नयी वर्षा-नया जीवन

नयी वर्षा-नया जीवन

बरसात क्या आ गई गाँव में नया जीवन आ गया है। कोई टाट के थैले की तिकोन ‘घोमची’ ओढ़ कर और कोई अपने शरीर पर के कुरते और बंडी को भी उतार कर, बरसते पानी मैं अपने-अपने काम में संलग्न हो उठे हैं। उनके शरीर में एक नवीन स्फूर्ति, चेहरे पर ‘सुर्खी’ और पावों में एक अजीब ‘गति’ आ गई है। उस जवानी में भी बूढ़े से दीख पड़ने वाले किसान ने दिनों से दो जून खाना नहीं खाया है लेकिन पानी का स्पर्श पाकर, अपने सारे दुख-दरद भुला, वह बड़ी मस्ती से एक गीत की कड़ियाँ आलाप उठा है। वह अपने आगे डोर से बँधे दो बैल लिए जा रहा है और उसके पीछे साहुकार के कर्ज की डोर से बँधा स्वयं उसका जीवन चल रहा है। लेकिन उसे खुशी है कि इन दो पाशविक बंधनों के बीच भी वह एक ‘जिंदा-आदमी’ है। ‘आदमी’,–जिसकी ‘आदमियत’ और ‘हँसने और गाने’ की आजादी को उससे कोई नहीं छीन सकता।

पानी के गिरते ही पानी की ही तरह तरल और सरल बच्चे उसका स्वागत करने के लिए मचल उठे हैं। मानो इस घरौंदे जैसे घर के जीवन से वे ऊब उठे हों। उन्होंने मन ही मन कुछ निश्चय किया, और कोई अपने माँ-बाप की निगाह छिपाकर और कोई उनके सामने से निकल भागकर, बंधनों की तरह, अपने शरीर पर से सारे वस्त्रों को भी उतार फेंककर, खुले आसमान के नीचे, ‘प्रकृति’ से, प्रकृति की ही तरह, खुले मुक्त स्वरूप से मिलने के लिए जा दौड़े। रास्ते में मिलने वाले पानी के बड़े ‘डबरों’ को वे पाँव मारकर ऊपर की ओर उछालते हैं। मानों ऊपर से गिरने वाली बूँदों की तरह, नीचे से भी बूँदों को ऊपर की ओर उछालकर इन दोनों अवस्थाओं के बीच भींगने में, वे एक विशेष आनंद पा रहे हैं। गलियों में जहाँ-जहाँ से भी पानी की धारा जरा तेज होकर बह निकली है, बच्चे पानी की उस धारा के साथ दूर-दूर तक गलियों के चक्कर काट रहे हैं। और उनमें से कुछ अपनी ही जगह पर गोल घूम-घूम कर तालियाँ बजाते हुए गा रहे हैं–
“पानी बाबा आओ रे।
ककड़ी भुट्टा लायो रे।”

आइए, अब जरा खेतों की ओर भी चलिए। देखिए, गर्मी में किसान ने इस वृक्ष को काट कर फेंक दिया था और यहाँ एक ‘ठूँठ’ भर बाकी था। आज पानी का स्पर्श पाकर उसकी बगल से कुछ ‘कोंपलें’ फूट आई हैं। कैसा अद्भुत दृश्य है। मानो मृत्यु में से ‘जीवन’ मुस्करा रहा है। और इधर देखिए इस झाड़ को सूखा समझकर लोग इसकी लकड़ियाँ तोड़कर जलाने के लिए ले जाते थे। लेकिन आज तो, वह भी हरा-भरा हो उठा है। और वह ‘जंगल’ जो कल तक अपनी प्रत्येक सड़ी पीली पत्ती को उतार फेंकने में हल्कापन महसूस कर रहा था, वर्षा के आते ही ‘चिकनी कोमल हरी पत्तियों’ से भर उठा है। वृक्ष ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानों नख से सिर तक शृंगार किए हों। और ‘लताएँ’ मानों अपनी ही कोमलता से, ‘लचीली’ और ‘लजीली’ हो, वृक्ष का सहारा पाने के लिए लालायित-सी नजर आ रही हैं। कोई उनकी डाल पकड़कर समकक्ष-सी खड़ी दीखती है और कोई अपनी ‘टहनियाँ’ फैलाकर सारे वृक्ष पर छाते हुए प्रगाढ़ आलिंगन करती-सी प्रतीत हो रही है। हवा के एक सर्द झोंके ने ‘दो पक्षियों’ को वृक्ष की एक डाल पर नजदीक लाकर बैठा दिया है। सामने से एक हिरण छलाँगे मारता हुआ चला गया और बगल से वह खरगोश एक ‘झाड़ी’ से निकल दूसरी में छिपते हुए, मानो यह चुनौती दे रहा है कि अब ढूँढ़ों तो जाने। कैसे जीवनस्पर्शी दृश्य हैं ये!

और इस धरती को क्या हो गया है। जिधर देखिए उधर हरियाली ही हरियाली नजर आ रही है। यह धरती की वही मिट्टी है, जिसे गरमी में मुट्ठी में लेने से वह छार-छार होकर बिखर जाती थी। और पानी गिरते ही जिसे हमने कीचड़ बनाकर कुचल डाला है। जैसे आज उसमें जादू हो गया हो। आज तो उसका कण-कण हरी दूब या घास का स्वरूप ले फूट निकलना चाहता हो। खेतों-मैदानों में, गढ़ों-कंदराओं में, नदियों की कगारों से पर्वतों के उच्च शिखरों तक पर सर्वत्र हरियाली लहरा रही है। गाँधीजी ने कई बार कहा था कि सत्य के साधक को ऐसा ‘नम्र’ होना चाहिए कि एक ‘रजकण’ भी उसे कुचल सके। लेकिन आज तो ये रजकण भी नम्रता की पराकाष्ठा पर पहुँचना चाहते हैं। आज तो उनमें का प्रत्येक कण नम्र मृदुल हरी दूब का स्वरूप ले, अपने कुचलने वालों का भी पैर सहला रहे हैं।

बचपन में पढ़ा था कि ‘धरती’ ‘पानी’ पर तैरती है लेकिन आज देखता हूँ कि धरती पर ‘समुद्र’ तैरता है। आकाश में छाए ये पानी से भरे घने काले-मेघ गहरे काले समुद्र की ही तरह तो दिखाई देते हैं। जब ये जमकर बरस जाते हैं तो ‘धरती और पानी’ का भेद मिट जाता है। एक और आनंद देखिए। गर्मी में जो धूल के कण, आवारा बनकर आकाश में छा गए थे, पानी की बूँदें उन्हें बड़े स्नेह से अपनी गोद में लेकर धरती की ओर ला रही हैं।

पानी स्वयं उनके स्पर्श से ‘मटमैला’ बन चुका है। लेकिन कितना रहस्य समाया हुआ है उस स्नेह मिलन में। इसके बाद ही तो धरती ‘उर्वरा’, आकाश ‘निर्मल’ और पानी की बूँदें मोती की तरह ‘उज्ज्वल’ हो उठती हैं।

यह देखिए आजकल तो प्रकृति भी आपके साथ ‘धूप-छाँह’ का खेल खेलना चाहती है। आप जरा सभ्यता का मिथ्याभिमान और बचाव के कृत्रिम साधन छोड़कर बाहर निकल आइएगा। आप बाहर निकले नहीं कि बादल का काला टुकड़ा आकर आपको भींगा जाएगा। किसी ऊँचे से टीले पर खड़े होकर आप बादल को अपनी ओर आते, अपने को भीगते, और सामने से होकर उसे निकल जाते देख सकते हैं। लेकिन इससे आप घबराइएगा नहीं, इसके कुछ ही क्षण बाद ‘सुनहरी धूप की एक चादर’ आकर पुन: आपको सुखा जाएगी। पशु-पक्षी भी इससे खेलने में आनंद ले रहे हैं और आप आदमी हैं कि इससे भागना चाहते हैं।

ये बौनी के दिन हैं, गाँव के सबसे खुशनुमा दिन। आज प्रत्येक ‘घर’ आम के नए पत्तों से सजाया गया है। किसान स्वयं स्नान कर और अच्छे कपड़े पहन कर सिर पर मंगल सूचक पगड़ी बाँधकर खेत जाने को तैयार हो रहा है। स्त्रियाँ भी स्नान-शृंगार कर उनके पीछे हो चली हैं। बैलों को घंटिया बाँधकर सजाया गया है। और चलने से पूर्व इन सब को आरती कुंकुम से सजाया जा रहा है और इस तरह सज-धज कर, शगुन के मंगल-घट ही नहीं, पानी से भरे बादलों के दल के दल लिए किसान खेतों में फसल बोने जा रहे हैं। आज उसे अपने कपड़े भीगने का डर नहीं है, बस खेत से भीगकर आना वह अपना सौभाग्य समझता है। देखिए ‘पुरुष’ अपने हाथ में बोने का ‘तियन’ लिए हुए है और ‘स्त्री’ अपने आँचल में ‘अनाज के दाने’ लेकर ‘बीज’ ‘बो’ रही है। खेतों में ‘फसल की प्राण-प्रतिष्ठा’ का यह मुहूर्त है। और सबके चेहरों पर एक नई जिंदगी छा गई है। कहा न आपसे कि ‘वर्षा’ क्या आ गई है, गाँव में एक ‘नया जीवन’ आ गया है।


Image: Landscape with Rainbow
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Artist: George Henry
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