कला के आधार

कला के आधार

(सह-लेखक : तारणीचरण चरणदास चिदानंद)

कला का प्रकाशन आंतरिक तथा बाह्य आधारों पर आश्रित है। उसका आंतरिक आधार कला की मौलिक प्रेरणा है, और उसके वाह्य आधार कला के माध्यम या उपादना होते हैं। यों तो भाव को कला का सूक्ष्म उपादान कहा ही जाता है, पर कला की आंतरिक प्रवृत्तियों को उसकी आभ्यंतरिक भित्ति मान लेना अनुचित न होगा।

अंतर तथा वाह्य के मिलने से कला की सृष्टि होती है। कला के वाह्य उपकरण तथा प्रसाधनों से उसकी आंतरिक प्रेरणाएँ अधिक मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण हैं। साधारणत: कला-सृष्टि के लिए तीन वस्तुओं की आवश्यकता प्रतीत होती है–
(1) सृष्टा
(2) सृष्टि का उपादान-माध्यम
(3) भाव (जिसे सूक्ष्म उपादन कहा जा सकता है)
सृष्ट, सृष्टि के उपादानों तथा मूल भाव से एक चौथी वस्तु की उत्पत्ति होती है, जो ‘सृष्ट’ या ‘सृष्टि’ कही जाती है। यह सृष्टि कला में भाव का ही प्रकटित रूप होता है।

कोई भी रूप या स्वरूप एक अज्ञात रूप का ही रूप होता है। कला मन संपर्कीय भाव, भावना तथा अनुभूति को ही रूपी बनाती है। वह भाव तथा सौंदर्य आदि को वाह्य वस्तुओं तथा ध्वनियों के माध्यम से रूप देती है। प्रत्येक कला में आंतरिक भाव रहता है और वाह्य उपादन भी। जिस प्रकार चित्रकला के लिए कागज, शिल्प के लिए पत्थर, संगीत के लिए वाद्ययंत्र आवश्यक होते हैं, उसी प्रकार साहित्य के बाहरी आधार भाषा तथा शब्द हैं। भाव घटना तथा कथावस्तु आदि सूक्ष्म विषय भी कलाकार के लिए वैसी ही स्थूल वस्तुएँ हैं, जैसे कुंभकार के लिए मिट्टी।

साहित्य

कोई भी कह सकता है, कि साहित्य भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त होता है…भाषा उसका अवलंबन है अर्थात् साहित्य जैसी सूक्ष्म कला का आधार वाणी जैसी सूक्ष्म वस्तु है। पुस्तक छापने के यंत्र साहित्य के सहयोगी नहीं किंतु सहायक आधार हो सकते हैं। वाणी से संपृक्त और कई चीजें साहित्य को रूप देने में सहायक होती है।

(1) शब्द या भाषा (2) घटना तथा चरित्र (3) भाव

भाषा के बिना साहित्य की सृष्टि संभव नहीं, अत: इसे साहित्य का वाह्य उपादान कहना चाहिए, पर छंद बन्द्य की योजना तथा शब्दगत उच्चारण सूक्ष्म तथा अदृश्य होने पर भी साहित्य के स्थूल उपादान में ही गिने जाएँगे, अव्यक्त का व्यक्त होना, इसका अर्थ ही तथा रूप का परिचय देना है, अब रही घटना; कथा वस्तु। सो घटना भी किसी वाह्य पार्थिव विषय-संपृक्त भावना ही ठहरती हैं। अत: उसमें भी गुरुता तथा स्थूलता आ जाती है, अतएव उसे स्थूल आधार में लिया जा सकता है।

साहित्य के आंतरिक आधार हैं भाव तथा भावना। भाव किसी न किसी मानसिक स्थिति या संवेग की परिपक्व स्थिति की सृष्टि करता है। और भावना किसी सत्यानुभूति को ही संवेगात्मक ढंग से प्रकाशित करती है। भाव का पक्ष हार्दिक होता है, भावना हृदय तथा बुद्धि के मिश्रण से ज्ञात होती है। यह बात प्रगीतों में अच्छी तरह से देखी जा सकती है।

संगीत

शब्दोच्चारण के मिलन-विरह, आकर्षण-विकर्षण अर्थात् एक संघर्ष तत्त्व पर संगीत आश्रित होता है। जहाँ इस उच्चारणागत-वैचित्र्य, मात्रागत आकुंचन तथा प्रसारण पर ही संगीत सीमित रहता है वहाँ साहित्य रस तथा भाव का ही आश्रय लेता है।

साधारणत: संगीत विभिन्न वाद्ययंत्र या विभिन्न माध्यम जात-ध्वनि-विशेष होता है, जैसे वीणा, वंशी आदि संगीत वाद्यों से, यहाँ तक कि मनुष्य के गले से भी जो स्वर लय तथा राग से ध्वनित होकर हृदय पर विशेष प्रकार का प्रभाव डालता है, उसे हम संगीत कहते हैं; उपर्युक्त वाद्ययंत्र संगीत के साधन या सहायक साधन होते हैं । इन्हें संगीत कला के स्थूल आधार मानना ही उचित होगा। क्योंकि इनके माध्यम से उस प्रभावमयी रहस्य जनक ध्वनि प्रेरित की जाती है।

इस संगीत को आक्षरिक न मान कर मात्रागत तथा उच्चारण वैचित्र्यगत मानना ही उचित होगा। जहाँ तक संगीत के आंतरिक आधार की बात है, वहाँ यह कहा जा सकता है कि उसके आंतरिक आधार लंबी कहानी, कथा-वस्तु सत्य तथा सौंदर्य नहीं है, बल्कि भाव या रस है।

राग के माध्यम से (बिना भाषा के) भावों को (आनंद…दु:खादि) हृदय-हृदय तक पहुँचा देना अपने स्वर माधुर्य से वैदेशिक अन्य भाषा-भाषी सभी को विमुग्ध करना ही संगीत की विशेषता है।

संगीत में हम शब्द वैचित्र्य तथा वर्णन शैली नहीं देखते। उसके राग से हम आंतरिक अनुभूति आल्हाद या वेदना से रसार्द्र होते हैं कि नहीं, यही देखते हैं।

संगीत तथा कविता में इतना अंतर परिलक्षित होता है, कि जहाँ संगीत केवल एक वातावरण की सृष्टि करने तथा भाव को असीम में मिला देने में ही अपना कर्तव्य का अंत समझता है, वहाँ कविता उसे संगीत अपेक्षाकृत स्थूलतर रूप देने की कोशिश करती है–भावों को खींच-खींच कर शब्दों में भर-भर कर उसे अनुभव की तीव्रता की ओर बढ़ाती है–अधिक स्थाई तथा स्वस्थ भावोद्योतक बना देती है।

हाँ, भावों को ही संगीत का आंतरिक आधार कहना उचित होगा, और अंत में यह कहा जाएगा कि केवल स्वर के मात्रागत संकुचित तथा विस्फारित स्थिति ही पक्के संगीत की सृष्टि करती है, जो भाव को एक अव्यक्त भाषा में व्यक्त करती है।

हृदय स्पर्शता तथा भाव प्रजनन-शक्ति संगीत की कसौटी होती है।

चित्रकला

कहा गया है कि एक से दो हो जाने को ही सृष्टि कहा जाता है। चेतन प्राणों को अचेतन तथा स्थूल परमाणुओं से बने शरीर के बंधन में बाँध देना ही सृष्टि है। सृष्टि एक ही चीज की मात्रागत भिन्नता से या दो चीजों से होती है।

चित्रकला में भी यही बात उसमें एक वर्ण के मात्रागत पार्थक्य से अथवा कम से कम दो रंगों के मिलन से सृष्टि होती है। रेखाओं तथा वर्णों (रंगों) के विरह-मिलन से आँखों पर जो असर पड़ता है उससे चित्रकला अपने भाव व्यक्त करती है। कभी इसमें प्राकृतिक चिह्न (सिंबल) रहते हैं, तो कभी केवल छंद; कभी केवल वर्ण या रंगगत प्रभाव से चित्र का तात्पर्य लगाने से होता है।

इस कला के बाहरी आधार रंग, तूलिका, कागज आदि वस्तुएँ हैं । इसके भीतरी या आंतरिक आधार सौंदर्य तथा सत्य हैं। चित्रकला वाह्य सौंदर्य तथा आंतरिक सौंदर्य या ‘भाव’ व्यक्त करती है। दो रंगों के मिलन-विरह में वह तीसरी चीज या भाव की अभिव्यक्ति होती है।

साहित्य में तो अक्षरों में ध्वनि या उच्चारण निहित किए गए हैं–फिर शब्द में अर्थ निहित किया गया है, पर चित्रकला के अक्षर (रेखा) सदा के लिए ध्वनि और भाव में बंद्य नहीं किए हैं। चित्र में मूक वाणी है, उसका केवल प्रभाव है, क्योंकि सच्ची कला बाहर का ज्यों का त्यों अनुकरण नहीं है। इस कला में भी व्यक्ति के माध्यम से अव्यक्त की ही अभिव्यक्ति होती है।

शिल्प तथा वास्तु-कला

शिल्प तथा वस्तुकला के उपादान हैं, काष्ठ-प्रस्तर तथा मृत्तिका आदि। दोनों एक अव्यक्त सौंदर्य को व्यक्त करते हैं। शिल्प जहाँ पर अपने आंतरिक सौंदर्य को निराकरण वृत्ति से प्रस्फुटित करता है, वहाँ वास्तुकला अपनी संयोजना वृत्ति से काम लेती है।

वस्तुत: मूर्ति प्रस्तर में पहले से ही छिपी रहती है। कलाकार केवल उसके अनावश्यक अंगों को हटा कर अपनी सुंदरता तक पहुँचा देता है। असीम सौंदर्य तथा अव्यक्त भाव को कला स्थूल के आधार पर व्यक्त करती है–सीमा में असीम को बाँधती है। अत: शिल्प कला के आंतरिक आधार भाव तथा रूप सौंदर्य है । शिल्प अपने भाव को विविध अंग-भंगियों के छंदों से अभिव्यक्त करता है, तथा अंतर को बाह्य रूप देता है।

वस्तुकला में वह मानसिक सौंदर्य सुंदरता तक ही सीमित रहता है–भाव की ओर नहीं बढ़ता है। इसके कलाविद् अंतर को रूप देने तक वस्तुओं को एकत्रित करते रहते हैं। सुंदरसं योजना से यह कला केवल सौंदर्य और आल्हाद देती है।

प्रसंग वश यह कह देना आवश्यक समझता हूँ कि अपने वक्तव्य में शिल्प के मौलिक रूप की ही आलोचना की है, विभिन्न शिल्पों की उप-प्रवृत्तियों पर नहीं।

यह मैं आरंभ में ही बतला चुका हूँ कि कला के आंतरिक आधार या अवलंबन उसके मूल आधार होते हैं।

संक्षेप में यह कोई कह सकता है कि इच्छा ही कलासृष्टि के मूल में रहती है, अत: वह प्रेरिका तथा आंतरिक आधार है।

परंतु कला में इच्छा जनयित्री हो सकती है, पर इच्छा के अतिरिक्त कई और सूक्ष्म चीजें संगीत, साहित्य, चित्र तथा शिल्प आदि कलाओं में दिखाई पड़ती हैं।

जिन-जिन मूल प्रवृत्तियों से कला प्रभावित तथा प्रसारित होती है, उन्हें कला के आधार मान लेना उचित होगा।

प्राय: प्रत्येक कला में किसी न किसी रूप में आल्हाद, वेदना, सौंदर्य, सत्य तथा अनुभूतियाँ रहती हैं। कला के भाव विविध हो सकते हैं, किंतु वे किसी न किसी रूप से आल्हाद या आनंद, सुंदरता, वेदना तथा सहानुभूति या तो किसी सत्य की सूचना देते होंगे। भाव का विराट क्षेत्र उपर्युक्त अनुभूतियों में आ जाता है ।

खास करके अनुभूति का क्षेत्र और व्यापक है, इसमें प्राय: सभी समा जाते हैं।


Image: Portrait of a Young Indian Scholar or Self portrait Mughal miniature
Image Source: Wikimedia Commons
Artist: Mir Sayyid Ali
Image in Public Domain


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राजाराम जैन द्वारा भी