टॉल गुरु

टॉल गुरु

भट्टजी एकांकियों के लिए प्रसिद्घ हैं। कविरूप में भी इनकी प्रसिद्धि है! किंतु यह शब्दचित्र देखिए, कैसा सजीव। शब्द रेखा बनकर बोल रहे हैं! कलाकार हर क्षेत्र में कलाकार है!

उनका यह उपनाम कैसे पड़ा यह पता न लग सका। वैसे उनका पूरा नाम था श्यामचंद्र टॉल गुरु। उनके संबंध में तरह-तरह की कहानियाँ प्रसिद्ध थीं, पर उन गुरु के कुछ काम तो ऐतिहासिक हो गए थे। कुछ लोगों का कहना था कि गाँजे और सुल्फे की ‘लौ’ ऊँची उठाने में उनका कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता था, इसी कारण उनका यह उपनाम, किसी ने अँग्रेजी के शब्द टॉल पर दे दिया। दूसरे दल के लोग उनकी पहाड़-सी ऊँची देह को देख कर टॉल नाम देने का प्रमाण पेश करते। बहरहाल जो कुछ भी हो, वे टॉल गुरु के नाम से प्रसिद्ध थे। टॉल गुरु बुद्धि की अपेक्षा शारीरिक बल को, कर्तव्य की अपेक्षा उमंग को तरजीह देने के पूर्ण पक्षपाती थे। भाँग को सत्तू की तरह फाँकते उन्हें कई लोगों ने देखा था। सुल्फा, गाँजा, चरस इन तीन देवताओं की स्तुति, उपासना और प्रार्थना करते उन्हें कोई भी देख सकता था। जीवन में और कोई काम उन्होंने कभी किया हो, इसका कोई प्रमाण कहीं भी नहीं मिल सका।

टॉल गुरु की शरीर-छवि का वर्णन साहित्य शास्त्र और वात्सयायन के काम सूत्रों के अनुसार इस ढंग से हो सकता है। उनके शरीर का रंग पतझड़ के बाद नीम के ठूँठ जैसा खुर्दरा और काला था। और रंग के अनुसार ही प्रस्थूल और लंबा भी। हुक्के के नारियल जैसी खोपड़ी। पीली और लाल डोरे से गुँथी हुई आँखें। नाक के संबंध में कई लोगों में परस्पर मतभेद हैं। कुछ का कहना है कि उनकी नाक बाँसुरी की पोर की तरह लंबी थी किंतु दूसरे लोग उनकी नाक की उपमा कुम्हार के आवे से देते थे। यानी चारों तरफ से बंद और नीचे की तरफ थोड़ी खुली हुई। ओंठ और मुँह वैसे ही जैसे ढक्कनदार मिट्टी का डबुआ हो। हाँ, हाथ काफी लंबे जैसे पेड़ की दो शाखाएँ ज्यादा लटकने और खींचे जाने के कारण जमीन तक झुक गई हो। जाँघें बाँस की तरह लंबी, पैर, काफी जमीन घेरने वाले। उनकी उम्र की बाबत अंदाजा लगाना कठिन है। उन्हें लोगों ने सदा ही एक रंग देखा। लाल अंगोछा कंधे पर और धोती। नंगे पैर, सिर घुटा हुआ। जाड़ों में फतुही वे पहनते। बस, इसके अतिरिक्त और भी कोई कपड़ा होता है पहनने के लिए, इसका उन्हें ज्ञान नहीं था। बड़े-बूढ़े कहते हैं उनके विवाह के लिए बड़े प्रयत्न किए गए। जब कोई भी लड़की का पिता उनके सौंदर्य पर मुग्ध न हुआ, तो वे कहीं से एक कुबड़ी भिखारन पकड़ लाए। वह सदा षड्ज में निषाद स्वर मिलाकर बात करती। कई बर्तनों के आपस में टकराने की तरह बोलती। सोने के समय को छोड़ कर सोलह घंटे तक बोलते उसे कोई भी सुन सकता था। जब रात को उसका मुँह नहीं बोलता, तो नाक बोलती थी। गुरु की तरह सुंदर वह नारी भी कुछ दिनों के बाद एक साधु के साथ भाग गई। गुरु के हृदय में अब भी उसके लिए स्थान रिजर्व है। उसी के शोक में उन्होंने स्त्रियों की तरफ देखना छोड़ दिया। उसके बाद उनकी दिनचर्या में कभी कोई परिवर्तन हुआ हो, इसका शायद ही उन्हें ध्यान हो। सबेरे उठते बाहर निपटने के बाद तालाब के किनारे बाबा जी के आश्रम में जा बैठते। वहाँ दम लगाते और गुरु-गुणानुवाद करते। दस बजे घर लौट कर सौदा सुलफ लाते, नहाकर शिवजी के मंदिर में एक लोटा जल चढ़ा कर भोजन करते, थोड़ा विश्राम और फिर बाबा की सेवा में लग जाते। फिर वहाँ से जब भी छुट्टी मिले।

जिस जगह गुरु रहते थे वहाँ चोरों की कमी न थी। फिर भी कभी किसी चोर की हिम्मत न हुई कि गुरु की उस पोशाक पर हाथ साफ करता। वे निधड़क रात को घर के बाहर मैदान में खाट पर दरी, मैला तकिया और पुराना कंबल बिछा कर सोते थे। इन वस्तुओं में कभी रद्दोबदल नहीं देखा गया। चाहे जाड़े हों या गर्मी। हाँ, ब्राह्मणों को श्राद्ध में दी जाने वाली (उस जमाने में) ढाई आने की पीतल की घंटी और एक कटोरी खाट के नीचे रखकर सोना वे कभी नहीं भूलते थे।

एक रात न जाने भूल से, या उसकी घात कहीं नहीं लगी तो खाली हाथ जाते-जाते एक चोर उनकी घंटी उठा कर दौड़ा। गुरु की आँख खुल गई। वे एकदम चोर के पीछे-पीछे दौड़े। दौड़ते चले गए। आगे-आगे घंटी लिए चोर और पीछे गुरु। कहते जाते–‘सुसरे, घर तक नहीं छोडूँगा। दौड़ कहाँ तक दौड़ेगा।’ फिर भी चोर दौड़ रहा था। करीब एक मील तक धावा मारते हुए जा रहे थे। जब चोर ने देखा कि विकट आदमी से पाला पड़ा है, यह अपनी घंटी लिए बिना न लौटेगा, तो हार कर उसने घंटी फेंक दी और भाग गया। गुरु ने घंटी उठाई तो देखा व टूट गई है। गुरु उसे ही लेकर लौटे। आकर देखा तो कोई दूसरा चोर उनका बिस्तर लेकर भागा जा रहा है। उन्होंने फिर दौड़ना शुरू किया। घंटी हाथ में लिए हुए वे दौड़ रहे थे। और चोर से बिस्तर छीन लाए। गुरु के इस पराक्रम की गाथा बरसों तक लोगों का मनोरंजन करती रही। वैसे तो उनके जीवन में इस तरह की कई ऐतिहासिक घटनाएँ हैं।

मैंने प्रारंभ में ही कहा है टॉल गुरु बुद्धि की अपेक्षा शारीरिक बल की, कर्तव्य की अपेक्षा उमंग मनाने को तरजीह देते थे। इस उमंग के सहारे चलने वाले टॉल गुरु कवि क्यों नहीं हुए जबकि कवि भी उमंग का स्वामी होता है। इस प्रश्न के उत्तर में लोग ब्रह्मा को सदा कोसते रहे हैं। क्योंकि जब विधाता ने उनको उमंग का स्वामी बनाया तो उसके कार्य रूप में कविता का भी उन्हें व्यसनी बनाना चाहिए था। और यह सब नहीं हुआ। कविता जैसी चीज़ उन्होंने सुनी ही न थी। मेरा विश्वास है कि उस चाणक्य के शरीर में कविता की धारा बहाना ब्रह्मा को अभीष्ट नहीं था। वह अच्छा ही हुआ। यहाँ चाणक्य का शब्दार्थ केवल शरीर समता के लिए ही रखा गया है और किसी प्रकार का पाठकों को भ्रम न हो इसीलिए सफाई देने की आवश्यकता हुई। हाँ, तो गुरु, यह निश्चय है, कविता नहीं करते थे, केवल सुल्फे की एक हाथ लंबी लौ के उठाने के बाद जो दृश्य उनके सामने उपस्थित हो जाते थे उसके प्रभाव में उन्होंने कई राज्य सिंहासन त्याग दिए। ऊँची-ऊँची पदवियों की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा। यहाँ तक की कलक्टर और कमिश्नर के साकार शरीर देख कर जो उन्होंने एक तुच्छ दृष्टि फेंकी, उसके सामने वे निराकार हो कर रह गए।

घर में उनके और कोई नहीं था। केवल भतीज-बहू और उसके छोटे बच्चे थे। भतीजा कहीं बाहर नौकरी करता था। इसलिए घर की देखभाल, साग-भाजी का एकमात्र काम था जिसके लिए उन्हें सुल्फे के दम के स्वर्ग से रोज़ उतर कर इस मत्य में आने की आवश्यकता थी। फिर भी कई बार ऐसे दिन भी उनके जीवन में आए जब सिर पर पानी डालने, दूध में घी डालकर पिलाने के बाद भी वे उस स्वर्ग से नहीं उतरे। कई बार ऐसा भी था कि गुरु को निश्शेष जीवन की भू पर स्थित उस देह को शीघ्र ही जमुना में प्रवाहित करने की क्रिया का भी प्रारंभ लोग करने लगे। किंतु देखा गया इनकी साँस ब्रह्म रंध्र से धीरे-धीरे ऐसे उतर रही है जैसे पतझड़ के बाद नीम में छोटी-छोटी कोंपलें प्रस्फुटित हो रही हों या कि घोर उमस के बाद हल्का-हल्का झोंका पवन का कहीं से आने लगा हो। आँखें खुलीं, नथुने फूले, मुँह फटा, हाथ हिले, और जीवन ने शरीर में प्रवेश किया। घर के लोगों की जान में जान आई! ऐसा कई बार हुआ और होता क्यों नहीं? जब उन्हें दौड़ने की उमंग उठती तो वे मीलों तक बिना उद्देश्य दौड़ते चले जाते और फिर लौट जाते, फिर साँस ही यदि ब्रह्म रंध्र तक दौड़ लगाती थी तो इसमें आश्चर्य किस बात का? सुल्फे, गाँजे, चरस, भाँग के संबंध में उनका ज्ञान विस्मृति की सीमा को कई बार पार कर चुका था। अलग-अलग और एक साथ सब मिलाकर बनी हुई सभी की रसायन पर वे घंटों तक व्याख्यान दे सकते थे और चरस का रस-पान करके स्वर्ग के द्वार तक जाकर लौटना तो उनका रोज का काम था। टॉल गुरु उन लोगों में से थे, जो लंगोटी बेच कर जीवन की अनवरत साधना में लगे रहते हैं। एक बार किसी रिश्तेदार की मृत्यु पर उन्हें कफन लेने जो भेजा गया, तो लौटकर ही नहीं आए। मुरदा घर में पड़ा था। लोग रो रहे थे। कोहराम मचा था। जब रुदन समाप्त हुआ तब भी गुरु न लौटे। इधर-उधर देखा। लोग कफन वाले की दुकान तक गए तो दुकानदार ने बताया–“गुरु इधर तो नहीं आए। मैं तो सबेरे से दुकान से हिला भी नहीं हूँ।” एक वैज्ञानिक के जी में आया तो वह साधु बाबा के पास दौड़ा गया कि शायद वहाँ न हों, तो देखा, गुरु दम लगा रहे हैं। कफन के दामों की चरस आ गई है। ऐसे प्रसंग उनके जीवन में नए नहीं थे। क्या आप ऐसे व्यक्तियों को जीवनमुक्त नहीं कहेंगे? राग-द्वेष-हीन, जीवनमुक्त। दायित्वपूर्ण केवल निष्ठा के प्रति सजग।

एक दिन की बात है, सुबह आठ बजे का समय होगा। घर में एक मेहमान आ जाने के कारण उन्हें आज्ञा मिली–‘जाकर चार पैसे की साग-भाजी, दो पैसे के पान, दो पैसे की बुहारी और दो पैसे के पेड़े जलपान के लिए लपक कर बाजार से ले तो आएँ।” मेहमान और कोई नहीं, बहू का भाई था। उसे नौकरी के लिए किसी साहब से ठीक दस बजे मिलने जाना था। गुरु अँगोछा कंधे पर डाले सामान लेने चल दिए। दुकान पर पहुँचने से पहले ही एक चेला मिल गया। बोला–“गुरु, तैराकी मेला बड़े जोर का हो रिया है।” गुरु जैसे चौंक कर बोल उठे–“अबे सच कह रिया है।” “गुरु से झूठ। इल्म कसम, बड़े तैराक इकट्ठे हुए हैं। लंबी दौड़ है, चलो हो क्या? मजा रहेगा। इल्म कसम। पहले दम लगेगा और फिर आपन तैरेंगे।” दम का नाम सुनते ही गुरु जमुना की तरफ चल पड़े! चेले ने दम लगवाया और दोनों कूद पड़े जमना में। इन दोनों की दौड़ निराली थी। लोग एक सीमा तक दौड़े और फिर लौट पड़े, किंतु गुरु आगे बढ़ते जा रहे थे। चेले ने पुकारा गुरु लौट पड़ो दो-तीन मील आ चुके हैं।

आपने उत्तर दिया–“तू लौट जा। बहुत दिनों बाद तो आज तैरने आया हूँ क्या ऐसे ही लौट जाऊँगा।”

पुकार-पुकार कर थकने के बाद चेला लौट पड़ा। गुरु तैरते ही चले गए। तैरते ही गए।

इधर घर में एक घंटा बीता, दो बीते, तीन हुए, परंतु गुरु का कहीं पता ही नहीं। साग वाले ने पूछने पर बताया कि इधर तो आए ही नहीं। हलवाई ने भी वैसा ही जवाब दिया। अब लगी खोज होने। बाबाजी ने गाँजे की दम मारते कहा–‘मर तो गया नहीं, आ जाएगा। जा।’

जब शाम तक कहीं पता न लगा तब एक ने समाचार दिया–“जमुना जी जाते देखा था। फिर नहीं मालूम।” दूसरे ने कहा–“तैरते देखा था।” तीसरे चेले ने कहा–“गुरु तैरते ही चले गए, आ जाएँगे।” रात हुई। दूसरा दिन हुआ, सबेरा, दोपहर, साँझ, फिर रात आई, पर गुरु का पता न लगा। अब घरवालों की चिंता ने रुदन का आकार धारण किया। इसी समय एक चेला बोला–“दो आदमी डूबे हैं यहाँ से पाँच मील पर।” शायद, इतना कह कर वह चुप हो गया। लोग इकट्ठे हुए। पास-पड़ोस के सभी आए। किसी ने कहा–“मृत्यु तो निश्चित है। पर आगे क्या हो।” किसी ने कुछ सुझाव दिया, किसी ने कुछ। अंत में निर्णय हुआ, क्रिया-कर्म तो करना ही होगा, नहीं तो गति नहीं होगी। भूत हो गए तो मुहल्ले वालों को तंग करेंगे। एक ने कहा–“मैं तो रात ही गली में जाते डर रहा था।”

“फिर जमुना में मगरमच्छों की भी तो कमी नहीं है”–एक बोला।

“मगर तो फिर भी छोड़ दे, नाका साला बड़ा बदमाश होवे है।”–दूसरे ने बात को रंग दिया।

“लेकिन गुरु, घड़ियाल तो आदमी को जैसे चटनी की तरह खाता है साला।”

“तो घड़ियाल और नाके में भी कोई फर्क है क्या?”

“वाह यह भी खूब रही, जब इनके नाम दो हैं, तो दो ही तो हुए।”

“भाँग खाके आए हो क्या?”

“अब नाम दो हैं तो क्या जानवर भी दो हैं? कृष्ण के कई नाम हैं। तेरा ही एक नाम गुट्टो है और दूसरा मनमोहन, बोल तू दो है क्या?”

“शर्त बद लो, नाका और घड़ियाल दो न हों तो। बोलो, है हिम्मत पाँच-पाँच की। निकालो अंटी में से अभी।” उसने अंटी खोली।

“अबे जा, तू क्या खा के शर्त बदेगा, लिए फिरे है पाँच रुपल्ली।”

इसी समय एक समझदार बोल उठे–“मुरदैनी में आए हो, चुप रहो।”

लोग चुप हो गए। पर नाके और घड़ियाल के द्वित्व पर दोनों की आँखें एक दूसरे को बहुत देर तक घूरती रहीं।

इसी समय भतीजे को तार दिया गया। वह पास ही कहीं नौकर था। सबेरे की गाड़ी से आ गया। और निश्चय के अनुसार चौथे दिन जमुना जी पर जाकर क्रियाकर्म की व्यवस्था की जाने लगी। लोग बाहर एकत्र थे। नाई सामान के लिए दौड़ रहा था। बाबा जी भी शिष्य के शोक में मग्न होने के लिए आ गए थे। पड़ोसियों में से किसी ने दुकान बंद की, किसी ने दफ्तर न जाने के लिए प्रार्थनापत्र लिख कर भेज दिया। भतीजे के आँसू नहीं सूख पा रहे थे। लोगों ने गुरु की प्रशंसा, नेकनीयती, साधुता, वीरता के गुणगान किया। कोई कह रहे थे–“ऐसा आदमी होना कठिन है। मुहल्ले की रौनक थे।” दूसरे बोल उठे–“कभी बहू बेटी की तरफ आँख उठा कर नहीं देखा।”

इधर घर में कोहराम मच रहा था। उनकी चारपाई, पुरानी दरी, मैला तकिया और फटा कंबल भंगी के सिपुर्द कर दिया गया था। गली में झाड़ू लगाने वाला भंगी उनके संबंध में पुरानी कहानियाँ सुना रहा था। मेहतरानी एक कोने में खड़ी बहू को समझा रही थी। बच्चों ने रोकर खेलना शुरू कर दिया था। इसी समय लोगों ने दूर से देखा–कंधे पर अँगोछा डाले गुरु की छाया–मूर्ति घर की ओर बढ़ी चली आ रही है। लोगों ने पहले तो किसी और की कल्पना की, फिर पास आने पर भ्रम दूर हुआ। वे टॉल गुरु ही थे।

आते ही बोले–“क्या बताऊँ तैरता-तैरता कालपी पहुँच गया–अस्सी मील। यह रोना-धोना कैसा है? अरे यह नाई, इतने लोग, क्या बात है?” और इसके बाद वे ठठा कर हँस पड़े। जैसे कुछ हुआ ही न हो। इसके साथ ही वे उसी मस्ती में चिलम भरने की तैयारी करने लगे।


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उदयशंकर भट्ट द्वारा भी