कविताओं में सामयिक यथार्थ

कविताओं में सामयिक यथार्थ

मानव जीवन की विविध घटनाओं का मार्मिक चित्रण अशोक चक्रधर के साहित्य का आधार है। उनकी अधिकांश कविताओं में मर्मांतक पीड़ा पहुँचाने वाले जीवन-प्रसंगों का वर्णन हुआ है। कहीं वह दहेज से जुड़ी हुई समस्याओं को दृश्यों में रूपायित करते हैं तो कहीं बेरोजगारी के भयानक दृश्यों को दिखाते हैं। सांप्रत समाज में फैली हुई कूटनीतियों, बढ़ती हुई अमानवीयता, पारस्परिक द्वेष आदि की भयावहता से हँसाते-हँसाते परिचित कराते हैं। राजनीति पर लिखी गई उनकी रचनाएँ, उन कविताओं के समानांतर नहीं रखी जा सकती, जो नेताओं को हास्य का विषय बना कर सतही ढंग से लिखी गई हों। नेताओं पर यदि वह व्यंग्य भी कर रहे होते हैं तो उसमें उनकी संविधान की समझ होती है। हास्य और व्यंग्य में वह सदैव उस सीमा-मर्यादा और लक्ष्मण रेखा का ध्यान रखते हैं, जिसके आगे साहित्यिक संस्कार घायल हो सकते हैं। अपने हास्य-व्यंग्य की कविताओं में साहित्यिक संस्कारों की उन्होंने सर्वदा रक्षा की है, भले ही वे कविताएँ कितनी ही सरल और आसान सी लगनेवाली क्यों न हो? प्रायः हास्य कविताओं में आ जानेवाले फूहड़पन और भदेस से उन्होंने स्वयं को बचाया है। वस्तुतः वह अपने गांभीर्य से हास्य की ओर आए हैं, न कि हास्य  से गांभीर्य की ओर गए हैं। वह मूलतः गंभीर रचनाकार हैं, लेकिन यह देखकर कि समाज इस गंभीरता की बोझ को समझने में असमर्थ है, क्यों न हास्य का सहारा लेकर इस गंभीरता को पाठक तक पहुँचाया जाए। इसलिए उन्होंने हास्य को साधन बनाया न कि हास्य उनका साध्य रहा। अपने समकालीन अन्य हास्य-व्यंग्य कवियों के समान ‘हास्य’ चक्रधर का साध्य नहीं रहा। हास्य को उन्होंने मात्र साधन बनाया।

जिंदगी की विविध घटनाओं के मार्मिक चित्रण के अंतर्गत यदि हम देखें तो बेरोजगारी पर लिखी हुई उनकी एक कविता है–‘कटे हाथ।’ कविता का आरंभ बड़े ही हल्के-फुल्के ढंग से होता है। एक सिपाही बगल में पोटली दबाए हुए थाने में प्रवेश करता है। थानेदार को सामने देखकर सैल्यूट के संबंध में कोई प्रतिक्रिया नहीं की। उसकी दृष्टि सिपाही की पोटली पर रही कि पोटली में क्या लेकर आया है। इससे संकेत मिलता है कि कोई सामान लाए जाने पर पुलिस की गिद्धदृष्टि उस सामान पर होती है, न कि अपने सम्मान पर।

सिपाही कुछ बता नहीं पाता, लेकिन उस पोटली में से कुछ टपकता हुआ नज़र आता है। थानेदार अपने रौबीले अंदाज में पूछता है–‘ये पोटली में से क्या टपका रहा है?/क्या कहीं से शर्बत की बोतलें मार के ला रहा है?’ (कटे हाथ भोले-भाले, पृ.-41) इससे पहले कि सिपाही अपनी कोई बात पूरी करे, थानेदार फिर उसे डाँटता है–‘तो घबराता क्यों है, हद है!/शर्बत नहीं है, तो क्या शहद है।’ (वही, पृ.-42)। सिपाही फिर घबराता है और बताता है कि इसमें शहद नहीं है। तब थानेदार पूछता है–‘तो खून है क्या?,/अबे जल्दी बता/क्या किसी मुर्गे की गर्दन मरोड़ दी/या किसी मेमने की टाँग तोड़ दी/अगर ऐसा है तो बहुत अच्छा है/पकाएँगे,/हम भी खाएँगे, तुझे भी खिलाएँगे।’ (वही, पृ.-42)

इस तरह से कथोपकथन के माध्यम से एक घटना चित्रित हुई है। थानेदार और सिपाही के बीच होने वाले संवाद में एक रोचक दृश्य बिंब बना है। एक बहुत कड़वे सत्य को रेखांकित करती हुई कविता है ‘बीयर कैसे पिऊँ’, यह कविता ‘भोले-भाले’ पुस्तक में सम्मिलित है। इस कविता का प्रारंभ भी बड़ी हास्यपूर्ण शैली में हुआ है–‘बहुत दिनों से मन में था/कि किसी एक दिन/मौज-मस्ती से जीऊँ/एक बोतल ठंडी-ठंडी/बीयर पीऊँ। लेकिन फैसला किया कि/बीयर-बाजी उसी दिन होगी/जिस दिन अखबार में/एक भी औरत के/जलकर मरने की खबर/नहीं होगी।’ (बीयर कैसे पिऊ, भोले-भाले, पृ.-98), यहाँ अचानक हास्य लुप्त हो जाता है और कविता एक गंभीर समस्या की ओर खींचकर ले जाती है। कवि ने इस कविता में वधू-दहन के कारणों को गिनाया है। कविता में पुलिस और समाज पर भी व्यंग्य किया गया है। दहेज-लोभी पिताओं पर भी व्यंग्य है। उनमें से एक सेठ एक दिन कवि के पास आता है और कहता है–‘ये लीजिए, अशोक जी, बीयर की बोतल, आज के अखबार में, बहू के जलने का, समाचार नहीं है।’ (वही, पृ.-98)। तब कवि महसूस करता है कि अखबार में हर घटना का समाचार प्रकाशित नहीं होता और वह अंत में निर्णय लेता है कि सच्चे समाचार की संपूर्ण प्रस्तुति तक बीयर पीने की उसकी कामना पूरी नहीं हो पाएगी। बीयर पीने की कामना से बीयर न पीने के संकल्प तक यह कविता महिलाओं की असमय, अकारण और दानवी शिकंजों में फँसकर होनेवाली मृत्यु पर मर्मांतक प्रहार करती है। इस प्रकार यह कविता पाठक को व्यवस्था के प्रति सोचने के लिए विवश करती है।

दहेज से उत्पन्न पीड़ाओं और समस्याओं पर लिखी गई एक और लंबी कविता है–‘बधाई।’ इस कविता में भी हास्य मुखरित रहता है। इसमें एक ऐसे काल्पनिक व्यक्ति ‘डॉ. फूंकेंद्र’ का जिक्र है, जिन्होंने एक दुकान खोली है–‘बहुएँ जलाने का सलाह-केंद्र।’ कविता का एक अंश इस प्रकार है–‘बहुएँ जलाने का सलाह केंद्र, परामर्शदाता, डॉ. फूंकेंद्र, मिलने का समय, चौबीस घंटे, बहुएँ जलाइए। झगड़े न टंटे। (बधाई, तमाशा, पृ.-29)। इस तरह कविता में यह सूचना है कि जिसे अपनी बहू जलानी हो, वह डॉक्टर फूंकेंद्र के पास आएँ, सलाह लें और अपनी बहू को जलाएँ। कई ने इस कविता में नाटकीय कौशल अपनाया है। आगे के अंश में एक पिता-पुत्र उसी दुकान में आते हैं, पिता अपनी पुत्र-वधु को जलाना चाहता है और उसके लिए डॉ. फूंकेंद्र से सलाह लेने आया है। यहाँ पर दोनों के बीच में हुआ संवाद बहुत मजे़दार है। डॉ. स्वयं को इस क्षेत्र का विशेषज्ञ बताते हुए जो कुछ कहता है, वह है तो काल्पनिक, लेकिन यदि गहराई में जाएँ तो क्या ऐसे लोग नहीं होते, जो कि बहुएँ जलवाने में सहयोग करते हैं? जो भी लोग बहुएँ जलवाने में सहयोग करते हैं, वे ही डॉ. फूंकेंद्र हैं–इस कविता द्वारा यही संकेत मिलता है–‘अगर आपकी वजनदार अंटी है/तो काम हो जाने की/पूरी गारंटी है। जलाने के एक-से-एक उम्दा तरीके हैं/हमारे कर्मचारियों ने, विदेशों में सीखे हैं। और माफ़ कीजिए/जलाने के लिए हम मिट्टी का तेल नहीं लाते हैं/हवाई जहाज वाला/महँगा व्हाइट पेट्रोल मँगाते हैं/इसके जरिये बहू फक्क से जल जाती है/न दर्द होता है/न चीखने-चिल्लाने की/आवाज आती है। काम सफाई से होता है मित्रवर। कोई भी सबूत/निशान या दाग़-धब्बे/न फर्श पर छोड़ते हैं/न चरित्र पर।’ (वही, पृ.-31)

समाज में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो बहू को जलानेवाले पिता-पुत्र या सास-ससुर को समझाने के स्थान पर उलटा ऐसा बताते हैं कि ‘तुम जला दो, कुछ नहीं होगा।’ वे उनकी लोलुपता को बढ़ाते हैं।

‘दुनिया पागल खाना’ कविता में बड़े मार्मिक प्रसंग सम्मिलित हैं। कवि का मानना है कि पागल ही असली मनुष्य होते हैं–‘ये सारे पागल, मनुष्य हैं/दरिंदे नहीं हैं/क्योंकि यहाँ/अत्याचार, उत्पीड़न दंगे नहीं होते।’ चक्रधर की कविताओं में जीवन का लेखा-जेाखा विपुल मात्रा में उपलब्ध होता है। उनके काव्य-विन्यास में स्वस्थ एवं सघन हास्य-व्यंग की सहज बुनाई भी दिख पड़ती है। इसी प्रकार उनकी एक अन्य कविता है ‘नया पाठ’, जिसे ‘इसलिए बौड़म जी इसलिए’ में समाविष्ट किया गया है। इस कविता में कवि ने बिजली न होने की स्थिति में आदमी द्वारा झेली जानेवाली कठिनाइयों का वर्णन किया है यथा–‘दस-दस घंटे/बिजली नहीं आएगी/तो अमर छत पर ही टहलेगा/टी.वी. नहीं चलेगा/तो दिल/सरकस में ही बहलेगा। पानी नहीं आएगा/तो पावर ही जाएगा/तो हीटर नहीं चलेगा/तो हाथ सेंकने के लिए/मरघट ही जाएगा।/काम खत्म करना होगा/तो दफ्तर सरपट ही जाएगा/और वहाँ पाएगा/कि बिजली नहीं है/तो लिफ्ट के बिना सीढ़ियों पर/कसरत ही करेगा/आ जाय/आ जाय/किसी तरह आ जाय/हसरत ही करेगा।’

कविता के अंत में जब लाख प्रयासों के बावजूद समस्या हल नहीं होती, तब उसे विकट-समस्या की संज्ञा देते हुए भगवत-भजन में लग जाने की विडंबनापरक प्रस्तुति हुई है।

चक्रधर की काव्य-सृष्टि मानक एवं मौलिक है। उनकी रचनाओं से अर्थगर्भित सार प्रकट होते हैं। एक अन्य कविता है–‘अगर जरूरी है’–इस कविता से ऐसा लगता है कि कवि इस दुनिया में हर दिन बढ़ रहे अत्याचार, खूनी हिंसा से बेचैन हैं। कविता के अंत में इन दुराचारों को समाप्त करने के उद्देश्य से कवि ने एक मार्मिक समाधान सुझाया है, जो इस प्रकार है–‘एक बोला–बिना खून लिए या दिए/तलवारें नहीं जाएँगी/म्यान में/बिचैलिया बोला–/एक सुझाता हूँ/प्लान मैं/पहले तो आप दोनों/आएँ होश में/रक्त बहना अगर ज़रूरी है/तो एक-एक लिटर दे दें/रक्तदान कोश में।’

‘चुटपुटकुले’ पुस्तक में समाविष्ट उक्त कविता द्वारा कवि ने जनमानस में सजगता लाने का प्रयास किया है। कवि ने अपनी कुशल प्रस्तुति से सामाजिक विभीषिकाओं को वैविध्यपूर्ण तरीके से सहज हास्य-व्यंग्य में पिरोया है, जो पाठक को सोचने के लिए विवश करती है। ऐसी ही उनकी एक कविता है–‘लो ये खबर कलमुँही आई।’ इस कविता का आरंभ इस तरह होता है–‘लो ये ख़बर कलमुँही आई/फिर दंगों ने ली अँगड़ाई/फिर से चाकू मस्त हो गए/लाठी खुश, बल्लम मुस्काई।’

प्रस्तुत कविता में सामाजिक अनीति और दुर्दशा की हृदयविदारक अभिव्यक्ति हुई है। ‘अपनी-अपनी प्रार्थना’ कविता के माध्यम से कलुषित और कलंकित समाज की झाँकी कवि ने हास्य-व्यंग्य का आलंबन लेते हुए इससे प्रस्तुत की है–‘दरअसल, प्रार्थना करना/तुझे नहीं आता है/बेटा, इतना भी नहीं मालूम/भगवान से क्या माँगा जाता है/सुन ज़रा भगवान से डर/प्रार्थना मेरी तरह कर/है प्रभो, तुम ज्ञान दो/सत्य दो/ईमानदारी और उच्च चरित्र दो/आदमी बोला/पुजारी जी, मैं तुमसे नहीं डरूँगा/तुम अपनी प्रार्थना करो/मैं अपनी करूँगा। और इस बात को तो/हर कोई जानता है/कि जिसके पास जो चीज नहीं होती/वही माँगता है।’

कविता के इस अंश से पुजारी के पवित्रमन, ईमानदारी, उच्च चरित्र आदि के अभाव का आभास होता है।

अशोक चक्रधर की रचनाएँ स्तरीय, सोचने को विवश करने वाली/और सारगर्भित होती है। उनकी रचनाओं के अंत में कोई-न-कोई संदेश/अवश्य मुखरित होता है। ‘सदाबहार त्योहार’ उनकी एक कविता है, जो हमारे देश में मनाए जाने वाले बहुसंख्यक त्योहारों के संबंध में है। कविता का एक भाग उद्घृत है–‘सचमुच हमारा ये देश सदाबहार है/यहाँ हर दिन कोई-न-कोई त्योहार है/इन त्योहारों के ही कारण/अशांति में भी शांति है/कल लोढ़ी थी, आज मकर-संक्रांति है/दक्षिण में पोंगल है/उत्तर-पूर्व में बिहू है/गुजरात में उत्तरायण है/कहीं स्नान है, कहीं जप है, कहीं पारायण है/हर त्योहार का मतलब/प्यार का व्यवहार है/हर त्योहार दिलों की गर्मी है/स्नेह की फुहार है।’

इससे प्रदेश-विशेष की अपनी पहचान का परिचय होता है। साथ ही दिल को आनंद देनेवाले इन त्योहारों से देश की अखंडता कायम करने की कामना भी कवि ने की है।

कवि ने ‘मछली का चारा मछली’ कविता में रिश्वत रूपी सामाजिक विरूपता की विडंबना की है। कविता के आरंभ में कविता का कथन है कि लोगों ने ये आम धारणा बना ली है कि मछली मारना आसान काम है। लेकिन कवि के अनुसार वह एक साधना है। कवि ने स्वयं इस कविता में बौड़म जी का किरदार निभाया है। पूरे दिन के लगातार प्रयास के बाद बौड़म जी को सांध्यकाल में एक मछली हाथ लगती है, जो बहुत बड़ी होती है, लेकिन बौड़म जी कहते हैं कि उस बड़ी मछली को पकड़ने के लिए उन्होंने व्हेल मछली को काँटे में चारा बनाकर डाला था। इस प्रकार कवि का संकेत है कि वर्तमान परिवेश में एक छोटे से काम के लिए भी आदमी को बहुत अधिक प्रयास करना पड़ता है। कविता का एक अंश प्रस्तुत है–‘ये बात मैंने आपको इसलिए बताई/कि आजकल/छोटी मछली पकड़ने के लिए/बड़ा चारा करना पड़ता है सप्लाई। पाँच हजार की नौकरी के लिए/पचास हजार का चारा/दस हजार की नौकरी के लिए/एक लाख का चारा/लाखों के टेंडर के लिए चाहिए/करोड़ों का चारा/यानी गधों के लिए चाहिए/घोड़ों का चारा/चारा, जाती हुई शताब्दियों का/आता हुआ शब्द है/जिसके पास चारा है/उसको सब कुछ उपलब्ध है।’

इस प्रकार कवि ने समाज में फैलनेवाली रिश्वत रूपी विष का चित्रांकन किया है। कवि इस सामाजिक विषमता से बहुत बेचैन है। रिश्वत से सामाजिक अधःपतन होता है। समाज में नैतिकता का अभाव और अन्याय का प्रयास होता है। आदमी अकर्मण्य हो जाता है। वह अयोग्य, आलसी और निकम्मा बन जाता है। उसमें किसी भी प्रकार की सामर्थ्य नहीं रह जाती। कवि ने वर्तमान सामाजिक परिस्थिति की इस विषमता की ओर से पाठक का ध्यान आकर्षित किया है और जागरण के शंखनाद का उद्घोष किया है।

अशोक चक्रधर ने मानव-जीवन की विभिन्न घटनाओं और परिस्थितियों को अत्यंत बारीकी से देखा है और विश्लेषित किया है। समाज में विद्यमान अनेक समस्याओं से वह भलीभाँति परिचित हैं। इन समस्याओं से दुखी कवि अशोक चक्रधर ने उन्हें अपनी व्यंग्य कविताओं द्वारा पाठक या श्रोता के सामने प्रस्तुत किया है। सामाजिक विषमाताओं की पहचान कर उनकी विडंबनापूर्ण प्रस्तुति करने में चक्रधर स्वयंसिद्ध कवि के माध्यम से सांप्रतिक घटनाओं, विषमताओं को हमारे सामने रखने में सफलता हासिल की है।


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Artist : Paul Albert Besnard
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