हिंदी नवलेखन : मूल्यांकन की समस्या के संदर्भ में

हिंदी नवलेखन : मूल्यांकन की समस्या के संदर्भ में

आधुनिकता और नवीनता के अन्वेषण में हिंदी की नई पीढ़ी ने जहाँ अपना एक प्रशस्त मार्ग बना लिया है वहाँ उसके समक्ष जटिलताएँ भी उपस्थित हो गई हैं। किसी भी साहित्यिक आंदोलन के कारण उसमें जहाँ बहुत-सी अच्छी चीजें आती हैं–कुछ ऐसी चीजें भी आ जाती हैं जो बाद में चलकर जब बाढ़ का पानी कम हो जाता है–किनारे पर शैवाल जाल-सी उलझ जाती हैं। आज वही स्थिति हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास या अन्य विधाओं के क्षेत्र में भी आ गई है। फलत: आधुनिक हिंदी नवलेखन के समक्ष कोई प्रतिमान नहीं है। कोई मानदंड ऐसा नहीं देखा जा रहा है, जिसके आधार पर साहित्य की सृजनात्मक प्रतिभाओं का मूल्यांकन किया जाए। हिंदी के साथ एक दिक्कत यह भी रही है कि जहाँ उपन्यास, कहानी तथा कविता के क्षेत्र में पूर्व से आज काफी प्रगति हुई है, नए-नए विचारों का समन्वय हुआ है; हिंदी-आलोचना में कोई भी गतिशीलता दिखाई नहीं पड़ती है। फलत: हिंदी का नव्य आलोचन मात्र पुस्तकालोचन और प्रभाववादी व्याख्याओं की संपुष्टि मात्र है। उसके पास कोई अपना काव्यशास्त्रीय दृष्टिकोण नहीं है। जब तक हमारे साहित्य में मापने के लिए तथा उसके समुचित अनुपेक्षण के लिए कोई अपना विशिष्ट निकष नहीं होगा तब तक साहित्य के भंडार में अच्छे-बुरे की पहचान नहीं हो सकेगी। आवश्यकता इस बात की है कि अब हमारे समक्ष जो सृजनात्मक साहित्य का ढेर लग गया है उसमें से अच्छे-बुरे को अलग छाँटकर बाहर निकाला जाए। हिंदी-नवलेखन में काव्य का क्षेत्र अत्यधिक गतिशील रहा है। फलत: नए भाव-बोध तथा नूतन परिप्रेक्ष्य में जो हिंदी की नवीन काव्य-शैली का निर्माण हुआ है वह अभिनंदनीय है। पर साथ ही बहुत सारी रचनाएँ भरती की आ गई हैं जो मात्र कविता के फ्रेम को ही उपस्थित करती हैं, उनके भीतर के चित्र को रख नहीं पाती हैं। ऐसी रचनाओं को काव्य के नाम पर मात्र नाराबाजी एवं आंदोलन के रूप में ही रखा जा सकता है। दूसरा कोई अभिप्रेत लक्ष्य इससे सिद्ध नहीं होता है। हिंदी की नई कविता ने स्फुट कविताओं के क्षेत्र में तथा नव गीत के क्षेत्र में भी पर्याप्त कार्य किया है। हिंदी नव गीत की भी अपनी एक विशेष धारा बनी है जिसे नयी कविता के भीतर रखना ही चाहिए, ऐसा मेरा विचार है। हिंदी नव गीत को नीरज, रामदरश मिश्र, रवींद्र भ्रमर, रामावतार त्यागी, कुमार मधु, राजेंद्र किशोर, वीरेंद्र मिश्र, बालस्वरूप राही तथा दुष्यंत कुमार ने जो नया स्पर्श दिया है–वह नव गीत के नूतन आयाम का ही बोधक है। अर्से से यही प्रतीक्षा की जा रही थी कि हिंदी की नई कविता कोई कथा-काव्य का जन्म दे, जिससे संपूर्ण युग-बोध को वाणी मिल सके। तभी ‘कनुप्रिया’ का प्रकाशन हुआ। भारती की कनुप्रिया, नरेश मेहता का राम पर लिखा गया काव्य ‘संशय की एक रात’ इस दिशा में एक नई भाव-भूमि की सृष्टि करता है। स्फुट कविताओं में प्रबंधत्व की गरिमा से युक्त भी रचनाएँ लिखी गई हैं जिनमें निराला की राम की शक्ति-पूजा-सी उदात्तता तो नहीं मिलती, पर उनमें एक नए भाव की तटस्थ अन्विति अवश्य मिलती है, जो अभिनंदनीय है। अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ एक ऐसी ही रचना है जिसे मैं हिंदी नव-लेखन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में मानता हूँ। हिंदी में हजारों की संख्या में हर मास कविताएँ छपती हैं पर उनके बीच कितना अपरिचित अपहचाना नया स्वर आ रहा है इसकी ओर भी ध्यान देना है। अधिकांश रचनाएँ बासी-सी लगती हैं। ऐसा कभी-कभी मालूम होता है कि नवीनता का सारा नवनीत चुक गया है, जो बचा है वह मात्र द्राविड़ प्राणायम ही रह गया है। यह स्थिति हिंदी कविता के लिए निराशाजनक है। विदेशी भाषाओं में भी कविता का क्षेत्र इसी प्रकार की अनास्था और असंतुलन का शिकार हो रहा है, पर उनके यहाँ ऐसी भीड़-भाड़ दिखाई नहीं पड़ती जो हमारे यहाँ है। हमारे यहाँ कविता के नाम पर एक अराजकता आ गई है, जिसे दूर करना है नहीं तो इसका फल यह होगा कि बाढ़ के पानी के साथ कुछ ऐसे भी रत्न बह जाएँगे, जिनके समुचित मूल्यांकन की अपेक्षा है। हिंदी की नव आलोचना को इस दिशा में एक जिम्मेदार कदम उठाना ही होगा। हिंदी के इतने प्रकाशकों के रहते जहाँ कहानी-मासिकों का अंबार लग गया है–किसी आलोचना-मासिक का अभाव इस बात की पुष्टि करता है कि हिंदी की समीक्षा कितनी ठंडी पड़ गई है। मैं व्यक्तिगत रूप से विश्वविद्यालयों में हिंदी की उच्च कक्षाओं के छात्रों के सामने मौन रह जाता हूँ जब कोई पूछता है–‘हिंदी समीक्षा की कौन-सी पत्रिका अच्छी है?’

हिंदी-कहानी की भी नव शैली निर्मित हुई है, पर अभी तक उसने कविता के धरातल-सा कुछ अपना धरातल बना लिया हो, ऐसी बात नहीं है। कुछ नए हस्ताक्षर उभरे हैं जिनमें नए की पकड़ है, खोज है, पर्याप्त संतुलन भी है। पर, अभी के पूर्णतया मार्ग को बनाने में सफल नहीं हुए हैं। यह हिंदी में नकल करके आंचलिक बनने की एक परिपाटी जो चल पड़ी है वह अब बहुत घिसी-पिटी लग रही है, इसमें संदेह नहीं। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, हिमांशु श्रीवास्तव, उषा प्रियम्वदा, उदयराज सिंह, मधुकर गंगाधर, मार्कण्डेय, रेणु, कमलेश्वर, रणधीर सिन्हा, शिवप्रसाद सिंह, अमरकांत आदि ने इस दिशा में पर्याप्त कार्य किया है, पर अभी हिंदी कहानी दूसरी प्रादेशिक भाषाओं की अपेक्षा काफी दुर्बल है, यह मानना ही पड़ेगा। हिंदी पत्रिकाओं में प्रति मास प्रकाशित कहानियों में तथा दूसरी भाषाओं की कहानी में जो विकसित भाव-बोध की प्रतिच्छाया दिखाई पड़ती है, वह हिंदी कहानियों में नहीं दिखाई पड़ती। यह हिंदी कहानी की असमर्थता को ही व्यंजित करती है। इस दृष्टि से हिंदी कहानी को अपने पार्श्व की बँगला कहानियों का मार्ग अपनाना चाहिए जो गतिशीलता से युक्त हैं।

हिंदी उपन्यास ने पिछले दशक में काफी उन्नति की है, पर पिछले पाँच वर्षों में उसके द्वारा भी कोई विशेष उल्लेख्य योगदान नहीं मिला है। रेणु के ‘मैला आँचल’ के बाद मोहन राकेश का ‘अंधेरे बंद कमरे’ की चर्चा रही, पर लगा, जैसे उपन्यास की गति को भी काठ मार गया हो। जो अभिप्रेत लक्ष्य था, वह अब भी दूर है। अभी राजेंद्र यादव का एक उपन्यास ‘सारिका’ में धारावाहिक निकला है–‘अनदेखे अनजाने पुल’ जो मनोवैज्ञानिकता की पूर्ण व्याख्या करते-करते मात्र व्याख्या ही रह गया है। यादव का ही ‘शह और मात’ कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाया है। लक्ष्मीनारायण लाल का ‘छोटी चंपा बड़ी चंपा’ अवश्य इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। मोहन राकेश का ‘नीली रोशनी की बाँहें’ कथा की व्यथा के साथ नए भाव-बोध की सरल व्याख्या उपस्थित कर सका है, इसमें संदेह नहीं। मोहन राकेश के पूर्व के उपन्यास ‘अंधेरे बंद कमरे’ से जितनी निराशा मुझे हुई थी, उतनी ही आशा इस कृति से बँधी है। हिंदी के नव उपन्यास के क्षेत्र में यद्यपि आंचलिक उपन्यास ही अधिक लिखे गए हैं, पर उनमें ‘तृषित’, शैलेश मटियानी तथा रामदरश मिश्र ने संतोषजनक कार्य किया है। शेष आंचलिक उपन्यास बकवास ही हैं, इसे स्वीकार करने में मुझे थोड़ी भी हिचक नहीं। इन उपन्यासों के आने के बाद भाषा की भी एक समस्या आ खड़ी हुई है जिसपर कभी विस्तृत रूप से विचार किया जाएगा।

हिंदी नवलेखन के उपन्यास क्षेत्र में जो गतिरोध तथा अव्यवस्था आ गई है वैसी अव्यवस्था दूसरी प्रादेशिक भाषाओं में नहीं दिखाई पड़ती। कारण स्पष्ट है, वहाँ उपन्यास की रचना एक कथा के लिए हुई है, मात्र विचारों के आदान-प्रदान के लिए नहीं। कथा के तंतु को बिना तोड़े हुए विचार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण समस्या को ज्वलित करने का प्रयास अज्ञेय के उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ में हुआ है जो हिंदी नवलेखन को अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर स्थापित करता है। हिंदी में ऐसी कृति भी लिखी जा सकती है, यह कल्पना की चीज़ न थी, जिसे अज्ञेय ने सत्य कर दिखाया है। विदेशी वातावरण में भारतीय विचारों को उपस्थित करने का श्रेय लेखक को सहज ही प्राप्त हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय भावभूमि को लेकर रचे गए उपन्यास में ब्रजकिशोर ‘नारायण’ की ‘स्वस्तिका’ भी एक उल्लेख्य कृति है जो भारतीय संस्कृति की विजय को घोषित करती है। इधर के अन्य उल्लेख्य उपन्यासों में कृष्णा सोबती का ‘तीन पहाड़’ तथा सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का ‘सोया जल’ शिल्प और कथा दोनों की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण रहा है।

ऐतिहासिक उपन्यासों की ओर हिंदी नवलेखन का ध्यान नहीं गया है। हिंदी में भी ऐसे ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ तथा चतुरसेन शास्त्री का ‘सोना और खून’ के बाद कुछ लिखा ही नहीं गया। हजारीप्रसाद द्विवेदी का ‘चारुचंद्रलेख’ एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अवश्य मानी जाएगी। यह दिशा भी काम करने की है। इस ओर हमारे उपन्यासकारों को आगे बढ़ना चाहिए। हिमांशु श्रीवास्तव का ‘सिकंदर’ एक अभिनंदनीय प्रयास है जो नई आशा को जन्म देती है। शिवसागर मिश्र ने भी इस दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य किया है जो ध्यातव्य है। मगध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार मानकर उन्होंने अच्छे ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है।

हिंदी नवलेखन के सर्वाधिक दुर्बल पक्ष हैं–एकांकी और नाटक। हिंदी का रंगमंच और उसपर खेलने लायक एकांकी का अभाव, यह प्रश्न आज भी समस्या बनकर रह गया है। मोहन राकेश, विनोद रस्तोगी, सियारामशरण प्रसाद, लक्ष्मीनारायण लाल, सिद्धनाथ कुमार, सत्येंद्र शरत, विष्णु प्रभाकर के बाद नाम ही नहीं मिलता। नाटकों में जगदीशचंद्र माथुर और धर्मवीर भारती ने काम अच्छा किया है, पर हिंदी नवलेखन ने इस दिशा में अभी तक कोई अपना विशिष्ट धरातल निर्मित नहीं किया है, जो निराशाजनक है। इस दिशा की ओर पर्याप्त काम करना है। व्यक्तिगत निबंध तथा स्केच के क्षेत्र में जगदीशचंद्र माथुर का ‘दस तस्वीरें’ नई भावभूमि का द्योतक है। इस दृष्टि से रघुवंश, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, लक्ष्मीचंद जैन, प्रभाकर द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र आदि की नई रचनाएँ विशेष उल्लेख्य हैं।

कुल मिलाकर हिंदी नवलेखन के समक्ष पर्याप्त समस्याएँ हैं। पर साहित्य आगे बढ़ रहा है, इसमें भी किसी को आपत्ति नहीं है। हिंदी की समग्र चेतना का प्रतिनिधित्व हमारा नवलेखन कर रहा है और उसमें जागरण के साथ नए युग की प्रतिध्वनि की गूँज आ गई है; यह अभिनंदनीय है। यह आशा सहज ही बँधती है कि अनेकानेक अनुपलब्धियों के बाद भी हमारी उपलब्धियाँ इतनी हैं जो हिंदी नवलेखन को नए युग की भावभूमि की पीठिका के रूप में स्वीकृत करा सकती हैं।


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प्रो. कृष्णनंदन ‘पीयूष’ द्वारा भी