पं. माधवराव सप्रे का व्यक्तित्व और पत्रकारित्व

पं. माधवराव सप्रे का व्यक्तित्व और पत्रकारित्व

मध्यप्रदेश की साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक जागृति के प्रथम प्रहर में पं. माधवराव सप्रे का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। यद्यपि आपका जन्म मध्यप्रदेश के उत्तर भाग में सागर जिले के एक छोटे-से ग्राम पथरिया में सन् 1871 में हुआ था, आप अपने अध्यवसाय और प्रतिभा के बल पर समस्त प्रदेश और देश में विख्यात हो गए। आपने बी.ए. उत्तीर्ण कर एल.एल-बी. पढ़ना भी प्रारंभ किया था, पर देशसेवा की अंत:प्रेरणा इतनी प्रबल थी कि न तो आपने कभी उस समय में महज सरकारी नौकरी का विचार किया और न वकालत का धंधा कर धन कमाने का। महाराष्ट्र के चिपलूणकर, लोकमान्य तिलक, आगरकर का आदर्श आपकी आँखों के सामने झूलता रहता था। यदि ये महानुभाव पत्र, लेखन और भाषण के द्वारा अपनी सोई हुई जनता को जगाने का कार्य कर सकते हैं, तो मैं क्यों न इन्हीं का अनुकरण करूँ? क्यों विदेशी शासकों के चरण-चुंबन करूँ? क्यों कचहरी के दरवाजे जाकर वकालत का व्यवसाय करूँ? तिलक की वाणी ‘केसरी’ में गरज रही थी। भारतीय तारुण्य उसे सुन-सुन कर फड़क उठता था। एक ओर गुलामी के चमचमाते हुए सिक्के थे, दूसरी ओर आजादी का कारावास और फाँसी का तख्ता दिखाने वाला मार्ग था। सप्रे जी ने दूसरा, कष्ट-सहन का, मार्ग ग्रहण किया। सबसे पहले अपने जीवनक्रम को बदलने का आपने संकल्प किया। सादा भोजन, मोटा वस्त्र और कष्ट सहन करने का आपने व्रत लिया। चटकती धूप और बरसते पानी में आप नंगे पैर और बिना छाते के बराबर चलते और प्रसन्नता से जन-सेवा का कार्य करते।

आपने देखा कि जनता में साहित्यिक और राजनीतिक भावनाओं को भरने के लिए सामयिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आवश्यक है। अत: आपने छत्तीसगढ़ को अपना कार्यक्षेत्र चुना और वहाँ के प्रमुख नगर रायपुर से सन् 1903 में ‘छत्तीसगढ़-मित्र’ लेकर जन-सेवा के लिए कटिबद्ध हो गए। ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में केवल सामयिक प्रसंगों की ही चर्चा नहीं होती थी, वरन् उसमें साहित्यिक प्रवृत्तियों का भी दिग्दर्शन होता था; लेख, कविताओं का भी प्रकाशन होता था। हिंदी के प्रसिद्ध लेखक उसमें लिखने में अपना गौरव समझते थे। स्वयं आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी भी यदा-कदा उसमें अपनी कृतियों को भेजते थे। यह वह काल था, जब मध्यप्रदेश सबसे पिछड़ा हुआ प्रांत समझा जाता था। सन् 1888 के पूर्व तो यहाँ कोई सामयिक पत्र निकलता ही नहीं था। सन् 1888 में केवल तीन पत्रों का प्रांत में अस्तित्व उल्लेखनीय है! एक है ‘विक्टोरिया-सेवक’ जो जबलपुर से प्रकाशित होता था, दूसरा ‘सरस्वती-विलास’ जो नरसिंहपुर से और तीसरा ‘सी.पी. न्यूज’ जो नागपुर से निकलता था।

प्रथम दो पत्र हिंदी के हैं और अंतिम पत्र अंग्रेजी का। इस समय देश में हिंदी की पत्रकारिता विशेष उन्नत नहीं थी। फिर भी युक्तप्रांत, बंगाल, आदि स्थानों से कुछ प्रतिष्ठित पत्र निकलने लग गए थे। प्रयाग से ‘सरस्वती’ भी हिंदी साहित्य-प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। जब ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन इस प्रदेश से हुआ तो प्रांत में नवीन साहित्यिक और राजनीतिक चेतना का उदय हुआ। पर प्रारंभिक कालीन पत्रों की जैसी स्थिति होती थी, वही स्थिति इस पत्र की भी हुई, आर्थिक संकटग्रस्त होकर यह पत्र बंद हो गया। पर जिसके हृदय को जन-सेवा की लगन जोर से झकझोर रही हो उसे विघ्न-बाधाओं से निराशा कदापि नहीं होती, प्रत्युत बल ही प्राप्त होता है। आपने नागपुर से 1906 में ‘हिंदी केसरी’ को जन्म देकर लोकमान्य तिलक के विचारों को हिंदी-भाषा-भाषी जनता में प्रचारित करने का पुण्य उपक्रम किया। आपके साथ इस समय पं. लक्ष्मीधर बाजपेयी, जिनका हाल ही स्वर्गवास हो गया है, पं. जगन्नाथप्रसाद और श्री गंगाप्रसाद गुप्त भी सहयोग दे रहे थे। ‘हिंदी केसरी’ की गर्जना ने प्रांत ही नहीं, समस्त हिंदी-जगत को स्फूर्ति से भर दिया। ब्रिटिश सरकार ‘केसरी’ की गरज से चौंक उठी। वह उसे हर कीमत पर बंद करना चाहती थी। अत: उसके संपादक सप्रे जी पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें सजा भी हो गई। तीन महीने जेल-यातनाएँ सहने के पश्चात् सप्रे जी किन्हीं कारणों से सशर्त छूट आए। उनके इस कार्य से जनता ने कुछ समय तक उन पर अविश्वास किया और ब्रिटिश सरकार ने तो उन पर कभी भी विश्वास नहीं किया। उसे शक था कि सशर्त छूटना भी आपकी एक कूटनीतिज्ञता थी। पर्दे की आड़ में आप सदैव क्रांति का संदेश सुनाते रहे। प्रदेश का ऐसा कोई साहित्यिक या राजनीतिक कार्य न होता जिसमें आपका अप्रत्यक्ष सहयोग न मिलता हो। यह सत्य है कि जेल से छूटने पर ग्लानिवश आप कुछ काल तक मौन रहे। पर उस मौनावस्था में आपने अपनी आध्यात्मिक साधना बहुत बढ़ा ली। रामदास के ‘दासबोध’ के आपने कई पारायण किए। ‘गीता’ का गहन अध्ययन किया और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन’–तेरा कर्म करने का अधिकार है, फल की इच्छा न कर। और प्रांत की पिछड़ी हुई व्यवस्था को सुधारने के लिए पुन: जबलपुर में ‘कर्मवीर’ के प्रकाशन में जुट गए। उनका विश्वास था कि यदि मैं शुद्ध अंत:करण से जन-सेवा का कार्य करूँगा, तो जनता का निश्चय मुझे सहयोग मिलेगा। अत: घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया और एक बड़े पैमाने पर इस पत्र की योजना बनाई। खंडवा के राष्ट्रीय कवि माखनलाल जी उन दिनों अस्वास्थ्य के कारण विश्राम ले रहे थे। आपने उन्हें ‘कर्मवीर’ द्वारा कर्मक्षेत्र में खींचा, साथ ही ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान और श्री सिद्धनाथ माधव आगरकर को भी आपने कर्मवीर के संपादन में प्रवृत्त किया। लोगों का विश्वास था कि सप्रे जी का ‘कर्मवीर’ पर अवश्य नाम होगा पर पत्र के प्रथम अंक ने उसे गलत सिद्ध कर दिया। सप्रे जी स्वयं नेता न बनकर दूसरों को नेता बनाना अधिक उचित समझते थे। पं. माखनलाल चतुर्वेदी को ‘कर्मवीर’ का संपादक बनाकर आप उसकी बाहरी व्यवस्था देखने लगे। यह सन् 1920-21 का काल था। गाँधी जी राजनीतिक क्षितिज से ऊपर उठकर जनता को अपनी ओर खींच रहे थे। लोकमान्य का परलोकवास हो गया था। ‘कर्मवीर’ ने गाँधी जी की राजनीति का समर्थन किया। उस समय हिंदी के दो पत्र बहुत ही लोकप्रिय हो रहे थे। एक था कानपुर का ‘प्रताप’ और दूसरा जबलपुर का ‘कर्मवीर’। मध्यप्रांत की जनता में राजनीतिक भावना को प्रबल करने में ‘कर्मवीर’ और उसके संचालक सप्रे जी का बहुत भारी हाथ है। दुर्भाग्य की बात है कि जनता में अधिक लोकप्रिय होते हुए भी जबलपुरी ‘कर्मवीर’ बहुत काल तक क्षेत्र में न रह सका। कई कारणों से उसे बंद हो जाना पड़ा। पर सप्रे जी ने तो कर्म करने का ही व्रत ले लिया था। आपने पुन: झोली उठाई और खंडवा में ‘कर्मवीर’ को पुन: जीवित किया। आप इस बार भी अपने को आगे नहीं लाए। पं. माखनलाल चतुर्वेदी और स्व. सिद्धनाथ माधव आगरकर के हाथों में पत्र को सौंप कर पीछे हट गए।

लोगों का आक्षेप रहा है कि सप्रे जी योजनाओं को बनाते हैं, उन्हें कार्यरूप में परिणत करते हैं लेकिन उनके साथ स्वयं अंत तक नहीं रहते; दूसरों के हाथों में सौंप देते हैं। उनमें संगठन-व्यवस्था की क्षमता न होने से योजनाएँ असफल हो जाती हैं। पर सप्रे जी तो आध्यात्मिक वृत्ति के पुरुष थे। वे किसी प्रिय से प्रिय वस्तु या संस्था के साथ आसक्त नहीं हो पाते थे। उनका उद्देश्य यही रहता था कि जनता में से ही योग्य व्यक्तियों के हाथों में अलिप्तभाव से संस्थाएँ सौप देनी चाहिए। वे ही धीरे-धीरे उन्हें चलाने की क्षमता प्राप्त कर लेंगे। हर्ष की बात है कि खंडवा में कर्मवीर-संस्था की जो नींव आपने डाली, वह आज भी जीवित है।

सप्रे जी ने इस प्रदेश में कई व्यक्तियों को सार्वजनिक कार्य के लिए तैयार किया। आपका जीवनक्रम बड़ा व्यवस्थित था! कोई भी पुस्तक या पत्र-पत्रिका भागदौड़ अस्त-व्यस्त में आप न पढ़ते। जब पढ़ते जम कर बैठते, पेंसिल से शंकास्थलों पर चिह्न लगाते जाते और यदि कुछ सूझ जाता तो अपने विचार भी लिख देते। लेख लिखते समय भी सावधानी रखते। जो मन में आया, घसीट देना, उनका स्वभाव न था। प्रैस के भूत छाती पर भले ही सवार रहें, पर आप जबतक विषय की रूपरेखा, उसके मुद्दे न टीप लेते, आगे न बढ़ते। लेख लिखने पर उसे दुबारा पढ़े बिना ‘कंपोज’ को न देते। तभी आप के लेखों में विचार-गंभीरता और तर्कबद्धता के दर्शन होते हैं। प्रत्येक शब्द को तोलकर लिखना आप खूब जानते थे। भिन्न-भिन्न विषयों की सामग्री कतरन के रूप में भी आप रखते थे। अपने समय के हिंदी-लेखकों में आपका प्रमुख स्थान रहा है। बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य द्विवेदी, रामनारायण मिश्र, गर्दे आदि से आपका घनिष्ट संबंध रहा है। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य-सम्मेलन के सभापति-पद को भी आप सुशोभित कर चुके हैं। मराठी भाषा-भाषी होते हुए भी आप राष्ट्रभाषा हिंदी का ही घर-बाहर प्रयोग करते थे। लेखक के अतिरिक्त आप प्रभावशाली वक्ता भी थे। साथ ही कीर्तनकार और प्रवचनकार भी आप अच्छे थे। जिस समय “जय जय रघुवीर समर्थ” के घोष के साथ आप कीर्तन या प्रवचन प्रारंभ करते, श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते। आप जीवन में जिस प्रकार पवित्रता के पोषक थे उसी प्रकार राजनीति में भी उसका समावेश चाहते थे। महात्मा गाँधी के समान राजनीति में आप भी धूर्तता को पसंद नहीं करते थे। सार्वजनिक जीवन से जो समय शेष रहा, उसमें फुटकर लेखों के अतिरिक्त आपने गीतारहस्य, महाभारत का उपसंहार, दासबोध, आत्मविद्या, एकनाथ-चरित्र, रामदास की जीवनी, आदि पुस्तकों का अनुवाद और प्रणयन किया। आपके द्वारा तिलक के गीतारहस्य का हिंदी अनुवाद हिंदी-जगत में बहुत प्रसिद्ध है।

राजनीति और दर्शन के पंडित होने के साथ ही आप में विनम्रता बहुत अधिक थी। रायपुर के ‘आनंदसमाज पुस्तकालय’ में नित्य जाने और सामान्य व्यक्तियों के बीच बैठकर उनसे घर-गृहस्थी से लेकर संसार भर की राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक विषयों की चर्चा कर डालते! आप चलते-फिरते विचार-पत्र थे। देश-विदेश की कोई भी घटना हो, तुरंत उस पर अपना संतुलित मत दे देते। कहते हैं, इसीलिए बहुत से व्यक्ति आपके विचार जानने के लिए ‘आनंदसमाज’ में जाया करते थे। स्वावलंबन की आपमें पराकाष्ठा थी। सन् 1926 में जब अंतिम बार बीमार पड़े, तब किसी को भी आपने कष्ट नहीं दिया, अपनी औषधि स्वयं उठकर पी लेते और चुपचाप पड़े रहते। सप्रे जी के असामयिक निधन से प्रांत की पत्रकारिता को सचमुच बड़ी ठेस लगी और सार्वजनिक जीवन में बहुत काल तक अनिश्चितता छाई रही। आप मध्यप्रदेश के प्रथम पत्रकार थे जिन्होंने जनता में राष्ट्रीय भावना को प्रज्वलित किया और गाँधीवाद का संदेश घर-घर पहुँचाया। आपके द्वारा संचालित और संपादित पत्र ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘हिंदी केसरी’ और ‘कर्मवीर’ ने हिंदी-जगत को पत्रकार के पावन कर्त्तव्यों से अवगत किया और कर्त्तव्य पर बलिदान होने की प्रेरणा दी जिसकी प्रतिध्वनि आज भी ‘कर्मवीर’ के ‘उद्देश्य’ के रूप में गूँज रही है–

“कर्म है अपना जीवन-प्राण
कर्म में बसते हैं भगवान
कर्म है मातृभूमि का मान
कर्म पर आओ हों बलिदान।”


Image: Large Bouquet of Wild Flowers
Image Source: WikiArt
Artist: Odilon Redon
Image in Public Domain


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विनयमोहन शर्मा द्वारा भी