माला का पत्र : श्री उदयराज सिंह के नाम

माला का पत्र : श्री उदयराज सिंह के नाम

स्रष्टा मेरे,

इतमीनान रखो, जिंदगी को जीने से मैं कतरा नहीं सकती; थोड़ी झुक जाऊँ यह भले संभव हो, पर टूट नहीं सकती। चौतरफी लड़ाई लड़ रही हूँ, यह बात तो तुमने बहुत नजदीक से देखी है–समाज की रूढ़ियों से लड़ाई, जमाने के तेवर से लड़ाई, नरक के घिनौने कीड़े से लड़ाई, अपने-आप से लड़ाई। लगता है, लड़ाई से छुटकारा नहीं मिलेगा। छुटकारे की जरूरत भी नहीं समझती। जो लोग समझते हैं, मध्यम वर्ग ‘कन्फ्यूज्ड’ हो रहा है, स्त्री और पुरुष दोनों का विवेक झर रहा है, मैं वैसे लोगों को एक चेतावनी देना चाहती हूँ और कहना चाहती हूँ कि ऐसी बात नहीं है। मध्यमवर्ग में ऐसे भी स्त्री और पुरुष जीवित हैं जो अपने चरित्र के द्वारा बहुत कुछ इंगित, संकेतित कर सकते हैं। मैं अपनी बड़ाई आप नहीं करती। ‘इटिकेट’ के खिलाफ भी है यह। पर आरोपों की बौछारें जब तेज हो जाती हैं, तानों की बर्छियाँ कलेजे को छेदने लगती हैं तो मुँह बाँधकर रहा भी नहीं जाता। यह जरूर है कि सीने-पिरोने का काम स्त्रियों के जिम्मे अधिक रहता है और मुझे भी मुँह को सी लेना चाहिए पर जमाने के रुख को देखते हुए, मुझे मुँह को सीने में गलती मालूम पड़ रही है। मैं अपना मुँह सी नहीं सकती। तो क्या खुले मुँह से आग उगलूँ? ऐसा तो उचित नहीं प्रतीत होता। हाँ, सच्ची बातों के कहने में मुझे डर नहीं लगता यह जानते हुए भी कि सच्ची बातों को सुनकर कभी-कभी लड़ाई भी हो जाती है। पर एक सच्ची बात को, छिपा लेने के लिए माफी माँगती हूँ वह यह कि आदर्शवाद के कुहासे से तुम मुझको खींचकर बाहर नहीं ले जा सके। मार्क्सवादी रूह के लिहाफ से प्रेम नहीं दिखलाया, यह ठीक है; समाजवादी यथार्थवाद के अहाते में बहुत देर तक घूमने नहीं दिया यह भी ठीक है; प्रकृतवादी माँद में नहीं बैठाया यह भी खुशी की बात है अन्यथा मैं तो आत्मरति का शिकार (Self-erotic) ही बन गई रहती।

पर नाराजगी की बात यह है कि तुमने मुझे जमाने के, बहुत लायक नहीं बनाया। मैंने इधर अपना एक फोटो लिया है; उसको देखने से ऐसा मालूम पड़ता है, तुमने हाथी दाँत की मीनार के ऊपर बैठकर मेरा सृजन कर दिया। मेरी एक सखी अंतर का भी यही अनुमान है। क्या सचमुच तुमने हाथी दाँत की मीनार पर बैठकर मेरा रूप गढ़ा है? यदि ऐसी बात है तो तुमने थोड़ी जल्दीबाजी कर दी। हाथी दाँत की मीनार पर बैठकर मूर्ति के गढ़ने का जमाना अब नहीं रहा; अब जमाना है, समाज के बीच रहकर, परिवार के अंदर घुसकर कुछ करने-कराने का। काश, तुमने इस पर कुछ अधिक ध्यान दिया होता!

याद नहीं आ रहा, किस लेखक का एक लेख पढ़ा है ‘तीर्थयात्रा’। इसमें लेखक ने सिनेमा को तीर्थयात्रा सिद्ध करते हुए सिनेमा नहीं देखने का इशारा किया है। यह संतोष की बात है, तुमने सिनेमा के इस युग में ऐसे दकियानूसी दृष्टिकोण का परिचय नहीं दिया और सिनेमा से ‘तफरीह’ (दिलबहलाव) करना बुरा नहीं समझा। सिनेमा देखना बुरा नहीं है बुरा है इसमें आई हुई (या संकेतित) बुराई को अपना बना लेना। जो लोग सिनेमा देखकर सीख ग्रहण करते हैं (और करना भी चाहिए) उनके लिए सिनेमा से बड़कर लाभदायक और है भी क्या? दिलबहलाव का दिलबहलाव और सीख की सीख! हाँ, उम्र का तकाजा भी कोई चीज है! बहुत छोटी उम्र में सिनेमा देखकर कोई सीख नहीं भी ग्रहण कर सकता है। तुम सिनेमा के प्रेमी मालूम पड़ते हो, प्रेमी ही नहीं, रसिया! ‘सिनेमाबाज’ विशेषण का प्रयोग करना मैं नहीं चाहती, पर बहुत अधिक सिनेमा देखना कभी-कभी संदेह भी उत्पन्न करता है। तुम तो ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ वाली उक्ति जानते ही होगे। फिर जानबूझकर ऐसी गलती क्यों की? मोटर पर (हुड गिराकर यूनिवर्सिटी की ओर मटरगश्ती करने के क्रम में) गाने के लिए क्यों बाध्य किया, गंगा में नौका-विहार के सिलसिले में संगीत के कार्यक्रम का क्यों आयोजन किया? अजीत बाबू से गद्य ही में अपना परिचय देने देते, शायरी का सहारा क्यों लेने दिया? मुझको छोटी उम्र में सिनेमा देखने के लिए बाध्य किया तो किया, मेरी बड़ी बहन लता, मेरी माँ, मेरे प्रेमी (या भाई?) अजीत, मेरे और अजीत के मित्र, राजनारायण, मेरे पति अरुणचंद्र, मेरे पति के बॉस मिस्टर भल्ला और उनकी पत्नी मिसेज भल्ला आदि सबको सिनेमा देखने के लिए बाध्य क्यों कर दिया? मेरी बड़ी बहन लता से पार्क में टाँग रोककर, अघलेटे रूप में गाने को क्यों विवश किया? मेरा मन तो कहता है इसमें जरूर कोई राज है! तब तो तुमने ‘देवदास’ सिनेमा के देखने के क्रम में मुझे अजीत से परिचित कराया और अरुणचंद्र से बिना मन की शादी होने पर उनसे भी ‘देवदास’ ही देखने की बात कहला डाली। यही नहीं, अजीत से भी ‘देवदास’ देखने की पैरवी एक पत्र के मार्फत करवा दी। क्या तुम्हारी दृष्टि में यह संयोग है? बड़ी बहन लता और उनके पति राजानारायण शादी होने पर सिनेमा जाते हैं ‘विद्यापति’ और न जाने कौन-कौन फिल्म देखने। गनीमत समझो, उनसे ‘देवदास’ देखने की सिफारिश नहीं की। ‘देवदास’ के अलावे और कोई सिनेमा नहीं है क्या? क्या तुम मुझे ‘पार्वती’ (देवदास की प्रेमिका) से अपने को मिलान करने की बात कहना चाहते हो? क्या मैं पार्वती हूँ? क्या मुझे पार्वती ही बन जाना चाहिए?

मेरे रचनाकार, तुमने मुझे बचपन में ‘देवदास’ सिनेमा दिखलाया; पर तब बचपन के कारण पूरा-पूरा समझ नहीं सकी। शादी के बाद मिस्टर अरुणचंद्र के साथ इलाहाबाद में भी इसे दिखलाया पर तब भी मैं इसे नहीं देख सकी। तब तो तुमने मुझे देखने ही नहीं दिया। अजीत की मूर्ति बराबर नाचती रही। ‘फ्लैशबैक’ (Flash back) के रूप में उसी अजीत की मूर्ति जिसने मुझको ‘देवदास’ फिल्म खत्म हो जाने के बाद, भीड़ छँट जाने पर, रोती हुई देखा और अपनी साइकिल के ‘केरियर’ पर बिठाकर घर पहुँचाया, आत्मीयतापूर्वक स्नेह प्रदान किया तथा मन-ही-मन जिसके प्रति अपने को सौंप कर मैंने संतोष की साँस ली। मैं जानती हूँ, इसमें तुम्हारा भी कम हाथ नहीं है, तुमने भी कम स्नेह नहीं प्रदान किया है। मुझे यह भी मालूम है कि बहन और भाई में शरीरपरक या वासनात्मक प्रेम-संबंध नहीं होता इसलिए मैंने हृदय से, अजीत को भाई माना भी नहीं; अजीत मुझको बहन कहकर भले संबोधित करे। भाई-बहन के प्रेम संबंध का थोड़ा-सा आभास ‘घेरे के बाहर में’ मैंने जरूर देखा है पर सबके लिए वह स्वीकार्य नहीं हो सकता। तुम ऐसी गलती नहीं कर सकते, इस बात का मुझे जबरदस्त विश्वास है। अजीत बाबू ने भी क्या मुझे भीतर से भी बहन माना? यदि यह बात ठीक है तो अपने मित्र राजनारायण से उन्होंने मुझको संकेतित करके क्यों कहा, ‘जाने उस जन्म की मेरी संगिनी हो और एकाएक मुझे पाकर अब छोड़ना ही नहीं चाहती हो।’ मेरे ललाट के ऊपर उनकी दृष्टि की बिंदी क्यों सटवाई? छत पर शीतलपाटी बिछाकर मैं सितार का गत सुना रही थी तो क्यों उनसे कहलाया, ‘चलो, छत के बीचो-बीच बैठें ताकि नीचे शहर का एक अंश भी दिख न पड़े।’ अजीत बाबू ने प्रेमी के समान मेरे पास पत्र क्यों लिखे; किरण से शादी कर लेने पर मेरे पास तुमने सफाई पत्र क्यों भिजवाया? क्या अजीत बाबू ने बेबसी-पत्र मेरे पास भेजे? तुम उदाहरण चाहते हो? लो देख लो; यह अजीत बाबू का ही लिखा हुआ है न?…‘मुझे अंदर आते ही घुटन होने लगी–रंगीन बंद कमरा यानी रंगीन सीलिंग, रंगीन दीवारें, रंगीन पंखा, रंगीन परदे, रंगीन पलंग, रंगीन कपड़े, रंगीन बहू–इतना सब रंगीन कि सब कुछ बदरंग लग रहा था। इत्रों की गंध से नाक भिन्ना उठी। मैंने झट खिड़की खोल दी और बाहर की ठंडी हवा ने मुझे राहत पहुँचायी। दूर-दूर तक फैली हुई सफेद धप्-धप् करती चाँदनी को देखकर जब मैं पलटकर लहालोट किरण को देखता तो जीवन के जाने कितने पक्ष उभर आते और मुझे ऐसा प्रतीत होता कि आग की लपटों से धू-धू करते इस कंगूरे से कूदकर यदि बाहर बहती हुई दूध की धार में समा जाऊँ तो शरीर के फफोले शांत हो जाएँगे। परंतु यह देखो, किरण ने मुस्कुरा दिया–‘आप बड़े परीशान जान पड़ते हैं!…हाँ, गर्मी बहुत है।…आइए, इधर बैठिए, मैं पंखा झल लेती हूँ।’ किरण ने सीलिंग में टँगे हुए पंखे की डोरी पकड़ ली। कुछ राहत हुई–कुछ लाज भी छूटी–कंठ से वाणी भी फूटी…। जाने क्यों वह रात बड़ी लंबी रही। मैंने चाहा, रात जल्द कटे। इसीलिए किरण को कहानी भी सुनाना शुरू किया–किरण को बड़ा मनोरंजन हुआ और अंत में उसने हँसते-हँसते कहा भी–‘बड़ी दिलचस्प कहानी है–ऐसी सुंदर माला को कौन न गले से लगाना चाहेगा! मेरी छाती से वह बराबर सटी रहेगी।’…

तुम भूल गए! तुमको भ्रम हो गया कि अजीत ने मुझसे शारीरिक प्रेम नहीं किया। अजीत के पत्र का तुम हवाला दे रहे–‘कहीं दुनिया यह न समझे कि अजीत और माला की आत्मीयता में शरीर की लिप्सा है–एक भूख।…’? मैं तुम्हें बतलाऊँ, तुम्हारे मर्यादावाद का बंधन नहीं होता तो अजीत बाबू कभी भी दूसरी ओर नहीं जाते, दूसरी वधू नहीं ग्रहण करते। क्या तुम्हें याद नहीं कि अजीत बाबू ने मुझको संबोधित कर कहा है, ‘मासूम बच्ची! मैंने तुम्हारा गला घोंट दिया–मेरे दामन पर खुदकशी के छींटे पड़े हैं।’ क्या बड़े भाई रामलाल की पत्नी के जोर से, अजीत बाबू, किरण को ग्रहण कर लेते? नहीं, इसमें तुम्हारा हस्तक्षेप है। हाँ, तुम्हारा हस्तक्षेप है। यों अजीत बाबू मेरे लिए बराबर छटपटाते रहे। यह तो संयोग की ही बात कही जाएगी कि किरण ने अजीत बाबू को बराबर बझाए रखा, मेरे प्रति भी स्नेह का भाव रखा। आज के जमाने में और आज की दुनिया में, ऐसा होना मुश्किल है। क्या तुम कहना चाहते हो, अजीत बाबू की, बड़ी बहन लता और माँ के सामने की, स्वीकारोक्ति–बहन के रूप में देखा है लता को और मुझको; शादी की कल्पना सपने में भी नहीं की? क्या इसे तुम अचेतन मन का आकस्मिक उच्छ्वास कहना चाहते हो? मित्र राजनारायण और बहन लता के कहने से अजीत बाबू, मेरे विवाह का प्रस्ताव (अरुणचंद्र से करने के लिए) लेकर आए पर मैंने तो उसे मृत्यु का प्रस्ताव ही समझा। भीतर से उनके विवाह-प्रस्ताव का कभी भी अनुमोदन नहीं किया। तुम शायद यह भूल गए कि भारत की रमणी एक बार जिसको हृदय दे देती है, फिर दूसरे को वह हृदय नहीं दे सकती, शरीर भले दे दे। मैं अरुणचंद्र को क्या हृदय दे पाई? अरुणचंद्र की धाय पन्ना बहुत समझाती रही, ‘जोगन’ बनने से काम नहीं चलेगा पर क्या उसके समझाने का मेरे ऊपर प्रभाव पड़ पाया? बड़ी बहन लता के विवाह के प्रस्ताव को अजीत बाबू ने ठुकरा दिया, लता बिगड़ गई, क्या मैं भी बिगड़ गई? बिगड़ी रही? मैंने फ्रायड के ‘टोटम’ (Totem) और ‘टेबू’ (Taboo) के बारे में सुना है। तुमने तो पढ़ा भी होगा इनके बारे में। पूरी पुस्तक ही है ‘टोटम एंड टेबू’ सिगमंड फ्रायड के द्वारा लिखित (Totem & taboo by Sigmund Freud) और इसलिए मैंने अजीत बाबू को प्रेमी के रूप में स्वीकार किया। मैं तुम्हारे ही द्वारा कहे गए वचन दुहराती हूँ ‘यह कैसा न्याय अजीत बाबू? यह कौन-सी दलील? हाँ, राम ने सीता को आग में खड़ा कर दिया। आप भी तो पुरुष हैं–राम की ही कड़ी की एक…।’

…मैं (माना) आग में खड़ी कर दी जाऊँ। यदि भस्म हो गई तो मेरे तेज में खोट है और सोने की तरह निखर कर निकल आई तो पवित्र हूँ, पवित्र?…आप यही न चाहते हैं–यही न?…तनिक भी दया न करेंगे–परीक्षा चाहते हैं? इस जाँच की यातना से नज़ात न देंगे क्योंकि सफाई चाहते हैं–एक गवाही भी? खूब! खूब!! अरुणचंद्र जी से शादी हो जाना मेरे लिए बहुत कुछ नहीं है। तुमने फ्रायड के ‘स्त्रियों का मनोविज्ञान’ (The Psychology of Women) नामक पुस्तक नहीं पढ़ी। फ्लुगेल (Flugel) के ‘परिवार का आत्मविश्लेषणात्मक अध्ययन’ (The Psychoanalytical Study of the family) को नहीं पढ़ा? बड़ी बहन लता ने अजीत बाबू को क्या-क्या नहीं कहा, मैंने क्या उसका विरोध नहीं किया? तुमने ही तो लिखा है कि शादी हो जाने पर ट्रेन में ‘एक लाल गठरी’ के रूप में रख दी गयी (या चढ़ा दी गयी?) मेरी छाती के घाव का टीसना क्या तुमने नहीं सुना? मैंने शादी करके अपराध ही किया। यह तो तुम्हीं ने मुझसे लिखवाया अजीत बाबू को संबोधित कर कि ‘यदि मैं आपसे क्षमा भी पा सकती हूँ तो आप मुझे क्षमा कर देंगे। आपकी नजरों में यदि यह एक बड़ा अपराध है तो अपराध ही सही परंतु मैं…मैं…।’ अजीत बाबू को संबोधित कराकर तुमने ही यह मुझसे कहलाया है ‘अजीत बाबू! मैं बहुत थक-सी गई हूँ। मेरी स्थिति उस वृक्ष की तरह है जो आँधी-तूफान के आघात से अपने डाल-पत्तों से बिछुड़ कर अकेला किसी मैदान में खड़ा हो। मुझे एक सहारा चाहिए–एक नीड़। इसकी जितनी जरूरत मैं आज महसूस करती हूँ उतनी कभी भी न की थी। मेरी यह आंतरिक इच्छा रहती है कि मैं आपके चरणों पर लोट जाऊँ और आप मेरे सर को सहलाते-सहलाते एक सहारा देते जाइए। फिर तो मैं इस भवसागर को पार कर जाऊँगी चाहे कितना भी आँधी-पानी आए–कैसा भी मौसम रहे। आपका चरण ही मेरा नीड़ होगा…आप तो जानते ही हैं…जीवन में मुझे कभी भी, कहीं भी, प्रेम न मिला–प्यार न मिला। कहीं मिला भी तो वह आपके ही साये में और जब वह घनी छाँव उठ गई तो मैं विधवा हो गयी–सचमुच विधवा। आप मेरे सुहाग को मुझे फिर लौटा देंगे? उस घनी छाँव तले फिर मुझे ठौर देंगे?’…

मेरे शुभैषी, मैं कृतज्ञ हूँ। तुमने मुझे सार्त्र (Satre) की लुलु के समान बेबस स्त्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जो एक नपुंसक के पल्ले बाँध दी जाती है और सती होने के नाते उसके साथ खुशी-खुशी जीवन व्यतीत करना स्वीकार कर लेती है। अरुणचंद्र के साथ तुमने मेरा गठबंधन कराया। अरुणचंद्र इलाहाबाद के ऑफिसर, सिविललाइंस के निवासी। गोद में पल्लव आया, सरिता आई। मुझको प्रसन्न रखने के लिए उन्होंने क्या नहीं किया? क्या उन्हें नपुंसक कहा जा सकता है? वह तो मुझको पढ़ना चाहते रहे, पढ़ते रहे मेरे भाग्य को, पर मेरे हृदय को पढ़ नहीं सके, मुझको छोड़कर चलते बने; पल्लव और सरिता को मेरे और अजीत के भरोसे छोड़कर। अजीत के प्रति कैसा स्नेह-भाव रहा! उफ्, जब-जब याद आती है, मन कैसा-कैसा तो हो आता है। तुमने अरुणचंद्र को वास्तव में, अरुण बनाया, आदर्श का गाढ़ा रंग चढ़ाया तब तो वह अपने बॉस के वश में रहे, बॉस की पत्नी का आज्ञोल्लंघन नहीं किया, हँसी-मजाक का खुलकर जवाब नहीं दिया।

लगता है, शरत् बाबू के साहित्य के तुम बड़े प्रेमी हो। शरत् बाबू भावुक उपन्यासकार माने जाते हैं, नारियों के महिमरूप के प्रतिष्ठाता, समाज के पीड़ित वर्ग के समवेदक, और न जाने क्या-क्या! इलाचंद्र जोशी ने तो उन्हें ‘कवि-प्राण होने पर भी वास्तविक जीवन का उपन्यासकार’ कहकर पुकारा है। संसार तथा भगवान के प्रति उत्तरदायित्व का बोध उनके साहित्य में खूब है; क्या तुमने मुझमें भी वही कुछ भरना चाहा। शरत् बाबू के उपन्यास पर आधारित फिल्म दिखलाई, शरत् का पूरा साहित्य अजीत बाबू के द्वारा उपहार में दिला दिया। क्या तुमने मुझे शरत् बाबू की राजलक्ष्मी, सावित्री, कमला (शिवानी) आदि के सहारे ही तैयार किया है? कह नहीं सकती, विद्रोह का अंश मुझ में भरने से कैसे चूक गए? ‘शेष प्रश्न’ और ‘विप्रदास’ की नायिकाओं का विद्रोह भाव तुम्हें प्रेरित क्यों नहीं कर सका? तुमने मुझे मूक क्यों बना दिया? विवशता की भी एक सीमा होती है? क्या आज के जमाने में भी पारंपरिक विचारों (Traditional thoughts) का वहन करना लाभदायक है। दकियानूसी भाग्यवाद के भरोसे बैठे रहना क्या युगोचित है? तुमने मुझे दैववादी क्यों बना दिया? संभव है तुमने नहीं भी बनाया हो, पर मैं तो अपने को ‘दैवाधीना कृता’ ही महसूस करती रही। माँ जब मेरी शादी के लिए तैयार हुई, क्यों नहीं अपने मन की बात कह डाली? लखनऊ के बालिका-विद्यालय के मंत्री और नगर के प्रसिद्ध वकील नवल प्रभाकर बाबू ने, विद्यालय में कन्फर्मेशन के क्रम में, जब घृणित प्रस्ताव–अपने को आबाद करने के लिए किया तो क्यों नहीं चप्पल चलवा दी? क्या तुम संयमी हो, आदर्श के पुजारी? क्या मुझे भी ऐसे अवसर पर संयम से काम लेना चाहिए? आदर्श की पूजा करनी चाहिए? मानती हूँ, चप्पल चला देने से मेरे चरित्र पर धब्बा लग जाता, पर इससे क्या? यह घुटन तो सहने को नहीं मिलती! बालिका-विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मिसेज शरण को बाद में सूचित करने और टीचरी से इस्तीफा देने से क्या फायदा?

मुझे अफसोस है, अजीत बाबू के साथ मेरा प्रेम मुखरित नहीं हुआ। काश, ऐसा हो पाता! मैंने महसूस किया, पतिदेव (अरुणचंद्र) ‘नेग्लेक्ट’ हो रहे हैं। उन्हें भी ऐसा भान हुआ ही होगा। मैंने अजीत बाबू के पास यह छिपकर क्यों लिखा कि ‘मैं नहीं चाहती कि उन (पतिदेव) का सपना टूट जाए। इसलिए मैं अपना पार्ट बड़ी खूबी से अदा कर रही हूँ। आशीर्वाद दें कि मेरा अभिनय सफल हो। आप ही तो नाटककार ठहरे।’…शायद कमजोरी के कारण। तुमने मुझे कमजोर बना दिया! सफेद साड़ी पहनती रही अपनी अन्यमनस्कता को प्रकट करने के लिए। अजीत बाबू के मित्र और बड़ी बहन लता के पति राजनारायण के पास उजली साड़ी पहनकर गई, शादी के बाद उजली साड़ी पहनती रही, पति अरुणचंद्र के बॉस मिस्टर भल्ला, उनकी पत्नी मिसेज भल्ला उजली साड़ी के लिए बोलते रहे, मैंने खुलकर कहा क्यों नहीं? साज-सिंगार को गले के लिए फाँस-फंदा समझा पर इसे जोरदार शब्दों में व्यक्त क्यों नहीं किया? गलदश्रु-भावुकता से पीड़ित मैं अजीत बाबू के पास पहुँची तो, पर इर्द-गिर्द के, अड़ोस-पड़ोस के लोगों, डॉक्टर साहब की पत्नी, पोस्टमास्टर साहब की बीबी की छींटाकशी से चुपचाप भाग क्यों आई? मैंने उन्हें मुँहतोड़ जवाब क्यों नहीं दिया? क्या स्त्रियाँ मुँहतोड़ जवाब नहीं देतीं? नहीं दे सकतीं? मुँहतोड़ जवाब पुरुषों के जिम्मे है? स्त्रियों का जन्म सहनशीलता को मूर्त करने के लिए हुआ है? पुरुष का जन्म स्त्रियों को सताने के लिए हुआ है, छलने के लिए हुआ है? ऐसा तो नहीं लगता। मैं तुम्हें कैसे बताऊँ, आज की नारी को सचेत होना चाहिए, मुखर होना चाहिए, अपने अधिकारों के प्रति, अपने बोधों के प्रति। तुम तो नवता के प्रति संवेदनशील भी हो फिर मुझको ऐसा क्यों नहीं बनाया? मेरी मनःग्रंथियों का स्वाभाविक रूप से विकास होने देते; मुझको समाज के, समय के प्रवाह में छोड़ देते किधर बहकर जा पाती हूँ, तटस्थ होकर मात्र देखते रहते। तुमने मुझे अपने हाथों की कठपुतली बना दिया, मुझे ही नहीं, मेरे साथ, मेरे इर्द-गिर्द रहने वाले औरों को भी; क्या तुम्हारे देखने में यह कोई गुनाह नहीं है?

माला


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Artist: Amrita Sher-Gil
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डॉ. स्वर्ण किरण द्वारा भी