विभिन्न ‘वाद’ और आधुनिक हिंदी कविता

विभिन्न ‘वाद’ और आधुनिक हिंदी कविता

साहित्य हमारे जीवन की विशद व्याख्या है। वह मानव द्वारा निर्मित होता है और मानव के लिए निर्मित किया जाता है। वह सर्वथा मानवोन्मुख है। मानव उसका लक्षित कर्मक्षेत्र है और उसकी उत्क्रांति का उत्कृष्ट उदाहरण है। मानव ही उसका साध्य है, और उसकी साधना का उपकरण भी है। वह हमेशा ही उसके आचार-विचार, व्यवहार और उसके जीवन के विविध प्रकरणों से आक्रांत होता रहता है। वह हमारी संस्कृति का, जो जातीय संस्कारों की समन्विति होती, प्रतिफलन होता है।

मनुष्य परिस्थितियों में पलता है और उसका जीवन उसकी अंतर्मुखी व्यंजना का द्योतक होता है। उसमें एक नैराश्यजनक उद्दीप्त भावना होती है जो उसे उसके कार्य-क्षेत्र की ओर अग्रसर कराती है। और, साहित्य मनुष्य के विचार-विमर्ष तथा उसकी प्रवृत्तियों एवं अनभिव्यक्त कर्म का प्रस्फुटित स्वरूप है। अतएव स्वभावत: ही इन सबका आभास साहित्य में रहता है। यहाँ यह भी जान लेना चाहिए कि कर्म और भावना अथवा प्रवृत्ति या प्रवृत्तियों एवं उद्भावनाओं का उद्भव और उनका ह्रास मुख्यतया तत्कालीन समाजगत आंतरिक वृत्तियों एवं परिस्थितियों पर ही निर्भर है। साथ ही यह भी द्रष्टव्य है कि साहित्य में जो प्रवृत्ति एक बार जागृत और विकसित हो जाती है। वह चाहे कुछ समय के लिए प्रसुप्त हो जाए, जड़ से उन्मूलित नहीं हो जाती। हिंदी साहित्य का इतिहास साक्षी है। उसमें जो प्रवृत्ति एक बार जागृत हुई वह किसी न किसी रूप में निरंतर बनी रही। आधुनिक हिंदी साहित्य की विविध प्रवृत्तियों के विषय में भी पूर्वोक्त दोनों बातें सटीक हैं। आज हिंदी में प्रचलन पाए जो अनेक ‘वाद’ हैं उनमें से कई पूर्ववर्ती प्रवृत्तियों के ध्वंसावशेषों की भित्ति पर खड़े हैं, कई के मूल में आज की सामाजिक, आर्थिक एवं यौन-संबंधी विषमताएँ हैं–अधिकांश पर पाश्चात्य छाप भी प्रभूत रूप से हैं जो आज की हमारी सामाजिक मनोवृत्ति एवं मन:स्थिति ही के परिचायक हैं।

एतदर्थ, आधुनिक हिंदी साहित्य का निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण करने पर सहसा ही पता चल जाता है कि आज हिंदी में अनेक ‘वाद’ प्रचलित हैं और साहित्य-निर्माण प्रमुख रूप से इन ‘वादों’ के अंतर्गत ही हो रहा है। मुख्य ‘वादों’ के नाम हैं–छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद, छायावाद (Phantasmata), प्रतीकवाद, यथार्थवाद, आदर्शवाद, मानवतावाद, प्रेमवाद, प्रयोगवाद आदि। कबीर और जायसी के साथ रहस्यवाद का संबंध जोड़ा जाता है, प्रतीकवाद को रीतिकालीन साहित्य से संबद्ध माना जा सकता है और आदर्शवाद को भक्ति-काव्य से। अन्यथा सभी ‘वाद’ मुख्य रूप से आधुनिक बौद्धिकविलासिता की देन हैं। सच तो यह कि न तो हमारे साहित्य में इन ‘वादों’ की कोई सुनिश्चित, सीधी परंपरा है और न तो ये हिंदी की मौलिक एवं स्थाई संपत्ति ही हैं। हमारा साहित्य अनायास ही इन ‘वादों’ में उलझ रहा है। इसका परिणाम भी स्पष्ट ही है। इन ‘वादों’ की प्रवृत्ति हममें प्रतिहिंसा की भावना जागरुक करती है जो कला और साहित्य के कलाकार और साहित्यकार को कोसों दूर हटा दे सकती है। यों सिद्ध किया तो यही जाता है कि ये विविध ‘वाद’ अपने यहाँ के साहित्य में पहले भी विद्यमान थे। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए भी यह कहना ही पड़ेगा कि इन साँचों को तैयार करने में ज्यादातर पाश्चात्य मसाले और नमूने से काम लिया गया है। अँग्रेजी में इनमें से कुछ mysticism, Phantasmata (पुराने ईसाई-संतों का छायाभास), symbolism आदि कहलाते हैं। इनमें से कुछ का प्रभाव सीधे अँग्रेजी साहित्य से, कुछ का बँगला से छनकर अँग्रेजी साहित्य द्वारा और कुछ का प्रभाव रूसी साहित्य से पड़ा है।

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आधुनिक हिंदी-साहित्य में छायावाद तथा रहस्यवाद का बोध अँग्रेजी के mysticism शब्द द्वारा होता है। Mysticism की भावना पहले अँग्रेजी से बँगला साहित्य में आई। फिर बँगला-पुस्तकों के हिंदी-अनुवाद द्वारा हिंदी-भाषा-भाषी-जन-समुदाय भी इस प्रकार की भावनाओं से परिचित हुआ। तदुपरांत अँग्रेजी-शिक्षा के बहुल प्रचार के फलस्वरूप इस इस प्रकार की भावनाएँ सीधे अँग्रेजी से ही हमारे साहित्य में घुसने लगीं। पंत, महादेवी आदि की रचनाओं में अँग्रेजी-कवियों–मुख्यत: रोमांटिक युगीन कवियों–कीटस, शेली, वर्डसवर्थ आदि का प्रभाव स्पष्ट झलक जाता है। सच पूछिए तो हिंदी में रोमांटिक युग का सूत्रपात भी अँग्रेजी साहित्य के प्रभाव का ही प्रतीक है। इसी साहित्य के प्रभाव से हिंदी कविता को मानसिक अकृतत्व (mental pessisity) की उलझन से निकलकर हृदय की चिर-उर्वरा भूमि में आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हमारे सुकुमार मधुर कवि पंत, दार्शनिक भाव-जगत को व्यक्त करने वाले महाकवि निराला तथा मनीषी कवि प्रसाद ने इसी साहित्य के प्रभाव से आत्मव्यंजना (subjectivity) की पुकार की–प्रकृति के स्पंदन से अपने हृदय के स्पंदनों का स्वर मिलाया, स्वर-ताल-युक्त लय का निरूपण किया। साथ ही मैं यह कहना भी न भूलूँगा कि कुछ ‘वादों’ का सृजन ऐसे ही दार्शनिक और छायावादी कवियों की रचनानाओं के द्वारा हुआ है। श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र के ‘अंतर्जगत’ में असीम और ससीम का संबंध निश्चित किया है–

“आज बज उठी तेरे कर से वीणा मेरे मन की,
आशातीत अतिथि! लीला कैसी? तेरे इस क्षण की?
जीवन-सागर के इस हट पर अपने सुंदर जग की
सृष्टि अनोखी की है तू ने, जहाँ न रेखा मग की।
नीचे सिंधु भर रहा आहें, हँसते नखत गगन में,
सब से दूर जल रहा दीपक तेरे इस भव्य भवन में।
तेरी धुँधली स्मृति के आगे झुकी विश्व की क्षमता,
भला असीम जगत यह तेरी कर सकता है समता?”

फिर, प्रसाद के साहित्य पर यथार्थवाद तथा आदर्शवाद को लेकर बहस चली। मानवतावाद, प्रेमवाद आदि सार्थक तथा निरर्थक ‘वादों’ की भी सृष्टि हुई। परंतु यह सृजनक्रम यहीं तक सीमित नहीं। यदि किसी स्थान पर अर्थ पूर्णतया स्पष्ट नहीं हुआ तो ‘अस्पष्टतावाद’ की भी नींव पड़ गई। चलिए न, प्रसाद के नाटकों में वीरता, साहस, क्षमा, उदारता, विश्वास, प्रेम आदि गुणों का अपूर्व उत्कर्ष और विकास देखकर कुछ लोगों ने उन्हें आदर्शवादी कह दिया। साथ ही कुछ लोगों ने उनके नाटकों में विरोध तथा झगड़े, मार-काट, हत्या इत्यादि का प्रदर्शन देखकर उन्हें यथार्थवादी करार दिया। वस्तुस्थिति यह है कि छायावादी अपनी अंतर्दृष्टि से अदृश्य को देखता है, अस्पृश्य को छूता है और अनुभव से परे की बातें किया करता है। उसकी आँखें विश्व के जर्रे-जर्रे पर पड़ती हैं। परंतु ऐसी उच्च-कोटि की ग्राहिणी-शक्ति हमारी इंद्रियों के लिए संभव नहीं। फलत: उनकी रचनाओं से पाठकों की अनुभूति का साधारणीकरण नहीं हो पाता।

अस्पष्टता का दूसरा कारण छायावाद काव्य में अभिधा-प्रयोग के विरुद्ध लक्षणा का प्रयोग हो सकता है। द्विवेदी-युग का काव्य इतिवृत्तात्मक था। कवि उससे ऊब चुके थे। हिंदी-काव्य में इसकी प्रतिक्रिया हुई! कवियों ने भाषा, भाव, विचार–सभी क्षेत्रों में नयापन लाने की कोशिश की। सफलता मिली। अनुभूति की जगह कल्पना से काम लिया जाने लगा। अज्ञात प्रियतम के प्रति उनके प्रेम ने उनकी व्यंजना को अंतर्मुखी बना दिया। उनके प्रियतम का न कोई रूप है, न रंग–उसके रहने का न कोई देश है, न स्थान। फलत: आलंबन में ही अस्पष्टता आ गई। भाषा और शैली के क्षेत्र में भी इन कवियों ने स्वेच्छाचारिता दिखलाई। विशेष्य के लिए विशेषण का प्रयोग, विशेषण-विपर्यय, अन्योक्ति-पद्धति–ये सब भाषा के क्षेत्र में नवीन प्रयोग थे। अत: काव्य अस्पष्ट हो गया।

छायावादी रचनाओं के अस्पष्ट और अगम्य होने का तीसरा महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि छायावाद-काल के प्राय: सभी कवियों–जिनमें पंत और निराला प्रमुख हैं–शब्द-मोह, चित्र-मोह और कल्पना-मोह का आधिक्य है। इन ‘त्रय मोहों’ के फेर में पड़कर इन कवियों की प्रवृत्ति (व्यंजना) केंद्रीयगामी हो गई–रूपकों, उपमाओं और उत्पेक्षाओं के जमघट खड़ाकर ये कवि गौण चित्रों में बहक जाते हैं। अंग्रेज कवि शेली के इसी काव्यगत दोष को लक्ष्यकर श्री लेविस ने लिखा है–“A general tendency of the images (is) fo forget the status of the metophos or simile that introduced them and to assume an autonomy and a right to propogate.”1 नतीजा यह होता है कि ये कवि अपनी रचनाओं में न तो विचारगत सामंजस्य ही स्थापित कर पाते हैं और न रागात्मक संबंध ही। फलस्वरूप उनकी रचनाएँ पाठकों के लिए अगम्य एवं दुर्बोध हो जाती हैं। निरालाजी की गीतिका से एक उदाहरण लें–

“पावन करो नयन!
रश्मि नभ-नील पर
सतत शत रूप धर
विश्व-छवि में उतर
लघुकर करो चयन
प्रतनु शरविंदु-वर
पद्म-जल-विंदु-पर
स्वप्न-जागृत सुघर
दु:ख निशि करो शतन!”2

पहली बात तो यह कि कविता के इटालिक अंशों का अर्थ लगाना ही असंभव-सा है (कम से कम इन पंक्तियों के लेखक के लिए)। फिर जब पुस्तक में दी गई टिप्पणियों की सहायता से किसी प्रकार अर्थ लग भी जाता है तो पाठकों के लिए भावों का विश्लेषण करना–उनमें संगति बैठानी प्राय: दुष्कर ही है। छायावाद युग की प्राय: सभी उल्लेखनीय रचनाएँ–गीतिका, अनामिका, परिमल, तुलसीदास, पल्लव3, गुंजन, निहार, नीरजा, सांध्य-गीत, आँसू, कामायनी–इस व्याधि से पीड़ित हैं।

छायावादी कवियों की एक बड़ी विशेषता यह है कि संसार उनको चिर-नवीन, चिर-कुतूहलमय एवं चिर-मनोहर प्रतीत होता है। उन्हें यदि यहाँ बुराई दीखती है तो सौंदर्य की नश्वरता एवं कोमल भावनाओं की उपेक्षा के रूप में। यही कारण है कि करुण प्रसंगों पर ये कवि अच्छा लिख सके हैं, क्योंकि उनमें प्राय: सौंदर्य का मिश्रण रहता है। यथा–

“अभी तो मुकुट बँधा था माथ,
हुए कल ही हल्दी के हाथ,
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले भी न चुंबन शून्य कपोल”
“हाय रुक गया यही संसार
बना सिंदूर अंगार
बाल सिंदूर अंगार
बाल-हत लतिका वह सुकुमार
पड़ी है छिन्नाधार!”

–पंत

किंतु यह स्थापना कि छायावादी काव्य-प्रभूत रूप से पलायनवादी था–ठीक नहीं। छायावाद की मूल प्रेरणा सुंदर का प्रेम था, जीवन या जगत से पलायन नहीं। वस्तुत: सौंदर्य-प्रेम के कारण इस खेमे के कवियों की दृष्टि जीवन और जगत की समस्याओं की ओर जाती ही नहीं। पंत, निराला, महादेवी में पलायन की भावना प्रधान नहीं।

छायावाद शैली की श्रेष्टतम रचनाएँ वे गीतियाँ हैं जिनमें कलागत सौंदर्य के साथ-साथ विषम-वस्तु की महत्ता भी असंदिग्ध है–जिनमें जीवन और जगत की मार्मिक छवियों से रागात्मक संबंध, अभिव्यक्तिगत सौंदर्य के साथ-साथ अक्षुण्ण है। सुप्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक दार्शनिक अलेक्जेंडर4 के अनुसार कला का सौंदर्य और उसकी महत्ता भिन्न चीजें हैं। कलागत सौंदर्य अभिव्यक्ति एवं शैली की पूर्णता और निर्दोषिता में है जबकि कलाकृति और कलाकार की महत्ता (greatness) विषय-वस्तु तथा दृष्टि की व्यापकता (profoundity) पर निर्भर है। जहाँ भी इन कवियों की दृष्टि अपनी वास्तविक समस्याओं की ओर गई है, इनकी अनुभूति व्यापक, अभिव्यंजना मर्मस्पर्शी हो उठी है। कला-सौष्ठव के साथ अनुभूति की गहराई–सोने में सोहागा। काव्य निखर उठा है।

पंत में छायावाद का निखरा हुआ और प्रकृत रूप मिलता है। कवि की आरोप-विधायनी कल्पना केवल प्रकृति के प्रति कुतूहल एवं रहस्य भावना तक ही सीमित नहीं; वह ‘पल्लव’ तक आते-आते, जैसे जीवन और जगत के मार्मिक तथ्यों का गूढ़ और अगूढ़ संबंध-प्रसार का चित्रण करने लगी है। कर्म-मार्ग की कठोरता से कवि अप्लावित नहीं। वह कर्म-सौंदर्य से साक्षात्कार चाहता है। उसकी दृष्टि जगत और जीवन के पूर्ण स्वरूप की ओर है। ‘पल्लव’ की ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता, इसी कारण, बड़ी सुंदर बन पड़ी है। परिवर्तन संसार का अटल नियम है। ज्ञात या अज्ञात रूप में जीवन के सभी पहलुओं पर इसका प्रभाव पड़ता रहता है। उसका संबंध जीवन के नित्य स्वरूप से है। फलत: कवि की दृष्टि विषय-वस्तु से दूर नहीं जाती। कला-सौष्ठव के फेर में पड़, वह वस्तु-विधान को विशृंखल नहीं करता। संभवत: छायावादी रचनाओं में ‘परिवर्तन’ शीर्षक कविता ही सर्वप्रथम और इसी कारण अद्वितीय भी है, जिसमें कवि ने पहली बार यह अनुभव किया कि चित्र-भाषा और नाद-सौंदर्य ही काव्य-सौष्ठव के प्राण नहीं। साधारण-सरल-सुगम पदावली में भी कवि अपनी सूझ-बूझ और सृष्टि के मार्मिक तथ्यों के चयन द्वारा चमत्कार उत्पन्न कर सकता है। जैसे–

“तुम नृशंस-नृप से जगती पर चढ़ अनियंत्रित
करते हो संसृति को उत्पीड़ित, पद मर्दित
नग्न नगर कर, भग्न भवन, प्रतिमाएँ खंडित
हल लेते हो विभव, कला-कौशल चिर संचित।
अधि-व्याधि, बहु वृष्टि, वात-उत्पात अमंगल।
वह्नि, बाढ़, भूकंप–तुम्हारे विपुल सैन्य-दल।”

–पंत : ‘परिवर्तन’

–सीधे-सादे शब्द। मर्म-स्पर्शी भाव। इतना ही नहीं। चित्रात्मकता और नाद-सौंदर्य में भी यह कविता बेजोड़ है। रूपको और लाक्षणिक शैली का बड़ा सफल प्रयोग इस कविता में हुआ है। एक उदाहरण लें–

“अहे वासुकि सहस्र फन
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरंतर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर
घूमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर
मृत्यु तुम्हारा गरल दंत कंचुक कल्पांतर
शत-शत फेनोच्छवसित, स्फीत फूत्कार भयंकर,
अखिल विश्व ही विवर, वक्र कुंडलदिग्मंडल”

–पंत : ‘परिवर्तन’

स्पष्ट है कि कवि की दृष्टि विचित्रता पर मुख्यत: नहीं। वह प्राचीन परंपरा को आत्मसात् कर चल रहा है। लक्षणा और रूपकों की बंदिश द्रष्टव्य है। फिर भी कहीं तद्रूपता और असामंजस्य नहीं। भावों में सर्वत्र समन्विति है।

निराला जी अपने वेदांत ज्ञान के कारण दु:खवाद से बचे रहे। पौरुष-भावना का जितना सुंदर सामंजस्य उनके काव्य में है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इनकी रचनाओं में खेद और विषाद का स्थान नहीं। ओज इनके काव्य का गुण है, निरंतर संघर्ष उसका विषय। उनकी प्रतिभा शुरू से ही बहुमुखी रही है। ‘तुम और मैं’ शीर्षक कविता में वह वेदांती रहस्यवाद “नाद वेद आकार सार” का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं, तो ‘राम की शक्ति-पूजा’ और ‘तुलसीदास’ जैसे महत्तम कृतियों में अपनी अंतर्मुख कल्पनाओं एवं उद्भावनाओं को सौंदर्य की गोचर भूमि पर प्रतिष्ठित करते पाए जाते हैं। ‘रेखा’ शीर्षक कविता में जहाँ यह कवि प्रथम प्रेम के उदय पर “बीथियों में कलरव सुख-चुंबित प्रणय” का मधुर आकर्षण पाकर उल्लसित होता है, वहाँ ‘इलाहाबाद के सड़कों पर’ का वर्णन करते हुए उसका ध्यान श्रमजीवियों के कष्टों पर भी जाता है।

महादेवी में लोकोत्तर (आध्यात्मिक?) अतृप्ति की एक आग है जो निरंतर धधकती रहती है आप तृप्ति चाहती ही नहीं–“मेरे छोटे जीवन में देना न तृप्ति का कण भर”। वेदना से इन्हें स्वाभाविक प्रेम है। मिलन-सुख भी इनके लिए तुच्छ है–“मिलन का मत नाम ले, मैं विरह में चूर हूँ”। संभवत: मानुषिक प्रयासों में आपकी आस्था नहीं। किसी अप्राप्य के चिंतन में ही आप तल्लीन-सी रहती हैं। यथा–

“तुम अमर प्रतीक्षा हो, मैं, पग विरह का धीमा
आते-आते मिट जाऊँ, पाऊँ न पथ की सीमा।”
“पाने में तुमको खोऊँ, खोने में समझूँ पाना,
यह चिर-अतृप्ति हो जीवन, चिर-तृष्णा हो मिट जाना।”

–महादेवी

यह चिर अतृप्ति ही आदर्शवादिता का मूल उत्स है। आपकी निराशा में शक्ति है, उन्माद है, और है प्रोत्साहन। हाँ, प्रसाद में और कहीं-कहीं दिनकर आदि में भी, पलायन की भावनाएँ मिलती हैं। यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं। परंतु यह भी द्रष्टव्य है कि ऐसे पलायनवादी उद्गार प्राय: असुंदर संबंधी विरक्ति या उपेक्षा के द्योतक हैं। प्रसाद के काव्य में असंतोष की यह भावना आध्यात्मिकता और चिर-सौंदर्यनिष्ठा की ओर उन्मुख हो चिर-मंगल का संदेश देती है। समरसता की भावना से प्रसाद का काव्य ओत-प्रोत है। उनका एक गीत है–“ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक! धीरे-धीरे।” वस्तुत: इस गीत में पलायन-भावना नहीं, कहने का ढंग मात्र ऐसा है। पढ़ने पर उदासीनता या उदासी का भाव नहीं आता, बल्कि हृदय उल्लासित हो उठता है।

फिर भी छायावादी काव्य एकांगी था। प्रस्तुत के स्थान पर अप्रस्तुत का विधान, वास्तविक अनुभूति के स्थान पर ऊहात्मक कल्पना का अतिरेक, अप्राकृतिक में प्राकृत, अमानव में मानव, जड़ में चेतन का आरोप–छायावादी काव्य की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं। वर्डसवर्थ के स्काईलार्क (लवा)5 की भाँति ये कवि गगन में मुक्त विहार तो करते हैं, लेकिन जमीन पर निगाह रखना अधिक पसंद नहीं करते। वस्तुत: जीवन के तीन पक्षों सत्यं, शिवं, सुंदरं में छायावादी कवि-मात्र सौंदर्य में उलझ कर रह जाते हैं। उनमें जीवन के प्रति संश्लिष्ट दृष्टिकोण का वस्तुत: अभाव है।

(3)

जीवन के प्रति संश्लिष्ट दृष्टिकोण के अभाव में छायावादी काव्य की अनुभूतिजन-संवेदना से क्रमश: दूर पड़ता गया। जिस क्रांति के सूत्रधार के रूप में छायावाद का अवतरण हिंदी काव्य-गगन में हुआ था, वह क्रांति ही स्वयं इसी के स्वर में गल गई। ‘काव्य में रहस्यवाद’ शीर्षक निबंध में असंबद्ध सैद्धांतिक चर्चा के फेर में पड़ गए हैं। जहाँ तक रसानुभूति का प्रश्न है, शुक्ल जी का कहना है कि छायावादी रहस्यवाद हमें उचित संतुष्टि नहीं देता–ठीक है। किंतु इस असंतोष का जो बौद्धिक निरूपण उन्होंने प्रस्तुत किया है, वह कहाँ तक मान्य और ग्राह्य है–कहना कठिन है। जो भी हो, इस असंतोष ने छायावाद को अधिक पनपने नहीं दिया। समाज की गति चक्रारोही है। वह गत्यावरोध बर्दाश्त नहीं कर सकता। इधर मार्क्स और फ्रायड के दर्शनों से भी हिंदी जनसमुदाय परिचित हो चुका था अथवा परिचित हो रहा था। फलत: छायावाद के विरुद्ध भी प्रतिक्रिया आरंभ हुई।


1. उक्त लेखक की Revaluation नामक पुस्तक, पृष्ठ-204

2. गीतिका, पृष्ठ-9

3. ‘पल्लव’ में यह दोष, कुछ हद तक, बहुत कम है। –लेखक

4. “उक्त लेखक की Beauty and other forms” नामक पुस्तक देखिए!

5. William Wordsworth–की प्रसिद्ध कविता–“To the skylark” अँग्रेजी साहित्य की अक्षय निधि है। कवि का दर्शन–जीवन को वह जिस रूप में देखना चाहता है–कविता के माध्यम से मानो फूट पड़ा है। वर्डसवर्थ का स्काईलार्क कोई साधारण पक्षी नहीं। अरे, वह तो मानव-मात्र के लिए आदर्श है! वह Ethereal Minstrel–स्वर्ग का गायक है, किंतु संसार से विरक्त नहीं। Heaven–आकाश से उसे स्वाभाविक प्रेम है, लेकिन Home–सांसारिक चिंताओं को हेय नहीं समझता। कैसी सम्यक दृष्टि! काश, हर मानव इस दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप दे पाता!

–लेखक


Image Courtesy: LOKATMA Folk Art Boutique
©Lokatma


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हरींद्र द्वारा भी