कथाकार कमलेश्वर से मुलाकातें

कथाकार कमलेश्वर से मुलाकातें

वे दिन : वे लोग

मलेश्वर साहित्य जगत का जाना-माना नाम है। कथाकार, उपन्यासकार, संपादक और एक्टिविस्ट के रूप में बुद्धिवादियों का एक बड़ा तबका उनकी रचनात्मकता का मुरीद है। ‘काली आँधी’, ‘एक सड़क सत्तावान गलियाँ’, ‘कितने पाकिस्तान’ जैसे उपन्यासों और ‘राजा निरबंसिया’ एवं ‘जार्ज पंचम की नाक’ जैसी कहानियों से उनकी वैचारिकी और सामाजिक प्रतिबद्धता को सहज ही समझा जा सकता है। नई कहानी के त्रिभुज के एक मज़बूत स्तंभ कमलेश्वर ने मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव के साथ मिलकर कहानी की नई ज़मीन तैयार की। कहानी को एक नया मुहावरा दिया। समांतर कहानी आंदोलन के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा, संत्रास, शोषण और संघर्ष को स्वर दिया। सांप्रदायिकता के ख़िलाफ आवाज़ उठाई। ‘सारिका’–संपादक के रूप में अनेक कीर्तिमान रचे। फ़िल्मों के यशस्वी लेखक के रूप में ख्याति अर्जित की।

कमलेश्वर के विविधवर्णी जीवन के अनेक रोचक प्रसंग हैं। उनसे मिलने, बतियाने और समारोहों में साझेदारी के कई अवसर आए। पहली मुलाकात अक्टूबर 1977 में दमोह में ‘सर्जना ’77’ के कार्यक्रम में हुई थी। तब पहली बार उनके तेजस्वी रूप से रू-बरू हुआ था। आयोजन के मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने मार्के की बात कही थी–‘हमारे साहित्य ने सदैव महापुरुषों की सुध ली; आम आदमी की कभी सुध नहीं ली। वह आदमी को बौना बनाने और बौने लोगों को ऊपर उठाने में लगा रहा। उस साहित्य ने अतीत की गौरव गाथा गायी, भविष्य के सपने सँजोए, पर वर्तमान के गौरव से पलायनवादी रूख अपनाया। सत्ता से जुड़े लोगों ने साहित्य से षड्यंत्र कर हमें एक ऐसे ख़ुशगवार माहौल में खड़ा कर दिया जहाँ हम स्वयं की पहचान भूल गए।’ उन्होंने यह भी कहा कि जब तक हम अतीत के मोह और भविष्य की कल्पना छोड़ अपने वर्तमान को बेहतर नहीं बनाते, तब तक प्रगति नहीं कर सकते। अपने समय के आम आदमी की चिंता सर्वोपरि है। आयोजन में डॉ. श्यामसुंदर दुबे, मधुकर सिंह, कामतानाथ, दामोदर सदन, रमाकांत चौधरी, डॉ. श्यामसुंदर व्यास जैसी शख्सियतें मौजूद थीं। कार्यक्रम के आयोजन में प्रमुख भूमिका कवि-कथाकार मनीषराय यादव की थी। तमाम अन्य इंतजामातों के बीच उन्होंने कमलेश्वर को एक नए सुजज्जित छोटे-से टेंट में ठहराया था और उनके प्रिय पेय से संध्यारानी के स्वागत की व्यवस्था की थी। मनीष की असामयिक आत्मघाती मृत्यु साहित्य-क्षेत्र की बड़ी क्षति थी।

वैसे कमलेश्वर काफ़ी सहज थे, लेकिन उन पर फ़िल्मी रंग चढ़ने लगा था। दमोह से लौटते समय हम दो-तीन मित्र और कमलेश्वर ट्रेन के एक ही कम्पार्टमेंट में थे। देखकर तनिक आश्चर्य हुआ था कि गाड़ी के रवाना होते ही कमलेश्वर ने अपने वस्त्र बदलकर केसरिया रंग का ढीला-ढाला कुर्ता और उसी रंग का लुंगीनुमा अधोवस्त्र धारण कर लिया था। उन दिनों अभिनेताओं को फुरसत के समय ऐसे ही रंग-बिरंगे वस्त्र धारण करने का रिवाज़-सा चल पड़ा था। ओम शिवपुरी, संजीव कुमार, इफ्तकार आदि को मैंने ऐसी वेशभूषा में देखा था। चूँकि कमलेश्वर भी बतौर प्रमुख स्क्रिप्ट राइटर सिनेमा जगत में मशहूर हो रहे थे, शायद इसीलिए इस वेशभूषा के प्रयोग का लाभ संवरण नहीं कर पाए थे।

कमलेश्वर से दूसरी मुलाकात जनवरी ’78 में छिंदवाड़ा के समांतर सम्मेलन में हुई थी। इसमें शामिल होने के लिए कमलेश्वर ने अपने अट्ठाइस दिसंबर ’77 के पत्र में मुझे लिखा था। सम्मेलन में समांतर आंदोलन और कथा-साहित्य को लेकर गंभीर चर्चा हुई थी। उस मौके पर कमलेश्वर ने जितेन्द्र भाटिया से यह कहते हुए परिचय कराया था कि गायत्री की माधवराव सप्रे जी पर पीएच.डी. की थीसिस के लिए नागर जी ने काफ़ी सहयोग किया है। उल्लेखनीय है उन दिनों गायत्री जी माधवराव सप्रे के अवदान पर पीएच.डी. की तैयारी कर रही थीं। कमलेश्वर और गायत्री जी को पता चला था कि इन्दौर के देवीसिंह राठौर ने डॉ. नेमीचंद जैन के मार्ग-दर्शन में सप्रे जी पर पीएच.डी. की हुई है। चूँकि देवीसिंह और नेमीचंद जी जैन दोनों मेरे अच्छे परिचित थे, अतः मैंने समय-समय पर उनसे सामग्री लेकर गायत्री जी को भेजी थी जो उनके लिए काफ़ी सहायक सिद्ध हुई थी। इस संदर्भ में नवंबर ’77 से नवंबर ’85 के बीच गायत्री जी के लिखे चार पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं। अंतिम पत्र दिनांक 30 नवंबर ’85 का है जिसमें उन्होंने पीएच.डी. अवार्ड होने का शुभ समाचार दिया था।

छिंदवाड़ा में कमलेश्वर काफ़ी असहज थे। उन दिनों टाइम्स वाले उन्हें ‘सारिका’ से हटाने के लिए प्रयत्नशील थे। अतः कमलेश्वर छिंदवाड़ा से जल्दी लौट गए थे, इस आग्रह के साथ कि ‘सारिका’ वाले मामले में कहीं कुछ छपे तो बताना। उनकी चिंता स्वाभाविक थी। ‘सारिका’ को दिल्ली शिफ्ट करने का आशय ही यह था कि सिनेमा-जगत में अपने फलते-फूलते  साम्राज्य को छोड़ कमलेश्वर बंबई से विलग हो दिल्ली जाना पसंद नहीं करेंगे और स्वतः ही ‘सारिका’ से मुक्ति पा लेंगे। 

बाहर से सख्त लगते कमलेश्वर अंदर से सहज और सहृदय थे। वे मित्रों की मदद करना और दोस्ती निभाना जानते थे। उनके और हमारे कॉमन मित्र कवि कृष्णकांत निलोसे ने अपने बॉस की पुस्तक के लोकार्पण हेतु कमलेश्वर जी को आमंत्रित किया था। वस्तुतः निलोसे ने अपने बॉस को खुश करने के लिए ही वह किताब तैयार करवाई थी। लोकार्पण तिथि तक पुस्तक आधी-अधूरी थी। फिर भी निलोसे ने रंगीन आवरण में लपेट कमलेश्वर से उसका विमोचन करवा लिया था। कमलेश्वर को इस तथ्य का पता था, तब भी उन्होंने उस अपूर्ण पुस्तक को सहर्ष लोकार्पित कर दिया था। कोई अन्य साहित्यकार होता तो ऐसे प्रपंच में पड़ने से इनकार कर देता, पर वह तो कमलेश्वर थे। कार्यक्रम में कमलेश्वर की दरियादिली की एक और मिसाल देखने को मिली थी। उन्होंने समारोह में उपस्थित उन दो नवयुवकों को सार्वजनिक रूप से क्षमा कर दिया था, जिन्होंने गुप्तनाम से ‘सारिका’–संपादक (कमलेश्वर) को अपशब्द भरा कठोर पत्र लिखा था।

रमेश बतरा आख़िरी दिनों में जब गंभीर रूप से अस्वस्थ थे और गोविंदवल्लभ पंत अस्पताल में भर्ती थे, कमलेश्वर चिंतित थे और उन्हें देखने के लिए दो बार अस्पताल गए थे। एक बार गायत्री जी भी साथ में थीं। कमलेश्वर चाहते थे कि बतरा की बेहतर देखभाल के लिए उन्हें अपोलो हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया जाए। उन्होंने अपोलो का एडमिशन कार्ड भी बनवा लिया था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने हाथ टेक दिए थे।

एक रोचक संस्मरण तब का है जब अभ्यास मंडल की व्याख्यानमाला में भाषण देने के लिए कमलेश्वर इन्दौर आए थे और इलाहाबाद के जमाने के अपने मित्र, कवि और दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक डॉ. सुरेन्द्र वर्मा के आग्रह पर उनके आवास पर ठहरे थे। इस प्रसंग का मजेदार पहलू यह है कि वर्षों बाद जब कमलेश्वर वर्मा जी से मिले तो उन्हें ध्यान ही नहीं आया कि वे कभी वर्मा जी के निवास पर ठहरे थे। यह बात खुद वर्मा जी ने मुझे बतायी थी। वर्मा जी को (और मुझे भी) आश्चर्य हुआ था। वर्मा जी को तो तनिक अफ़सोस भी हुआ था।

जब 1980-81 में मैं दिल्ली प्रशासन में प्रतिनियुक्ति पर था, कमलेश्वर दूरदर्शन के एडिशनल डायरेक्टर थे। मैंने दो-तीन बार दूरभाष पर संपर्क साधने की कोशिश की थी पर असफल रहा था। दरअसल, कमलेश्वर उन दिनों अत्यधिक व्यस्त रहते थे। प्रेमचंद की कहानी सद्गति पर लघु फ़िल्म बना रहे थे। स्मरणीय है कि सद्गति सामाजिक विसंगति दर्शाती प्रेमचंद की एक महत्वपूर्ण कहानी है। बात प्रायः उनके पी.ए. के मार्फत ही हो सकती थी। इसलिए मुलाकात संभव नहीं हो पा रही थी। आख़िर एक दिन मैं उनके कार्यालय पर जा धमका। बातचीत के दौरान मैंने बताया कि मैं भी दिल्ली में गत एक वर्ष से हूँ, पर बहुतेरी कोशिश के बावज़ूद आपसे भेंट न कर सका। एक क्षण को मुझे लगा था, उन्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है कि दिल्ली में होते हुए एक वर्ष तक मैं उनसे नहीं मिला। उनसे न मिल पाने का मैं बहाना बना रहा हूँ। यद्यपि उन्होंने कुछ नहीं कहा, फिर भी उनके चेहरे की रंगत से मुझे ऐसा ही लगा था। असहमति का केवल एक यही प्रसंग मुझे उनसे अपने पूरी परिचय-काल में लगा।

‘सारिका’ छोड़ने की चल रही उठापटक के बीच 13 मई 78 को अभ्यास मंडल में व्याख्यान देने आने से पूर्व जब कमलेश्वर इन्दौर आए थे, तो प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी। उनको होटल से कॉन्फ्रेंस-स्थल तक लाने की जिम्मेवारी मेरी थी। तैयारी में देरी हो रही थी, सो मैंने कहा था–‘प्रेसवालों का मामला है। हमें समय पर पहुँच जाना चाहिए।’ कमलेश्वर ने कहा था–‘घबराओ मत, मैं भी संपादक हूँ और पत्रकारों के तेवरों से वाकिफ़ हूँ।’ बहरहाल कॉन्फ्रेंस में ज्य़ादातर सवाल उनके ‘सारिका’ से अलग किए जाने के प्रयासों को लेकर थे, जिसके जवाब कमलेश्वर बहुत सावधानी से दे रहे थे। खैर, इस प्रवास के दौरान जो एक सनसनीखेज प्रस्ताव कमलेश्वर के समक्ष रखा गया, उसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। वह जनता सरकार का जमाना था।

समाजवादियों का बोलबाला था। युवा लेखक, चिंतक और समाजवादी नेता अनिल त्रिवेदी ने कमलेश्वर के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि वे इन्दौर विश्वविद्यालय (अब देवी अहिल्या विश्वविद्यालय) के कुलपति का पद ग्रहण करना पसंद करेंगे। कमलेश्वर चकित थे, पर उन्होंने इनकार नहीं किया था, कहा था–प्रस्ताव पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे। उनके उत्साह का आभास दिनांक 7-5-78 को मुझे लिखे पत्र से हो गया था। आगामी इन्दौर विजिट का कार्यक्रम बताते हुए लिखा था–‘तीन से पाँच के बीच अनिल त्रिवेदी से बातचीत, तुम और जानकारी ले लो।’ खैर, बाद में सरकारें बदल गईं और बात आई-गई हो गई।

समांतर आंदोलन के माध्यम से कमलेश्वर ने शोषित-पीड़ित जन के पक्ष में तथा सांप्रदायिक शक्तियों के विरोध में माहौल तैयार किया था। चूँकि वे सारिका के संपादक थे, अतः लेखकों को अपने साथ जोड़ने और समांतर आंदोलन को आगे बढ़ाने में उन्हें इससे सुविधा हुई थी। अनुयायियों की एक फ़ौज तैयार हो गई थी। लेकिन जो फैशन की तरह आंदोलन से जुड़े थे या ‘सारिका’ में छपने के मोह में कमलेश्वर के साथ थे, कमलेश्वर के ‘सारिका’ से हटने के बाद छिटकते गए। न केवल छिटके, बल्कि गुमनामी में चले गए।

‘सारिका’ छोड़ने के पश्चात कमलेश्वर ने ‘कथा-यात्रा’ का प्रकाशन-संपादन शुरू किया था। जितेन्द्र भाटिया सदा की तरह उनके साथ तन-मन से जुटे थे। दिन-रात कथा-यात्रा को छोटे-से दफ्तर में बिता देते थे। यहाँ तक कि अपने घर से टेबल-कुर्सी तक वहाँ ले गए थे, लेकिन पाँच अंकों के बाद ही कथा-यात्रा से अलग हो गए थे। कमलेश्वर की कुछ गतिविधियों और आरोपों के कारण विश्वास की डोर टूट गई थी। बावजूद इसके जितेन्द्र ने कभी कमलेश्वर के ख़िलाफ मुँह नहीं खोला। जितेन्द्र तो कमलेश्वर को अपना गुरु और गाॅड फादर मानते थे। अतः वे आघात झेल गए। वरना एक वक्त था जब कमलेश्वर जितेन्द्र-सुधा के एककक्षीय घर में शाम के वक्त अक्सर जाते थे, और जमकर बैठकें होती थीं। कमलेश्वर प्रायः गोबी के पराठों की माँग करते थे। जितेन्द्र भाटिया ने तो एक तरह से कमलेश्वर को क्षमा कर दिया था, पर सुधा अरोड़ा ऐसा नहीं कर सकीं।

कथा-यात्रा के बंद होने को लेकर एक और विवाद हुआ था। मध्यप्रदेश के लोकप्रिय अख़बार ‘नई दुनिया’ (जिसमें इस ख़ाकसार ने लगभग दस वर्षों तक फ़ीचर एडिटर के रूप में सेवाएँ दीं) में ख़बर छप गई कि कथा-यात्रा बंद हो गई। वस्तुतः तब तक पत्रिका बंद नहीं हुई थी। ख़बर हवा में थी। गलत सूचना के आधार पर यह समाचार छप गया था। जब ख़बर कमलेश्वर तक पहुँची तो बहुत खिन्न हुए। प्रतिवाद-स्वरूप एक कड़ा पत्र ‘नई दुनिया’ के संपादक को लिखा। यह अलग बात है कि इसके कुछ समय बाद ही कथा-यात्रा की यात्रा को विराम लग गया था।

अनुभव हुआ कि कमलेश्वर की इच्छाओं का पेड़ बड़ा था। आकर्षक प्रस्तावों को प्रायः नकार नहीं पाते थे। बात चाहे कुलपति वाले प्रस्ताव की हो, टी.वी. सीरियल लिखने की हो या दूरदर्शन के अतिरिक्त निर्देशक बनने की हो। उन्होंने चन्द्रकांता जैसा सीरियल लिखे थे। इंगित, गंगा, दैनिक जागरण, भास्कर आदि पत्रों के संपादन से भी उन्हें परहेज नहीं था। बाद में जब दिल्ली में थे तब बावजूद अस्वस्थ होने के, शिमला के सम्मान-समारोह में शामिल होने से अपने को रोक नहीं पाए थे। उस समय उनका उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ काफ़ी चर्चा में था। एक समय था जब उन्होंने आकशवाणी और दूरदर्शन पर पंद्रह अगस्त और गणतंत्र दिवस के चल-समारोहों की रनिंग कमेंटरी की थी। आयोजनों का आतिथ्य स्वीकार करने में अधिक ना-नुकूर नहीं करते थे। ‘सारिका’ न छोड़नी पड़े, यह भी उनकी इसी सोच का अंग था। एक बार उनसे मिलने जे.पी. रोड, वरसोवा स्थित उनके फ्लैट पर गया था। फ्लैट के पीछे कुछ दूरी पर संध्या समय हिलोरे मारते सागर का वह मनोरम दृश्य आज भी आँखों में समाया है। चर्चा के दौरान मैंने कहा था कि फलाँ फ़िल्म में (नाम याद नहीं रहा) स्क्रिप्ट राइटर के रूप में आपका नाम नहीं दिया गया, लेकिन इससे आपको क्या फ़र्क पड़ता है! फ़िल्म-जगत में आपका इतना नाम है कि ऐसी बातों से आपकी प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आती। मेरी बात पूरी होने से पहले ही कमलेश्वर बोल पड़े थे–‘भाई, तुम्हें पता नहीं। सिनेमा की दुनिया में बहुत राजनीति है। उठा-पटक है। कॉम्पीटिशन है। लोग एक-दूसरे की टाँग खींचने में लगे रहते हैंं। रोल कटवा दिए जाते हैं। लिखता कोई है और नाम किसी और का जाता है।’ यह भी कि वे अपना विरोध दर्ज करवा रहे हैं। बात आगे जाती इससे पहले ही ख्यात फ़िल्म निर्माता-निर्देशक साजनकुमार अपनी फ़िल्म की स्क्रिप्ट डिस्कस करने आ गए और बात अधूरी रह गई। इससे अलहदा यह तो साबित हुआ कि फ़िल्म-जगत में कमलेश्वर का इतना रूतबा और रूआब था कि बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशक खुद चलकर चर्चा के लिए उनके निवास पर पहुँचते थे।

जो भी हो, कोई आधी सदी तक एक साहित्यकार, संपादक, फ़िल्ममेकर और एक्टिविस्ट के रूप में कला और साहित्य के क्षेत्र में वे अत्यंत सक्रिय रहे। सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मोर्चा खोला। आम आदमी की पैरवी की। साहित्य में एक मुक्कमल मुकाम था उनका। उनके अवदान को कमतर नहीं आँका जा सकता।


जैसे ही जूठी प्लेटें उठाकर एक ओर रखे ड्रम में डालने के लिए जग्गू झुका कमर में दर्द की एक लहर ऊपर से नीचे तक दौड़ गई। एक आह निकली जो सिर्फ उसने सुनी। बाकी सब तो मस्ती में डूबे थे। दुःख उसका अपना था। जग्गू को न ड्रम से आ रही जूठन की गंध ने छुआ, न नीम के पेड़ से ड्रम में झरी नीम की पत्तियों ने। छुआ होता तो पता चलता कि कड़ुवाहट कहाँ ज्यादा घुली है–पत्तियों में या खुद उसके अंदर! पर अपनी पीर लिए वह देर तक वहाँ खड़ा नहीं रह सकता था। केटरर हरनाम सिंह देख लेता तो काम-चोरी के लिए डाटता या आइंदा काम पर न आने का फरमान जारी कर देता। लँगड़ाता हुआ, जग्गू फिर से स्वागत-समारोह में आए अतिथियों के बीच जाकर जूठी प्लेटें इकट्ठी करने लगा। उसे प्रभु पर, यदि वह कहीं है तो, क्रोध हो आया। क्यों उसने...लकवे के हल्के अटैक के कारण उसके बाएँ पैर को कमजोर कर दिया। इस विकलांगता की वजह से ही उसे वेटर का पद न देकर केवल प्लेटें उठाने का काम दिया गया।