‘स्त्री जितना दिखती है, सिर्फ उतनी भर ही नहीं होती’–सूर्यबाला

‘स्त्री जितना दिखती है, सिर्फ उतनी भर ही नहीं होती’–सूर्यबाला

‘नई धारा’ द्वारा उदय राज सिंह जन्मशती महोत्सव

पिछली शताब्दी में क्रमशः अस्तित्व में आए स्त्री-लेखन की प्रवहमान धारा में स्त्री स्वयं अपने अनुभव का प्रमाणिक बयान दर्ज करने के लिए उद्धत थी। अब तक पुरुष की दृष्टि से देखी और उकेरी जाती रही। स्त्री अब स्वयं कर्म से कर्त्ता हो रही है। स्त्री जितना दिखती है, सिर्फ उतनी भर ही नहीं होती।

ये कहना है प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सूर्यबाला का। वे 1 दिसंबर, 2021 को बिहार संग्रहालय के सभागार में आयोजित प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘नई धारा’ के अपने संस्थापक संपादक एवं प्रसिद्ध लेखक उदय राज सिंह के जन्मशती महोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि बोल रही थीं। वे महोत्सव के प्रथम सत्र में ‘सत्रहवाँ उदय राज सिंह स्मारक व्याख्यान कर रही थीं, जिसका विषय था ‘स्वप्न, द्वंद्व और उपलब्धियों के बीच स्त्री-लेखन की चुनौतियाँ। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध लेखिका पद्मश्री डॉ. उषाकिरण खान ने की जबकि संचालन ‘नई धारा’ के संपादक डॉ. शिवनारायण ने किया। डॉ. सूर्यबाला ने अपने व्याख्यान में कहा कि स्त्री-लेखन को अपने अनुभव, अनुभूतियों और स्मृतिकोषों के बीच से ‘वह स्त्री’ उकेरनी है, जिसे अपने स्त्री होने पर गर्व हो, जो अपनी प्रकृति प्रदत्त, बुद्धिमत्ता चातुर्य और प्रबंधन क्षमता से समृद्ध स्त्रीत्व को लेकर आत्मविश्वस्त हो। उन्होंने कहा कि कालजयी लेखन कभी भी ‘बोल्ड’ और ‘दुस्साहसी’ शब्दों का मुहताज नहीं हुआ करता। दुर्भाग्यपूर्ण सिर्फ यह है कि अश्लील को प्रमाणित किया जा सकता है न पारिभाषित। उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है, जिसे हम इनकार नहीं कर सकते। उन्होंने ‘नई धारा’ की साहित्य-परंपरा की मुक्तकंठ प्रशंसा करते हुए उसके आयोजन से जुड़ने को अपना सौभाग्य बताया।

इस अवसर पर ‘नई धारा’ की ओर से डॉ. सूर्यबाला को पंद्रहवाँ उदय राज सिंह स्मृति सम्मान-2021 से विभूषित करते हुए उन्हें एक लाख रुपये सहित सम्मान पत्र, प्रतीक चिह्न, अंगवस्त्र आदि अर्पित किया गया। ‘नई धारा’ के प्रधान संपादक डॉ. प्रमथ राज सिंह ने सुप्रतिष्ठ लेखक विनोद कुमार सिन्हा (सीतामढ़ी), तेलुगु के चर्चित कवि डॉ. याकूब (हैदराबाद) तथा चर्चित लेखिका अंजु रंजन (जोहान्सबर्ग) को ‘नई धारा रचना सम्मान-2021’ से नवाजते हुए उन्हें 25-25 हजार रुपये सहित सम्मान पत्र, प्रतीक चिह्न, अंगवस्त्र आदि अर्पित किए।

आरंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए ‘नई धारा’ के प्रधान संपादक प्रमथ राज सिंह ने कहा कि ‘नई धारा’ हमारे लिए केवल एक पत्रिका भर नहीं है, बल्कि एक रचनात्मक अभियान है, जहाँ साहित्यकारों के सम्मान से हम समय, समाज और साहित्य को एक सकारात्मक दिशा देना चाहते हैं। यही ‘नई धारा’ की विरासत और परंपरा है, जिसका विस्तार करने का संकल्प हम आज उदय राज जन्मशती महोत्सव के अवसर पर पुनः करते हैं।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध लेखिका डॉ. उषाकिरण खान ने कहा कि ‘नई धारा’ का पटना से विगत 72 सालों से सतत प्रकाशन हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता की स्वर्णिम विरासत है, जिस पर तमाम हिंदी भाषियों द्वारा गर्व किया जाना चाहिए। अपने समय के अच्छे साहित्यकारों का सम्मान किया जाना भी श्रेष्ठ संस्कृतिकर्म है, जिससे सभ्यता समृद्ध होती है। वास्तव में ‘नई धारा’ का गौरव बिहार का गौरव है।

सम्मानित लेखकों में सीतामढ़ी से आए विनोद कुमार सिन्हा ने कहा कि मुझे लेखन में प्रवृत्त होने की प्रेरणा राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह से मिली थी, इसलिए आज उन्हीं के परिवार से मिला सम्मान मेरे लेखन का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार है। हैदराबाद से आए तेलुगु कविता के प्रसिद्ध कवि डॉ. याकूब ने कहा कि मेरी जिंदगी एक कविता है या कविता ही मेरी जिंदगी है। मैं सच्चे मन से विश्वास करता हूँ कि कविता लोगों को जोड़ती है, मानवीय संबंधों को सुदृढ़ बनाती है। समरस सामाजिक परिवेश का निर्माण मेरे कविताकर्म का सर्वोपरि उद्देश्य हैं। ‘नई धारा रचना सम्मान’ ने मेरे इन उद्देश्यों को प्रमाणित कर, मुझे आत्मबल प्रदान किया है। जोहान्सबर्ग से चर्चित लेखिका अंजु रंजन ने अपने संदेश में कहा कि सृजन-साधना से मेरी चेतना का नवीकरण होता रहता है और जो मुझे अपने कर्तव्य के प्रति सजग-दृढ़संकल्पित करता है। साहित्य अपने देशवासियों से जुड़े रहने के लिए मुझे ऊर्जस्वित भी करता रहता है। ‘नई धारा’ को सलाम कि उसने सृजन के प्रति मेरी आस्था और साधना को प्रमाणित किया।

‘नई धारा’ के संपादक डॉ. शिवनारायण ने इस अवसर पर कहा कि बीते 72 सालों से निरंतर प्रकाशित हो रही ‘नई धारा’ बिहार के सूर्यपुरा राजपरिवार की पाँच पीढ़ियों की हिंदी सेवा का व्रत है, जिसे हिंदी के महान कथाकार राजा राधिकामरण प्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, आचार्य शिवपूजन सहाय जैसे हिंदी के तपोनिष्ठ लेखकों ने पल्लवित-पुष्पित किया। यह मेरा सौभाग्य है कि बीते 31 सालों से मैं इस ऐतिहासिक साहित्य-पत्रिका के संपादन से जुड़ा हूँ। आयोजन के दूसरे चरण में प्रसिद्ध ठुमरी गायिका डॉ. कुमुद झा दीवान का चित्ताकर्षण ठुमरी-दादरा का गायन हुआ। उनकी गायकी से पूरा सभागार झूम उठा और ‘वाह-वाह’ से गूँजता रहा।

पूरे आयोजन की सूत्रधार रहीं आरती जैन। आरंभ में कुँवर वीरेंद्र सिंह ने गिटार वादन के साथ वाणी वंदना प्रस्तुत की, जबकि जन्मशती महोत्सव के अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया चर्चित कथाकार शंभु पी. सिंह ने। महोत्सव में पटना सहित बिहार के विभिन्न हिस्सों से आए रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति से इसे यादगार बनाया।


Image Source : Nayi Dhara Archives