केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रेम

केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रेम

मानव जीवन में ‘प्रेम’ एक अनिवार्य तत्त्व है। वह मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में से एक है। प्रेम का जीवन में वही स्थान है जो आत्मा का शरीर में। आत्मा बिना शरीर निष्प्राण होता है, प्रेम बिन जीवन। जीवन में प्रेम रूपी रस का संचार न हो तो जीवन में संबंधों की डोर नीरस, सूखी और कमजोर हो अंततः टूट जाती है। जीवन के इस बाग में प्रेम रूपी पुष्प न हो, तो जीवन का रंग और उसकी महक फीकी पड़ने लगती है। सृजनशील और कर्मण्य जीवन का आधार बनाता है प्रेम। प्रेम ही वह भाव है जो मनुष्य का शेष चराचर जगत से नाता बनाए रखता है। जीवन में प्रेम की इस महत्त्वपूर्ण भूमिका को कवि पहचानता है। इसीलिए कवि केदारनाथ अग्रवाल ‘प्रेम’ को जीवन का सर्वोच्च मूल्य मानते हुए जीवन जीने के क्रम में प्रगाढ़ प्रेम करते रहने को आवश्यक मानते हैं। प्रेम को मानवीय चेतना की परम उपलब्धि स्वीकार करते हुए कवि ने ‘आत्मगंध’ की भूमिका में लिखा–‘मैं प्रेम की महत्ता को जानता हूँ। इसीलिए प्रगाढ़ प्रेम करते रहने को आवश्यक समझता हूँ। मैं प्रेम को जीवन का मूल्य मानता हूँ। प्रेम है क्या? यह एक का किसी दूसरे से संबद्ध होना है। दो आत्मीय इकाइयों का एकात्म होना है।…प्रेम मानवीय चेतना की परम उपलब्धि है जिसे प्राप्त कर आदमी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है।’

जीवन का यह सर्वोच्च मूल्य ही वास्तव में जीवन का सबसे बड़ा दर्शन है। यहीं से जीवन का आरंभ होता है और यहीं अंत भी। यही पाकर हम सबल भी होते हैं और इसे खोकर कमजोर भी। जीवन के सभी क्रिया-कलाप यहीं से नियमित और नियंत्रित होते हैं। जो यहाँ चूक जाता है, वह हर जगह चूक जाता है। जीवन को जीते हुए जो प्रेम की इस प्रवृत्ति को समक्ष लेता है, वह आजीवन डूबता नहीं। इस भाव की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जो इसके श्यामल रंग में जितना डूबता जाता है, वह उतना ही उज्ज्वल होता जाता है। केदार प्रेम की इस महत्ता से भली-भाँति परीचित हैं, तभी लिखते हैं–‘हे मेरी तुम! प्यार नहीं पाथर की नाव/डूब जाए जो नदिया में/भारी भार भरी/हे मेरी तुम! प्यार सिंधु की लहर-छहर है/गमनागमनी है/आक्रीड़न है/आर-पार की उत्तोलन है।’ सच्चा-प्रेम जीवन की वह शक्ति है जो मनुष्य की तमाम कमियों को खूबियों में बदलने के साथ ही उसके जीवन को सार्थक, सही और संपूर्ण दिशा देने में भी सहायक होती है। वास्तव में जीवन में प्रेम का आधार जितना पुष्ट और पुख्ता होगा, जीवन का आनंद उतना ही गहरा और व्यापक होगा।

कवि केदार के जीवन में प्रेम की यह निर्मल धार प्रवाहित करने वाली कोई और नहीं बल्कि स्वयं उनकी प्राणप्रिया पत्नी पार्वती देवी हैं। ‘कवि हूँ, पत्नी-प्रेमी हूँ।’ कवि का प्रेम दांपत्य-प्रेम है। परकीया प्रेम से दूर केदार का प्रेम विशुद्ध रूप से स्वकीया है। आमतौर पर हमारे यहाँ वर का विवाह कन्या के साथ संपन्न होता है लेकिन कवि की विशिष्टता इस बात में है कि उनका विवाह किसी कन्या से न होकर ‘प्रेम’ से हुआ है। ‘प्रेम’ को ब्याहने की बात कवि ने की है : ‘गया ब्याह में युवती लाने प्रेम ब्याह कर संग में लाया’। केदार की पत्नी ही उनकी प्रेयसि हैं। केदार पत्नी के रूप में प्रेम को पाकर आत्मविभोर हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी चकोर को चंदा मिल गया हो। पति-पत्नी के बीच का यह प्रेम निश्छल और प्रकृत है, इसीलिए जीवनदायी थी; ‘वह आईं/मेरी आँखों में आई ज्योति/चाँद हुई वह/मैं हो गया चकोर/प्राकृत प्रेम/हुआ बरजोर/जीवनदायी।’ प्रेम प्रेमिका के प्रति हो या पत्नी के प्रति अगर उसका आधार सच्चा एवं स्थायी हो तो वह सबल, जीवनदायी होने के साथ-साथ प्रेरक भी होगा।

नारी के कई रूपों में एक रूप पत्नी का भी होता है। सुख-दु:ख साथ बाँटने वाली यह नारी, पति के जीवन की सहयोगिनी होती है। जीवन की कठिन बेला में वह पति के जीवन को संबल प्रदान करती है। त्रिलोचन की चंपा लाख दु:ख सहने पर भी अपने बालम को कलकत्ता नहीं भेजना चाहती। धनिया गरीबी की मार झेलते हुए भी होरी के प्रति समर्पित है। नागार्जुन को घोर निर्धनता की बेला में प्रिया का सिंदुर-तिलकित थाल याद आता है तो केदार घर की अव्यवस्था को देखकर मायके गई हुई पत्नी को याद करते हुए कहते हैं : ‘हे मेरी तुम! कल कमीज में बटन नहीं थे, कुरता देखा तो आगे से फटा हुआ था/धोती में कुछ दाग पड़े थे,/…सोपकेस में सोप नहीं था, एक बूँद भी तेल नहीं था/कंघा परसों टूट चूका था/…पैसे की डिबिया में पैसा नहीं था/बालू और अनाज खत्म था, लालटेन अंधी जलती थी, हाय राम/मेरी आफत थी/अब बोलो तुम कब आओगी। घर सँवारने।’ मध्यवर्गीय पति के घर का वृत्तांत बताती यह कविता परिवार के भीतर स्त्री की भूमिका का चित्रण पेश करती है। उसका न होना कवि के घरेलू जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। व्यवस्थित दांपत्य-जीवन का आधार होती है पत्नी।

केदार पेशे से वकील थे। वकील को पैसा बनाने की मशीन माना जाता है। लेकिन वकालत के पेशे से जुड़े होने के बावजूद कवि आजीवन अर्थाभाव के संकट से जूझता रहा। आज के इस पूँजीवादी दौर में अर्थहीनता आदमी को असमर्थता की ओर ले जाती है। ‘गठरी चोरों’ की इस दुनिया में ‘गठरी’ न चुराने का संकल्प ही उसे ‘कंगाल’ व ‘भुक्खड़ शहंशाह’ तक बना डालता है। ऐसी परिस्थिति में उसके पास प्रिया को देने के लिए प्रेम के अतिरिक्त और कुछ न था। केदार इस अर्थ में भाग्यशाली हैं कि अर्थहीन, असमर्थ, कंगाल और भुक्खड़ शहंशाह होने के बावजूद उनके लिए प्रिया का प्रेम कम नहीं हुआ। दोनों के मध्य प्रेम की आवाजाही निरंतर बनी हुई है। ‘कंगाल हूँ/भुक्खड़ शहंशाह हूँ/और तुम्हारा यार हूँ/तुमसे पाता प्यार हूँ।’

प्राणप्रिया का यही प्रेम उसके जीवन की शक्ति है। जो उसे प्रतिकूल परिस्थितियों में हारने नहीं देती। उसे संघर्ष करते रहने को बराबर प्रेरित करती है। जीवन में व्याप्त ताप को सोख लेने के साथ ही कवि के जीवन को नई आशा और ऊर्जा से भर देती है। प्रिया की मुस्कान पर पीड़ित, दीन दुखी कवि के जीवन में विद्रोही ज्वार भरने में सहायक है : ‘प्राणमयी मुस्कान तुम्हारी/दीन दुखी मेरे जीवन में/तब विद्रोही ज्वार भरेगी/ज्वालामयी मुस्कान तुम्हारी/जब शोषण को क्षार करेगी/पर पीड़ित मेरे जीवन में/तब आशा–उद्गार भरेगी।’ जीवन में व्याप्त दीनता, शोषण, दु:ख, विपदा को क्षार करने वाली प्रिया की यह ज्वालामयी मुस्कान कवि को अतिशय प्यारी है। इसीलिए कवि प्राणप्रिया के इस जीवनदायी मुस्कान पर सारी तन्मयता बाँटते हुए उसका एकमात्र अधिकारी बने रहना चाहता है। प्रिया का यह प्रेम कवि जीवन में अमृत प्रदत्त है। जब-जब जीवन के प्रति आस छूटने को होती है कवि का मघुप रूपी मन प्रेम रूपी इस अमृत धार को पीने के लिए उत्सुक हो उठता है। जीवन में व्याप्त संघर्ष से लड़ने के लिए प्रिया की मुस्कान के साथ कवि के आधे पर पत्नी-प्रिया का दिया हुआ चुंबन थी, जो उसे इस घमासान संघर्ष में लड़ने और अडिग रहने को प्रेरित करता है : ‘मैं रणोद्यत हुआ। माथे पर लेकर चुंबन तुम्हारा/झिझका नहीं न अड़ी/बराबर लड़ा/घमासान संघर्ष में पड़ा/हाथ हारे–पाँव हारे/मैं न हारा/माथ में चुंबन लिए जीता रहा।’

पर कभी-कभी जीवनभर की लड़ाई की परिणति देख कवि में निराशा घर कर जाती है। आने वाले कल की चिंता मन के विश्वास को डिगाने लगती है। दायित्वों का निर्वाह करते-करते वह थक-सा जाता है। संघर्षों और दायित्वों के बोझ से उसकी रीढ़ हिलने लगती है। जीवन के इस कटु अनुभव को अपनी पत्नी से साझा करते हुए कवि कहता है : ‘हे मेरी तुम! भरी पैठी कल की चिंता। हिला रही है मेरी रीढ़/…खेते खेते अपना डोंगा/मेरे हाथ शिथिल हो आए/…कटु यथार्थ से लड़ते-लड़ते/अब न लड़ा जाता मुझसे।’–जब कटु यथार्थ से लड़ते-लड़ते यह लगने लगता है कि अब नहीं लड़ा जा रहा, तब जीवन के इस कठिन बेला से पार पाने के लिए वह अपने निकट अपनी पत्नी को ही पाता है। जीवन में व्याप्त निराशा के इस कुहरे को दूर कर जीवन को नये सिरे से जीने की आस लिए हुए कवि अपनी प्रिया प्रियंवद से आत्मीय निवेदन प्रस्तुत करते हुए कहता है : ‘हे मेरी तुम! अब तुम ही थोड़ा मुसका दो/जीने की उल्लास जगा दो।’

अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए प्रिया प्रियंवद ने कवि का साथ जीवन के हर मोड़ पर दिया है। ऐसा नहीं कि जीवन का यह संघर्ष केवल कवि का अपना है। पत्नी होने के नाते जीवन का सुख-दु:ख दोनों का बराबर होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते कवि भले ही कभी-कभी हताश, निराश हो थक जाय, उसकी हिम्मत उसका साथ छोड़ दे लेकिन कवि प्रिया जीवन के इस कठिन संघर्ष में भी हिम्मत का दामन नहीं छोड़तीं। उदासी, बेबसी और आँसुओं को परे रख कविप्रिया सदैव चेहरे पर एक मुसकान लिए पति के साथ जीवन में व्याप्त संघर्ष से दो-दो हाथ करने को तत्पर रहती हैं : ‘जब देखा/मुसकाते देखा तुमको/मन को मारे/हिम्मत हारे/कभी न देखा तुमको/…जब देखा/तब खुश-खुश देखा तुमको/रोते-रोते। आँसू बोते/कभी न देखा तुमको।’ प्रेम की असली परीक्षा विकट परिस्थितियों में ही होती है। जीवन के इस कड़े संघर्ष में धैर्य और साहस को बनाए रखते हुए कविप्रिया का कवि को भी उसके लिए प्रेरित करते रहना अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। जीवन की इस लड़ाई में अपने किसी का साथ मिल जाय तो संघर्ष थोड़ा आसान हो जाता है। इस दृष्टि से कवि भाग्यशाली हैं कि उनको सदैव प्रिया का साथ मिला। केदार के लिए प्रिया के साथ होने का अर्थ है : ‘कुछ नहीं होता जहाँ/तुम पास होती हो वहाँ/मैं नहीं होता उदास/मैं नहीं होता हताश।’ जीवन और समाज में स्त्री की यह महान भूमिका है। कवि की विशिष्टता इस बात में नहीं कि उन्होंने स्त्री की इस भूमिका को पहचाना अपितु इस बात में है कि स्त्री को उन्होंने इसी रूप में देखा, जीया और अभिव्यक्त किया।

आदिकवि बाल्मीकि ने भी राम और सीता के प्रेम का विकास मिथिला या आयोध्या के महलों और बगीचों में न दिखाकर दंडकारण्य के विस्तृत कर्मक्षेत्र के बीच दिखाया। ऐसा प्रेम वास्तव में जीवन-यात्रा के मार्ग में माधुर्य और आनंद फैलाने वाला होता है। इसके प्रभाव से संपूर्ण कर्मक्षेत्र प्रकाशित हो उठता है। प्रेम के इसी सबल पक्ष की ओर संकेत करता हुआ कवि कहता है ‘प्यारी! तारों का आलोक/हर सकता है तभ का शोक/प्यारी! अपना प्रेमलोक/हर सकता है जग का शोक। प्रेम मनुष्य को अंदर से भी जोड़ता है और बाहर से भी। प्रेम के इस विराट दर्शन में सभ्यता के आरंभ से ही पूरी प्रकृति-सृष्टि सुरक्षित है। केदार की प्रेम-कविताएँ सिर्फ प्रेमी या प्रेमिका के प्रति माननीय और सहृदय नहीं बनातीं बल्कि पूरे परिवेश के प्रति, हर एक व्यक्ति के प्रति आत्मीय होने का संदेश संप्रेषित करती है। ‘फूल तुम्हारे लिए खिला है/लाल-लाल पंखुरियाँ खोले गजब गुलाब/हे मेरी तुम!’ इसे देखकर चूमो चूम-चूमकर झूमो/झूम-झूमकर नाचो-गाओ…नेह-नीर हो बरसे-हरसे/जड़ हो चेतन/चेतन हो/जीवन की धारा/धारा काटे निष्कुट कगारा/मानव हो मानव को प्यारा/जग हो फूल गुलाब हमारा।’ ऐसी ही स्थिति में व्यष्टिगत चेतना समष्टिगत चेतना में परिणत हो जाती है। वास्तव में प्रेम ‘अहं’ के समर्पन और तिरोहण का नाम है। सच्चा और निश्छल प्रेम जीवन की सारी विषमताओं को समाप्त कर देता है। प्रेम का पल्लवन समानता के धरातल पर ही संभव हो सकता है। ऐसी दशा में एक का जीना दूसरे के लिए जीने का मार्ग प्रशस्त करता है। जो प्रेम का ईष्ट है, वही केदार की कविताओं का लक्ष्य है। ‘जीता रहूँगा मैं/जागता रहूँगा मैं/जीते जागते/सत्य को साधते-साधते/चेतना को साधता रहूँगा मैं/अंधकार को असत्य को/प्रेम की प्रखर धार से/काटता रहूँगा मैं।’

प्रेम मनुष्य को सक्रिय और सृजनशील बनाता है, इसका उद्घोष कई बार केदार की कविताओं में हुआ है। ‘प्रेम’ को जीवन का सबसे बड़ा मूल्य मानते हुए केदार स्वयं उसे जीते हैं और दूसरों को भी प्रेमपूर्ण जीवन जीने को प्रेरित करते हैं। उनका मानना है कि प्रेम से अलग जीवन को जीने की और कोई पद्धति नहीं हो सकती। मनुष्य से प्यार करना और उससे प्यार पाना ही जीवन जीने की सर्वोत्तम पद्धति है। कवि ने जीवन में प्रेम के महत्त्व को समझते हुए ‘पुष्पदीप’ भूमिका में लिखा कि ‘आदमी का जन्म पाकर, आदमी की तरह जीने के लिए, अपने घर-परिवार को अच्छे सदस्यों का घर-परिवार बनाने के लिए, अपने समाज और राष्ट्र को सत्यदर्शी समुन्नत बनाने के लिए और महान मानवीय मूल्यों और आदर्शों से निरंतर चरित्र को परिचालित करते रहने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि आदमी प्यार करे और प्यार पाये।…प्यार ही तो आदमी को कर्मशील बनाता है।…बिना प्यार के जीवन हरगिज मानवीय जीवन नहीं हो सकता। वह तो सब तरह से अमानवीय होकर निरर्थक हो जाएगा।’ जीवन को प्रेम के इसी दर्शन से जोड़ती हैं केदार की दांपत्य-प्रेम से सनी हुई कविताएँ। कुंठारहित प्रेम कितना उत्प्रेरक और उत्साहवर्द्धक होता है इसका एहसास केदार की अत्यंत माननीय प्रेम कविताओं की संजीदा अंतर्यात्रा के द्वारा हम कर सकते हैं। इनमें कठिन जीवन-संघर्ष के खट्टे-मीठे अनुभव और सुख-दु:ख के ताने-बाने से बुना हुआ ऐसा प्रेमाख्यान है, जिसमें समर्पण है, आत्मीयता है, तृप्ति का अहसास है साथ ही कर्म करते रहने का उत्साह भी है। प्रेम बिना जीवन कितना अमानवीय, सारहीन अकर्मण्य और निरर्थक होता है, इसका साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं, ये पंक्तियाँ–‘प्यार न पाता/तो क्या होता?/घास-फूस की झाड़ी होता/बिना सूत की आंड़ी होता/मसूर होता/कांड़ी होता/बेपहिये की गाड़ी होता/सबसे बड़ा अनाड़ी होता/गूँगी खड़ी पहाड़ी होता/बंगाल की खाड़ी होता।’


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Artist : August Macke
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भैरव सिंह द्वारा भी