हिंदी गजल में माँ

हिंदी गजल में माँ

मैक्सिम गोर्की ने कहा था कि ‘सिर्फ माँ ही आपके भविष्य के बारे में सोच सकती है क्योंकि वो ही अपने बच्चों के रूप में उन्हें जन्म देती है।’ माँ ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। कहते हैं ईश्वर खुद सभी जगह मौजूद  नहीं रह सकता, इसलिए उसने सृष्टि पर माँ की रचना की है। खुद ईश्वर भी माँ की गोद के लिए तरसते हैं। माँ की अनुभूति ममत्व की अनुभूति है, जिसमें डूबने पर बस डूबे रहने का मन करता है। माँ के विराट व्यक्तित्व के सामने सृष्टि के तमाम रिश्ते बहुत छोटे हैं। माँ और बच्चे का रिश्ता गर्भनाल से जुड़ा होता है। इसलिए यह दुनिया के तमाम रिश्तों से नौ महीने अधिक बड़ा होता है। माँ अपने बच्चों को न केवल अपने खून से पोषित करती है, बल्कि धरती पर स्वतंत्र अस्तित्व देने के बाद भी स्तनपान करा जीवन देती है। कहते हैं कि माँ की बच्चों के प्रति ममता दूध की शक्ल में उसके स्तन  से प्रवाहित होती है। हालाँकि विज्ञान इसे हार्मोन का चमत्कार कहता है, पर जो भी हो एक माँ अपने गर्भ धारण से लेकर बच्चे को जन्म देने और पालने-पोसने तक बहुत कठिनाइयों से गुजरती है, पर उफ तक नहीं करती। माँ की पीड़ा माँ बनने पर ही समझ आती है। बच्चों को यह बात तब तक समझ में नहीं आती जब तक वह खुद माँ-बाप नहीं बनते। हर धर्म की यह मान्यता है कि ईश्वर के साक्षात दर्शन माँ के रूप में होते हैं।

माँ अपने बच्चों के लिए गूगल की तरह होती है, जिसके पास बच्चों की सारी समस्याओं का निदान होता है। जीवन भर हमारे साथ माँ के दिए संस्कार ही होते हैं, जिसके बल पर हम सफलता की इबारत लिखते हैं। इ.एम. फॉरेस्टर ने कहा था कि ‘मुझे ऐसा विश्वास है कि अगर सभी देशों की माताएँ मिल जातीं तो इतने युद्ध नहीं होते’। मैं इस कथन से बिल्कुल इत्तेफाक रखती हूँ। बच्चे की प्रथम गुरु माँ होती है। जब कोई बच्चा बड़ा आदमी बनता है तो सब के मुख से यह बात निकलती है कि धन्य है वह माँ जिसने ऐसे बच्चे को जन्म दिया। अब्राहम लिंकन ने भी कहा था कि ‘मैं जो कुछ भी हूँ या होने की उम्मीद रखता हूँ इसका सारा श्रेय मेरी माता को जाता है।’ संस्कृत में कहा गया है कि नास्ति मातृ समा छाया, नास्ति मातृ समारू गति। नास्ति मातृ समं त्राण, नास्ति  मातृ समा प्रिया। अर्थात माता के समान कोई छाया नहीं है,  माता के समान कोई सहारा नहीं है, माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है। हमारे साहित्य में भी कहा गया है कि भले ही पुत्र कुपुत्र हो जाए पर माता कभी कुमाता नहीं हो सकती। भारतीय संस्कृति में माँ हमेशा पूजनीय रही है। हिंदी गजल में गजलकारों ने माँ को किस तरह अभिव्यक्त किया है, देखना दिलचस्प होगा।

हिंदी गजल में छोटे बहर के बेहतरीन शायर विज्ञान व्रत की नजर में माँ ही जमीन और आसमान है। सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक जहाँ भी नजर जाए माँ ही नजर आती है। शेर देखें–

‘माँ तुम्हें देखूँ कहाँ तक
हो जमीं से आसमाँ तक

दूर तक बस हो तुम्ही-तुम
है नजर मेरी जहाँ तक।

शिवकुमार बिलगरामी की शायरी माँ की कसम खिलाने को लेकर जरा हटकर तर्क देती है। आपने अक्सर देखा होगा कि माँ किसी बुराई से बचाने के लिए बच्चे को कसम देती है ताकि बच्चे उसकी कसम का मान रखकर बुराइयों से दूर रहे। पर, जब खुद माँ की बारी आती है तो अपनी संतान की कसम वो कभी नहीं खाती। शेर देखें–

‘माँ मुझे अपनी कसम अक्सर खिलाती है
खुद कभी मेरी कसम हरगिज न खाती है

क्या बताऊँ मैं तुम्हें क्यों याद आई माँ
याद आती है अगर माँ की तो आती है।’

गीत-गजल में बराबर हस्तक्षेप रखने वाले गजलकार दिनेश प्रभात अस्वस्थता के दौर में भी माँ की जीवटता और इच्छा शक्ति को बड़े सलीके से बयान करते हैं। माँ भले बीमारियों की वजह से लाचार हो जाए, पर, बच्चों के लिए जीना चाहती है। दूसरे शेर में वे कहते हैं कि एक अनपढ़ माँ भी जीते जी अपने बच्चों का भविष्य बेहतर देखना चाहती है और यही माँ का वास्तविक रूप है। शेर देखें–

‘पड़ी हुई टूटी खटिया पर लकवाग्रस्त अपाहिज माँ
कभी रोग हावी है माँ पर, कभी रोग पर काबिज माँ।’

अपने अलहदा कहन और बेमिसाल दृष्टि की वजह से गजल की दुनिया में महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप रखने वाले गजलकार वशिष्ठ अनूप जब कहते हैं कि माँ-बाप के घर बच्चे अधिकारपूर्वक रहा करते हैं, उसी अधिकार से बच्चों के घर माँ-बाप क्यों नहीं रहते? तो मन में एक टीस-सी उठती है। वाकई आजकल इस तरह की बातें आम हो गई हैं। वृद्धाश्रम की परिकल्पना हमारी इसी सोच को बल देती है। दूसरे शेर में बताते हैं कि माँ सीमित संसाधन के बावजूद अपने बच्चों को दूध-भात खिलाने का सपना लिए चंदा मामा को बुलाती है। शेर देखें–

‘फास्ट फूड और चमक-दमक वाले इस युग में भी
अम्मा के हाथों का खाना अच्छा लगता है।

रहा करते थे बच्चे जिस तरह माँ-बाप के घर में
उसी अधिकार से माँ उनके घर क्यों रह नहीं सकती?’

सुदेश कुमार मेहर ने अपनी शायरी में नए प्रतीक और बिंबों से बहुत कुछ जोड़ा है। उनका कहना है कि हमारी कामयाबी कहीं न कहीं माँ की दुआओं का परिणाम ही है। माँ प्रथम गुरु होती है। अतः हमारी शिक्षा-दीक्षा और संस्कार में माँ की भूमिका सर्वोपरि है। शेर देखें–

‘गाड़ी बंगला दौलत शोहरत कब यूँ बेबात मिले हैं
माँ ने मन्नत माँगी थी जीजी ने उपवास रखे।’

छंद की सभी विधाओं में एक साथ हस्तक्षेप रखने वाले समर्थ युवा गजलकार राहुल शिवाय अपनी माँ का स्पर्श खुदा के स्पर्श के जैसा मानते हैं यानी कि माँ साक्षात ईश्वर का दूसरा रूप है, जिसे वे पूजते हैं। उन्हें माँ के सम्मुख जाना देवी के सम्मुख जाने जैसा प्रतीत होता है। शेर देखें–

‘थक गया था ढूँढ़कर मंदिर में मस्जिद में जिसे
माँ के छूते ही लगा कि उस खुदा ने छू लिया।’

वरिष्ठ गजलकार कमलेश भट्ट ‘कमल’ माँ को जमीन से जुड़े रहने का माध्यम मानते हैं। माँ शहर की तमाम सुविधाएँ छोड़ कर गाँव रहना चाहती है। गाँव-घर, जत्था-जमीन के प्रति लगाव एवं परंपरा के निर्वाह करने की प्रवृत्ति को अपने शेरों में वे कुछ इस तरह ढालते हैं। जरा शेर देखें–

‘वहाँ परदेस में भी तो नहीं कुछ कम हैं सुविधाएँ
मगर अपना वतन जीते-जी माई छोड़ती कब है!’

सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता हरेराम समीप के शेरों में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। आजकल समाज में नैतिक मूल्यों की गिरावट चरम पर है। जन्म देने वाली माँ खुद के परिवार के वास्ते ही बोझ हो जाती है। आलम यह है कि अपने ऐशो-आराम में खलल न पड़े इसलिए माँ की विदाई भी खबर नहीं बनती। माँ के इंतकाल के बाद तेरहवीं के दिन संवेदना से परे बीमारियों के खर्चे का हिसाब लगाया जाता है। शेर देखें–

‘तेरहवीं के दिन बेटों के बीच बहस बस इतनी थी
किसने कितने खर्च किए थे अम्मा की बीमारी में।’

ऐसा भी नहीं है कि दुनिया के सारे बच्चे संवेदनाशून्य हो गए हैं। आज भी कुछ ऐसे बच्चे हैं जिनकी नजरों में माँ सर्वोपरि है। उनकी आँख में इस बात का पानी बचा हुआ है कि किस तरह रात-रात भर जाग कर बच्चों की अच्छी नींद के लिए माँ ने अपनी नींद की कुर्बानी दी है। वैसे बच्चों के लिए माँ के गिरवी रखे कंगन सारी दौलत पर भारी है। माँ की हर एक निशानी उसकी थाती है। इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर वरिष्ठ गजलकार श्रीपाल धीमान ने कुछ इस तरह के शेर कहे हैं। शेर देखें–

‘मैं सारी दौलतें उस पर लुटा दूँ एक ही पल में
रखे थे माँ ने जो गिरवी वही कंगन दिला दे तो।’

पेशेगत मजबूरी और असीमित दौलत की चाह ने बच्चों को अपने माँ-बाप से दूर कर दिया है। युवा गजलकार के.पी. अनमोल अपनी इसी पीड़ा को कुछ इस तरह से शेर में व्यक्त करते हैं। शेर देखें–

‘घर से निकल के खूब कमाया तो है मगर
हाथों से अपने माँ को दवाई न दे सका।’

के.के. प्रजापति वरिष्ठ गजलकार हैं। माँ को सताये जाने की पीड़ा इन्हें भीतर तक सालती है। वे हर एक बच्चों से आह्वान करते हैं कि वे आत्मावलोकन करें कि उनकी जो यह दुर्गति है कहीं न कहीं माँ को सताए जाने का परिणाम तो नहीं? शेर देखें–

‘सुकून होगा बहाल कब
ये तुमसे मेरा सवाल है

मैं रोने लगता हूँ फूटकर
जो माँ का आता खयाल है।’

अशोक मिजाज के शेरों में माँ के हाथों की रोटी की खुशबू है। वे घर, होटल या ढाबा कहीं भी रोटी की गंध पाते हैं तो माँ की याद आती है। दरअसल यह महज रोटी की गंध नहीं माँ की ममता की गंध है, जो अपने बच्चों के नथुने में हमेशा समाहित रहती है। एक तरफ ऐसे बच्चे भी हैं जो अपने बूढ़े माँ-बाप को वृद्धाश्रम पहुँचा देते हैं, तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे बच्चे भी हैं जो अपने माँ-बाप की सलामती के लिए दुआएँ माँगते हैं। हमारे समाज में ऐसे संस्कारवान बच्चों के लिए इनके शेर देखें–

‘वो अपना घर हो या होटल हो ढाबा हो रस्ते का,
कहीं रोटी महकती है तो माँ की याद आती है।’

युवा गजलकार पंकज कर्ण माँ के अलग रूप को अपने शेरों में पिरोते हैं। एक तरफ माँ अपने बच्चों को सीने से लगाए जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं का परित्याग कर देती है, तो दूसरी तरफ कुछ माँएँ अपने बच्चों को जन्म देकर सड़क पर छोड़ देती हैं। सामाजिक लोक-लाज, परवरिश न कर पाने की पीड़ा जैसे अनेक कारण माँ को खुद से बच्चों को अलग करने की वजह हो सकती है। शेर देखें–

‘भले हो मुफलिसी पर घर वही आबाद रहता है
जहाँ कण-कण से खुशबू आती है माँ की दुआओं की।’

युवा गजलकार विकास के शेरों में माँ की ममता सर्वोपरि है। माँ की एक नजर बच्चे के लिए किसी ताबीज से कम नहीं होती। शेर देखें–

‘सुबह से शाम देती है हमारी माँ दुआ हमको
न ढाओ तुम सितम इतना दुआ को चोट लगती है।’

गजलकार मधुरेश की गजलों में संवेदना का विस्तार अपने पूरे शबाब पर होता है। माँ  से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात उनके जेहन में जज्बा होकर शेर के रूप में निकलती है, तो पाठक भी उन्हीं संवेदना से खुद को जुड़ा महसूस करता है। शेर देखें–

‘दिखाकर मुझको माँ बोली ये तेरा तब का फोटो है
तू पानी को कहा करता था जब पप्पा बहुत पहले

खुशी में भी निकल आते हैं आँसू ये तभी जाना
थमाई माँ को पहली बार जब तनखा बहुत पहले।’

वरिष्ठ गजलकार लक्ष्मीशंकर बाजपेयी अपने शेरों के माध्यम से माँ से बच्चों के भावनात्मक लगाव को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि एक वयस्क इनसान भी अपनी माँ की नजर में हमेशा बच्चा ही होता है। माँ का प्रेम मोमबत्ती की रोशनी की तरह होता है, जो स्वयं पिघल कर दूसरों को रोशनी देता है। शेर देखें–

‘याद बरबस आ गई माँ, मैंने देखा जब कभी…
मोमबत्ती को पिघलकर, रोशनी देते हुए…!’

वरिष्ठ गजलकार रवि खंडेलवाल माँ को अपने शेरों में व्यक्त करते हुए कहते हैं कि माँ को कोई जीते जी नहीं समझ सकता। माँ जब नहीं होती है, तभी माँ की कीमत समझ में आती है। माँ के बिना घर बहुत उदास और तन्हा लगता है। बिलकुल वैसे ही जैसे बिना देवता के मंदिर। शेर देखें–

‘घर के अंदर माँ रहती है, माँ के अंदर घर
बिन माँ के सूनी दीवारें, सूना घर का दर।’

महेश कटारे सुगम जब अपनी गजलों में माँ को अभिव्यक्त करते हैं तो आँखों में माँ का चेहरा सामने आ जाता है, जिसमें एक बूढ़ी माँ अपनी कम होती आँखों की रोशनी और झुके कंधों पर भी घर की बागडोर को थामे रहती है। दूसरे शेर में वे वैसी माँ की त्रासदी को अपने शेर के माध्यम से जुबान देते हैं जिन्हें उनके ही बच्चों ने लावारिस बना दिया है। शेर देखें–

‘अपने लिए नहीं कुछ रक्खा सब को सब कुछ बाँट दिया
लावारिस ही घूम रही है दो दो बेटों वाली माँ।’

ओमप्रकाश यती ने माँ के कोमल व मजबूत दोनों पक्षों को देखते हुए बेहतरीन शेर कहे हैं–बाहर से मजबूत दिखती माँ भीतर से कितनी कोमल है, यह बेटी की विदाई के वक्त दिखता है। उन्होंने दूसरे शेर में माँ के शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन किया है। माँ जब तक जिंदा रहती है अपने बच्चों के वास्ते गहन अंधकार में भी भोर की तरह होती है। शेर देखें–

‘हमें लगता है जब भी, रात काली खत्म कब होगी
चली आती हमारे पास बनकर भोर है अम्मा।’

वरिष्ठ गजलकार अनिरुद्ध सिन्हा अपनी गजलों के माध्यम से माँ को अपनी अनुभूतियों के फ्रेम में सजा लेने की बात करते हैं। माँ की ममता भरी छवि उनकी आँखों में यूँ बस गई है कि जैसे माँ से ही माँ की तस्वीर चुरा ली हो। अपने दूसरे शेर में वे कहते हैं जिसके सिर पर माँ की ममता की छाँव हो उसके घर में पीड़ा दस्तक दे ही नहीं सकती। शेर देखें–

सच पूछो तो ममता की जंजीर चुरा ली है
मैंने माँ से माँ की ही तस्वीर चुरा ली है,

कैसा ममता का आँचल है उसके सीने पर
पूरे घर की जिसमें माँ ने पीर चुरा ली है।

इस तरह हम देखते हैं कि विभिन्न गजलकारों ने अलग-अलग नजरिये से माँ को देखा है। माँ एक विराट सागर है, जिसमें ममत्व की धारा प्रवाहित होती है। माँ के विराट व्यक्तित्व को भावों और शब्दों में सहेजना संभव नहीं है। हालाँकि माँ को अनुभूत करने वाले शब्दकर्मी माँ को शब्दों से रूपायित करने की कोशिश करते हैं। यहाँ भी गजलकारों ने अपनी-अपनी दृष्टि से बस माँ के अद्भुत रूपों को देखने की चेष्टा भर की है। माँ हम सब के लिए एक चिराग की तरह है, जो खुद जलकर हमें प्रकाशित करती रहती है। हस्तीमल हस्ती ने अपनी गजल के एक शेर में सच ही कहा है कि–

‘आग पीकर भी रोशनी देना
माँ के जैसा है ये दिया कुछ-कुछ।’


Image : Mother and Child
Image Source : WikiArt
Artist : Mary Cassatt
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भावना द्वारा भी