सोखोदेवरा : एक तीर्थ से गुजरते हुए

सोखोदेवरा : एक तीर्थ से गुजरते हुए

सदियों से पराधीन भारत के समक्ष दो महनीय कार्य थे। पहला था परतंत्रता के अंधकार से मुक्त होना और दूसरा स्वतंत्र भारत में ऐसे राम राज्य की स्थापना करना, जहाँ किसी प्रकार का भेद-भाव न हो। जात-पांत, धर्म-संप्रदाय, गरीब-अमीर की विषमता न रहे और समता का साम्राज्य हो। देश सही अर्थों में फले-फूले। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने साबरमती और सेवाग्राम जैसी संस्थाओं की स्थापना की थी। किंतु ऐसा हो न सका। उनके जीवन काल में उनके एक लक्ष्य की ही पूर्ति हो सकी थी। देश स्वतंत्र हो गया था। किंतु, दूसरा काम यानी रामराज्य के उनके आदर्शों को समाज में स्थापित करना अभी बाकी था। लोकनायक जयप्रकाश उनके उस अधूरे कार्य को पूरा करने में आजीवन लगे रहे। इसलिए भारतीय जन-मानस में जयप्रकाश दूसरे गाँधी के रूप में दिखाई पड़ते हैं। मैं खुद को भी उन लाखों-करोड़ों लोगों में मानता हूँ, जो गाँधी और जयप्रकाश के प्रति वास्तविक श्रद्धा रखते हैं। इसलिए जीवन में जब कभी भी मौका मिला, साबरमती, वर्धा, सेवाग्राम आदि जगहों में गाँधी और जयप्रकाश की उस मनोवृति का दर्शन करने जाता रहता हूँ, जिसने रचनात्मक कार्यकर्ताओं की एक समृद्ध टोली तैयार की थी।

साबरमती, सेवाग्राम, पवनार तथा अन्य जो आश्रम उस समय बने थे, वे अंतर्मुखी थे। उनके अधिक से अधिक कार्य आश्रम के अंदर चलते थे। लेकिन आजादी के बाद 5 मई, 1954 को लोकनायक जयप्रकाश द्वारा बिहार के नवादा जिले में निर्मित सोखोदेवरा आश्रम का मुख्य काम गाँवों में आत्मनिर्भरता पर जोर देना था। सत्य और अहिंसा के आधार पर शोषणहीन, शासन-मुक्त अहिंसक समाज की रचना करना, जिससे ग्राम्य जीवन सुखद, स्वस्थ, सुसंस्कृत, स्वशासित और स्वावलंबी बन सके। इसके संचालन हेतु उन्होंने ग्राम निर्माण मंडल का गठन किया था। इस नई संस्था का काम यह था कि इसके कार्यकर्ता गाँवों के विकास में अधिक समय लगायेंगे। इस प्रकार यह नई संस्था नई परिस्थिति की उपज थी।

सोखोदेवरा आश्रम का नाम तो बरसों से सुनता आ रहा था। लेकिन उसे देखने का अवसर नहीं निकाल पाया था। लेकिन वर्ष 2021 के फरवरी माह में बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के पद पर आसीन होने के बाद जब मेरी बात ग्राम निर्माण मंडल के अध्यक्ष प्रभाकर कुमार से हुई तो उनका एक ही अनुरोध था कि मैं सोखोदेवरा आश्रम का सर्वेक्षण अथवा निरीक्षण करूँ और बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से ग्राम निर्माण मंडल को मिलने वाले चरखों और अनुदानों का सही ढंग से उपयोग हो रहा है या नहीं–मैं उन्हें ईमानदारी से बताऊँ। जे.पी. की कर्मभूमि तो वैसे भी मेरे लिए विशेष थी। इसलिए सोखोदेवरा आश्रम का प्रोग्राम बनाने में मैंने तनिक भी देरी नहीं की।

वैसे तो किसी भी जगह पहली बार जाना अतिरिक्त उत्साह पैदा कर देता है, लेकिन जयप्रकाश की कर्मभूमि मेरे लिए विशेष थी, इसलिए वहाँ जाने को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित था। नियत तिथि यानी 27 फरवरी 2021 की सुबह-सुबह हम दो गाड़ियों में लदकर पटना से निकल पड़े। एक गाड़ी में मैं अपने सहयोगी राजीव कुमार के साथ, जबकि दूसरी गाड़ी में अध्यक्ष प्रभाकर जी अपने सहयोगियों के साथ थे।

पटना से सोखोदेवरा (कौआकोल) की दूरी तकरीबन 160 किलोमीटर है। करीब एक घंटे के सफर के बाद हमें चाय की तलब होने लगी। हम सब बख्तियारपुर के पास एक ढाबे पर रुक गए। गरमा-गरम चाय पी और फिर बढ़ चले गंतव्य की ओर। सड़कें अच्छी थीं। हालाँकि कहीं-कहीं उबड़-खाबड़ सड़क मिली और कुछेक जगहों पर जाम का भी सामना करना पड़ा। लेकिन जे.पी. की कर्मभूमि देखने का उत्साह ऐसी छोटी-मोटी मुश्किलों पर हावी रहा और चार-पाँच घंटे का सफर बड़े आराम से कट गया।

दोपहर के 1 बज रहे थे। कौआकोल बाजार से होते हुए दोनों गाड़ियाँ ग्राम निर्माण मंडल द्वारा संचालित लक्ष्मीनारायण उद्योग भवन के प्रवेश द्वार पर पहुँचकर रुक गईं। वहाँ ग्राम निर्माण मंडल के प्रधानमंत्री अरविंद कुमार सिंह दर्जनों कार्यकर्ता के साथ सूत की माला लेकर हमारे स्वागत में खड़े थे। स्वागत-सत्कार के बाद प्रभाकर जी ने सभी से हमारा परिचय कराया और फिर हम भवन के अंदर प्रवेश कर गए। अरविंद सिंह गाइड की भूमिका में थे। वे कहने लगे कि लोकनायक जयप्रकाश ने क्षेत्र के जमींदारों से आरजू-मिन्नत करके 140 एकड़ जमीन ली थी। उसमें से 60 एकड़ जमीन आश्रम के तहत तथा बाकी भूमिहीनों के बीच बाँट दी गई। उनका कहना था कि जिस समय इस आश्रम की स्थापना हुई थी, उस समय इस क्षेत्र को काला पानी कहा जाता था। यहाँ मलेरिया, कुष्ठ रोग और कालाजार जैसी बीमारियों का भयंकर प्रकोप था। सुदखोरी से लोग परेशान थे। यहाँ की ज्यादातर भूमि पथरीली और बंजर थी। उस दौरान जयप्रकाश ने स्वयंसेवकों के सहयोग से कठिन परिश्रम और संकल्प से उसे खेती योग्य बनाया। स्वयंसेवकों के साथ जयप्रकाश सबेरे से ही काम में लग जाते थे। वे आश्रम की भूमि को समतल करते, सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था करते, कंपोस्ट खाद बनाते तथा लोगों को सूती, रेशमी, ऊनी एवं सूत की कटाई और चरखा चलाने का प्रशिक्षण देते थे। उस दौरान जयप्रकाश ने कुष्ठ सेवा-केंद्र, सामान्य चिकित्सालय तथा मात-सेवा सदन की स्थापना की थी। साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्रामीण उद्योग परियोजना समिति, खादी ग्रामोद्योग समिति, कृषि समिति, लघु सिंचाई समिति तथा ग्राम निर्माण समिति का गठन किया था। जयप्रकाश और उनके स्वयंसेवक संगठन, भूमि वितरण तथा निर्माण का कार्य भी करते थे। दो-तीन वर्षों की मेहनत के बाद यहाँ नये जीवन का आभास मिलने लगा था। भूदान वाली जमीन पर दो गाँवों को बसाया गया था, जिनमें अधिकतर दलित थे। इन दोनों गाँवों का नाम गाँधी धाम तथा जय कस्तुरबा ग्राम रखा गया। डेढ़-दो वर्षों में ही इन दोनों गाँवों में कृषि उत्पादन पहले से चार गुना अधिक होने लगा था। ग्रामीणों की आर्थिक उन्नति हुई थी और उनका आत्मविश्वास बढ़ा था। प्रभाकर जी कहने लगे कि विभिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए ग्राम निर्माण मंडल का काम आज भी अनवरत रूप से चल रहा है।

अब हम एक बड़े हॉल में हैं, जिसमें 20-25 आदिवासी महिलाएँ हाथ चरखे पर धागा तैयार कर रही थीं। पूछने पर पता चला कि इनमें से अधिकांश महिलाएँ बिरहोर टाँड़ गाँव की है, जो यहाँ से 3 किलोमीटर की दूरी पर है। दूसरे हॉल में आधा दर्जन महिलाएँ धागे का लच्छा (गुंडी) तैयार करने में तल्लीन थी। मैं खादी वस्त्र निर्माण की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता हूँ। जानकारी मिलती है कि खादी कपड़े का निर्माण कई चरणों में पूरा होता है। सबसे पहले चरखे पर सूत की कताई होती है, फिर गुंडी तैयार करने के बाद उसकी रंगाई होती है। तत्पश्चात करघे पर बुनाई होती है। हम ध्यान से सुनते रहे। यह समझ में आया कि आधुनिक तकनीक के युग में भी खादी के अधिकांश काम हाथ और पैर से होते हैं। यह पूरी तरह कौशल और कला पर आधारित है।

तत्पश्चात हम प्रथम तल पर अवस्थित एक हॉल में प्रवेश करते हैं। उस हॉल में आठ करघे थे, जिन पर बुनकर काम कर रहे थे। उन करघों से निकल रही खट-खट की आवाज मुझे सुकून दे रही थी। मैं कुछ मिनटों तक उसका आनंद लेता रहा। फिर एक बुनकर से काम के एवज में उसे मिलने वाली पारिश्रमिक के बारे में पूछता हूँ। जवाब मिलता है–एक थान की बुनाई पर 600 रुपया। एक थान की बुनाई में डेढ़-दो दिन का समय लगता है। मतलब कि दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद इन्हें 300 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी मिलती है। उस परिसर में कार्यरत ब्रेड, बिस्कुट, मधुमक्खी पालन एवं बेकरी की ईकाइयों को भी देखने की इच्छा थी। लेकिन हम सभी को भूख जोरों की लगी हुई थी, इसलिए वहाँ से हम आश्रम के अतिथि-गृह के लिए निकल पड़े।

अतिथि-गृह का कमरा वातानुकूलित और करीने से सजा हुआ था। आधुनिक परिवेश, साफ-सुथरा कमरा, थोड़ी सी सजावट और फूल-पते भी। कुल मिलाकर अतिथि-गृह अच्छा लगा। ग्राम निर्माण मंडल के कोषाध्यक्ष दिलीप मंडल बताने लगे कि जे.पी. जब 1954 में यहाँ आए थे, तो न बिजली थी, न सड़क, न फोन और न आने-जाने का कोई साधन। आश्रम तक पहुँचने के लिए उन्हें 18-20 किलोमीटर की दूरी बैलगाड़ी से तय करनी पड़ती थी। 1961 में जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद यहाँ आए थे, तब उनके लिए कचना मोड़ से आश्रम तक पहुँचने के लिए कच्ची सड़क का निर्माण कराया गया था। जे.पी. के साथ स्वयंसेवकों की एक टोली भी रहती थी। प्रारंभ में यहाँ पर जयप्रकाश और स्वयंसेवकों के लिए फूस की झोपड़ियों बनी। किंतु दो-तीन साल बाद, मिट्टी के साफ-सुथरे और हवादार खपरैल मकान बनाये गए, जो आज भी मूल रूप में विद्यमान है। तब जे.पी. के यहाँ आने-जाने वालों का रेला लगा रहता था। जब तक यह अतिथि-गृह नहीं बना था, तब तक वैसे मेहमानों को जयप्रकाश अपनी कुटिया में सुलाया करते थे। गरमी के दिनों में कार्यकर्ता पेड़ के नीचे भी सो जाते थे। 1956-57 में जयप्रकाश ने बाहर से आने वाले मेहमानों के लिए कुछेक कमरों का यह अतिथि-गृह बनवाया था। सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, खुद मेहनत, अस्पृश्यता निवारण और सहिष्णुता-आश्रम के ये नियम सभी के ऊपर लागू थे। केवल आश्रमवासियों के लिए ही नहीं, वरन जो कोई भी मेहमान यहाँ आकर ठहरते थे, उनके लिए इन नियमों का पालन करना आवश्यक था। जे.पी. के समय निर्धारित किए गए नियम आज भी यथावत् हैं।

अतिथि-गृह में जलपान-गृह भी है। अध्यक्ष प्रभाकर जी के अनुरोध पर हम सभी जलपान-गृह में रखी कुर्सियों पर बैठ गए। जलपान-गृह भी साफ-सुथरा और व्यवस्थित था। खाना निःसंदेह बहुत स्वादिष्ट था। शाकाहारी सब्जी, रोटी, चावल और दाल खाकर मन तृप्त हो गया। भोजन के क्रम में ही यह सर्वसम्मत राय बनी कि एक घंटे के विश्राम के बाद हमलोग जे.पी. निवास के दर्शन करेंगे और उसके बाद वहाँ की संध्याकालीन प्रार्थना में शामिल होंगे।

अतिथि-गृह से 500 मीटर की दूरी पर है जे.पी. निवास। निवास के प्रवेश-द्वार के निकट जयप्रकाश की प्रतिमा पर नजर पड़ी। वहाँ कुछ स्वयंसेवक फूल-माला लिए हुए खड़े थे। प्रभाकर जी वहाँ उपस्थित स्वयंसेवकों से मेरा परिचय कराते हैं। फिर हम सभी बारी-बारी से जे.पी. की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर निवास की तरफ मुड़ते हैं। निवास के प्रवेश-द्वार पर रुककर चारों ओर नजरें दौड़ाता हूँ। निवास की बनावट अपने आप में विशिष्ट है। ईंट की दीवारें, खपरैल छप्पर, खिड़कियाँ, रोशनदान, नीचे की जमीन-सब ज्यों की त्यों। उसमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया गया है। निवास का रख-रखाव बहुत ही साफ-सुथरा, खूबसूरत और दुरुस्त। बरामदे में सूचना पट्टिका लगी हुई है। ध्यान से उसे पढ़ता हूँ। उस पर जे.पी. के जन्म से लेकर मृत्यु तक की स्मरणीय तिथियों का उल्लेख है। तत्पश्चात अंदर के कमरे में प्रवेश करता हूँ। जे.पी. के कमरे का साक्षात दर्शन। छोटा सा कमरा, जिसमें गद्दी बिछी हुई है। सामने की दीवार पर जे.पी. की विशाल तस्वीर है। बैठकखाने की दूसरी दीवार पर प्रख्यात चित्रकार शांति रंजन गंगोपाध्याय की पेंटिंग प्रदर्शित है। जयप्रकाश का डेस्क पूर्ववत रखा है। अरविंद कहते हैं कि यह वही कमरा है, जिसमें देश-विदेश से आए हुए अतिथियों से जे.पी. मुलाकात करते थे। 1961 में जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद आए थे तो यहीं गद्दी पर बैठे थे। 1954 से लेकर 1974 तक यह जयप्रकाश का निवास-स्थान था। 1974 के जयप्रकाश आंदोलन की पूरी कल्पना यहीं उभरी थी। एक स्वयंसेवक बताते हैं कि जे.पी. इसी गद्दे पर बैठते थे और उनके सामने देश-विदेश की ख्यात हस्तियाँ बैठा करती थी। उनमें बिनोबा भावे, त्रिपुरारी शरण, कर्पूरी ठाकुर और सीमांत गाँधी से लेकर चंबल का दुर्दांत डकैत माधो सिंह तक होते थे। वहाँ से अंदर की ओर कदम बढ़ाते हैं। जे.पी. और प्रभावती का छोटा-सा कमरा। वही शयन कक्ष, वही ड्राईंगरूम। दरवाजे, खिड़कियाँ, बेड, रोशनदान, नीचे की जमीन सब वही। जे.पी. के अमेरिका प्रवास के दौरान प्रयोग में लाई गई टोपी और रोजाना उपयोग में लाए गए कटोरा, चप्पल, छड़ी, कुर्सी, टेबुल, चौकी इत्यादि इस कमरे में प्रदर्शित हैं। इसी कमरे की दीवार पर नामचीन चित्रकार एस.एम. कुलकर्णी की पेंटिंग भी टँगी हुई है। पिछवाड़े में रसोई घर है। इस छोटे से रसोई घर में ही जे.पी. और उनके अतिथियों का भोजन तैयार होता था। मुझे लगा मानो जे.पी. जीवित हैं अपनी इस कुटिया में। मुझे यहाँ हर जगह जे.पी. नजर आ रहे हैं। कहीं टहलते हुए, धूप सेवन करते हुए, लोगों से बात करते हुए, चरखा कातते हुए, कुष्ठ रोगियों की सेवा करते हुए। यहाँ के चप्पे-चप्पे पर इतिहास के कण बिखरे हैं। उनकी जीवन-शैली को बहुत ही सहजता से संजोकर रखा गया है। यहाँ कुछ देर ठहरने पर ही समय-चक्र में पीछे जाने का पूरा आभास होता है। चारों तरफ सादगी और स्वच्छता। कितनी शांति और सफाई है यहाँ।

तभी अरविंद जी की आवाज से मेरी तंद्रा टूटती है और मैं वर्तमान में लौट आता हूँ। अरविंद जी याद दिलाते हैं, ‘सर, प्रार्थना का समय हो रहा है।’ कलाई घड़ी की ओर नजर दौड़ाई तो 6 बज रहे थे। हमलोग बरामदे में बिछी दरी पर बैठ गए। वहाँ दर्जनों लोग पहले से बैठे थे। कहते हैं जे.पी. और अन्य आश्रमवासी प्रतिदिन सुबह-शाम प्रार्थना किया करते थे। प्रार्थना के बाद वे सभी के साथ बैठकर सवाल-जवाब भी किया करते थे। कोषाध्यक्ष दिलीप मंडल ने मंद स्वरों में बापू के प्रिय भजन–‘रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम’ की शुरुआत की। वहाँ बैठे सभी लोग उनका साथ दे रहे थे। एक के बाद एक भजन। ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे।’ उसके तुरंत बाद ‘मानव-मानव एक समान, रहे न भेदभाव का नाम।’ प्रार्थना की ध्वनि वातावरण में गुंजायमान हो रही थी। प्रार्थना के वे स्वर दिनभर की सड़क यात्रा से थके हुए मेरे मन को राहत प्रदान कर रहे थे–एक थेरेपी की तरह। प्रार्थना खत्म होने के बाद भी मैं बहुत देर तक मन ही मन उन्हें गुनगुनाता रहा।

शाम का धुंधलका गहराने लगा था। हम लौट पड़े गेस्ट हाउस की ओर। गेस्ट हाउस में गरमा-गरम पकौड़े और चाय का सेवन कर तरोताजा हो गया। फिर ग्राम निर्माण मंडल और आश्रम की गतिविधियों पर बैठक शुरू हो गई। औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद, गया इत्यादि जिलों से आए ग्राम निर्माण मंडल के मंत्री अपनी-अपनी गतिविधियों के बारे में हमें जानकारी दे रहे थे। मैं गौर से उनकी बातों को सुनता रहा। उनकी बातों का लब्बोलुआब यही था कि उनके कार्यक्रमों को पूरा करने में खादी बोर्ड के सक्रिय सहयोग की जरूरत है।

बैठक के बाद हम बरामदे में लगी कुर्सियों पर बैठ गए। रात्रि भोजन में अभी विलंब था। अतः इधर-उधर की चर्चा चल पड़ी। तभी प्रभाकर जी ने गेस्ट हाउस के एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इसी कमरे में जे.पी. ने चंबल घाटी के खतरनाक डाकू माधो सिंह को लगभग एक माह तक छिपाकर रखा था। मुझे सहसा स्मरण हो आया। चंबल के कुख्यात डकैतों के आत्मसमर्पण की घटना जयप्रकाश की जीवन की स्मरणीय घटनाओं में से एक है। मैं प्रभाकर जी से विस्तार से जानना चाहता हूँ। प्रभाकर जी आँखें बंद कर अतीत में चले गए। कहने लगे कि चंबल के कुख्यात डकैत माधो सिंह पर सरकार ने डेढ़ लाख रुपये का इनाम रखा था। उसके गिरोह में सैकड़ों डाकू थे और सबके पास अत्याधुनिक हथियार थे। उन्हें पकड़ने के सरकार के सभी प्रयास व्यर्थ साबित हो रहे थे। सरकार परेशान थी। सन् 1972 की बात है। डाकू माधो सिंह भेस बदलकर पटना आया। पटना के कदमकुआँ स्थित चरखा समिति में जयप्रकाश के समक्ष पहुँचते ही वह उनके पैरों पर गिर पड़ा। उसने कहा, ‘मैं चंबल घाटी के डाकुओं की तरफ से आपके पास आया हूँ। हम सब आत्मसमर्पण करना चाहते हैं, इसके लिए आपका सहयोग चाहिए।’ पहले तो जयप्रकाश जी ने इसे संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री का काम कहकर टाला। लेकिन माधो सिंह अड़ा रहा कि वह उनसे मध्यस्थता के वचन लिए वगैर नहीं जाएगा। अंततः जयप्रकाश जी को मध्यस्थता की बात स्वीकार करनी पड़ी। उन्होंने कहा–‘आपने तो मुझ पर बहुत बड़ा वचन डाल दिया है।…मैं मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों से बात करूँगा।…मुझे अगर पक्का भरोसा हो जाएगा कि ये सरकारें मेरी बात मानेंगी, तब मैं इसमें हाथ डालूँगा। उसके बाद जयप्रकाश जी ने माधो सिंह को आश्रम के इसी कमरे में छिपाकर रखा और उस बीच संबंधित राज्य सरकारों से बातचीत शुरू की। जयप्रकाश के प्रयास से ही 14 अप्रैल, 1972 को चंबल घाटी के 300 खूँखार डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था। खूंखार बागियों के आत्मसमर्पण की यह घटना इतिहास में बेमिसाल है। यह संपूर्ण विश्व में अपनी तरह की पहली अकेली घटना है।

रात्रि के नौ बज चुके थे और भोजन तैयार हो चुका था। जलपान-गृह के स्वयंसेवकों ने बड़े ही प्रेम से खाना परोसा। घर जैसा खाना। बहुत ही स्वादिष्ट। पता चला कि खाना बनाने के लिए यहाँ पारंपरिक विधि उपयोग में लाई जाती है। यानी लकड़ी की आग का इस्तेमाल होता है, इसलिए इतना स्वाष्टि है। दाल-सब्जी, रोटी एवं खीर प्रेम से ग्रहण कर अपने कमरे की ओर लौट पड़े। दिनभर की थकान का असर दिखा और बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई।

सुबह चार बजे अपने आप ही नींद खुल गई। नित्यकर्म से निवृत होकर उजाला होने का इंतजार करता रहा। जैसे ही उजाले की पंखुड़ियाँ खुली, मैं आश्रम भ्रमण के लिए निकल पड़ा। सोचा, इसी बहाने सुबह का टहलना भी हो जाएगा। मौसम अच्छा है, हल्की ठंड, आसमान बिल्कुल साफ। गेस्ट हाउस के ठीक सामने सुगंध बिखेरने वाले फूलों के कतारबद्ध पौधे। दूसरी तरफ आम-पीपल नीम और अन्य प्रजातियों के पेड़-पौधे। कुछ मिनट चलने के बाद मालदह उद्यान दिखता है। मैं उसमें प्रवेश कर जाता हूँ। उद्यान में आम के सैकड़ों वृक्ष हैं। एक ही कद-काठी के अलग-अलग कतारों में खड़े उन वृक्षों की शोभा देखते ही बन रही है। उन वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है। गहरा हरा रंग। आम के मंजर की महक और पक्षियों के कलरव से यहाँ के वातावरण में एक अजीब-सा सांगीतिक आस्वाद धुला हुआ महसूस हो रहा है। किसी वृक्ष पर कोयल की कूक सुनाई पड़ रही है। कितना मनोहर, कितना सुहावना दृश्य है। शायद यह प्रकृति के शृंगार का मौसम है। पटना में न तो शुद्ध हवा है, न शुद्ध पानी और न प्राकृतिक वातावरण। वहाँ यह खूबसूरती सिरे से गायब है। मैं सोचने लगा कि जिस जीवन में बाग-बगीचे न हो, आम्र मंजरियाँ न हो, कोयल न हो, उसकी कूक न हो–उसका क्या मतलब? मैं उद्यान के नैसर्गिक सौंदर्य में काफी देर तक खोया रहा। पटना शहर की भागमभाग और शोरगुल भरी जिंदगी से दूर आकर यहाँ मन को सुकून मिल रहा था।

करीब एक घंटे के भ्रमण के बाद जब गेस्ट हाउस लौटा, तो सभी लोग जे.पी. चट्टान के भ्रमण के लिए तैयार बैठे थे। मैंने भी देर नहीं की और कुछ ही मिनटों में तैयार होकर उनके संग निकल पड़ा। आश्रम से डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर जंगल में है जे.पी. चट्टान। आश्रम और क्षेत्र के बूढ़े-बुजुर्गों का कहना है कि जयप्रकाश प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान अक्सरहाँ उस चट्टान पर आकर बैठते थे। इसलिए वह चट्टान आज भी उनके अनुयायियों के लिए श्रद्धा एवं आकर्षण का केंद्र है।

सुबह का वक्त था। हमारी गाड़ी कच्चे रास्ते में धूल उड़ाती हुई पहाड़ी के टेढ़े-मेढ़े चढ़ाव चढ़ती रही। उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ता। लेकिन हरियाली से सराबोर। कभी घना जंगल रहा होगा। अरविंद जी बता रहे थे कि इस जंगल में नीलगाय, हिरण और भालू के साथ ही पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ देखने को मिलती है। पेड़-पौधों पर चिड़ियों की चहचहाहट खूब सुनाई दे रही थी। दस मिनट भी नहीं लगा और हमारी गाड़ी जे.पी. चट्टान से कुछ दूरी पर रुक गई। वहाँ से हम पैदल ही चट्टान की ओर बढ़ चले। जंगली पगडंडियाँ हैं, जगह-जगह वृक्षों-झाड़ियों के झुंड खड़े हैं। आसपास की झाड़ियों से निकली छोटी-मोटी असंख्य शाखाओं से बचते-बचाते और उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते होते हुए हम चट्टान के उपरी हिस्से पर थे। ग्रेनाइट पत्थर का चट्टान। आकाश में चमकते सूर्य की रोशनी में ठंढी बयारों के बीच मौसम अद्भुत संतुलन बना रहा था। प्रकृति के वास्तविक सौंदर्य से साक्षात्कार। चारों तरफ पहाड़ी चोटियाँ और जंगलों का अप्रतिम सौंदर्य। भावना की उमंगों का उभारने-उकसाने वाली प्राकृतिक विभूति।

जे.पी. चट्टान से एक किलोमीटर की दूरी पर है शिवपुर डैम। हम वहाँ के लिए निकल पड़े। चारों तरफ पहाड़ियों और पेड़ों की झुरमुटों से घिरा डैम अत्यंत ही मनोहारी लग रहा है। प्रकृति का पूर्ण सुसज्जित रंगमंच-रोमांच और रमणीयता से भरपूर, जिसके थिर जल के अधरों पर नर्तन करता वन प्रदेश का मंद-मंद बहता समीर। डैम में बैठे रंग-बिरंगे पक्षी वातावरण को मनमोहक बना रहे थे और मछलियों की उछल-कूद से छोटी-छोटी उठती जलतरंगें मन को भावविभोर कर रही थी। जानकारी मिली कि इस डैम में बारहों महीने पहाड़ों से पानी आता रहता है और गर्मी की तपिश से त्राण पाने हेतु वन्य प्राणी भी यहाँ अक्सर आते रहते हैं।

सुबह के 7.30 बज चुके थे। धूप तेज होने लगी थी। हम वहाँ से गेस्ट हाउस की ओर लौट पड़े। गेस्ट हाउस में चाय की चुस्कियों के बीच आश्रम और कृषि विज्ञान केंद्र के कार्यकलापों पर चर्चा होती रही। मैं अपने नोट बुक में उन्हें दर्ज करता रहा। फिर नहा-धोकर जलपान गृह में प्रवेश कर गया। गर्मागर्म सब्जी और कचौरियाँ अत्यंत ही स्वादिष्ट थी। कचौरियों के बाद गर्मागर्म कड़क चाय ने हमें दिनभर की भागदौड़ का सामना करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार कर दिया।

सुबह के 10 बज चुके हैं। मुझे पटना के लिए निकलना है। अतः सभी से अनुमति लेकर अपनी गाड़ी में बैठकर निकल पड़ता हूँ। गाड़ी 100 की स्पीड से तेजी से भाग रही है, पर मेरे दिल-दिमाग में अभी भी आश्रम भरा हुआ है। रास्ते भर यह मंथन चलता रहा कि आज जब आश्रम एवं संस्थाओं को लेकर प्रायः तरह-तरह की बातें हमारे सामने आती रहती है, वैसी स्थिति में सोखोदेवरा आश्रम की तुलना कीचड़ के बीच कमल से की जा सकती है। डेढ़-दो दिनों के आश्रम-प्रवास के बाद मेरी यह स्पष्ट धारणा बनी है कि आश्रम के काम मात्र हाथी के दाँत नहीं है, जो सिर्फ देखे जाए, बरन चबाने के भी हैं, जहाँ सच में कुछ हो रहा है। नदियाँ, पहाड़, पेड़-पौधे, वन्य जीवन और मिलनसार लोग-क्या कुछ नहीं है कौआकोल (सोखोदेवरा आश्रम) में। यहाँ की आबोहवा इतनी संतुलित है कि पूरे साल वहाँ घूमने का लुफ्त लिया जा सकता है। चारों तरफ फैली पहाड़ियाँ, नदी-नाले, पेड़-पौधे और जंगलों से घिरा यह जगह हवा-पानी बदलने के ख्याल से भी माकूल सैरगाह है। कौआकोल से दस-पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर ककोलत का शीतल जल प्रपात और लछुआड़ में भगवान महावीर की जन्म स्थली है, जहाँ सालों भर लाखों की संख्या में जैन श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। कौआकोल सभी आधारभूत सुविधाओं जैसे स्कूल, बाजार, प्राथमिक चिकित्सालय आदि से युक्त हैं। लेकिन आश्रम गेस्टहाउस को छोड़कर यहाँ पर्यटकों के ठहरने और भोजन की अभी कोई उचित व्यवस्था नहीं है। इसलिए रात्रि-विश्राम की सहूलियत मिले तो यहाँ की नैसर्गिक अनछुई खूबसूरती किसी को भी मुग्ध कर सकती है। एक खुशनुमा और लाजबाब माहौल में खामोश-शांत पड़ाव की तलाश करने वाले पर्यटकों के लिए यह पसंदीदा स्थल बन सकता है।


Image: Gandhi Mahadev Sevagram
Image Source: Wikimedia Commons
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अशोक कुमार सिन्हा द्वारा भी