हिंदी गजल के एक सक्रिय महारथी

हिंदी गजल के एक सक्रिय महारथी

हर और भले धुँध है लेकिन यह छँटेगी
सूरज को अँधेरों का कभी डर नहीं होता।

कोई किसी की तरफ है, कोई किसी की तरफ
वो एक हम हैं जो रहते हैं जिंदगी की तरफ।

चोर दरवाजा नहीं रखते हैं दिल में दोस्तो
जो जुबाँ का है वही अंदाज दिल का हू-ब-हू।

फितरत में झूठ शामिल है हमारी दोस्तो
सच तो ये है आइना तुम भी नहीं, हम भी नहीं।

साफगोई, आशा, विश्वास, जिजीविषा और ईमानदारी से भरे ये शेर हिंदी गजल के समर्थ कवि अनिरुद्ध सिन्हा के हैं। अनिरुद्ध जी की गजलें व्यापक सामाजिक सरोकारों से वाबस्ता हैं। ये इतनी वैविध्यपूर्ण हैं कि इनमें जीवन के सभी पक्षों का सहज ही उद्घाटन हो जाता है। इनमें हमारे समय के तमाम सवाल उठाए गए हैं। यह जीवन के विद्रूप और कठोर पक्षों का चित्रण तो करती ही हैं, मानवीय मूल्यों और राग-अनुराग का भी सुंदर ताना-बाना बुनती हैं। सिन्हा जी कवि भी हैं, गजलकार और आलोचक भी। ‘तिनके भी डराते हैं’, ‘तपिश’, ‘तड़प’, ‘तमाशा’, ‘तो गजल क्या है’, ‘तुम भी नहीं’ आदि उनके गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘समकालीन हिंदी गजल’ और ‘हिंदी गजल का नया पक्ष’ उनकी आलोचना की पुस्तकें हैं। उन्होंने कई पत्रिकाओं के गजल विशेषांकों और पुस्तकों का संपादन भी किया है। इन उपलब्धियों के लिए उन्हें कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। उनकी गजलों पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध गजलकार जहीर कुरैशी ने लिखा है कि–‘अनिरुद्ध सिन्हा एक ऐसे रचनाकार हैं जो सबसे पहले गजल को गजल के रूप में देखना चाहते हैं। यानी कथ्य के साथ-साथ अनिरुद्ध गजल के इल्मो-उरुज, गजल की सांकेतिकता, व्यंजना और मैनरिज्म की अधिकतम रक्षा करना चाहते हैं। उनकी अधिकांश गजलें हिंदी-उर्दू की साझा संस्कृति का एक अनुकरणीय उदाहरण मानी जा सकती हैं। अनिरुद्ध सिन्हा अपनी गजलों में परंपरा का दामन थाम कर भी नव्यता के रास्ते पर शऊर के साथ आगे बढ़ते चले जाते हैं।

अनिरुद्ध जी की गजलों की विशेषताओं को चिह्नित करती हुई ध्रुव गुप्त की यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है–‘अनिरुद्ध की गजलें अपने अलग तेवर और जुदा अंदाज के लिए जानी जाती रही हैं। वह हमें गुदगुदाती भी हैं, खरोचती भी हैं, बेचैन भी करती हैं। और सबसे बड़ी बात कि पढ़ने के बाद भी दिलो-दिमाग में तीव्र अनुगूँज छोड़ जाती हैं। यही वजह है कि गजलों की भारी भीड़ में भी उनके अशआर अलग से पहचाने और रेखांकित किए जा सकते हैं।…नाद, अंतर्ध्वनि, अर्थव्यंजना और शिल्प के स्तर पर उनमें कुछ ऐसा है जो पाठकों और श्रोताओं से सीधा संवाद करता चलता है।’

हर सजग रचनाकार अपने समय, समय की हलचलों, हरकतों पर खुली और चौकन्नी नजर रखता है। अनिरुद्ध सिन्हा के लिए भी यही सच है। हमारा समय अनेक प्रकार की समस्याओं, विसंगतियों और विडंबनाओं से भरा है। बहुत सारे जीवन-मूल्य प्रेम, सद्भाव, करुणा, सच्चाई, ईमानदारी आदि सद्वृत्तियाँ इन दिनों खतरे में पड़ी हुई है। इस संदर्भ में ये शेर द्रष्टव्य हैं–

ये हिंसा लूट और डाकाजनी इतने चरम पर है,
अब अपनी आँख में सपने सजाना है बहुत मुश्किल,
सदी ने कर दिया है आदमी का ध्यान खतरे में।

इस समय सहअस्तित्व और सहयोग का भाव कमजोर हो रहा है। विश्वसनीय लोग भी अब विश्वासघात कर रहे हैं। इन दिनों ऐसी घटनाएँ अक्सर हो रही हैं कि किराए पर घर लेने वाले घर पर कब्जा कर ले रहे हैं। यह शेर देखें–

जिसे किराये पर हमने दिया था रहने को
उसी के कब्जे में अपना मकान है भाई।

आज राजनीति में ही नहीं, हर तरफ अवसरवाद चल रहा है। मौका और लाभ देखकर आदमी कभी भी पाला बदल ले रहा है। सामाजिक और वैचारिक पक्षधरता का कोई महत्त्व ही नहीं रह गया है। और तो और, शिक्षित और साहित्यिक व्यक्ति भी हवा का रुख देखकर विचार बदल रहे हैं–

सत्य पराजित रोज हुआ करता है जिनसे
साथ उन्हीं के सब ही लेंगे, क्या कर लोगे?

अदबी लोगों के ये अपने-अपने खेमे
शुद्ध हवा में विष घोलेंगे, क्या कर लोगे?

अनिरुद्ध सिन्हा की गजलों का एक बड़ा हिस्सा आम आदमी के जीवन से वाबस्ता है। आजादी से पहले और बाद में भी देश के नेताओं ने हर मोर्चे पर जूझने वाले नौजवानों और गाँव से लेकर शहर-नगरों तक हर जगह खटने वालों को बार-बार लुभावने आश्वासन दिए और तरह-तरह के झूठे सपने दिखाए लेकिन उनका यथार्थ जीवन पर तो दलित और लहूलुहान होता रहा। सामान्य किसान, मजदूर और निम्नवर्ग तो गोदान के होरी की तरह ‘मर्जाद’ बचाने की कोशिश में अपमानित ही होता रहा। इस बेबसी और बदहाली से जुड़े ये शेर बहुत मार्मिक हैं–

एक चीज थी बची हुई, वो भी उतार दी,
मजबूरियों ने बाप की पगड़ी उतार दी

पुरखों के नाम की जो जमीने थीं बेच दी
खूँटी से खानदानी निशानी उतार दी।

गरीबों का दर्द, कर्ज लेने की विवशता और उसे न चुका पाने की यंत्रणा का बयान करता हुआ यह शेर भी देखने लायक है–

वो महाजन भी रोज आता है
मैं भी कहता हूँ कह दो घर में नहीं।

आर्थिक परिस्थितियाँ इनसान को कभी-कभी इस तरह तोड़ देती हैं कि उसकी आँखों के सपने मर जाते हैं, उसकी संवेदना पथरा जाती है। समझ में नहीं आता कि कभी अच्छे दिन आएँगे या नहीं। और आएँगे भी तो कब? क्या ऐसे लोगों के जीवन में भी कोई राम आएगा, कभी इनका भी कल्याण होगा?

पड़ते हैं पाँव राम के किस रोज देखिए,
मुद्दत से खुद में है कोई पत्थर बना हुआ।

और यह तो विवशता का चरम है–

रोटियों के लिए औरतें अब यहाँ
दे रहीं जिस्म की पेशगी क्या करें।

स्वाधीनता से पहले राजनीति त्याग और तपस्या थी। सेवा और बलिदान की प्रतीक थी। हर क्षेत्र में काम करने वाले लोग नेताओं के त्याग-तप को आदर्श मानते थे और उनके प्रति निर्विवाद रूप से सम्मान-भाव रखते थे। आजादी के बाद धीरे-धीरे त्याग स्वार्थ में और साधना ‘साधने’ में बदलने लगी। स्पष्ट छवि वाले नेता मुखौटे लगाने लगे। उन्हें पहचानना कठिन होने लगा। हर चुनाव में पार्टी और वेशभूषा के साथ ही नारे और विचार भी बदलने लगे। सिन्हा जी ने ऐसे नेताओं की अच्छी पहचान की है–

उसे समझना भी आसान कुछ नहीं था, और
बदल-बदल के वो मिलता था अपना चेहरा भी।

विचारहीन, सिद्धांतहीन और मर्यादाहीन राजनीति करने वालों के पास सिर्फ खोखली बातें और निरर्थक बयान ही बचे हैं–

आज के दौर की सियासत क्या,
ये लड़ाई है बस बयानों की।

इस दौर की राजनीति करने वाले सिर्फ मतलब के लिए ही जनता से संबंध रखते हैं। राजनीति इनके लिए सिर्फ और सिर्फ कारोबार करते हैं। जातियों-धर्मो, और मंदिर-मस्जिद का भी ये कारोबार ही करते आ रहे हैं–

एक मंडी है सियासत ऐसी
जिसमें अल्लाह बिके, राम बिके।

है उनका एक ही मकसद वही हर बार करते हैं
सियासी लोग हैं मतलब का कारोबार करते हैं।

यह पूँजी के चरम वर्चस्व का समय है। बहुत सारे जीवन-मूल्यों को बाजार और पैसे ने निगल लिया है। प्रेम, बंधुत्व, इनसानियत, करुणा, परोपकार, सामाजिक सद्भाव आदि के लिए अब समय और स्थान नहीं बचा है। प्यार का सरेआम सौदा हो रहा है। ऐसे में निश्छल और पवित्र प्रेम की आवाज नहीं सुनी जा रही है। यही हमारे समय का सच है–

इतना आसान नहीं प्यारे मोहब्बत करना,
ये वो गुड़िया है जो बाजार से कट जाती है।

विगत दशकों में मनुष्य ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जंगलों, पहाड़ों, नदियों और हर प्राकृतिक संसाधन का यथासंभव शोषण किया है। इन सबके साथ ही पशु-पक्षियों का भी शिकार और विनाश किया है। प्रकृति के साथ इनसानियत और अस्तित्व का रिश्ता समाप्त होता गया है। इनके परिणामस्वरूप पर्यावरण में भीषण असंतुलन हुआ है। इसीलिए चौकाने वाली त्रासद स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। पर्यावरण की यह चिंता अनिरुद्ध जी के शेरों में कई बार प्रकट होती है–

कहाँ है बादल, कहाँ समंदर, कहाँ घटाओं का शोर-गुल भी,
सभी परिंदे थके-थके हैं, थकान का मौसम शजर-शजर है।

जमीं ही सहारा में तब्दील हो न जाए कहीं
वो धूप है कि उबलने लगा है दरिया भी।

इधर वृद्धजन की चिंता भी साहित्यिक वर्गों में उभरने लगी है। शहरीकरण, एकल परिवारों और अर्थ केंद्रित संबंधों के कारण परिवार से वृद्धजन की उपेक्षा होने लगी है। बहुत सारे लोग अपने माँ-बाप को वृद्धाश्रमों के हवाले करने लगे हैं, जो घर में हैं वे भी प्रतिबंधों में हैं। लोग यह नहीं समझ रहे कि वे खुद भी एक दिन वृद्ध होंगे। इस समस्या से जुड़े सिन्हा जी के यह अशआर देखें–

दुखों की बस्तियाँ आबाद थीं जब जगहँसाई तक,
चुकाया कर्ज हमने जिंदगी का पाई-पाई तक

बुढ़ापे में हमें यूँ कैद कर रखा है बच्चों ने
कि हम हैं घर की चौखट से हमारी चारपाई तक।

अनिरुद्ध जी की गजलों की अच्छाई यह भी है कि तमाम समस्याओं और चुनौतियों के बावजूद उनमें निराशा नहीं है। परिस्थितियों के सामने समर्पण नहीं है। इनमें यह भाव बार-बार उभरता है कि मंजिल दूर है, रास्ता घुमावदार और उबड़-खाबाड़ है लेकिन हम मंजिल तक अवश्य पहुँचेंगे। अँधेरा बहुत है लेकिन रोशनी भी कम नहीं है। इनमें हौसला, साहस और उम्मीद भी खूब है–

हर ओर भले धुँध है लेकिन ये छँटेगी,
सूरज को अँधेरों का कभी डर नहीं होता

किसी तलाश की हद से गुजरने वालों को,
सफर में धूप का कोई सितम नहीं होता।

काँप जाते हैं शाहबाज सभी,
हौसला जब उड़ान भरता है।

अनिरुद्ध सिन्हा ने प्रेम के भी खूबसूरत अशआर कहे हैं। समाज और परिवार से प्रेम करने वाले कवि के यहाँ प्रेम अनुपस्थित हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। इनमें अनुराग की कोमल संवेदनाएँ और सौंदर्य की आकर्षक छवियाँ भी हैं और सहयोग का उल्लास तथा बिछोह की तड़प भी है।

‘वो जिक्र आया तो होंठों को सी लिया मैंने,
लबों से नाम तुम्हारा निकल गया होता।’

‘तुम्हारा नाम रातों में जो हम लिखते हैं कागज पर,
अँधेरों में चमक उठती कलम की रोशनाई तक।’

जैसे शेर इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

इन विषयों के अतिरिक्त जीवन के अन्य कई पक्षों, समस्याओं और संभावनाओं से संबंधित शेर भी उनके यहाँ मौजूद हैं। उन्होंने कविता और गद्य में पर्याप्त लेखन किया है। यह संभव नहीं कि उनका सारा लेखन एक जैसा हो। वह हिंदी गजल के सक्रिय महारथी हैं। उनकी यह सक्रियता कई स्तरों पर हैं। हिंदी गजल की शक्ति को रेखांकित करने, उसे स्थापित करने और नई प्रतिभाओं को उत्साहित करने की दिशा में भी उनका कार्य सराहनीय है।


Image : Ayu-Dag on a foggy day
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Artist : Ivan Aivazovsky
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वशिष्ठ अनूप द्वारा भी