मुक्तक कवि कालिदास

मुक्तक कवि कालिदास

काव्य-प्रकार के प्रसंग में ‘मुक्तक’ का नाम आता है। मुक्तक नाम की सार्थकता इसी में है कि वह पूर्वापर-निरपेक्ष पद्य हो। यों तो महाकाव्य के असाधारण किंतु अनिवार्य बहुतेरे गुणों का उल्लेख कर चुकने के बाद उपसंहार इन्हीं शब्दों से हुआ है–

“वाग्वैदग्ध्यप्रधानेऽपि रस एवात्र जीवितम्”–वचन-रचना की प्रधानता रहने पर भी कवित्व का प्राण रस ही है, अत: मुक्तक के लिए भी ‘अग्निपुराण’ की यह चेतावनी महाकाव्य के समान ही समझी जानी चाहिए। कहें, तो सागर को गागर में भरने की विदग्धता मुक्तक में ही अधिक अपेक्षित रहने के कारण इसके निर्माण को क्लिष्टतर कह सकते हैं। यहाँ महिमा को अणिमा में समेटना पड़ता है; गरिमा को लघिमा में अक्षुण्ण रखने की साधना करनी पड़ती है। परिभाषा मुक्तक की अभिसंक्षिप्त है–

“मुक्तकं श्लोक एवैकश्चमत्कारक्षम: सताम्”–कि सहृदयों को चमत्कृत करने वाला एक ही श्लोक काव्य है; किंतु यह संक्षिप्तता तब विराट् बन जाती है जब श्लोक के चार चरणों में ही रस का सम्यक निर्वाह करना पड़ता है क्योंकि यहाँ उसकी सामग्री को उभार कर दरसाने के योग्य ‘कैनवास’ नहीं होता। फिर भी मुक्तक के सूक्ष्म शरीर में महान समारोह के साथ रस को प्रतिष्ठित करने वाले कविगण पाए जाते हैं। आचार्य आनंदवर्धन ने लिखा है–

“मुक्तकेषु हि प्रबंधष्विव रसबंधाभिनिवेशिन: कवयो दृश्यंते। यथाहि अमरुकस्य कवेर्मुक्तका: शृंगाररसस्यन्दिन: प्रबंधायमाना: प्रसिद्धा एव”–अमरुक की ही भाँति आगे चलकर पंडितराज ने प्रबंधायमान मुक्तकों की सृष्टि की है। और, भर्तृहरि, गोवर्धन आदि के संस्कृत तथा हाल के प्राकृत मुक्तकों के अतिरिक्त अपभ्रंश में मुक्तक रचना की चर्चा भी ‘ध्वन्यालोक’ में आई है–दंडी ने उक्त भाषाओं की परिभाषाएँ काव्यादर्श में दी हैं–यह सब मुक्तकों की विविधता, लोकप्रियता का ही परिचायक है।

मुक्तक और गीतिकाव्य

आधुनिक गीतिकाव्य मुक्तक काव्य का विवर्त हो सकता है पर उसी का एक रूप-विशेष नहीं। गीतिकाव्य के मूल में आत्मनिष्ठता का जो आग्रह अनिवार्य है वह मुक्तकों में सर्वत्र नहीं पाया जाता। और व्यक्ति चेतना की मार्मिक अभिव्यक्ति के अभाव में गीतिकाव्यत्व दुर्लभ है।

भरत ने लास्य के अंगों में ‘गेयपद’ का प्रथम उल्लेख किया है–

‘आसने चोपविष्टायां तंत्रीभाण्डोपवृंहितम्
गायनैर्गीयते शुष्कं तद् गेयपदमुच्यते’

ऐसा प्रतीत होता है कि कालिदास ने यक्ष प्रिया के इस मर्मस्पृक् चित्रण में भरतोक्त ‘गेय पद’ को ध्यान में रखा था–

“उत्संगे वा मलिनवसने सौम्य निक्षिप्य वीणां
मद्गोत्रांकं ‘विरचितपदं’ गेयमुद्गातुकामा
तंत्रीमार्द्रां नयनस लिलै: सारयित्वा कथंचिद्
भूयोभूय: स्वयमपि कृतां मूर्च्छनां विस्मरंती।”

निश्चय ही यह ‘गेय पद’ मुक्तक से गीतिकाव्य तक प्रसरणशील है।

यहाँ ऐसी आशंका न की जानी चाहिए कि किसी दृश्य-श्रव्य प्रबंध के अंतर्गत जो पद्य होते हैं उनमें परस्पर संबंध होता है अत: उनमें मुक्तकत्व की संभावना ही नहीं रहती। कारण, उन पद्यों में पार्यंतिक सापेक्षता अवश्य होती है; किंतु अनेक स्थानों में पूर्वापर प्रसंग के बोध के बिना भी शब्दार्थ के बोध में बाधा न होने तथा कहीं-कहीं रसास्वाद में भी किसी प्रकार के विघ्न की संभावना न रहने से मुक्तकत्व की उत्पत्ति होती है, क्योंकि आखिर मुक्तक से हमारा क्या तात्पर्य है? यही तो कि उसे पूर्वापर की अपेक्षा न हो और वह रस-चर्वणा का प्रयोजक अवश्य हो!

जैसे–

“यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीना–
माविष्कृतारुणपुरस्सर एकतोऽर्क:
तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां
लोको नियम्यत इवैष दशांतरेषु।”

एक ओर चाँद डूब रहा है और दूसरी ओर से अरुण केतन फहराता हुआ सूरज बढ़ता आ रहा है। इस प्रकार, एक ही समय में इन दो तेजस्वियों के उत्थान-पतन का भी कुछ विशिष्ट अभिप्राय है। वह जैसे एक सूक्ष्म संकेत है कि ऐसे ही सुख-दु:ख का चक्र चलता रहता है; कोई सूरमा हो या दुर्बल–उसके जीवन में भी एकरसता संभावित नहीं है; चढ़ाव-उतराव–जैसे यही गति की स्वाभाविकता है। इसमें भी सूक्ष्मतर व्यंजना है कि मानव-जीवन को पतन की घड़ियों में भी निराश न होना चाहिए–जैसे अभ्युदय में इतराना न चाहिए, क्योंकि किसी भी घड़ी दशाविपर्यय संभावित है। कालिदास के इस पद्य से, पूर्वापर प्रसंग के ज्ञान के बिना भी, संपूर्ण अर्थोपलब्धि होती है, अत: यह मुक्तक के गुणों से सहज आवेष्टित है। यह गीतिकाव्य भी है, क्योंकि इसके द्वारा वक्ता का भावोच्छवास अभिव्यक्ति प्राप्त कर रहा है।

भाव चाहे सुखात्मक हो, चाहे दु:खात्मक, जब वह उमड़-घुमड़ कर हृदय को ढँक लेता है, तब उसकी संपूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती। आंशिक अभिव्यक्ति कथनोपकथन किंवा कार्य-कलाप द्वारा होती है; किंतु निगूढ़ अंश वाणी प्राप्त करने के लिए मचलता रहता है, वही अनभिव्यक्त, (वार्तालाप या क्रियाकलाप द्वारा) अगूढ़ अंश गीतिकाव्य का विषय है। आपातत: जो दिखलाई नहीं देता; साधारणत: जो अनुमेय भी नहीं, वही भावाकुल हृदय का निरुद्ध उच्छवास गीतिकाव्य की सामग्री है। ऊपर का पद्य ऐसा ही है। इसी कसौटी पर निम्नलिखित पद्य को भी परखना चाहिए–

‘रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्
पर्यत्सुकी भवति यत् सुखितोऽपि जंतु:
तच्चेतसां स्मरति नूनमबोधपूर्वं
भावस्थिराणि जननांतरसौहृदानि।’

निश्चय ही यह निगूढ़तम की अभिव्यक्ति है। इसकी विशेषता यहीं समाप्त नहीं हो जाती कि वक्ता या बोद्धव्य की चिंता किए बिना भी यह स्वतंत्र रूप से अर्थ की व्यंजना में क्षम है, प्रत्युत यह मन के मंथन की सहजानुभूति को–अदृश्य-अस्पृश्य भावोच्छ्वास भाषा की सुंदरता में उलझा कर, द्रव को जमा कर, अरूप को आँखों के आगे खड़ा कर दिखला सकने की असाधारण सामर्थ्य के कारण ही गीति-तत्त्व से मुखरित है। कवि कहता है–सुंदरता की झाँकी लेकर या संगीत सुनकर सुख में आकंठ मग्न प्राणी भी जो उत्सुक-उद्भीव हो उठता है वह अवश्य ही अचेतनमन में चिर संचित किंतु तत्काल-विस्मृत किसी बिछड़े हुए के प्यासे प्यार की सुध में बेसुध हो-हो उठता है।

कवींद्र रवींद्र ने लिखा है कि कालिदास के काव्यों में धारावाहिक गति नहीं है। उनका प्रत्येक श्लोक संपूर्ण और स्वतंत्र है। प्रत्येक श्लोक स्वतंत्र हीरक-खंड की भाँति उज्ज्वल और सारा काव्य हीरक-हार के समान सुंदर देख पड़ता है। किंतु नदी की नाईं न तो उसमें कलकल ध्वनि है और न अविच्छिन्न धारा-प्रवाह ही।

कवींद्र की स्थापना का निष्कर्ष यह है कि संस्कृत में गीतिकाव्य की रचना हो ही नहीं सकती। कारण वह भाषा की अस्वाभाविकता बताते हैं। मैं समझता हूँ, जन-पदीय बोलियों या प्रांतीय भाषाओं में भावाभिव्यक्ति का प्रकार और है और परिमार्जित, सुसज्जित, शिक्षा-सापेक्ष भाषा–संस्कृत में और। कालिदास के शब्दों में पहली वनलता और दूसरी उद्यानलता है। अनगढ़ वन्य विकास जिस कारण आकर्षक है, नागरिक सुषमा का सलज्ज उभार उसी कारण नहीं। दोनों की सम-विषम तुलना पर यह उक्ति स्मरणीय है–‘ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया शमीलतां छेत्तुमृषिर्व्यवस्यति।’

गीति-काव्य और प्रकृति

कालिदास के काव्याह्वान का विस्तृत पट प्रकृति है। वह प्रकृति और मनुष्य के बीच रागात्मक संबंध स्थापित करने वाले कवि-कलाकारों में अद्धितीय हैं। नीले आकाश में उजले बादल चाहे जितने सुंदर हों; किंतु रूमझूम कर बरसते हुए काले-कजरारे बादलों और उन्हें अपने में घुला लेने को बावरे हुए नयनों के बीच जो एक अमूर्त स्पर्श है; रागात्मक अनुस्यूति है उसके स्रष्टा कालिदास हैं। कहना अनावश्यक है, गीतिकाव्य की प्रकृति के कितना अनुकूल है यह चित्र का संगीत-बंधन! प्रकृति की गति तथा सौंदर्य-चेतना के साथ भाव-सामंजस्य का निदर्शन संपूर्ण ‘मेघदूत’ है। स्वानुभूति की स्वच्छंद अभिव्यक्ति को काव्यात्मक प्रतिष्ठा प्रदान करना संस्कृत की परंपरा के प्रतिकूल है; किंतु प्रकृति के सप्राण आवेष्टनों के बीच मानवीय व्यापक भावनाओं की गीतितरंगों से वह आमूल अभिषिक्त है, इसमें संशय नहीं–

पर्याप्तपुष्पस्तवकस्तनाभ्य: स्फुरत्प्रवालोष्ठमनोहराभ्य:
लता वधूभ्यस्तरवोऽप्यवापु विंनम्रशाखाभुजबंधनानि।

ऋतु-परिवर्तन में वनस्पति जगत् के नवीन रूपों में मानव-जीवन से संबद्ध उपस्थिति रहती है। तिमिर तथा आलोक की आँखमिचौनी की भाँति यह मानवीय द्वंद्व-भावनाओं से हिलामिला होता है। यहाँ अपनी नवीनता में वसंत की भाँति निदाघ भी स्वीकृत है–

सुभगसलिलावगाहा: पाटलसंसर्गसुरभिवनवाता:
प्रच्छायसुलभनिद्रा: दिवसा: परिणामरमणीया:।

ग्रीष्म की उत्तप्त प्रकृति जैसे परिणाम में रमणीय हो गई है वैसे ही जीवन की जटिलताओं में भी मंगल का निविड़ भाव निगूढ़ रहता है।

कुसुमजन्म ततो नवपल्लवा:
तदनु षट्पदकोकिलकूजितम्
इति यथाक्रममाविरभून्मधु
द्रुर्मवतीमवतीर्य्य वनस्थलीम्।

यहाँ वसंत का जैसा क्रमिक उदय तथा अभ्युदय अंकित है वह जीवन में मधुमास की आभा के आभास, सुवास एवं उल्लास का भी वास्तविक क्रम है।

स्रा मंगलस्नानविशुद्धगामी
गृहीतपत्युद्गमनीयवस्त्रा
निर्वृत्त पर्जन्य जलाभिषेका
प्रफुल्लकाशा वसुधेव रेजे।

वर्षा की वारिधारा से अभिषिक्त हो चुकने के बाद खिले हुए काश-कुसुमों वाले शारद प्रकृति की सौंदर्य-गरिमा से उपमिता होकर पार्वती जो भावात्मकता ग्रहण करती हैं वह जड़-चेतन का छायातप-सा आलिंगन है; दो मेघ-खंडों को जैसे सतरंगी सुरधनु जोड़ रहा हो!

विश्रांत: सन् ब्रज वननदीतीरजातानि सिंचन्
उद्यानानां नवजलकणौर्यूथिकाजालकानि
गण्डस्वेदापनयनरुजा क्लांतकर्णोत्पलानां
छायादानात् क्षणपरिचित: पुष्पलावीमुखानाम्।

जंगली नदियों के किनारे-किनारे आप उगे जुही के गुच्छों को नन्हीं-नन्हीं बूँदों से सींचकर मेघ चुपचाप नहीं चला जाता, बल्कि वहीं फुलवारियों में फूल चुनती मालिनों के पसीने से तर मुखड़े पर अपनी ठंडी छाँह भी डालता हुआ हौले-हौले सरकता है।

इस प्रकार गीति-कविता का प्रकृति के साथ भावात्मक संबंध देखते ही बनता है। अवश्य इस संबंध के मूल में मानव की प्रकृति से साहचर्य-भावना ही रहती है और यह भावना ज्यों-ज्यों क्षीण पड़ती जाती है त्यों-त्यों गीतिकविता की संभावना भी कम होती जाती है।

(ऑल इंडिया रेडियो के सौजन्य से)


Original Image: Strawberry Thief
Image Source: WikiArt
Artist: – William Morris
Image in Public Domain
This is a Modified version of the Original Artwork

रूप-विधान तथा रस-व्यंजना में चंडीदास और विद्यापति विभिन्न प्रकृति के कवि हैं। राधा-कृष्ण को विभाव-रूप में प्रतिष्ठित करने और ‘रति’ भाव की अभिव्यंजना मात्र से दोनों सजातीय नहीं सिद्ध हो सकते। दोनों का अंतर कालिदास और जयदेव जैसा भी नहीं, कुछ और ही ढंग का है। यहाँ उसी को समझ लेना है। बहुज्ञता के व्यापारी एक ही साँस में कालिदास और रवींद्रनाथ के नाम लेने के अभ्यासी होते हैं; किंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं। दोनों दो प्रकार के कवि हैं, चित्रमय या नादात्मक अभिव्यक्ति आदि का साम्य फिर भी आकृतिगत (Technical) साम्य ही है,–प्रकृतित: दोनों दो हैं। कालिदास रूप-प्रधान कवि हैं और रवींद्रनाथ भाव-प्रधान। कालिदास रूप-सृष्टि द्वारा अरूप रस-भाव की व्यंजना करते हैं और रवींद्रनाथ रस-भाव के लिए रूप का सहारा लेते हैं। अंतत: कालिदास में चित्र और रवींद्रनाथ में संगीत की प्रधानता है। इन दोनों (चित्र और संगीत) में अधिक व्यंजकता किसमें रहती है, यह एक विवादास्पद अथच अप्रासंगिक विषय है, यहाँ इसे छोड़ ही देना होगा। दोनों के सामंजस्य में महाकवित्व निहित है, यह मान्यता मेरी नहीं। अनुभूति की विवशता है कि सैद्धांतिकता की उपेक्षा न करने पर भी, व्यवहार-दशा में सामंजस्य की लीपापोती में से किसी एक रंग की छनती हुई गहराई को–एक की प्रधानता को मैं अस्वीकृत न करूँ। तो मुझे यहाँ यही कहना है कि चंडीदास भाव-प्रधान कवि हैं और विद्यापति रूप-प्रधान। चंडीदास में संगीत की प्रधानता है और विद्यापति में चित्र की। गीतकविता की परंपरा में दोनों के ही गीत आते हैं; किंतु दोनों की रसानुभूति दो प्रकार की होती है। दोनों को सजातीय सिद्ध करना मैथिली के महाकवि विद्यापति को हिंदी के आदिकवि के रूप में समादृत करने जैसा ही आग्रहपूर्ण है। यदि विद्यापति की मैथिली आधुनिक मैथिली से भिन्न और आदिम हिंदी के सन्निकट है, तो यह बात चंडीदास की बंगला के बारे में भी उतनी ही सत्य है। पंद्रहवीं शताब्दी के मध्यभाग से यूरोप में ‘रिनेसाँ’ (Rebaissance) का–नव-जागरण का आरंभ माना जाता है जबकि यूनानी दार्शनिकों के स्वतंत्र चिंतन से प्रभावित होकर चर्च के अंध धर्म से विज्ञान के वस्तु-सत्य के संधान को अधिक स्पृहणीय समझा जाने लगता है और जिसकी परिणति विज्ञान प्रधान वर्तमान बौद्धिकता कही जा सकती है। ठीक उन्हीं दिनों हमारे देश में संत तथा भक्त कवियों की परंपरा मध्ययुग की संस्कृति को खाद देकर उर्वर बना रही थी कि जिसके स्वर्ण-सस्य के रूप में सूर-तुलसी प्रकट होने वाले थे, पाश्चात्य वस्तु-विज्ञान के आधुनिक विकास सामने रखने पर इसे मानना ही पड़ेगा। मैं यहाँ चर्च-धर्म और पौराणिक-धर्म की तुलनात्मक मीमांसा न करूँगा; किंतु यह कहे बिना भी मेरा वक्तव्य स्पष्ट न होगा कि हमारे देश में बौद्ध धर्म एक वैज्ञानिक दर्शन ही था जिसने मध्ययुग की संस्कृति की नींव हिला दी थी और जिसकी विभिन्न शाखाओं ने किसी न किसी रूप में हमारी मान्यताओं को निश्चित प्रभावित किया था। संक्षेप में, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश के साहित्य पर तो उसकी परछाईं देखी ही जा सकती है, संस्कृत के एक वृहत् भाग को भी उससे असंक्रांत नहीं माना जा सकता। कबीर और तुलसी बौद्धिक कवि ही कहे जाएँगे–एक दिशा में जयदेव और विद्यापति भी। पहले दोनों में सामाजिक बौद्धिकता और दूसरे दोनों में वैयक्तिक बौद्धिकता का विकास हुआ है। उसके विपरीत चंडीदास, सूरदास एवं मीरा का काव्य सहज हार्दिकता की उपज है। जयदेव और विद्यापति का काव्य हार्दिकता या अनुभूति-प्रवणता से कम और बौद्धिकता अथवा कल्पना-प्रवणता से अधिक उत्प्रेरित है, यह तर्क द्वार भी प्रमाणित किया जा सकता है और स्वाध्याय द्वारा अनुभव में भी उतारा जा सकता है। उसे अहार्दिक किंवा अनुभूति-शून्य तो कोई नहीं कह सकता क्योंकि यदि ऐसा होता तो गीतिकाव्य में उसके लिए ठौर ढूँढ़ना ही अशक्य हो जाता; किंतु वह तो गीतिकाव्य का आद्य शृंगार समझा जाता रहा है। अनुश्रुति है कि चंडीदास और विद्यापति का सम्मिलन हुआ था। मुझे तो यह तुलसीदास और मीराबाई के पत्र-व्यवहार के समान ही प्रतीत होता है। किंतु इस जनश्रुति की सदा से चर्चा होती आई है। “विद्यापति ठाकुर बंगदेशीय कवि चंडीदास के समसामयिक थे। एक बार वसंत काल में गंगातीर पर दोनों में साक्षात्कार भी हुआ था। उस भेंट की चार कविताएँ ‘वैष्णव पद कल्पतरु’ के 270वें पृष्ठ में देखी जाती हैं। ग्रियर्सन साहब लिखते हैं कि दो तो विद्यापति की है और दो विद्यापति के अनुगामी किसी बंगाली कवि की बनाई हुई हैं।” चंडीदास नाम के कई एक कवि हुए हैं। बहुत संभव है कि ‘कृष्णकीर्तन’ के निर्माता शृंगारी चंडीदास–जिसकी रचना विद्यापति से अधिक मेल खाती है–के साथ उपर्युक्त घटना घटित हुई हो; किंतु सहज प्रेम-तत्त्व के भावुक (Emotional) महाकवि चंडीदास और विद्या-वैभव-समृद्ध बुद्धिप्रधान (Intellectual) महाकवि विद्यापति का जैसा आंतर वैसा दृश्य है, उनके वहिर्मिलन की यह बात केवल कुतूहल उत्पन्न करके ही रह जाती है। विद्यापति ने उनके दर्शन का आग्रह प्रदर्शित किया हो तो इसका कारण ढूँढ़ना अनावश्यक है। किंतु श्री दीनेंद्रकुमार राय महाशय जिन शब्दों में इस प्रसंग की चर्चा करते हैं वह अवश्य विचारोत्तेजक है। श्री सतीशचंद्र राय एम. ए. महाशय तो बहुत बड़े भ्रम में पड़ गए हैं। उन्होंने ‘कृष्णकीर्तन’ वाले चंडीदास को ही वास्तविक चंडीदास समझ लिया है। तब उन्हें चौंक कर यह निष्कर्ष निकालना पड़ा है कि–“जहाँ विद्यापति ने भावोच्छ्वास और तल्लीनता की पराकाष्ठा दिखलाई है, वहाँ चंडीदास ने चोज-भरी उक्ति-प्रत्युक्तियों (Dialogues) से अपने काव्य में ऐसा एक अनूठापन भर दिया है कि उसकी तुलना ईसा की 16वीं सदी के पहले के बँगला-साहित्य में बहुत कम मिलती है। बंगाली जाति स्वभावत: भावोच्छ्वास-प्रवण होती है, और चंडीदास ने जयदेव के अतुलनीय गीति-काव्य के आधार पर काव्य लिखा है। फिर भी उनके काव्य में किसी कारण से भाव-प्रधान गीति-कविता की अपेक्षा कार्य-प्रधान नाट्यकला का ही अधिक नैपुण्य दीख पड़ता है। यह बंगला साहित्य के इतिहास में एक कठिन समस्या प्रतीत होती है।” इस विषय पर आगे–कृष्णकीर्तन–के प्रकरण में विस्तृत विवेचन किया गया है। अस्तु, श्री दीनेंद्रकुमार राय महाशय का मंतव्य प्रथम प्रस्तुत है :– कवि ने गाया है– “विकसित, पुष्प थाके पल्लवे विलीन, गंध तार लुकावे कोथाय?” कि खिला हुआ फूल तो भला कोंपलों में छुपा है पर उसकी गंध कहाँ छिपेगी? महाकवि चंडीदास की कविता के संबंध में यह बात शत-प्रतिशत सत्य है। उन दिनों आज कल के समान न यान-वाहनों की प्रचुरता थी और न देश-देशांतरों में जाना ही सहज साध्य था। रेल, मोटर, हवाई जहाज, टेलीफोन, रेडियो आदि विश्व के साथ मिलाने-जुलाने वाले किसी भी साधन का अभाव था। इतने पर भी उन्हीं दिनों चंडीदास की मधुर पदावली, देखते ही देखते, बंगदेश के एक छोर से दूसरे छोर तक छा गई थी। कीर्तनियाँ लोगों के ललित कंठ से गाई जा कर गाँव-गाँव, नगर-नगर में फैल कर बंगीय नर-नारियों के हृदय को आनंद-रस से आप्लुत करने लग गई थी। यह बात बिलकुल ही ठीक है कि चंडीदास को बचपन में अच्छी शिक्षा नहीं मिल सकी थी। रामी के साथ परकीया-साधना में प्रवृत्त हो कर उन्होंने सुमधुर कविता रचने की शक्ति अर्जित कर ली थी। किंतु फिर भी यदि संस्कृत भाषा में उनकी पैठ न होती तो बंग-साहित्य की उस शैशवावस्था में (विशेष कर तब, जबकि राष्ट्रीय जीवन में मुगलों की सभ्यता का प्रभाव अक्षुण्ण भाव से विराजमान था) स्वदेश-वासियों को यह ऐसा महार्घ रत्न दान कर सकना उनके लिए असंभव था। उनकी पदावली का पाठ करने से यह सुस्पष्ट रूप में ही प्रतीत हो जाता है कि न केवल संस्कृत भाषा में, प्रत्युत ‘भागवत’ में भी उनकी यथेष्ट पारदर्शिता थी। यदि उनकी कविता घुणाक्षर न्याय से लिख गई होती और ग्राम्य दोष से भरी-पूरी रहती अथवा उसमें दुर्बोध्य प्रादेशिक शब्दों की भरमार होती तो वैसी दशा में, उनके जीवन-काल में ही उनके कवित्त्व की ख्याति समूचे बंगाल में कभी भी नहीं फैल सकती थी, और इतना ही क्यों, वह बंगाल के भी बाहर, सुदूर मिथिला में प्रवेश कर मिथिला के राजकवि विद्यापति को तो किसी की भाँति मुग्ध न कर सकती थी। इस समय को काव्य-जगत् का महागौरवमय युग कह कर निर्दिष्ट किया जा सकता है। बंगाल में चंडीदास और बिहार में विद्यापति इन्हीं दिनों अपनी-अपनी भाषा के लालित्य और पदों के अतुलनीय माधुर्य से विद्वज्जनों के समाज को मुग्ध कर रहे थे। ये दोनों समसामयिक थे, इस विषय में तो संदेह के लिए अवकाश हो ही नहीं सकता। ‘पदकल्पतरु’ और ‘गीतकल्पतरु’ के कतिपय पदों के पढ़ने से यह सहज ही प्रतीत होता है कि दोनों कवि एक-दूसरे की कविताओं पर मुग्ध हो रहे थे। ऐसी दशा में यदि ये परस्पर परिचय के लिए व्याकुल होते थे तो यह स्वाभाविक ही था। चंडीदास विद्यापति की प्रतिभा के चाहे जितने भी बड़े पक्षपाती हों, किंतु वह इस दुराशा को तो क्षण भर के लिए भी अपने मन में स्थान नहीं दे सकते थे कि वह मिथिला पहुँच कर महाराज शिवसिंह के दरबार के राजकवि, सुपंडित, भाग्यवान विद्यापति के दर्शन कर चरितार्थ होंगे। क्योंकि दोनों की सामाजिक स्थिति में आकाश-पाताल का-सा अंतर था। एक यदि सर्व-जन-सम्मानित, सुविद्वान, धनवान, महाराज का प्रेमपात्र सुहृद् था, तो दूसरा गँगई-गाँव का रहनेवाला दरिद्र, पूजा-पाठ से जीविकोपार्जन करने वाला पुरोहित अथवा पौरोहित्य से भी प्रताड़ित, समाज में अपमानित, उपेक्षित, एक अछूत धोबिन का प्रेमी कह कर लांछित और सर्वसाधारण के व्यंग्यबाणों से जर्जरित था। किंतु इतने पर भी वे दोनों एक ही पथ के पथिक थे। राधा-कृष्ण का अपार्थिव प्रेम ही दोनों के काव्य का उपादान था। विद्यापति ने चंडीदास की कविताओं के भीतर से ही उनके हृदय के ऐश्वर्य का परिचय प्राप्त किया था। उनका समग्र दु:ख-दैन्य अथवा कलंक इस ऐश्वर्य की छाया छूने में भी समर्थ न था। इसी बीच विद्यापति के चंडीदास से मिलने का सुयोग जुट गया। गोस्वामी तुलसीदास जी के– ‘जाकर जा पर सत्य सनेहू, सो तोहि मिलय न कछु संदेहू।’ वचन के अनुसार विधाता ने ही उनकी इच्छा पूरी की। महाराज शिवसिंह को किसी राज-काज के सिलसिले में बंगाल जाना पड़ा। असल में उन्हें वर्द्धमान जिले के मंगलकोट नामक स्थान में पहुँचना था। विद्यापति भी चंडीदास से साक्षात्कार की कामना सँजोए किसी राजाधिराज के साथ सुदूर तीर्थाटन के लिए निकले हुए एक अकिंचन के समान (राजेंद्र संगमे दीन यथा याय दूर तीर्थपर्यटने) महाराज शिवसिंह के साथ सुदूर वर्द्धमान के मंगलकोट नामक ग्राम में उपस्थित हुए। किंतु वस्तुत: उनका उद्देश्य था चंडीदास का दर्शन; चंडीदास के साथ कविता की आलोचना। उन्होंने अवकाश के क्षण मंगलकोट में न बिताकर चंडीदास से मिलने की व्याकुलता व्यक्त की। और इतना ही नहीं, रूपनारायण नामक एक व्यक्ति के साथ चंडीदास के दर्शनार्थ चल भी दिए। ‘संगहि रूपनारायण केवल विद्यापति चलि गेल!’ इधर चंडीदास को मंगलकोट में विद्यापति के आने की बात कैसे मालूम हुई, यह कह सकना कठिन है। बहुत संभव है, कानोंकान यह संवाद उन तक पहुँच गया हो! कुछ भी हो, विद्यापति के दर्शनों की आशा से चंडीदास भी मंगलकोट की ओर चल पड़े। तभी वसंत की सुनहली दोपहरी में, गंगा के किनारे बरगद की ठंडी छाँह में, बंगाल और मिथिला के महाकवियों का चिरकांक्षित मिलन संभव हुआ। यों तो उनके उस मिलन के आनंद का अनुभव ही किया जा सकता है फिर भी प्राचीन काल की एक सुमधुर कविता के द्वारा उनके मिलन की घटना ने साहित्य-जगत् में भी स्थायित्व लाभ लिया है :– ‘समय बसंत, याम दिन माझ हि वटतले, सुरधुनी - तीरे, चंडीदास कविरंजन मिलल, पुलके कलेवर गीर! दुहुँ जन धैरय - धरइ ना पार! संगहि पनारायण केवल दुहुँक अवश प्रतिकार!’4 इसके बाद, जैसे दो विद्वान इकट्ठे होने पर शास्त्रीय आलोचना करने लग जाते हैं वैसे ही दोनों कवियों ने छुट कर रसालोचना की। यहाँ यह कहना तो अनावश्यक होगा ही कि इनकी आलोचना तैलाधार भांड या भांडाधार तैल के तुल्य शुष्क तर्कमात्र न थी। चंडीदास ने ‘रसतत्त्व’ के संबंध में प्रश्न कर कहा :– ‘कह विद्यापति इह रस कारण, लछिमा पद करि ध्यान’ विद्यापति ने भी ललितमधुर कविता में चंडीदास को ‘रसतत्त्व’ की व्याख्या कर सुना दिया, और अंत में– ‘भणे विद्यापति चंडीदास तथि रूपनारायण-संगे, दुहुँ आलिंगन करल तखन भासल प्रेम-तरंगे!’ इस मिलन-प्रसंग में बंगाल और बिहार के दो आदिकवियों की सहृदयता का एक उज्ज्वल दृष्टांत कविता में देखा जा सकता है। उन दोनों में से किसी ने भी इस मिलन के उपलक्ष्य में ‘रूपनारायण’ नामक एक नगण्य व्यक्ति के अस्तित्त्व की उपेक्षा नहीं की है। कहते हैं, विद्यापित नान्नुर जाकर चंडीदास के साथ कुछ दिन रहे थे। विद्यापति के साथ चंडीदास के इस मिलन को अविश्वास्य घटना कह कर कुछेक समीक्षक साफ उड़ा देना चाहते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कोई चोखी-अनोखी नई बात कहकर अथवा बहुत दिनों से चले आते हुए किसी सत्य को मिथ्या सिद्ध कर पाठकों को विस्मित-चकित कर देने का लोभ नहीं संवरण कर पाते। वे भाँति-भाँति के तर्कों की झोली झाड़ कर किसी न किसी नए तथ्य का आविष्कार करने बैठ जाते हैं। उन्हीं में से कुछ लोग चंडीदास और विद्यापति के मिलन की कहानी को जिस युक्ति से मिथ्या सिद्ध करने के लिए बद्ध-परिकर दिखाई देते हैं वह नितांत नि:सार है। उनका कहना है कि गान्नुर गंगातट से आठ कोस पच्छिम है और नान्नुर के पच्छिम की ओर से ही विद्यापति के आने की बात कही जाती है। चंडीदास यदि नान्नुर से पूर्व दिशा की ओर न गए होते तो गंगा के तीर पर बरगद की छाँह में विद्यापति से उनका मिलना संभव न होता! इससे यह प्रमाणित होता है कि दोनों कवियों के मिलन की बात काल्पनिक है–केवल कवि-प्रसिद्धि! परंतु इसके उत्तर में यह सत्य-तर्क दिया जा सकता है कि नदिया जिले के पश्चिम भाग में भागीरथी हैं–और भागीरथी का पश्चिम तट वर्द्धमान जिले में है, सबसे मज़ेदार बात यह है कि जिस नवद्वीप से नदिया जिले का नाम है, वह नवद्वीप ही भागीरथी के पश्चिम तट पर अवस्थित है। वस्तुत: इसका एकमात्र कारण है, भागीरथी की धारा की गति का बदल जाना। पाँच सौ वर्ष पहले जिस ओर से नदी बहती थी उस ओर से उसकी धारा का मुड़ जाना कोई असंभव बात तो है नहीं। इसके अतिरिक्त विद्यापति सुदूर मिथिला से बंगाल बैलगाड़ी या पालकी से, स्थलमार्ग से ही आए हों, इस प्रकार के अनुमान करने का कोई कारण नहीं दीख पड़ता। प्रत्युत विद्यापति ने जलमार्ग से यात्रा की होगी, इसी की अधिक संभावना है। कारण, उन दिनों वही पथ अधिक सरल-सुगम था। फलत: दोनों कवियों का गंगातट पर मिलना कोई अशक्य व्यापार नहीं हो सकता। हमारा विश्वास है कि सुप्रतिष्ठित सत्य को अनुमान के जादू द्वारा उड़ा देने की चेष्टा से वाग्विभूति का प्रदर्शन करने पर प्राय: यही होता है कि साधारण जनों का दीर्घकाल से चला आता हुआ रहा-सहा विश्वास भी नष्ट हो जाता है और नहीं तो उससे कुछ नया प्राप्त हो सकने की संभावना तो रहती नहीं।” राय महाशय की इस समीक्षा में कुछ विचित्रता है। चंडीदास के प्रति भक्ति का अतिरेक ही कदाचित् इस विचित्रता का बीज हो! राजकवि विद्यापति से साधक कवि चंडीदास इसलिए मिथिला में नहीं मिल सकते थे कि दोनों की सामाजिक स्थिति में आकाश-पाताल का-सा अंतर था, यह युक्ति तो कुछ जँचती नहीं। कारण, यदि विद्यापति दरबारी कवि मात्र थे, तो चंडीदास को उनसे मिलने का आग्रह क्यों था? और यदि वह ‘दरबार’ से ऊँचे उठे हुए थे–तब तो चंडीदास के लिए यह सामाजिक वैषम्य अधिक आपत्तिजनक नहीं हो सकता था। सच तो यह कि चंडीदास की महत्ता से स्वयं विद्यापति प्रभावित थे और, यदि दोनों का सम्मिलन सचमुच ही संघटित हुआ, तो वह निश्चित रूप से उसी का परिणाम भी था। चंडीदास को विद्यापति के भौतिक ऐश्वर्य ने अभिभूत नहीं किया था।5 दूसरी बात, राय महाशय परंपरा के पूर्ण पक्षपाती हैं इसलिए इस मिलन-कल्पना को तर्कों से प्रमाणित करने में नहीं चूकते, तर्क अपने तईं चाहे जैसे हों। गंगा का किनारा कट सकता है, धार पलट सकती है,–भौगोलिक व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर भी उपस्थित हो सकता है कि भवभूति की भाषा का सहारा लेकर कहना पड़े– पुरा यत्र स्रोत: पुलिनमधुना तत्र सरितां विपर्यासं यातो घन-विरल भाव: क्षितिरुहाम् बहोर्दृष्टं कालादपरमिव मन्ये वनमिदं निवेश: शैलानां तदिदमति बुद्धिं द्रढ़यति। किंतु चंडीदास-विद्यापति की काव्य-प्रकृति के आंतरिक वैसा दृश्य की ओर जैसा संकेत पहले किया जा चुका है और जो उनके सामाजिक वैषम्य के कारण भी न केवल अभिव्यक्ति-पक्ष में किंतु अनुभूति-पक्ष में भी सुस्पष्ट प्रतीत होता है,–उसमें अंततोगत्वा तात्त्विक विभेद नहीं, एकता ही है,–‘चंडीदास-विद्यापति-सम्मिलन’ का यही अर्थ मैं समझता हूँ। ऐतिहासिक समकालिकता की सिद्धि मात्र नहीं।