मेरी कोटा-यात्रा (भ्रमण)

मेरी कोटा-यात्रा (भ्रमण)

सुनते हैं, साहित्यिकों में ‘प्रसाद’ बड़े ही प्रवास-भीरु थे। पर जब से मैं जोशी कॉलेज में हिंदी का अध्यापक हुआ, तब से कुछ यों कोल्हू के बैल वाला चक्कर शुरू हुआ कि यदि आज ‘प्रसाद’ जीवित होते, तो उन्हें भी मेरे घर घुस्सपन का लोहा मानना पड़ता। लेकिन, मेरे पूर्व जन्म का घुमक्कड़ -संस्कार बिल्कुल मर नहीं सका। उसमें अब भी वह चेतना थी, जिसके प्रबल आकर्षण से खिंचकर मैं कभी राँची पहुँच जाता, तो कभी कराची। और ज्यों-ज्यों दिन बीतते चले जाते थे, त्यों-त्यों मेरी अंतरात्मा अधिकाधिक व्याकुल होती चली जा रही थी। मन का पंछी कॉलेज के जीवन के पिंजड़े को तोड़ कर उन्मुक्त आकाश में स्वच्छंद विचरण करने के लिए पंख फटफटा रहा था।

कि ऐसे ही दिनों में, विधाता के अयाचित वरदान के समान, बेनीपुरी जी का एक पत्र पहुँचा, जिसका आशय यह था कि कोटा चलना होगा, अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन है। बिहार के प्राय: सभी गणमान्य साहित्यिक प्रतिनिधि के रूप में चलेंगे। पटना जंक्शन से एक पूरा डब्बा रिजर्व रहेगा। जल्द स्वीकृति दो।

बड़े दिनों की छुट्टियाँ आगमन का संदेश सुना रही थीं। मन कहीं उड़ जाने के लिए बेचैन हो ही रहा था। ऐसे ही समय में बेनीपुरी जी का पत्र क्या आया कि मानो भूख की ज्वाला से तड़पते हुए ब्राह्मण को किसी भारी-भरकम से यजमान का मधुर निमंत्रण मिला हो। फौरन् स्वीकार कर लिया और तदनुकूल उत्तर भी दे दिया।

यों तो आज कल सम्मेलन का रूप अत्यंत विकृत हो गया है। राजनीति के छल-छंदों से साहित्य का रंगमंच भी कुछ वैसा ही भ्रष्ट हो गया है, जैसे हमारे तीर्थ-स्थान; परंतु, फिर भी हमारे-जैसे कोरे साहित्यिकों के लिए ये सम्मेलन कुछ वैसा ही महत्त्व रखते हैं, जैसे बच्चों के लिए मेले या साधु-संतों के लिए कुंभ। और कुछ नहीं, तो महान साहित्यिकों के समवेत दर्शन-लाभ से ही हम अपने को कृतार्थ समझ लेते हैं। यद्यपि इन सम्मेलनों में अब ऐसे साहित्यिकों के दर्शन भी दुर्लभ होते जा रहे हैं।

दिसंबर का अंतिम सप्ताह और प्रभात का समय। बर्फ-सी ठंडी हवा मानो गरम-गरम कपड़ों के भी भीतर पैठ कर रोओं को छू रही थी। और भगवान् भास्कर के लिए मुँह दिखाना कठिन हो रहा था। आसमान के एक छोर से दूसरे छोर तक बादल छाए हुए थे और बूँदें लग रही थीं कि जैसे अब गिरीं, तब गिरीं।

पटना जंक्शन स्टेशन पर सबसे पहले जिस व्यक्ति पर मेरी दृष्टि पड़ी, वह थे श्री बेनीपुरी। उनके बाद मेरी आँखें दिनकर जी को ढूँढ़ने लगी। परंतु, बेनीपुरी जी ने यह कह कर उनकी ओर से एकदम निराश कर दिया कि किसी अनिवार्य कार्यवश उनका जाना संभव न हो सका। इतने में मंद-मंथर गति से चलते हुए जब सुधांशु जी दिखलाई पड़े, तब यह सोच कर मन में कुछ संतोष हुआ कि चलो, यदि सूर्य को बादलों ने छिपा लिया, तो क्या हुआ? चाँद की चाँदनी ही सही। रात तो मजे में कट जाएगी। परंतु, दिनकर तो दिखाई ही न पड़े और सुधांशु दिखाई देने पर भी यह कह कर कन्नी काट गए कि स्वास्थ्य ठीक नहीं।

एक तो साहित्यिक-यात्रा और वह भी दूर की, मन स्वभावत: यह चाहता था कि जितने भी अधिक व्यक्ति हों, उतना ही अच्छा। परंतु, एक मेरे ही सोचने से क्या होता? सब के सामने अपनी-अपनी परिस्थितियाँ थीं। आशा तो तब तक साथ देती रही, जब तक गाड़ी छूट नहीं गई। किंतु, जब गाड़ी छूटी और हमने अपने साथियों की संख्या पर ध्यान दिया तब जैसे संपूर्ण आकाश में केवल एक चंद्रमा दिखलाई पड़ता है, वैसे ही आँखें चारों ओर से घूम-फिरकर बेनीपुरी जी पर ही अटक जाती थीं, जिनका बिस्तर हमारे सामने ही लगा था।

दीर्घ काल के उपरांत ऐसा सुअवसर हाथ आया था, जब हम और बेनीपुरी जी कुछ दिनों के लिए एक साथ रहने जा रहे थे। एक साथ रहना, खाना, पीना, सोना और बातें करना। मैंने सोचा, अब जो संयोग उपस्थित है, उसको छोड़ कर जो नहीं आए, उनकी चिंता करना व्यर्थ है। और मैंने बेनीपुरी जी को देखा और बेनीपुरी जी ने मेरी ओर। फिर तो जैसे नए दिन के उज्ज्वल प्रकाश में बीती हुई रात का घना अंधकार विलीन हो जाता है, वैसे ही एक टूटे हुए स्वप्न की तरह पटना जंक्शन का स्टेशन पीछे छूट गया और कोटा-यात्रा की भावी सुखद स्मृतियों को लेकर हमारी वह जनता एक्सप्रेस धक्-धक् कर आगे चल पड़ी।

श्री कामेश्वर शर्मा ‘कमल’ का सुपरिचित मुखड़ा स्टेशन पर दिखलाई पड़ा था, परंतु पीछे यह मालूम हुआ कि वह उमानाथ जी को लेकर बाद में आएँगे। हाँ, छपरे के श्री सतीशचंद्र शर्मा भी हमारे साथ थे, जिन्हें हमने कुछ देर के बाद पहचाना। एक सज्जन और भी थे, जो हमारे साथ ही कोटा की यात्रा कर रहे थे और जिन्हें देखकर हम बार-बार इस भ्रम में पड़ जाते थे कि यह अपर ‘दिनकर’ कौन हैं? सूरत-शक्ल, हाव-भाव और बातचीत सब में एक विचित्र समानता। नया आदमी देखे, तो अवश्य धोखा खा जाए। और यह थे मुंगेर कॉलेज के प्रोफेसर कपिल। फिर तो आनंद आ गया।

एक के बाद एक स्टेशन छूटने लगे। उस बदली के दिन में, जब दिसंबर की सर्द हवा तेजी के साथ हमारे डब्बे की काँच की खिड़कियों पर सर टकराती थी, हरे-भरे खेतों के उस पार दोपहर ढलती जा रही थी। नदी, नाले और पुल सभी भागते नजर आते थे।

बेनीपुरी जी का उन्मुक्त हास्य डब्बे भर में गूँजने लगा। पान पर पान, सिगरेट पर सिगरेट, चाय पर चाय, हम पीते-पिलाते चले गए। और नाना प्रकार के साहित्यिक प्रसंग, कथा-कौतुक, आलाप-प्रलाप एवं वाद-विनोद का अटूट क्रम तब तक चलता रहा, जब तक निशा-नवेली काली चादर से अपने सारे शरीर को ढँक कर चली नहीं आई और हम खा-पी कर निश्चिंत हो निद्रा-देवी की मधुर गोद में ढुलक नहीं पड़े।

सुबह के जब चार बजे, तब टुंडला में हमारी नींद टूटी। वहाँ हमें गाड़ी बदलनी थी, अतएव हमलोग उतर पड़े। मुँह-हाथ धोकर चाय पी।

उस प्रभात को भी मेघों ने अपने सघन आवरण से बाहर निकलने नहीं दिया। आगरा फोर्ट में जब हम उतरे, तब दिन काफी निकल आया था, लेकिन ठंड कुछ इस तरह पड़ रही थी कि सारी दुनिया ठिठुरी-सी जा रही थी।

केवल कवि ही जन्मजात नहीं होते, नेता भी जन्मजात होते हैं। और हमारे दल को भी बने-बनाए नेता मिले, श्री बेनीपुरी। वह मस्त बुढ़ापा बेनीपुरी जी का कि लाख जवानियाँ भी देखें, तो शर्माकर सर झुका लें।

दलपति का विचार हुआ कि ताजमहल का आँगन देखते ही चला जाए। बस, फिर क्या था? एक ओर मधुर-मधुर बूँदा-बाँदी हो रही थी और दूसरी ओर हमारा दल सारे सामान को स्टेशन के प्रतीक्षालय में ही छोड़ आगरे की सैर के लिए निकल पड़ा।

आगरे का किला देखते-देखते बारह बज गए। संयोगवश हमारा गाइड भी ऐसा मिला कि हम खुश हो गए। ऐसी काव्यपूर्ण भाषा में वह वहाँ की हर वस्तु का वर्णन कर रहा था कि कभी-कभी तो हम यह भी भूल जाते थे कि हम बीसवीं सदी में हैं। करीब 60-70 फुट ऊँची और 10-12 फुट चौड़ी दीवारों से घिरा और लाल पत्थरों से बना हुआ यह किला, सच पूछिए तो, दिल्ली के लाल किले से भी भव्य और आलीशान है, ऐसा हमारे गाइड ने कहा।

इसके बाद हम उस जगत-विख्यात इमारत को देखने चले, जिस पर आज तक न जाने कितनी कविताएँ, कितनी कहानियाँ और कितने निबंध लिखे जा चुके हैं और फिर भी जिनका अंत नहीं होता। कविगुरु रवींद्र के शब्दों में जो ‘काल के कपोल पर अश्रु का एक बूँद जल है।’ ताजमहल–संगमर्मर की वाणी है, जिसे संसार से दूर, यमुना के तट पर, दो प्रेमी हृदय मौन-भाव से प्रकट कर रहे हैं। और आज भी उनकी भाषा चिर नवीन है।

लेकिन, मेरे-जैसा भी कोई नीरस व्यक्ति होगा, जो इतनी दूर से आकर भी ताजमहल के भीतर प्रवेश न करे और बाहर ही बाहर खड़ा रहे। सब लोगों ने घूम-फिर कर ताजबीवी के उस चाँदनी रात-से या साबुन की झाग-से रोजे का कोना-कोना देख लिया और मैं फाटक के उस विशाल पेड़ के नीचे खड़ा-खड़ा यह देखता रहा कि कैसे-कैसे श्रद्धालु प्रेमी जन उस इमारत की एक झाँकी-भर पाने के लिए न जाने कितनी दूर से वहाँ पहुँचते हैं और क्या संदेश लेकर घर लौट जाते हैं? बेनीपुरी जी सदल-बल ताज के भव्य प्रांगण में उसकी कला की एक-एक बारीकी पर गौर कर रहे थे और मैं सत्रहवीं सदी के उस प्रेम-स्वप्न में खोया-खोया एक विचित्र उदासीपन का अनुभव कर रहा था।

दिन ढलने लगा। मगर, मौसम ज्यों का त्यों था। ताजमहल से निकलकर हमारा ताँगा सीधे सिकंदरा की ओर बढ़ा। कैसा विचित्र संयोग? आगरे के किले ने यदि शाहजहाँ के अंतिम दिन कारागृह में बीतते देखा था, तो सिकंदरा ने सबसे प्रतापी मुगल-सम्राट अकबर को अपनी ही बनाई समाधि में सोये देखा। नगर के कोलाहल से बहुत दूर, आगरा और मथुरा के मार्ग पर खड़े, अकबर के समाधि-स्थल के प्रहरी-स्वरूप वे बड़े-बड़े गुंबद पुकार-पुकारकर जीवन की क्षण-भंगुरता का संदेश दे रहे थे और उनकी छाया में हमारे-जैसे सैकड़ों सैलानी और मस्त जीव आज भी उस पुकार को अनसुनी कर कल्लोल करते फिरते हैं और कहीं पत्थर की दीवारों पर, तो कहीं नीचे फर्श पर बिछे पत्थर के टुकड़ों पर अपना नाम खोद जाते हैं, ताकि लोग आएँगे, तो उनके नाम भी पढ़ेंगे। नाम की ऐसी पिपासा क्या सम्राट और क्या भिक्षुक, सबकी एक-सी रहती है। ऐसा ही एक ‘प्रेमा’ नाम हमने सिकंदरा के उस मकबरे के मुख्य मार्ग पर बिछे पत्थरों में दर्जनों बार अंकित देखा, जिसे अपने पैरों के नीचे कुचले जाने से बचाते हुए हम बारंबार मोह में पड़ जाते थे।

सिकंदरा के दिव्य दर्शन कर जब हम निकले, तब थकावट के मारे चूर-चूर हो गए थे। आसमान में बदली, जमीन पर ठंडी और तेज हवा, दिसंबर का महीना, आगरे का शहर और बिना खाए-पिए घूमना, घूमना, केवल घूमना। यह तो कहिए कि नए-नए ऐतिहासिक स्थानों को देखने की धुन ही कुछ ऐसी थी, जिसकी मस्ती में भूख-प्यास किसी को कुछ नहीं समझते थे। परंतु, जब सिविल लाइंस पहुँचे और सामने साहित्य रत्न भंडार का साइन बोर्ड देखा, तब पेट में चूहे कूदने लगे। सूर्यास्त होने में कुछ देर थी। हम अनायास महेंद्र जी के कमरे में दाखिल हो गए। और फिर तो मत पूछिए। हमारी वह आवभगत हुई कि मुरझाया हुआ चेहरा एक बार फिर खिल उठा। तमाम थकावट दूर हो गई। बेनीपुरी जी के ठहाकों से वातावरण की कठोर शीतलता में एक रंगीन तमतमाहट आ गई।

संयोग ऐसा बना कि आगरे से सम्मेलन के प्राण टंडनजी भी उसी गाड़ी से चल रहे थे, जिससे हम लोग। और प्रयाग के जो साहित्यिक उनके साथ जा रहे थे, उन्होंने टंडनजी के नाम पर एक पूरी बोगी ही रिजर्व करा ली थी। इस प्रकार वह बोगी एक प्रकार से हमारा साहित्यिक उपनिवेश बन गई, जिसमें हम सभी लोग साहित्य के नाम पर गर्व का अनुभव करते हुए मन ही मन टंडनजी की जय बोल पैर फैला कर लेट गए।

गाड़ी खुलने में अभी घंटे भर की देर थी। बड़ा ही मधुर और सरस वार्तालाप प्रारंभ हुआ। न जाने कितने दिनों पर सभी बंधु एक-दूसरे से मिले थे। कितने तो जीवन में प्रथम बार मिले थे। उमानाथ जी भी और कमल जी भी तब तक अलग थे। उमानाथ जी अपनी लच्छेदार भाषा में सम्मेलन का राजनीतिक तत्त्व मुझे समझाते ही रहे कि मैं ऊपर की बर्थ पर लेटा-लेटा झपकियाँ लेने लगा और चलती गाड़ी के पहियों से लोरियों का जो संगीत प्रस्फुटित हो रहा था, उसका आनंद लेता-लेता सो गया।

और जब 26 दिसंबर के प्रात:काल में मेरी आँखें तंद्रा के अलस भार से झुकी-थकी खुल पड़ीं, तब गाड़ी राजस्थान के शुष्क और पथरीले भू-भाग से चीखती-चिल्लाती सरपट भागी जा रही थी।

इस प्रकार हमारी यात्रा का पूर्व भाग निर्विघ्न समाप्त हो गया।

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आज तीन महीनों के बाद कोटा-सम्मेलन की इस अपूर्व यात्रा का स्मरण कर रहा हूँ। इस बीच में न जानें कितने मधुर प्रसंग काल के महाकाश में निमग्न हो गए और उनके साथ ही खो गए कुछ कटु अनुभव भी। अब जो शेष रहे हैं, वे दोनों से परे एक सुंदर-सुखद संस्मरण भर हैं। चलो, यह भी अच्छा ही हुआ।

यहाँ न तो सम्मेलन का संस्मरण लिखने बैठा हूँ और न यात्रा का आद्योपांत वर्णन ही। सम्मेलन की विभिन्न परिषदों से मैं उतना ही तटस्थ रहा, जितना ताजमहल से। मुख्य अधिवेशन के विशाल प्रदर्शन से ही मैं समझ गया कि यहाँ केवल बिजली की चकाचौंध ही है, देवालय में मंद-मधुर जलने वाली अगुरु आरती नहीं। मैं सम्मेलन में ढूँढ़ रहा था साहित्य की आत्मा को। और वहाँ दिखलाई पड़ रही थी हृदय-हीन भीषण-प्रतिमा पर रंग बिरंगी ज्योति किरणों की जगमगाहट। अत: मैं स्वभावत: सम्मेलन से दूर-दूर खिंचने लगा। पंडाल से बाहर जो कुछ दूकानें थी, मैं उन्हीं के सामने किसी कुर्सी या बेंच पर बैठा-बैठा ऊँघता होता और जब कभी किसी सीताराम चतुर्वेदी अथवा जयचंद्र विद्यालंकार का भाषण लाउडस्पीकर की विद्युत-तरंगों के द्वारा दहाड़ता हुआ मेरे कान के पर्दे को फाड़ने-सा लगता, तो चुपचाप वहाँ से चल कर अपने निवास स्थान पर पहुँच जाता और लंबी चादर तानकर सो रहता।

इसमें संदेह नहीं कि सम्मेलन की स्वागत-कारिणी-समिति का प्रबंध अत्यंत उत्तम था। समिति के अध्यक्ष श्री बुध सिंह वापना स्वयं सदैव विनम्र भाव से उपस्थित मिले।

भोजन की व्यवस्था भी अत्यंत सुंदर थी। पहले दिन तो निस्संदेह राजस्थान की मिर्ची की तेजी कानों को झनझना देनेवाली रही; परंतु, ज्योंही उन्हें हमारी मधुर-प्रियता एवं सरलता का परिचय मिला, त्यों-ही उनके पक्क और व्यंजन भी मधुर होने लगे और अंत में तो मधुर हो गए। नाना प्रकार के दिव्य पदार्थों का आस्वादन कर हम तृप्त हो गए। और सच पूछिए तो, सम्मेलन के पंडाल में पहुँच कर जो अवसाद, निराशा और विकुंठा के भाव उत्पन्न होते, वे तभी दूर होते, जब हम रस-भंडार के द्वार पर पहुँच जाते और अपनी रसना को उन सरल-स्वादिष्ट पदार्थों के उपभोग में व्यस्त कर देते, जो विशेषत: हमारे ही लिए निर्मित किए गए थे।

मैं ऊपर कह ही चुका हूँ कि सम्मेलन के रंग-ढंग देखकर मुझे उसमें तनिक भी दिलचस्पी नहीं रह गयी। वहाँ क्या हो रहा है और क्या नहीं? कौन-सा प्रस्ताव पास हो रहा है और कौन नहीं? अथवा कौन वक्ता बोल रहे हैं और कौन नहीं? इन सारी बातों से मुझे कुछ भी लेना-देना नहीं था। चुटकी भर सत्तू बीच में डाल कर जिस प्रकार पहले जमाने के बाबू लोग बटेरों को लड़ाया करते थे, ठीक उसी प्रकार आज के ये चंड-मुंड साहित्य-दिग्गज अपने छोटे-मोटे चेलों से डंड-बैठक करवाते हैं और उनमें जो सिर-तुड़ौवल होती है, उसका मजा लूटते हैं।

हम ढूँढ़ते थे वहाँ मैथिलीशरण गुप्त को, महादेवी वर्मा को, निराला को, पंत को और वहाँ का यह हाल था कि विराट् लाउडस्पीकर-बम-विस्फोट के सिवा और किसी का स्वर दिखाई ही नहीं पड़ता। पंडाल बड़ा ही सुंदर बना था, इसमें संदेह नहीं। हजारों बिजली-बत्तियाँ जब रात में जगमग करने लगतीं, तब तारों से भरे आसमान का सुंदर दृश्य स्मरण हो आता। मगर, साहित्य के चंद्रमा के बिना इतना विराट् आयोजन भी नीरस-निष्प्राण लगता। साहित्य का देवता अपने ही मंदिर से मानो निर्वासित था।

हाँ; कभी-कभी प्रभाकर माचवे दिखलाई पड़ जाते, तो कभी विष्णु प्रभाकर। सम्मेलन से दूर-दूर रहने वाले एक हम ही नहीं थे। भीषण भाषणों से ऊब कर चाय की चुस्की लेने पहुँच जाते थे डॉ. उदय नारायण तिवारी और पंडित वाचस्पति पाठक भी। इन लोगों से यदा-कदा मिलना तो मधुर रहता ही था, सबसे मधुर तो वह क्षण होता था, जब दो अपरिचित रूप, किंतु, चिर-परिचित हृदय अवाक् हो एक-दूसरे को देखने लगते थे और कभी बंबई, तो कभी नागपुर और कभी मुरादाबाद का साग्रह निमंत्रण प्राप्त होता था और बड़ी विवशता से उसे अस्वीकार करना पड़ता था।

संपूर्ण कोटा नगर में यों मेरा अपना कोई नहीं था और जिस एक को मैं अपना कह कर क्षणिक संतोष-लाभ कर भी सकता था, उससे जब मैं मिलने गया, तब हठात् विधि-विधान की निष्ठुरता विश्वास कर लेना पड़ा। हर्बर्ट कॉलेज के प्रोफेसर श्री रामचरण महेंद्र से बहुत दिनों का मेरा पत्र-परिचय था। परंतु, मेरे आने की उन्हें कोई खबर नहीं थी। और जब मैंने उन्हें ढूँढ़ निकाला भी, तब वह कोटा छोड़ने-छोड़ने को थे। सुदूर पंजाब में उनकी पत्नी मृत्यु-शय्या पर पड़ी थीं और वह मुझसे हँस-हँसकर बातें कर रहे थे। ऐसा था उनका धैर्य। कोई आधे घंटे में ही वह चले गए थे, परंतु उसी आधे घंटे में प्रतीत हुआ कि एक शीतल जल प्रवाह के सामने बैठा हुआ मैं रस के छींटों का आनंद ले रहा हूँ।

सबसे मजेदार तो कोटा का कवि सम्मेलन रहा। एक कवि होने के नाते लोग यह समझ रहे थे कि मैं कवि-सम्मेलन में अवश्य रहूँगा। परंतु, वहाँ का रंग-ढंग देख कर मुझे भारी संदेह हो रहा था; कि यदि मैं कवि-सम्मेलन में उपस्थित रहा, तो लोग धड़-पकड़ कर मुझे अवश्य कवि-सम्मेलन का सभापति बना देंगे। फिर तो मेरी इतने दिनों की साख ही मिट जाएगी। दूसरी बात यह थी कि मैं निशा-जागरण का अभ्यासी नहीं। 9 बजते-बजते ऊँघने लगता हूँ। इसीलिए फड़कते हुए मन और धड़कते हुए दिल को काफी समझा-बुझाकर मैंने कवि-सम्मेलन से दूर रहना ही अपने लिए श्रेयस्कर समझा। प्रात:काल प्रिय मित्र उमानाथ जी से ज्ञात हुआ कि सभापति महोदय बेतरह मेरी खोज कर रहे थे और सभापति बनाए गए थे, ‘आजकल’ के श्री देवेंद्र सत्यार्थी। मैंने मन ही मन प्रभु को उसकी असीम कृपा के लिए धन्यवाद दिया। श्री सत्यार्थी कवि-सम्मेलन के लिए सर्वाधिक सुयोग्य सभापति मिले। उनके ईषत् श्वेत-रेखांकित दिव्य स्मश्रु जाल एक ओर जहाँ कवींद्र रवींद्र का स्मरण दिला रहे थे, वहीं दूसरी ओर उनकी कविताओं में अटक से लेकर कटक और कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक का सारा भारतवर्ष बोल रहा था। मैं तो उनकी विपुल दाढ़ी के एक बाल से भी हलका पड़ जाता। फिर तो उनके कंधों से सदा झूलनेवाला एक कैमरा भी था।

केवल सम्मेलन के दृष्टिकोण से कोटा आना तो बिल्कुल निरर्थक होता, यदि राजस्थान का प्राचीन गौरव और उसके दर्शनीय ऐतिहासिक स्थान हमें आमंत्रित नहीं करते। और बिहार से इतनी दूर आकर हम उनका आमंत्रण अस्वीकार नहीं कर सकते थे। फिर तो हम कोटा नगर और सम्मेलन को छोड़ कर चल पड़े राजस्थान के अंतप्रदेश की ओर। पहले दिन रही चंबल की यात्रा। कोटा से प्राय: 50-60 मील दूर, चारो ओर पार्वतीय भू-भाग से घिरा हुआ। चंबल नदी में एक बाँध की योजना तैयार की जा रही है, जिससे इतनी विद्युत-शक्ति पैदा होगी कि कहते हैं, वह सारे राजस्थान की कायापलट कर सकती है। एक पूरी मोटर बस ही हमें मिली, जिसके पीछे-पीछे उस योजना को कार्यान्वित करने वाले सरकारी इंजीनियर भी हमारी सहायता को चल रहे थे। राजस्थान के उजाड़ और पथरीले प्रांत से हमारी गाड़ी लचकती एवं धूल उड़ाती हुई चल रही थी। चंबल नदी की उस विद्युत योजना को हम काव्य-प्रेमी जीव भला क्या समझें? यद्यपि इंजीनियर साहब उसकी एक-एक खूबी को अलग-अलग समझाने का प्रयत्न कर रहे। हम तो देख रहे थे चट्टानों को तोड़-फोड़ कर बहने वाली चंबल नदी की धारा का प्रखर वेग और उसका कल-कल संगीत, जो दूर से ही उस निर्जन घाटी को प्रतिगुंजित करता सुनाई पड़ रहा था। और हम देख रहे थे अतीत काल के वे मधुर-मोहक चित्र, जब एक-एक इंच जमीन के लिए राजपूत वीर अपने प्राणों की आहुति देते होंगे और जिनके बलिदानी रुधिर से यहाँ का एक-एक कण लाल है।

जब हम लौट रहे थे, तो रास्ते में एक प्राचीन मंदिर का भग्नावशेष दिखलाई पड़ा। यों तो वह ऐतिहासिकों और पुरातत्वज्ञों के अनुसंधान का विषय है, परंतु, हमारे जैसे साधारण व्यक्ति को तो इतना ही ज्ञात हो सका कि वह दसवीं या ग्यारवीं सदी का मंदिर रहा होगा। मुख्य मंदिर शिव का प्रतीत हुआ जिसके ऊपर पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़ों पर तमाम स्त्री और पुरुष के जोड़े का चित्र बना हुआ था। ऐसे चित्र दक्षिण-भारत के सभी प्रसिद्ध मंदिरों में पाए जाते हैं और उस मंदिर में दक्षिण की ही स्थापत्य-कला का समावेश हुआ-सा जान पड़ता है। मुख्य मंदिर से सटा हुआ जो एक दूसरा मंदिर है, उसमें त्रिदेव की विराट मूर्ति खंडित अवस्था में पाई जाती है। कहते हैं कि जब मुसलमानों ने राजस्थान पर आक्रमण किया, तब उन्हीं लोगों के द्वारा यह मंदिर ध्वंस कर डाला गया। आज तो इसके आसपास कोसों तक मनुष्य का आवास नहीं मिलता है। परंतु, खंडहर ही बतला रहे हैं कि किसी जमाने में यह स्थान बड़ा ही दिव्य, पवित्र और रमणीक रहा होगा।

उस दिन सूर्यास्त होते-होते हम कोटा लौटे। किंवदंती है कि ‘कोटया’ नाम का कोई भील सरदार था, जिसे मार कर तत्कालीन बूँदी नरेश के छोटे भाई ने वर्तमान कोटा शहर को बसाया था। आज का कोटा तो बिजली की बत्तियों, पानी कल, कोलतार से बनी सड़कों एवं ऊँचे सफेद मकानों से जगमगाता हुआ आधुनिक नगर हो गया है। परंतु, पुराना कोटा ऐसा नहीं रहा होगा। नगर से दो तीन मील की दूरी पर चंबल के किनारे आज भी कोटा-नरेश का राज प्रासाद वीरान-सा पड़ा उसकी याद दिला रहा है। और उसके आसपास प्राचीन कोटा के खंडहर भी दिखालाई पड़ते हैं। उनमें एक अधर में लटकी हुई विशाल चट्टान भी है, जो दर्शकों के लिए भयानक कौतूहल की सामग्री बन गई है। इसे देखकर सहसा प्रकृति की अनोखी कारीगरी पर दाँतों तले उँगली दबा लेनी पड़ती है। किस प्रकार यह चट्टान एक दूसरे चट्टान पर निरवलंब-सी टिकी हुई है, कुछ समझ में नहीं आता। नीचे सैकड़ों फीट गहराई में हर-हर करती हुई चंबल नदी की प्रखर धारा बह रही है और ऊपर यह पत्थर का टुकड़ा संसार के आठवें आश्चर्य के समान तिरछा लेटा हुआ ऐसा लगता है कि मानो अब गिरा, तब गिरा। मगर, आज तक वह एक इंच भी नहीं फिसला है, यद्यपि जमाने को करवट बदलते हुए सैकड़ों साल गुजर चुके हैं।

जिस राजस्थान को भारतीय इतिहास की लगभग दस शताब्दियों ने एक-एक कदम पर बनाया और बिगाड़ा है, उसे क्या इस भाग-दौड़ में देखा और समझा जा सकता है? कदापि नहीं। राजस्थान को भलीभाँति देखने के लिए महीनों चाहिए। लेकिन, हम तो आए थे सम्मेलन देखने के लिए और उसी में चाहते थे यह पुण्य भी लूट लेना। सो, जहाँ समाजशास्त्र-परिषद् में जयप्रकाश जी का भाषण समाप्त हुआ कि हमारे दल का तरुण रक्त घर लौट चलने के लिए अधीर हो उठा। यह तो धन्यवाद कीजिए बेनीपुरी जी का, कि जिनका अटल प्रोग्राम बूँदी जाने का बना और तब जो लोग घर लौट रहे थे, वे भी बूँदी की ओर चल पड़े।

चंबल बाँध की यात्रा में श्री देवेंद्र सत्यार्थी ने साथ दिया था बूँदी की यात्रा में वनस्थली के डॉक्टर सुधींद्र साथ रहे। सत्यार्थी जी के साथ थी उनकी दिव्य-भव्य दाढ़ी और रस की एक जीवित प्रतिभा। और डॉक्टर सुधींद्र के साथ थीं उनकी कविताएँ, जो रास्ते भर हमें आनंद देती रहीं।

नकली किले की लड़ाई के लिए बूँदी राजपूताने के इतिहास में प्रसिद्ध है। बूँदी का प्राचीन किला एक छोटी-सी पहाड़ी के ऊपर बसा हुआ है, जिस पर जाने के लिए चक्करदार रास्ता बना हुआ है। हमें तो इस शहर में कोई खास खूबी नहीं मालूम पड़ी, सिवा इसके कि यह कोटे से भी पुराना है। हाँ, पुराने टूटे-फूटे मकान और सूखे-सूखे जंगल एक उदासी का भाव प्रकट कर रहे थे। एक स्थान पर एक प्राकृतिक जल-धारा भी देखी, जिसे गोमुखी से निकाल कर शिवमूर्ति के मस्तक पर गिरा दिया गया है।

बेनीपुरी जी के सम्मान में कोटा के समाजवादी दल की ओर से एक सभा तथा उसके साथ कवि-सम्मेलन का आयोजन भी किया गया, जो काफी सफल रहा।

सम्मेलन समाप्त हो गया। बूँदी-यात्रा भी शेष हो गई। अब हमारे पास लौट जाने के सिवा और कोई कार्यक्रम नहीं था।

सुनने में आया है कि कभी किसी कैदी को जेल की दीवारों से इतनी ममता हो जाती है कि वह छुटकारा पाने पर भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। फिर तो कोटा-जैसा सुंदर नगर, नगर का वह गर्ल्स कॉलेज होस्टल और होस्टल का वह कमरा, जिसमें छ: दिन और छ: रातें हमने बिताईं–हम, बिहार प्रांत के नवरत्न। ऐसा संयोग क्या बार-बार मिलता है? सम्मेलन तो एक बहाना मात्र रहा। वास्तविक आनंद हमारे उस मधुर सहवास में रहा, जिसका मुक्त उपभोग हमने प्राय: एक सप्ताह तक किया। एक दिन उसी कमरे में एक छोटा-मोटा कवि-सम्मेलन भी हमने कर डाला, जिसमें सुधींद्र जी ने अपनी सुमधुर कविताओं की धारा बहा दी। और रातभर वह हमलोगों के साथ ही रहे। एक रात श्री वाचस्पति पाठक और डॉ. उदयनारायण तिवारी भी हमारे अतिथि रहे। जाड़े की लंबी, सर्द और ठिठुरी हुई रातों में जब हम नीचे फर्श पर ही बिछावन लगा कर एक किनारे से दूसरे किनारे तक थके-माँदे लंबे रहते और किसी दिन सीमित भोजन अथवा सीमित वस्त्रों में ही अपने मेहमानों की भी खातिरदारी करने का सुनहला अवसर पाते, तो कितनी खुशी होती थी? बेनीपुरी जी का वह मस्त दबंग पौरुष, जो दो-चार को कौन कहे, दस-बीस व्यक्तियों में उमड़ा-उछला पड़ता था और अपने विमुक्त हास्य-हिल्लोल से लगातार घंटों तक श्रोताओं को कुंठित किए रहता था, उमानाथ जी का वह धारा-प्रवाह चलने वाला अथक एवं कवित्त्वपूर्ण वाग्जाल, जिसमें एक बार फँसकर फिर निकलना एक अत्यंत दुष्कर कार्य है और कपिल जी का वह सरस-गंभीर विनोद, एक साथ ही त्रिगुण मिश्रित विचित्र संस्मरण क्या सहज ही विस्मरण किए जा सकते हैं? सच पूछिए, तो जब सब लोग कोटा से विदा होने की तैयारी में लगे थे, कोई बिस्तर बाँध रहे थे, तो कोई बाजार से सौदा खरीद रहे थे, तब मैं भीतर ही भीतर रोता-सा वहाँ की एक-एक दीवार से अपना मधुर संबंध माँग रहा था। होस्टल की क्यारियों में खिलने वाला एक-एक फूल मानो मुझसे पूछ रहा था, क्या चले ही जाओगे? और मैं जैसे अपनी विवशता पर आप ही पराजित-सा हुआ जा रहा था।


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