द्वंद्वात्मकता के कथाकार राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह

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द्वंद्वात्मकता के कथाकार राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह

राजा राजराजेश्वरी प्रसाद सिंह अँग्रेजी, संस्कृत, बांग्ला, फारसी तथा पश्तो के विद्वान थे। ब्रजभाषा के भी वे बड़े कवि थे। बिहार के भोजपुरी भाषा-भाषी तत्कालीन जिला शाहबाद एवं वर्तमान जिला रोहतास के सूर्यपुरा राज्य के राजा थे। इन्हें लोग प्यारे कवि भी कहते थे। नोबल पुरस्कार प्राप्त रवींद्रनाथ टैगोर की ‘चित्रांगदा’ का उन्होंने हिंदी अनुवाद किया था। जब कभी वे कलकत्ता जाते थे तब वे रवि बाबू के पड़ोस में रहते थे। उन दिनों बिहार, उड़ीसा, पं. बंगाल एक ही राज्य थे और हाईकोर्ट कलकत्ता हुआ करता था। बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र से भी उनका अच्छा साहित्यिक संबंध था। उसी परिवेश में राजा राजराजेश्वरी प्रसाद सिंह के प्रथम पुत्र का जन्म 10 सितंबर, 1890 को हुआ, जिनका नाम रखा गया राधिकारमण प्रसाद सिंह।

बालक राधिकारमण की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। हिंदी, संस्कृत, उर्दू, फारसी, अँग्रेजी, बांग्ला की शिक्षा मिली। बालक राधिकारमण जब मात्र 13 वर्ष के थे तो 6 अप्रैल, 1903 को उनके पिता का देहांत हो गया। रियासत पर ऋण का भार था और दोनों भाई अवयस्क थे। अतः सूर्यपुरा ‘एस्टेट कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ के अधीन चला गया। उनकी आगे की शिक्षा-दीक्षा आरा के तत्कालीन कलेक्टर की देखरेख में हुई–पहले आरा जिला स्कूल और आगे आरा के कलेक्टर की इच्छा से सेंट जेवियर्स कॉलेज, आरा में नाम लिखा दिया गया। वह कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन था।

तब तक महात्मा गाँधी का सत्याग्रह आंदोलन प्रारंभ नहीं हुआ था, परंतु कलकत्ता में स्वदेशी आंदोलन अवश्य प्रारंभ हो गया था। उन्हीं दिनों खुदीराम बोस ने बिहार के मुजफ्फरपुर में बम फेंक कर दो अँग्रेज अफसरों को मार दिया था। कलकत्ता में श्रीअरविंद घोष के क्रांतिकारी विचारों से किशोर राधिकारमण बहुत प्रभावित हुए। इन दिनों ‘युगांतर’ तथा ‘वंदेमातरम’ पत्रिकाएँ निकलती थीं जिसके वे नियमित पाठक थे। कलेक्टर को राधिकारमण के स्वदेशी आंदोलन के प्रति दिलचस्पी की भनक मिली तो उन्हें आगरा भेज दिया गया। मात्र 21 वर्ष की उम्र में राधिकारमण का विवाह हो गया। उस समय 1911 में वे आगरा कॉलेज से एफ.ए. (इंटरमीडिएट) की परीक्षा उत्तीर्ण हुए थे। उन्हीं दिनों आगरा कॉलेज की पत्रिका में उनकी प्रथम कहानी ‘कानों में कँगना’ छपी जो बाद में 1913 में ‘इंदु’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। हिंदी के कहानी जगत में गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ को प्रथम कहानी माना गया है, परंतु हिंदी की पहली कहानी को लेकर उस जमाने में भी मतभेद था। ‘उसने कहा था’ कहानी 1915 में प्रकाशित हुई थी और प्रेमचंद की कहानी ‘पंच-परमेश्वर’ 1916 में। राधिकारमण की कहानी तो 1911 में ही लिखी गई, जिसका प्रकाशन 1913 में हुआ। प्रसिद्ध समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा मिश्र बंधुओं ने भी उस कहानी की प्रशंसा की तथा मैथिलीशरण गुप्त तो उस युवा कहानीकार से मिलने आगरा चले गए।

युवक राधिकारमण ने म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद में बी.ए. की पढ़ाई पूरी की। बी.ए. में संस्कृत में स्वर्णपदक प्राप्त किया। बी.ए. पास कर पटना कॉलेज में एम.ए. में नामांकन हुआ। 1915 में उन्होंने इतिहास में एम.ए. की परीक्षा पास की। 1916 में सूर्यपुरा स्टेट ऋणमुक्त हो गया और अँग्रेज सरकार ने ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ के अधीन उन्हें सूर्यपूरा स्टेट का मैनेजर बना दिया। 1918 में रियासत का पूर्ण भार राधिकारमण के हाथ में आ गया। उन्हीं दिनों उन्होंने ‘तरंग’ शीर्षक से एक लघु उपन्यास लिखा और साहित्य जगत में भी राजा साहब बन गए। आचार्य शिवपूजन सहाय राजा साहब के हमउम्र थे, परंतु राधिकारमण उन्हें अपना गुरु मानते थे–पहले बांग्ला में लिखते थे–कभी-कभी फारसी में लिखते रहे। बिहार और बंगाल का जब बँटवारा हुआ तब आचार्य सहाय ने उनसे हिंदी में लिखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘आप तो संस्कृत और फारसी दोनों के विद्वान हैं, आप जब हिंदी में लिखेंगे तो संस्कृत का गांभीर्य और उर्दू की नजाकत दोनों आपकी शैली में आ जाएगी।’ सहाय जी की प्रेरणा के बाद उन्होंने हिंदी में लगातार लिखना आरंभ किया और ‘शैली सम्राट’ कहलाए।

1934-35 में जब राजा साहब बुरी तरह अस्वस्थ हो गए तो डॉक्टरों ने पूर्ण विश्राम की सलाह दी, कोई पढ़ना-लिखना नहीं। किसी का आना-जाना नहीं। उन दिनों भी वे आधी रात में उठकर लिखने लगते थे। इस तरह जीवन और मृत्यु से संघर्षरत राधिकारमण प्रसाद ने ‘राम-रहीम’ की पांडुलिपि तैयार की जिसे आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपने संपादकत्व में 1936 में प्रकाशित कराया। सार्वजनिक जीवन में भी वे अपनी अनूठी वाक्य शैली तथा हाजिरजवाबी के साथ दूर दृष्टि से सभी को प्रभावित करते रहे।

28 जनवरी 1927 को शाहाबाद डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की तरफ से राजा साहब को महात्मा गाँधी का अभिनंदन करना था। अभिनंदन पत्र लेखन तथा वाचन का कार्य उन्हें ही करना था। उस अभिनंदन पत्र में भी उनकी दूर-दृष्टि तथा जादूभरी अनूठी शैली झलक रही थी। उन्होंने लिखा–‘भारत के सुदूर तट से आती हुई अहिंसा की मर्मभेदी ध्वनि को सुनकर पाश्चात्य जगत की भौतिक साधना की विराट व्यर्थता आज रह-रहकर उभर आती है, उसके दृष्टि पथ पर अनायास चौंका देती है, उसकी बुद्धि और अनुभूति को भी। राष्ट्र के अंतर में आत्मबल का संकट, राजनीति के मंदिर में आध्यात्मिकता की प्राण-प्रतिष्ठा–यह आपका गौरव दान जगत् के इतिहास में स्वर्णक्षरों में अंकित होकर अजर-अमर रहेगा। संसार का संन्यास से, व्यवहार का विराग से अपूर्व मिलन सार्थक हो।’

उक्त अभिनंदन पत्र राजा साहब के लिए अभिशाप भी साबित हुआ और वरदान भी। अँग्रेज सरकार के आदेश से ‘चेयरमैन’ पद से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी तरफ ‘बिहार हरिजन सेवक समाज’ की देखरेख की जिम्मेवारी उन्हें सौंपी गई और ‘बिहार हरिजन सेवक समाज’ का अध्यक्ष बना दिया गया। 1937 से 1940 तक वे अध्यक्ष बने रहे।

बिहार में 1934 के भूकंप से जो विनाशलीला हुई, उसमें राजेंद्र बाबू के साथ राजा साहब ने अकथ सेवा की। दोनों को महात्मा गाँधी का आशीर्वाद प्राप्त था। राजा साहब ने एक प्रहसन भी लिखा था। नाम था ‘नये रिफॉर्मर’ (नवीन सुधारक)। इसमें गाँव से आए उन छात्रों का चित्रण था जो गरीब किसान पिता से पढ़ाई के नाम पर रुपये मँगवाते हैं और शहरों में पाश्चात्य सभ्यता के विलासितापूर्ण जीवन में रंग जाते हैं। इलाहाबाद में इसका मंचन हुआ। नायक की भूमिका अदा कर रहे थे उनके सहपाठी महावीर प्रसाद जो बाद में बिहार के एडवोकेट जनरल हुए। महामहोपाध्याय सर गंगानाथ के घर पर इलाहाबाद एडवोकेट जनरल महावीर बाबू के सहयोगी इन पंक्तियों के लेखक के गाँव के स्व. रामेश्वर बाबू थे जिन्होंने 1931 में गाँव में दुःखहरण पुस्तकालय की स्थापना की थी। उसी पुस्तकालय के एक वार्षिकोत्सव में 29 दिसंबर, 1956 को राजा राधिकारमण प्रसाद अपने अभिन्न मित्र महावीर प्रसाद के साथ आए थे। महावीर बाबू ऐसे अभिन्न मित्र थे कि उनके निधन के बाद राजा साहब ने सिनेमा देखना छोड़ दिया। मैं 1956 में मैट्रिक पास कर सी.एम. कॉलेज दरभंगा से इंटर विज्ञान का छात्र था। राजा साहब की आदत थी कि वे बच्चों को देखते थे तो कुछ सवाल पूछते थे। मुझे 64 वर्षों के बाद अभी भी याद है कि उन्होंने एक शेर का अर्थ पूछा–

‘हमारा तुम्हारा, तुम्हारा हमारा, तुम्हारे हमारे, हमारे तुम्हारे’ 10-12 छात्र थे–किसी ने उत्तर नहीं दिया, मैंने अर्थ समझने-समझाने का प्रयास किया। तभी मुझसे पूछा कि कुछ लिखते हो? मैंने कहा, ‘लिखता हूँ–कोर्स संबंधी निबंध लिखता हूँ।’ उन्होंने कहा, ‘कहानियाँ लिखो–निबंध लिखो–अपने घर-परिवार-समाज-ग्राम-देश में जो देखते हो–अनुभव करते हो–लिखो और लिखकर मुझे भेजो’, पुस्तकालय के संस्थापक तथा महावीर बाबू के सहयोगी रामेश्वर बाबू से कहा विनोद जो लिखे उसे लेते आइएगा।’ उसके बाद रामेश्वर बाबू पटना जाते तो मेरा आलेख ले जाते और अगली बार जब आते तो राजा साहब के संशोधन, मार्गदर्शन–युक्त आलेख लेते आते और दूसरा ले जाते। इस प्रकार राजा साहब मेरे प्रथम साहित्यिक गुरु हुए।

पहले के साहित्यकार केवल साहित्य की नहीं साहित्यकारों की भी रचना किया करते थे। उन दिनों राजा साहब बोरिंग रोड, पटना में रहा करते थे। मैं जब कभी पटना जाता था–स्टेशन के नजदीक महावीर जी का दर्शन करने के बाद बोरिंग रोड में अपने गुरु का दर्शन करता था। उसके बाद ही अन्य कार्य करता था।

राजा साहब की अपनी पुस्तकों के नामकरण अर्थात् शीर्षक देने की भी अनूठी शैली थी। उनकी अधिकतर पुस्तकों का नाम द्वंद्वात्मक है–जैसे-‘पुरुष और नारी’, ‘हवेली और झोपड़ी’, ‘देव और दानव’, ‘अपना-पराया’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘वे और हम’, ‘तब और अब’, ‘धर्म और मर्म’, ‘चुंबन और चाँटा’ आदि। वास्तव में राजा साहब यह कहना चाहते थे कि विरोधात्मक अर्थ के बावजूद दोनों शब्द तत्वतः एक हैं। एक साहित्यकार किसी के विषय में जो जानता है, सुनता और देखता है, वही लिखता है। अतः ‘जानी-सुनी-देखी’ शृंखला के अंतर्गत राधिकारमण की पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। शृंखला की पहली कड़ी–‘नारी क्या एक पहेली?’ यह 1951 में प्रकाशित कहानी संग्रह है। फिर इस शृंखला में दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हुईं।

राधिकारमण ग्रंथावली के पाँच खंडों में राजा साहब की सभी पुस्तकों का आकलन इस प्रकार हुआ है, प्रथम खंड–उपन्यास–(1) ‘राम रहीम’ ( 2 ) ‘पुरुष और नारी’, द्वितीय खंड–जानी-सुनी-देखी शृंखला–(3) ‘नारी क्या एक पहेली?’ (4) ‘पूरब और पश्चिम’ (5) ‘वे और हम’, ‘युद्ध’, ‘चुंबन और चाँटा’ तृतीय खंड–उपन्यास और कहानियाँ–(1) ‘टूटा तारा’ (2) ‘सूरदास’ (3) ‘संस्कार’ (4) ‘गाँधी टोपी’ (5) ‘सावनी समाँ’ (6) ‘अबला क्या ऐसी सबला’ (7) ‘कुसुमांजलि’ (8) ‘बिखरे मोती’–खंड-1 (कहानियाँ), चतुर्थ खंड–जानी-सुनी-देखी शृंखला (1) ‘हवेली और झोपड़ी’ (2) ‘देव और दानव’ (3) ‘धर्म और मर्म’ (4) ‘तब और अब’। पंचम खंड–लघु उपन्यास, नाटक, प्रहसन एवं विविध–(1) ‘माया मिली न राम’–लघु उपन्यास (2) ‘मॉडर्न कौन सुंदर कौन’ लघु उपन्यास (3) ‘अपनी-अपनी नजर, अपनी-अपनी डगर’ लघु उपन्यास (4) ‘नवजीवन’ (प्रेम लहरी) लघु उपन्यास (5) ‘तरंग’ लघु उपन्यास (6) ‘अपना-पराया’ नाटक (7) ‘धर्म की धुरी’ नाटक (8) ‘नजर बदली बदल गए नजारे’ नाटक (9) ‘नए रिफॉर्मर’ (नवीन स्मारक) प्रहसन (10) ‘बिखरे मोती’ खंड-2 (संदेश-संस्मरण) (11) ‘बिखरे मोती’ खंड-3 (स्पष्ट रचनाएँ) (12) ‘बिखरे मोती’ खंड-3 (भाषण-संकलन)।

इस प्रकार 1911 से 1970 तक उनकी कुल तीस पुस्तकों ने हिंदी साहित्य जगत में आलोक फैलाया। राधिकारमण प्रसाद का पहला उपन्यास ‘राम-रहीम’ 1936 में प्रकाशित हुआ। इस नाम से महात्मा गाँधी भी आकर्षित हुए। नाम से ऐसा लगता है कि उपन्यास हिंदू-मुस्लिम एकता पर आधरित होगा, परंतु ऐसा नहीं है। इस उपन्यास के प्रमुख पात्र दो युवतियाँ हैं–बेला और बिजली। दोनों का जीवन अलग है, सोच अलग है, दृष्टिकोण अलग है, भाग्य भी अलग है, परंतु अंत में पुस्तक उनकी जीवन स्थिति और वैषम्य के बावजूद परस्पर साहचर्य को अंगीकार करने की कथा कहती है। उपन्यास बेला के बहाने धर्म समाज के पाखंड को प्रदर्शित करता है। उपन्यास की पात्र, बेला के संबंध में राधिकारमण जी कहते हैं, दसवें साल अपनी भाँवरें डाली थी और पूर्ण युवती होने से पहले अचानक पुत्र वियोग और वैधव्य की भीषण यंत्रणा से प्रातःकाल की शेफालिका की तरह चू पड़ी।’ यह बेला के चरित्र की पहली परत है। राजा साहब अपने पात्रों का व्यक्तित्व एक साथ नहीं वरन, परत-दर-परत खोलते हैं। अभी तक सांसारिक प्रपंचों से अपने को बचाने के फलस्वरूप उसने पूजा-पाठ को स्वीकारा था। जब देवर दिनेश ने बलात्कार किया और अंततः उसे गर्भवती बना दिया तो पुरुषों के प्रति घृणा, अविश्वास और आक्रोश से वह भर उठी। बेला तत्कालीन समाज की बाल-विधवा की जीवंत प्रतिमा है जिसे हर मोड़ पर उसके शरीर के ग्राहक मिलते हैं जो उसे रखैल बनाकर रखने के लिए तैयार हैं लेकिन धर्मपत्नी की गरिमा से मंडित होना हिंदू समाज में अकल्पनीय है। बेला अंततः वेश्यावृत्ति का धंधा अपनाती है। शरीर तो कलंकित और कलुषित हो ही गया उसका व्यापार होता है तो हो। मन तो बचा रहे।’

बेला पर उसके गुरु महाराज पंडित जी भी आसक्त हो जाते हैं। गुरु-दक्षिणा के रूप में अंग-स्पर्श की याचना करते हैं और गीता का श्लोक सुनाते हैं–‘प्रकृतेः कृयमाणानि गुणै कर्माणी सर्वशः/अहंकार विमूढ़ात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते।’ मैं तो कुछ करता नहीं। आत्मा तो अकर्ता है, प्रकृति कर रही हैं–मैं जिम्मेवार नहीं हूँ। पंडित जी का पाखंड आधुनिक तथाकथित संतों-बाबाओं की याद दिला देता है। वास्तव में साहित्यकार भविष्यवक्ता भी होता है। बेला पंडित की बातों में नहीं आती–धक्का देकर निकल जाती है। लेखक मनुष्य के तन-मन के अलग स्वरूप का विश्लेषण करते हैं। उपन्यास का अंतिम अंश मार्मिक है और ‘स्त्री-विमर्श’ का भी संकेत देता है। बेला ने गायन तक अपने को सीमित रखा और बिजली पाश्चात्य सभ्यता की चमक-दमक से अभिभूत होकर खुलकर खेलती रही। अंत में बिजली गंगा की सैर करने जाती है, साथ में उसका पुत्र भी है। बेला रामभजन में खो गई है। बेला का अंतिम सत्य है रामभजन और बिजली का अंतिम सहारा बनता है उसका पुत्र। इन दो स्त्रियों के माध्यम से दो तरह की चेतनाओं का चित्रण हुआ है। राधिकारमण ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है–‘वास्तविकता की सारी जमीन पर नैतिकता की किनारी टँकी है–यथार्थवाद के मौसम में आदर्शवाद के छींटे हैं।’ विषयामुक्ति के फैले साम्राज्य में आदमी अंधा हो जाता है उसे मानवीय सिद्धांतों के प्रति कोई आस्था नहीं रहती–चाहे वह राम हो या रहीम, हिंदू हो या मुस्लिम। 1957 में तन और मन का विश्लेषण करने वाला उनका एक और उपन्यास आया ‘चुंबन और चाँटा’। कई बार अपने उस उपन्यास के संबंध में उन्होंने मुझसे कहा, ‘इसकी कहानी बिल्कुल सच्ची है–इसमें तीन चौथाई वास्तविकता और मात्र एक चौथाई कल्पना और शिल्प है।’

इसमें एक वेश्यापुत्री गुलाबी का चित्रण है। गुलाबी के सामने दो रास्ते हैं। एक माँ का पेशा अपनाना और दूसरा एम.ए. का छात्र कन्हैया जो उससे प्यार भी करता है, के साथ शादी करना। कन्हैया के चुंबन से उसका जीवन प्रारंभ होता है और वह उसका चाँटा भी सह लेती है। परिस्थितिवश अधिक उम्र के सेठ जी के साथ रहने लगती है किंतु ऐसा हो नहीं पाता। अततः वह वृंदावनवासिनी हो जाती है। राधिकारमण प्रसाद ने कुछ लघु उपन्यासों की भी रचना की है। एक लघु-उपन्यास प्रकाशित हुआ, ‘माया मिली न राम’। कहते हैं कि इसका कथानक उन्हें मिला पटना की यात्रा करने के दौरान चौबीस घंटे के सफर में। इस पुस्तक के प्रारंभ में ही धर्मांधता और पाखंड पर आघात है। तो क्या ईश्वर भी रीछ की तरह क्रूर है, गीदड़ की तरह धूर्त जिसकी जबान पर तारीफ के तराने हैं। उसे वह धन-धान्य क्या मुँह माँगा इनाम–वरदान देता है और जिसे स्त्रोत पाठ आदि आडंबर में विश्वास नहीं, उसके सिर पर अंगार बरसाता है, ऐसा!

‘वाह री, यह रीझ और वाह री वह बूझ। ईश्वर की ऐसी छीछालेदरी?’ राजा साहब की एक कहानी सातवीं-आठवीं कक्षा के कोर्स में थी, ‘दरिद्र नारायण’। इस कहानी में द्ररिद्र नर की सेवा को नारायण की सेवा से उत्तम माना गया है। ठीक उसी तरह इस लघु-उपन्यास में वे कहते हैं। ‘जो दीन-दरिद्र हर मायने में लाचार है, वही प्रत्यक्ष परमेश्वर है। हर वैसी खुली नजर के सामने, अपने जी का तो यही तकाजा है। इनकी सेवा ही सच्ची पूजा ठहरी। जिनके हृदय में करुणा की धर है, सेवा का अंकुर है, वही मनुष्य में शुमार है आज’। राधिकारमण प्रसाद ने मानव-धर्म को सर्वोपरि मानते हुए कहा है–मैं फकत इंसान हूँ हिंदू-मुसलमान कुछ नहीं, मेरे दिल के दर्द में तफरी के ईमान कुछ नहीं।

पुस्तक के अंत में लेखक ने पुस्तक का सारांश ही नहीं अपने जीवन के मूलमंत्र का भी जिक्र किया है। ‘काश, हमारी मुँदी आँखें खुल पातीं, विवेक विरोधी बुद्धि भी करवट ले पाती कि यह अनित्य का मोह ऐसा पुरजोर है! हमारे तन-मन-जीवन में, यही शरीर, यही कुटुंब परिवार, यही जमीन-जर किसी के पहले भी पूर्वजन्म में भी रहे, बाद में भी रहेंगे। नहीं नहीं, कभी नहीं। बस जन्म-मृत्यु के चक्र में यह आए और बह गए, फिर भी इसी नश्वर भौतिक बंधन–इसी मैं’ और मेरे लिए’ भ्रम-मोह के मायाजाल में आजीवन चिपटे रहना? ऐसी आसक्ति–ऐसी मदहोशी–हद की भी हद है ऐसी तंगनजरी! है न? न सत्ता साथ जाती है न संपत्ति साथ जाती है बस, सेवा की सनद हर हालत साथ जाती है।’

राधिका बाबू नाटककार भी थे। उनके उपन्यासों में ऐसे कई स्थल मिलेंगे जहाँ नाटकीय संवाद फिल्मी डायलॉग को भी मात करते हैं। नाटकीय परिस्थिति की अच्छी पकड़ और निर्वाह उपन्यासों में भी देखा जा सकता है। अधिकतर साहित्यकारों की उक्तियाँ, उपमाएँ, लोकोक्तियाँ, समकालीन परिस्थितियों एवं काल को इंगित करती है परंतु कुछ चोटी पर पहुँचे साहित्यकारों की उक्तियाँ समकालीन नहीं, सर्वकालीन होती हैं, जो युगों से चलती आ रही हैं और युगों तक चलती रहेंगी।

ऐसे ही साहित्यकार थे राधिका बाबू। उनके कथा साहित्य, उपन्यास तथा संस्मरण में आप ऐसी छोटी-छोटी हजारों उक्तियाँ देखेंगे जो सतसइया के दोहे की तरह देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर को सिद्ध करती हैं। उनकी अनूठी शैली के अंतर्गत पेश हजारों उक्तियों में से मैं मात्र दस उक्तियाँ अवलोकनार्थ पेश कर रहा हूँ।

        मसनद की दिशा बदलती है, नशा नहीं।

        कामना तो बूढ़ी हुई नहीं, उसकी कामिनी बूढ़ी हो गई।

        भगवान जहाँ धन देता है, वहाँ मन नहीं देता।

        वेश्या की छाती में भी दिल है और संन्यासी की छाती में भी सिल है।

        जंजीर जंजीर ही है चाहे लोहे की हो या सोने की।

        वासना का तंदूर कभी ठंडा नहीं होता।

        जवान फिसलकर गिरता भी है तो दामन झाड़कर खड़ा हो जाता है और अधेड़ गिरता है तो कमर टूट जाती है।

        चुगली तो वह चिड़िया है जो बे पर की भी उड़ जाती है।

        तारीफ तो वह तवायफ है जो बड़े-बड़ों को भी अपने शीशे में उतार ले पल में। वह लेखनी भी क्या जो जमाने की नब्ज पर उँगली न हुई।

छह दशकों तक साहित्य जगत में अपनी जादूभरी अनूठी शैली से और रस की चाशनी से पाठकों को मंत्रमुग्ध करने वाले राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह का 24 मार्च, 1971 को देहावसान हो गया। साथ ही उनकी कलम भी अनंत विश्राम को प्राप्त हुई।


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