रचना उस साँचे से बाहर निकलती दिखाई देती है उसे हाशिये पर धकेलने की कोशिश की जाती है।
तेजेंद्र की कहानियों में अपनी परंपरा से संवाद की कोशिश भी दिखाई देती है। कथा-परंपरा से। उदहारण के लिए तेजेंद्र की एक कहानी है ‘मलबे की मालकिन’, जिसका शीर्षक मोहन राकेश की प्रसिद्ध कहानी ‘मलबे का मालिक’ की याद दिलाता है। हालाँकि यह समानता यहीं तक है। क्योंकि भारत विभाजन की क्रूर सच्चाई से उपजी कहानी ‘मलबे का मालिक’ से यह कहानी बहुत भिन्न प्रकृति की है। रिश्तों की एक उलझनभरी कहानी। समीर, नीलिमा और उसकी माँ प्रियदर्शिनी के प्रेम त्रिकोण की कहानी। ऐसी कहानियों को लिखना तलवार की धार पर गुजरने के समान होता है। जब मैं बच्चा था और मैंने अनीता औलक की किताब ‘चंद सतरें और’ में जब यह पंक्ति पढ़ी थी ‘आई लव यु! यु लव मई मम्मी! आई नो आईटी!’ तब पढ़कर शरीर में झुरझुरी उठती थी। बार-बार पढ़ता और रोमांचित होता था। अब जब इस कहानी में ऐसा प्रसंग पढ़ा तो सब कुछ सहज लगा। यही तेजेंद्र शर्मा की खासियत है उनकी कहानियाँ विश्वसनीय लगती हैं।
लेकिन इस संग्रह में जो कहानी मुझे सबसे खास पसंद आई वह है ‘एक बार फिर होली’। भारत विभाजन, पकिस्तान में मोहाजिर बनकर जीने की अजनबियत, अपने-पराये की सूक्ष्म संवेदनाओं को यह कहानी बड़ी बारीकी से हमारे सामने रखती है और होली के रंगों के बहाने एक ऐसी टीस के साथ यह कहानी खत्म होती है कि पढ़ने के बाद मौन सा छा जाता है। याद आया, रघुवीर सहाय कहा करते थे कि मैं चाहता हूँ जब मैं कविताएँ सुनाकर हटूँ तो सन्नाटा छा जाए। कुछ वैसा ही प्रभाव रह जाता है इस कहानी का।
पढ़ने लायक कहानी ‘कब्र का मुनाफा’ भी है। कब्रों की बुकिंग करवाकर उनको कैंसल करवाकर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। परदेसी धरती पर देसी लोग पैसा कमाने के लिए क्या क्या धंधे करते हैं। एकदम नई जमीन की कहानी।
तेजेंद्र की कहानियों में सभ्यताओं का द्वंद्व है, समाज का वह विद्रूप चेहरा है जिसे पूँजीवाद रह-रहकर बेनकाब करता चलता है। तेजेंद्र जी की भाषा में एक तरह का ‘इन्हेरेंट विट’ है जो कहानियों में एक खास किस्म की रवानी पैदा करता है और हिंदी उर्दू की साझी परंपरा की किस्सागोई की विरासत की याद दिलाता है। तेजेंद्र शर्मा की रेंज बहुत बड़ी है। उनके समकालीन कई कथाकार एक ही कहानी को बार बार लिखकर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय होने का दंभ भरते रहे जबकि यह लेखक समाज की अलग अलग विडंबनाओं को अपनी कथाओं के माध्यम से समझते रहे।
उनकी कहानियाँ बार बार मेरे जैसे पाठकों के मन में यह सवाल उठाती रहती हैं कि आखिर वह क्या कारण है कि डायस्पोरा लेखन के बड़े बड़े लेखकों तक को हिंदी में वह मुकाम क्यों नहीं दिया गया जिसके वे हकदार हैं? क्यों आजादी के तकरीबन 70 साल के बाद भी हिंदी की चौहद्दी सिमटी हुई दिखाई देती है? यकीन न हो तो ‘कब्र का मुनाफा’ संग्रह की कहानियों को पढ़ें और खुद इन सवालों के जवाब में अपना सिर धुनें। जैसे मैं धुन रहा हूँ कि आखिर मैंने उनकी कहानियाँ इतनी देर से क्यों पढ़ीं!


Image : Girl Reading on a Divan
Image Source : WikiArt
Artist : Isaac Israels
Image in Public Domain

प्रभात रंजन द्वारा भी