हमें यह कहना है!

हमें यह कहना है!

गया में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन का इक्कीसवाँ अधिवेशन सानंद समाप्त हुआ। प्रांत के, प्रांत के बाहर के भी, साहित्यिक जुटे–भाषण हुए, कविता हुई, अभिनय हुआ। गया की गर्मी; फिर भी हृदय की सरसता और आर्द्रता ने बाहर की ताप और झुलस पर विजय प्राप्त की। हमारी दशा गया कि फल्गु-सी रही–ऊपर बालुका-राशि; नीचे शीतल जल। तीन दिनों तक हम इस लोक से अलग सरस्वती लोक में रहे।

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लेकिन ऐसा लगता है, अभी हम इस लोक से ऊबे नहीं हैं या सरस्वती-लोक के जादू का आकर्षण हम पर पूरा प्रभाव नहीं डाल सका है। बाहर से बहुत कम लोग आए–वे भी नहीं आए, जिन्हें जरूर आना चाहिए। कैसी वंचना? एक ओर हम इस लोक को गालियाँ देते हैं, दूसरी ओर इससे ऐसे चिपके रहते हैं कि दो-चार दिनों के लिए इससे दूर रहने के जो मौके आते हैं, हम उनका भी फायदा नहीं उठाते! हमारे पूर्वजों ने तीर्थ-व्रत का सिलसिला लगाया, उसे तो हम छोड़ रहे हैं; लेकिन नए तीर्थ, नए त्योहार भी हम न बना पाए हैं, न मना पाते हैं।

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और, बुरी बात तो यह होती है कि यदि ऐसे मौकों का फायदा भी उठाना चाहते हैं, तो इस लोक की गंदगी हमारा पीछा वहाँ भी नहीं छोड़ती। अपनी बक-बक में वीणा की झंकार को भी हम भुला देते हैं! अरे यारो, इन चीजों के लिए इस लोक में ही काफी फैली हुई जगह है, समय की भी कमी नहीं। एक निश्चित स्थान पर, दो-चार दिनों के लिए पहुँचे हो, तो वहाँ ज़रा उन्मुक्त आनंद लो!

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हमें नई रुचि बनानी होगी; नई आदत डालनी होगी। हम संक्रांति काल से गुजर रहे हैं जरूर–अभी सारी चीजें तरलाई की हालत में हैं। लेकिन इस तरलता से ही तो ठोस चीजें ढलेंगी; संक्रांति के गर्भ से ही तो नया युग पैदा होगा! अत: धीरे-धीरे नवनिर्माण भी होते जाना चाहिए! खास कर सांस्कृतिक क्षेत्र में तो इस पर ध्यान देना ही होगा। राजनीति में जो आचार क्षम्य भी हो सकता है, वह साहित्य में एक महान अपराध माना जा सकता है! किंतु दिक्कत यही है कि राजनीति अभी हमारे इतना निकट है कि उसकी अच्छाई-बुराई को हम हर जगह ढोते चलते हैं! स्थान और अवसर के भेद से हमारे आचार-व्यवहार में भी भेद होना चाहिए; अभी इस बारीक बात को हम अच्छी तरह नहीं समझ पाए हैं!

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राजनीति का महत्त्व अब स्थानांतरित हो रहा है। साहित्य और संस्कृति की महत्ता धीरे-धीरे ऊपर आ रही है। इसलिए इस ओर लोगों का झुकाव बढ़ रहा है–यह स्वाभाविक है, वांछनीय है। किंतु, साहित्य को भी हम राजनीति का अखाड़ा न बना डालें–यह डर तो है ही! एक क्षेत्र तो ऐसा रहे, जहाँ भिन्न-भिन्न विचार-धाराएँ रखते हुए भी हम प्रेम से मिल सकें, आनंद मना सकें!

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यहाँ एक स्पष्टता अपेक्षित है। राजनीतिक विश्वास एक चीज़ है, राजनीतिक दलबंदी दूसरी चीज़। विश्वास में उदारता होती है, विशालता होती है, वह ऊपर उठाता है, आगे बढ़ाता है। ‘वाद’ होने पर भी वह ऐसा वाद होता है, जिसके बारे में ऋषियों ने कहा है–“वादे वादे जायते तत्वबोध:”। साहित्य में ऐसा वाद सदा अभिनंदनीय है। राजनीतिक विश्वास की दृष्टि से शेक्सपीयर और ह्यूगो में, गौल्सवर्दी और गोर्की में कितना अंतर है! किंतु, एक ही पाठक दोनों को पढ़कर कितना आनंद अनुभव करता है लेकिन दिक्कत तब पैदा होती है, जब राजनीति का कूड़ा-करकट सरस्वती के निर्मल उज्ज्वल प्रांगण को दूषित-कलुषित करना प्रारंभ कर देता है। हमें यह सोचना है कि इस कूड़ा-करकट से हम साहित्य को कैसे बचावें!

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साहित्य सम्मेलनों के आदर्श, उद्देश्य, रूप, संगठन आदि के बारे में भी हमें गौर से विचार करना है। पहले हमें मुख्यत: प्रचार करना था, इसलिए हम इसका द्वार सबके लिए खुला छोड़े हुए थे! लेकिन, अब साहित्य-सम्मेलनों को मुख्यत: साहित्य-निर्माण करना है, अत: उसे सिर्फ साहित्यिकों की संस्था बनाना पड़ेगा। अखिल भारतीय सम्मेलन एवं बिहार-सम्मेलन दोनों के विधानों में संशोधन होने जा रहा है। क्या यह उचित नहीं होगा कि हम उनकी सदस्यता में ही कोई ऐसी शर्त रख दें जिससे अ-साहित्यिक व्यक्तियों का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो जाए और सम्मेलन पूर्णत: साहित्यिक व्यक्तियों की प्रतिनिधि संस्था बन जाए!

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गया सम्मेलन में कुछ परिषदें भी की गईं, जो काफी सफल रहीं। साहित्य के भिन्न-भिन्न अंगों के संबंध में विचार-विमर्श करने के लिए ऐसी परिषदों की आवश्यकता है ही। विज्ञान, दर्शन, साहित्य, पत्रकार आदि परिषदों में कुछ ठोस समस्याएँ रखी गईं। लेकिन, समयाभाव के कारण विशेष रूप से उनपर विचार नहीं किया जा सका। अत: आगे के लिए ज़रूरी यह है कि परिषदों की संख्या परिमिति रहे और समय का बँटवारा ऐसा हो कि लोगों को उससे पूरा लाभ उठाने का मौका मिले।

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बिहार इस समय एक सांस्कृतिक जागरण के दौर से गुज़र रहा है। गाँव-गाँव में इसकी झलक दीख पड़ती है। पुस्तकालय खोले जा रहे हैं, साहित्यिक जल्से किए जाते हैं, नाटक और संगीत के लिए भी रुचि देख पड़ती है। नए-नए लेखक, नए-नए कवि पैदा हो रहे हैं, विकसित हो रहे हैं। शहरों में तो राजनीतिक जल्सों का स्थान सांस्कृतिक जल्से तेज़ी से ले रहे हैं! बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन को इस जागरण का केंद्र बनना है। सम्मेलन के नए सभापति श्री लक्ष्मी नारायण सुधांशु सुधी आलोचक और कर्मठ साहित्यसेवी हैं। इनके दोनों गुणों की आवश्यकता इस समय सम्मेलन को है। प्रांत की साहित्य-धारा को नियंत्रित और सुसंचालित करने का भार उनके कंधों पर आया है। आशा है, अपने कार्यालय में वह कुछ ऐसा कर जाएँगे कि बहुत दिनों तक सम्मेलन पर उनकी स्पष्ट छाप दिखाई पड़े!

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अँग्रेजी-परित्याग और हिंदी-स्वीकार की जो एक पंचवार्षिक योजना गया-सम्मेलन में स्वीकृत की गई है उसे यदि कार्यरूप में परिणत कर लिया गया, तो बिहार इस क्षेत्र में देश के लिए पथ-प्रदर्शक बन जा सकता है। सरकार, विश्वविद्यालय और स्थानीय संस्थाओं के इस ओर ध्यान देने पर ही इसकी पूरी सफलता निर्भर करती है। किंतु, जनता को भी इस संबंध में कुछ कम करना नहीं है। इसके लिए जो उपसमिति संगठित की गई, उसका संयोजक श्री देवव्रत शास्त्री जी को चुन कर सम्मेलन में उपयुक्त ही काम किया! शास्त्री जी की लगन और धुन प्रांत में प्रसिद्ध है। उनके सतत प्रयत्नों से यह प्रस्ताव कार्यरूप में परिणत होकर रहेगा ऐसा सहज ही विश्वास किया जा सकता है।


Image Source: Wikimedia Commons
Artist: Ustad Mansur
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