मेरे हिस्से में अम्मा

मेरे हिस्से में अम्मा

‘हम कुआँ में कूद के मर जाईब!’

मेरी बहन मिनी और मुझ पर गुस्से से तमतमाई अम्मा ज़ोर से चिल्लातीं। मैं एकदम सहम जाता। हम दोनों की लड़ाई रोकते जब वह बेहद परेशान हो जातीं तो बस उनकी यही आख़िरी चाल होती। मिनी दीदी मुझसे आठ साल बड़ी थीं, इसलिए वह अच्छी तरह जानती कि हमारी लड़ाई खत्म करवाने के लिए यह अम्मा की धमकी मात्र थी। लेकिन मैं तो सिर्फ़ 5-6 साल का था और मैं बिलकुल सकपका जाता। अम्मा जब गुस्सा होतीं तब हम सब भाग खड़े होते, मामला संगीन हो जाता। मैं तो बिलकुल सहम जाता। उस समय पास ही हमारी नानी के घर में एक कुआँ था। कहीं हमारी लड़ाई-झगड़े से बाज आ कर अम्मा सचमुच कुएँ में कूद गईं तो? मैं फ़ौरन हथियार डाल देता और मिनी दीदी फूली न समातीं कि एक बार फिर उन्होंने मुझे पछाड़ दिया। शुक्र है अम्मा भी शांत हो जातीं और अगले ही क्षण मुझे अपने से चिपका लेतीं। बाद में घर में सब इस बात का लुत्फ़ उठाते कि किस तरह मिनी दीदी ने मुझसे फिर उन्हीं घिसे-पिटे मामलों में झगड़ा मोल लिया जिन पर हमारी बरसों से जंग छिड़ी हुई थी। हर दिन स्कूल से लौटने के बाद मिनी दीदी मुझे किसी फालतू बात पर चिढ़ा देतीं और हमारा ऐसा भीषण झगड़ा छिड़ता कि अम्मा भी सुलह कराने में असफ़ल रहतीं और अंत में विवश हो कर अपना ब्रह्मास्त्र छोड़तीं–कुएँ में कूद कर मर जाने की।

भगवान का शुक्र है कि कुछ सालों बाद मिनी दीदी ने मुझे छेड़ना बंद कर दिया और आगे चल कर कई बार अम्मा और हम लड़े, पर मैंने उन्हें कुएँ में कूदने की वजह नहीं दी। बचपन के उन दिनों से लगभग पचास साल तक मुझे अम्मा का साथ मिला, लेकिन गत 27 जुलाई को अपने नब्बेवें वर्ष में वह हमें हमेशा के लिए छोड़ गईं। पिछले साल दिवाली के दूसरे दिन वह पटना से दिल्ली आईं और मैंने अपने जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रिय समय उनके साथ गुज़ारा। कोरोना के कारण मैं घर से निकलता नहीं था, इसलिए रोज़ सुबह से शाम तक हम एक साथ थे। हर रोज़ उठना-बैठना, खाना-पीना, पल-पल का साथ बन गया था हमारा। पहले पढ़ाई और फिर काम में मसरूफ़ रहा तो समय ही कहाँ मिला इस कदर एक दूसरे के साथ रहने का! एक ओर मैं बेहद ख़ुशनसीब और एहसानमंद हूँ कि मुझे अम्मा के साथ इतना क़ीमती समय मिला, तो दूसरी ओर हाल की इस नज़दीकी से उनके न रहने का वियोग और भी भारी पड़ रहा है।

अम्मा और मेरा एक अटूट बंधन था। एक, मैं तीन बहनों के बाद सबसे छोटा और इकलौता बेटा, उस पर बचपन से ही बराबर अस्वस्थ रहने का आदी। जब रात-रात भर बुखार से तपता और निरंतर दम फूलता, तो अम्मा का स्पर्श ही राहत देता। वह पूरी रात सिरहाने साथ-साथ जागतीं, एक पल ठंडे पानी की पट्टी लगातीं और फिर दूसरे पल एकदम छाती पर मरहम मलतीं। मेरा इलाज तो महज़ उनका पास होना था। मैं उनसे सट कर सो जाता। जब कभी कहीं बाहर जाना होता, तो अम्मा बड़े चाव से सजती-सँवरती और मैं बहुत क़रीब से उन्हें निहारता। तैयार होने का उनका एक नियमित क्रम था। पहले बाल कँघी करना, फिर उसकी चोटी पिरोकर एक जूड़े में लपेटना, बड़े-बड़े पिन्स को खोंस कर, फिर चेहरे पर पाउडर, आँखों में काजल, होंठों पर लिपस्टिक, और आख़िर में एक बड़ी लाल बिंदी बनाना। वह अपनी एक उँगली को बार-बार एक चाँदी की गोलाकार डिब्बी में बोरकर लाल सिंदूर अपने ललाट पर अचूक बीचों-बीच लगातीं। मैं मंत्रमुग्ध देखता रहता कि कैसे एक ही प्रयास में, हर बार, अम्मा अपने उँगली से मल-मल कर, एक छोटी बिंदु से शुरू कर एक बड़ी गोल आकार की बिंदी बनाती, जो नाप में हमेशा एक होती।

2004 में जब बाबू जी नहीं रहे तो उन्होंने टीका लगाना बंद कर दिया–हम सारे बच्चे इससे नाख़ुश थे लेकिन वह हमारी एक न सुनती। एक-दो बार मेरी बहनों की ज़िद करने पर उनका मन रखने के लिए मान जातीं, मगर उस बिंदी के जाने के बाद मानो उनकी शख़्सियत ही बदल गई, जैसे उनके अक्स से थोड़ी-सी आभा मिट गई। रिवाज़ से परे बाबू जी का जाना अम्मा के लिए एक बड़ा धक्का था, 55 साल से वह उनको पूरी तरह समर्पित थीं, सचमुच एक अर्धांगिनी थीं।

शृंगार-क्रम का समापन माँग में सिंदूर डालकर होता। एक और भी छोटी-सी चाँदी की एक पुरानी डिबिया से पूजा में अनुमंत्रित नारंगी रंग के सिंदूर को अम्मा तीन बार अपनी माँग में लगातीं।

इसके बाद ध्यान साड़ी की ओर मुड़ता। कमर में खोंसे हुए चाभी के गुच्छे से सही चाभी ढूँढ़ कर गोदरेज स्टील अलमारी का ताला और फिर दरवाज़ा खोला जाता। लॉक, हैंडल और दरवाज़ा खोलते और बंद करते वक़्त इतनी झनझनाहट और खड़खड़ाहट होती कि सारे घर में गूँजती–उस आवाज़ को हम बच्चे शायद कभी नहीं भूल पाएँगे! बीच के ताखा पर दो थाक साड़ियों से मौसम और मौक़े के अनुकूल दो-तीन साड़ियों को पलंग पर फैला दिया जाता। मेरे और अम्मा के बीच अब तर्क-वितर्क शुरू होता। इस मामले में वह छुटपन से ही मेरी राय पर निर्भर ही नहीं पर विश्वास करती थीं। कपड़े, गहने और खाने के चयन के मामले में। कभी-कभार विवाद छिड़ जाता और बाहर बरामदे से बाबू जी जल्दी करने की आवाज़ देना शुरू करते और अक्सर अम्मा पर दबाव डालने के लिए मोटर गाड़ी में जा बैठते और हर पल नौकरों को भेजते कि दुल्हिन जी को ठेलें कि देर हो रही है और वह उनको छोड़ कर जा रहे हैं। यह धमकी नहीं थी। वह ऐसा कई बार करते थे। थोड़ा भी विलंब हो तो अम्मा को पटना मार्केट या अलंकार ज्वेलर्स या किसी शादी या जलसे में छोड़ कर निकल लेते। मैं इस डर से, कि बाबू जी कहीं सचमुच रवाना न हो जाएँ, अम्मा को साड़ी के चयन का मामला जल्दी निपटाने की आग्रह करता मगर उन पर बाबू जी की धमकियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। साड़ी चुनने के बाद उसे बड़े सलीके से बाँधा जाता और फिर वर्षों से सधी निपुणता से फर्राटे से चुन्नट लगाई जाती।

अब बारी आती गहनों की। अलमारी के ऊपरी ताखा पर कुछ गहने फैले होते, कुछ रोज़मर्रा के पहनने वाले और कुछ उसी दिन बैंक के लॉकर से निकाले गए। उनको अम्मा चुन-चुन कर पहनतीं और फिर आईने के सामने जाकर निरीक्षण करतीं। मेरी अंतिम राय ली जाती। ज्यादातर मैं अपनी स्वीकृति दे देता और अलमारी को फिर लॉक कर, चाभी के गुच्छे उनके हवाले कर, उन्हें रवाना करता। लेकिन कभी-कभार मुझे लगता कि पाउडर थोड़ा ज्यादा ही सफ़ेदी झलका रहा है या कोई गहना अत्यधिक भड़कीला लग रहा है तो मैं निःसंकोच बोल देता और अम्मा उचित बदलाव कर डालतीं।

अम्मा की बदौलत साड़ियों और गहनों में मेरी रुचि अब भी बरकरार है! इसके अलावा ख़ातिरदारी और खाना बनाने की रुचि भी अम्मा से ही आई। 25 साल की ही उम्र में अम्मा ने सूर्यपुरा कोठी का हमारा पारिवारिक निवास खुद दिन-रात लगकर बनवाया। उनको इस बात पर बहुत गर्व था, विशेष रूप से इसलिए कि घर के पूरे होने के करीब मेरी बहन मिनी गर्भवती थीं। हमारे घर पर मेहमानों का ताँता लगा रहता। जब भी कोई रिश्तेदार के बच्चे बाहर से घर आते या किसी की शादी होती उन्हें घर खाने के लिए अनिवार्य रूप से बुलाया जाता। नतीजा यह था कि स्वाभाविक रूप से हर रोज़ सुबह, दिन या रात के खाने पर कोई-न-कोई मेहमान हमारे साथ ज़रूर जुड़ता। और इसके साथ हर कुछ दिनों पर एक पार्टी होती। ऐसे मौके पर अम्मा और बाबू जी बड़े गौर से मेहमानों की सूची तैयार करते और और भी चाव से मेन्यू बनाते। इसमें मैं भी कार्यरत होता और इतना ही नहीं, खाना बनाने में अम्मा का सहायक भी बन जाता। अम्मा बड़े जोश से हमेशा नई-नई रेसिपी खोज-खोज कर इकट्ठा करतीं और कई कुकिंग क्लासेज से भी सीख कर आतीं। उनका ख़ज़ाना मुख़्तलिफ़ था। मिसेज़ खान के मटन मिंच से ले कर इमली में छोटी-बरी तक। एक तरफ़ उनका प्रसिद्ध स्टफ्ड चिकन और दूसरी ओर उनकी दाल-भरी पूरी, जिसके साथ हमें याद दिलाया जाता कि कैसे हमारे नाना को सिर्फ़ एक बड़ी पूरी मिलती दिनभर के खाने के लिए जब वह मीलों चलकर अपने स्कूल से पैदल आते-जाते। एक तरफ़ अम्मा का आम-पुलाव और मुक्ताझूरी और दूसरी ओर फ्रूट ट्राईफल और कॉफी सूफ्ले जिसके लिए हम भर-पेट खाने के बाद भी उत्सुकता से इंतजार करते। जब मैं अम्मा के साथ 17 साल की उम्र में अमरीका गया तब मैं रसोई में उनका असिस्टेंट बन गया। नौकर तो थे नहीं। सब्जी, तरकारी और मांस की सफ़ाई और काटने-कतरने का ज़िम्मा मेरा था। सारे रसोई के उपयंत्र चलाने की बागडोर भी मैं सँभालता था। फिर भूनना और तलना उनके निर्देशन में। और बाद में सारी सफ़ाई करना। इसका मैं आदी हो गया और आज भी मुझे खाना बनाने में जो दिलचस्पी है वह अम्मा की ही बदौलत है। बचपन से ही केक और पुडिंग बनाने में मैं उनकी ख़ास मदद करता क्योंकि उन्हें बनाने के लिए कई यंत्र इस्तेमाल होते–मिक्सी, बीटर, बेकर, ओवन इत्यादि और साथ-साथ ख़ूब चखने को भी मिलता। यही नहीं, जब कभी किसी भी खाने को चखना होता तो अम्मा मुझे ही चखाती और मैं भी बेझिझक अपनी राय उन्हें दे देता। परिवार में बचपन से ही मेरी ख्याति बन गई थी कि खाने के मामले में मुझे संतुष्ट करना मुश्किल है और अगर वाकई किसी डिश को परखना हो तो फिर मुझे चखाया जाये! अम्मा को बनाने के साथ-साथ खाने का बहुत शौक़ था और वह हर तरह के खाने का स्वाद लेने से नहीं घबरातीं बल्कि उत्सुक रहतीं। बाबू जी के जाने के बाद जब वह खुल कर सफ़र करने लगीं और अपने बच्चों के साथ रहने लगीं तो बाहर खाने में और नए-नए तरह के खाने सैंपल करने में ख़ूब दिलचस्पी रखतीं।

अपने माता-पिता के बारे में कोई लिखने लगे तो यादों की बाढ़ आ जाती है। और, फिर कभी…

आज अम्मा 1 दिसंबर को 90 साल की हो जातीं। उनके जाने का अफ़सोस दोगुना है क्योंकि वह श्री उदय राज सिंह की जन्मशती महोत्सव में शामिल नहीं हो सकीं। अम्मा को इस शताब्दी महोत्सव का इंतजार था और हमने कल्पना ही नहीं की थी कि वह आज हमारे साथ नहीं होंगी। इस ख़याल से कुछ सांत्वना मिलती है कि ज़रूर आज दोनों एक साथ अम्मा की नब्बेवीं और बाबू जी की सौवीं वर्षगाँठ मना रहे हैं।

अम्मा के अभाव में यह उचित है कि मैं उनके ही लिखे कुछ शब्दों से इस लेख को समाप्त करूँ। 2004 में ‘नई धारा’ में उन्होंने बाबू जी के बारे में लिखा था : ‘नई धारा को उन्होंने एक बच्चे की तरह पाला-पोसा था। उससे उन्हें विशेष लगाव था। अब उनके नहीं रहने पर उनकी चिंता हमारी चिंता हो गई है। किसी भी हालत में ‘नई धारा’ को सूखने न दें, यही उनके प्रति हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में जो कुछ हमसे बन पड़ेगा, करेंगे, लेकिन मैं जानती हूँ कि यह तभी संभव हो पाएगा, जब ‘नई धारा’ के पाठकों और लेखकों का सहयोग हमें मिलेगा। इस पुनीत कार्य के लिए मैं आप सभी से सहयोग की अपेक्षा रखती हूँ। ‘नई धारा’ की पवित्र गंगा बहती रहे…बहती रहे, चिरकाल तक! अब यही कामना है।’

‘नई धारा’ की कामयाबी में अम्मा का महत्त्वपूर्ण योगदान इस पत्रिका के जन्म से रहा है। बाबू जी के जाने के बाद पिछले 17 सालों में भी अम्मा ने ‘नई धारा’ को क़ायम रखा और अंत तक अपनी दिलचस्पी बनाए रखीं। तो ‘नई धारा’ में सिर्फ़ हमारे संस्थापक उदय राज सिंह के ही प्राण नहीं, अम्मा के भी प्राण बसे हैं। आशा है आपको यह शीला सिन्हा श्रद्धांजलि विशेषांक पसंद आएगा।

अम्मा बचपन में बड़ी चुलबुली थीं यहाँ तक कि उन्हें ‘टॉमबॉय’ करार दिया गया था। वृद्धावस्था में भी वह हमेशा जिंदादिल और प्रफुल्लित रहती थीं। इधर कुछ सालों से वह रोज़ बड़ी गंभीरता से पूछतीं, ‘हम कईसे जाईब आउर कहाँ जाईब?’ और दूसरे ही क्षण ठहाके से हँसती। हमेशा आशावादी और जोशीला बने रहने की वह हम सब के लिए एक अमिट मिसाल रहेंगीं। मैं अपने आप को ख़ुशनसीब समझता हूँ कि उनकी ठहाके वाली हँसी उनके अंत के दिनों में मेरे हिस्से आई। जैसा कि मुनव्वर राणा ने लिखा है :

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई,
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई!


Image Source : Personal collections of Pramath Raj Sinha and Family


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प्रमथ राज सिंह द्वारा भी