तेजेंद्र शर्मा का सृजन-संसार

तेजेंद्र शर्मा का सृजन-संसार

हिंदी साहित्य का इतिहास हिंदी भाषी राज्यों विशेषकर बिहार-उत्तर प्रदेश तक सिमटा हुआ है, ऐसा अक्सर कहा जाता है। यह पूरी तरह गलत भी नहीं है। देखा जाए तो अब तक के हिंदी साहित्य के इतिहास में दक्षिण या पूर्वोत्तर भारत में लिखे गए हिंदी-साहित्य या फिर विदेशों में रचे जा रहे हिंदी साहित्य को नहीं के बराबर स्थान मिला है। उसकी घोर उपेक्षा होती रही है। फिर हिंदी के विश्व साहित्य के समग्र आकलन का श्रीगणेश कब और कैसे आरंभ हो पाएगा, कहना कठिन है। दस-दस विश्व हिंदी सम्मेलन हो गए और हिंदी के साहित्येतिहास की चौहद्दी जहाँ की तहाँ सिमटी पड़ी है। कब होगा उसका विस्तार? इधर के कुछेक इतिहास ग्रंथों में प्रवासी हिंदी लेखन को जोड़ा अवश्य गया है, पर वह प्रवासी हिंदी लेखन का ब्यौरा भर ही है, हिंदी का समावेशी विस्तार नहीं! ऐसे में जरूरी है मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, म्यांमार, अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, क्यूबा, मैक्सिको, रूस, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, हॉलैंड, नीदरलैंड, डेनमार्क, स्वीडन, इटली, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, दक्षिण अफ्रिका, चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, तुर्की, तजाकिस्तान, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया जैसे अनगिन देशों में भारतवंशी लेखकों द्वारा हिंदी में रचे जा रहे साहित्य को हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में शामिल करते हुए उसके वैशिष्टय का मूल्यांकन हो, इसकी चिंता की जानी चाहिए। मॉरीशस के अभिमन्यु अनत, ब्रजेंद्र भगत मधुकर हों या अमेरिका के कुँवर चंद्रप्रकाश सिंह, रामेश्वर अशांत आदि या फिर इंग्लैंड के उषाराजे सक्सेना, तेजेंद्र शर्मा आदि, इन सबके साहित्य में भारत की सामाजिक संस्कृति का आख्यान है। इनमें कथाकार तेजेंद्र शर्मा का सृजन-संसार तो एक तरह से ब्रितानी भूमि में भारतीय सोच के पौधों पर उगे समकालीनता के फूलों की खुशबू का संसार है, जो विश्वभर में फैले संवेदनक्षम लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।

कथाकार तेजेंद्र शर्मा के लेखन से मेरा पुराना सरोकार रहा है। वे दिल्ली के शुरुआती संघर्षों में लंबे समय तक अपने को माँजते रहे। फिर मुंबई चले गए। वहाँ अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के पंखों को फैलाना शुरू ही किया कि काल के डंक ने उन्हें धराशाई कर दिया। आहत तेजेंद्र मुंबई के मोह को त्याग लंदन उड़ गए। लंदन की गोद में उन्हें सुकून मिला, जहाँ मुंबई की यादों को सँजोए उन्होंने अपने लिए एक छोटे-सी प्यारी दुनिया बसाई। इसी दुनिया में रहते हुए उन्होंने एक से एक खूबसूरत कहानियाँ लिखीं, जिसमें भारत से लेकर ब्रिटेन तक की संघर्षगाथा जानने को मिलती है। तेजेंद्र शर्मा के लेखन में विविधता है, पर उन सबके केंद्र में है कहानी। कहानियाँ उन्होंने मन से लिखीं और जमकर लिखीं। उनका पहला कहानी-संग्रह ‘काला सागर’ 1990 में आया। इस मानी में उनके लेखन का यह रजत जयंती वर्ष है। उसके बाद तो उनकी कहानियों के कई संग्रह आए, जिनमें ‘ढिबरी टाईट’ (1994), ‘देह की कीमत’ (1999), ‘यह क्या हो गया’ (2003) ‘बेघर आँखें’ (2007), ‘सीधी रेखा की परतें’ (2009), ‘कब्र का मुनाफा’ (2010), ‘दीवार में रास्ता’ (2012), ‘मेरी प्रिय कथाएँ’ (2014), ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (2014) तथा ‘सपने मरते नहीं’ (2015) हैं। 2007 में उनकी कविताओं का भी एक संग्रह ‘ये घर तुम्हारा है’ के नाम से आया था। उन्होंने अनेक पुस्तकों का संपादन भी किया, जिनमें ‘यहाँ से वहाँ तक’ (2006, ब्रिटेन के कवियों का कविता-संग्रह), ‘समुद्र पार रचना-संसार’ (2008, प्रवासी हिंदी लेखकों की कहानियों का संग्रह), ‘ब्रिटेन में उर्दू कलम’ (2010, आठ उर्दू कथाकारों की कहानियों का संग्रह) ‘समुद्र पार हिंदी गजल’ (2011), ‘देशांतर’ (2013, प्रवासी  कथाकारों की 25 कहानियों का संग्रह) आदि की खास चर्चा होती है। इन्होंने एक समय दूरदर्शन के चर्चित सीरियल, ‘शांति’ के लिए सीरियल लेखन का काम भी किया!

21 अक्टूबर, 1952 को पंजाब के एक गाँव जगराँव में जन्में तेजेंद्र शर्मा अपने को शहरी उत्पाद मानते हैं। गाँव से उनका कोई सरोकार नहीं रहा। उनकी कहानियों में गाँव कहीं आता भी नहीं। वे हमेशा बड़े शहरों में रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी साहित्य में एम.ए. एवं कंप्यूटर कार्यों में डिप्लोमा करने के बाद काफी दिनों तक दिल्ली में ही संघर्ष करते रहे, फिर मुंबई चले गए। वहीं इंदु जी से विवाह हुआ, जिनकी प्रेरणा से हिंदी कहानी-लेखन में प्रवृत्त हुए। 1995 में इंदु जी का निधन हुआ, जिसके बाद उन्होंने नैना जी से विवाह किया। इंदु जी के व्यक्तित्व का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके व्यक्तित्व के भिन्न-भिन्न पहलुओं को लेकर उन्होंने कई कहानियाँ लिखीं, जिनमें ‘कैंसर’, ‘अपराधबोध का प्रेत’, ‘ईंटों का जंगल’, ‘भँवर’, ‘रेत का घरौंदा’, ‘पासपोर्ट का रंग’ आदि की चर्चा तो सहज ही की जा सकती है। इंदु जी के निधन के बाद मुंबई से उनका जी उचट गया, जिससे मुक्ति के लिए वे लंदन चले गए और वहीं के होकर रह गए।

तेजेंद्र शर्मा की आरंभिक कहानियाँ उनके संघर्षशील जीवन एवं उनसे जुड़ी सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। बकौल लेखक ‘मेरी शुरुआती कहानियाँ सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं क्योंकि जीवन में कुछ न कुछ ऐसा घटित होता रहता है, जो लेखक को कलम उठाने के लिए प्रेरित करता है और मजबूर भी। किंतु उन कहानियों में भी घटना से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण रही है उन घटनाओं की मारक स्थितियाँ। फिर वह चाहे ‘काला सागर’ थी या ‘ढिबरी टाईट’ या ‘कड़ियाँ’ या फिर ‘एक ही रंग’। मेरी कहानियों में एक अंडर करंट महसूस किया जा सकता है कि आज की दुनिया में तमाम रिश्ते अर्थ से संचालित होते हैं। यह मेरी 1980 और 1990 की कहानियों में तो महसूस किया ही जा सकता है, आज की मेरी कहानियाँ भी इस थीम से अछूती नहीं है। कहीं अन्याय होता मैं नहीं देख सकता। अपने आप को कमजोर के साथ खड़ा पाता हूँ।’ स्वभावतः ही तेजेंद्र शर्मा प्रतिरोध के कथाकार हैं, जिसके साथ करुणा और न्याय का भाव भी उनकी कहानियों में मिलता है। देखा जाए तो साहित्य का स्वभाव ही होता है करुणा, न्याय और प्रतिरोध। करुणाविहीन लेखन में संवेदना नहीं होती। वह दिलों को छू नहीं सकता। करुणा या संवेदना साहित्य की मूल प्रकृति है, जो लेखक को कमजोर या आहत व्यक्ति के लिए न्याय दिलाने को प्रेरित करती है। समाज के कमजोर से कमजोर व्यक्ति की चिंता रचनाकार को होती है और जिसे न्याय दिलाने के लिए वह अपने लेखन में सत्ता-साम्राज्य के प्रतिरोध में मुखरित होता है। लेखक का प्रतिरोध सकारात्मक दिशा में रचनात्मक होता है, जिसके कारण असंख्य लोगों को वह अपने साथ कर लेता है। देश और समाज से वह जुड़ जाता है। यह करुणा, न्याय और प्रतिरोध का स्वर तेजेंद्र शर्मा की कहानियों का मूल स्वर है। इसलिए उनकी कहानियाँ सहज संवेदित करती हैं। एक बातचीत में उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया का खुलासा करते हुए कहा भी, कि ‘रचना लिखने से पहले मैं दिमाग से उसके बारे में सोचता हूँ, विषय पर रिसर्च करता हूँ और विषय को अपने सिस्टम में अच्छी तरह सैटल होने देता हूँ। जब एक बार रॉ-मैटीरियल मेरे सिस्टम में सैट हो जाता है तो मैं अपने दिमाग को थोड़ा विश्राम देता हूँ और फिर दिल से लिखना शुरू करता हूँ। मैं कहानी लेखन में बौद्धिकता का पक्षधर नहीं हूँ। उसके लिए लेख और अन्य विधाएँ मौजूद हैं। क्योंकि कहानी के माध्यम से मैं किसी राजनीतिक पार्टी की विचारधारा का प्रचार नहीं कर रहा होता, इसलिए दिल से लिखता हूँ ताकि मेरी बात हर दिल तक पहुँचे। जब तक मैं अपने चरित्र की समस्याओं को अपनी समस्या नहीं बना लेता, तब तक मैं उनके साथ अपने आप को आइडेंटीफाई नहीं कर पाता। मैं उनकी मुश्किलें अपनी बनाता हूँ, फिर थोड़ा-सा अपना, बिलकुल अपना जोड़ता हूँ। इस तरह दूसरे का दर्द थोड़ा अपना दर्द बन जाता है। उसकी संवेदना मेरी अपनी संवेदनाएँ बन जाती हैं। जाहिर है कि जब दिल में दर्द जाग जाएगा तो संवेदनाओं का प्रवाह तो पैदा होगा ही।’

तेजेंद्र शर्मा की कहानियाँ चाहे वे ‘कब्र का मुनाफा’, ‘देह की कीमत’, ‘ढिबरी टाईट’, ‘काला सागर’, ‘एक ही रंग’, ‘कैंसर’, ‘मुझे मार डाल बेटा’, ‘कल फिर आना’ हो या फिर ‘होमलेस’, ‘पासपोर्ट का रंग’, ‘कोख का किराया’, ‘रेत का घरौंदा’, ‘ओवर फ्लो’, ‘पार्किंग’, ‘भँवर’, ‘बेघर आँखें’, ‘ईंटों का जंगल’, ‘अभिशप्त’ आदि कहानियाँ, सबमें संवेदना का हृदयस्पर्शी प्रवाह है। गजब की पठनीयता है इन कहानियों में। आम आदमी की पीड़ा का बयान करती ये कहानियाँ हमेशा इनसानियत के पक्ष में खड़ी मिलती हैं। यही कारण है कि तेजेंद्र शर्मा अपने को किसी सीमा में बाँधना पसंद नहीं करते। प्रवासी लेखक कहलाना तो उन्हें बिलकुल ही पसंद नहीं। यदि आमजन के सुख-दुःख, पीड़ा-संत्रास आदि की कोई सीमा नहीं होती तो उसे अपनी कहानियों में चित्रित करने वालों लेखक की हदबंदी क्यों हो भला! लंदन में रहने के कारण राजनीतिक हदबंदी के लिहाज से हिंदुस्तानियों के लिए भले वे प्रवासी लेखक हों; किंतु मन, विचार और कलम से तो वे पूरी तरह भारतीय हैं और जिसकी तसदीक उनकी कहानियाँ करती हैं। उनके अंदर भारत के प्रति अपरिमित प्रेम है। उनकी अधिकांश कहानियों के पात्रों के नाम तक हिंदुस्तानी हैं। ‘पासपोर्ट का रंग’ का पात्र गोपाल दास त्रिखा हो या ‘बेहतरीन जिंदगी’ का पात्र नरेन, ‘होमलेस’ का नायक सिकंदर हो या ‘टेलीफोन लाइन’ का पात्र अवतार सिंह , सबके सब हिंदोस्तानी हैं। ‘एक बार फिर होली’ नजमा की कहानी बताती है तो ‘कोख का किराया’ मनप्रीत की, ‘कब्र का मुनाफा’ में खलील और नजम जमाल है तो फिर ‘नरक की आग’ में राजेश और नरेश की कहानी है। उनकी कहानियों के पात्र हिंदोस्तानी ख्यालात के हैं। वे विदेशों में आने-जाने को अभिशप्त भी होते हैं, तो मन उनका हिंदोस्तान में ही रह जाता है। वे विदेश की धरती में जीते हुए भी भारतीय संस्कृति से अपने को मुक्त नहीं कर पाते। इनकी कहानियों में भिन्न-भिन्न पीढ़ियों-संस्कृतियों का द्वंद्व अपने विकासक्रम में परस्पर टकराते हुए भी अपनी जड़ों के भारतीय होने का अहसास करा जाते हैं, जो बताता है कि संवेदनाओं की कोई सीमा नहीं होती। देखा जाए तो दुनिया के किसी भी हिस्से का सामान्य जन-जीवन भिन्न-भिन्न भाषा-संस्कृतियों में जीते हुए भी संघर्षयात्रा में उनकी बुनियादी भाव-यात्रा समान ही होती है, जिसे कोई भी भौगोलिक-राजनीतिक सीमा खंडित नहीं कर सकती। इसी भाव-यात्रा के सूत्र की तलाश तेजेंद्र शर्मा की कहानियाँ करती हैं।

तेजेंद्र शर्मा मुख्यतः मानवीय संवेदना के कथाकार हैं। उनकी तमाम कहानियों में मानवोत्थान का भाव मुखर रहता है। ‘कब्र का मुनाफा’ में चाहे बाजार के वर्चस्व की सक्रियता दिखती हो या ‘कोख का किराया’ में डेविड और गैरी द्वारा मैनी के कोख के इस्तेमाल से अपनी दुनिया आबाद करने के मूल में भी बाजार के ही प्रभुत्व के दर्शन हों या फिर ‘होमलेस’, ‘बेघर आँखें’, ‘पासपोर्ट का रंग’ जैसी कहानियों की दुनिया, इनमें अंततः और तत्त्वतः भी मनुष्य की संवेदना की सर्वोपरिता का ही भाव मुखर है। उनकी प्रायः सभी कहानियाँ संवेदना में पगी मुस्कारती हैं। उनके तमाम पात्र अपनी संवेदना के उजास से मोहित करते हैं। संवेदना के कई-कई रंग हैं इनकी कहानियों में। अच्छी कहानी के लिए कहानीकार का किसी वास्तविक घटना से जुड़ा होना आवश्यक नहीं होता, बल्कि किसी लेखक के लिए जरूरी यह होता है कि वह दूसरों के चेहरे के दर्द को अपना गम बना सके और दूसरों के चेहरे की मुस्कुराहट को अपनी हँसी। यही क्षमता लेखक के देश-समाज या समय से जुड़ने या उसकी संवेदना को परखने-समझने की गुण-ग्राहकता को बढ़ा देती है। तेजेंद्र शर्मा ने जितनी कहानियाँ लिखीं, सब की सब उनके जीवन से ही जुड़ी नहीं हैं, बल्कि सुनी-सुनाई या दूसरों के अनुभव से ली गई घटनाओं से पकाई गई कहानियाँ भी हैं। लेकिन वे सभी घटनाएँ जब तक उनके रचनात्मक अनुभव-प्रक्रिया की आवाँ में पकी नहीं, वे कहानियाँ का रूप नहीं ले पाई। ‘देह की कीमत’ सहित अनेक कहानियाँ लेखक के अपने जीवन से जुड़ी न होकर रचनात्मक अनुभव-प्रक्रिया की आवाँ में पकी कहानियाँ ही हैं।

तेजेंद्र शर्मा का कथा साहित्य विषय की दृष्टि से विविधताओं से भरा समृद्ध साहित्य है। अब तक उन्होंने जितनी कहानियाँ लिखीं हैं, उनमें अनेक हिंदी की सर्वश्रेष्ठ समकालीन कहानियों में रखी जाने योग्य हैं। एक क्लासिक कहानी के लिए जिस कथा-दृष्टि और मानवीय संवेदना की आवश्यकता होती है, उन तमाम तात्त्विकियों से बुनी गई उनकी कहानियाँ विशेष अध्ययन की अपेक्षा रखती हैं। हालाँकि तेजेंद्र शर्मा ने अब तक किसी उपन्यास की रचना नहीं की है, जिसके व्याज से किसी क्षेत्र या विषय के विस्तृत कथा-लेखन की उनकी क्षमता का आकलन किया जा सके, लेकिन इससे उनकी कथा-संवेदना की लेखन-क्षमता पर किसी प्रकार का अविश्वास व्यक्त नहीं किया जा सकता। कहानी के अलावा उन्होंने कविताएँ भी खूब लिखीं और मन से लिखीं हैं। डॉ. हरीश नवल कहते हैं कि ‘तेजेंद्र दिमाग से कहानी लिखता है और उसमें दिल से भाव भरता है। दूसरी ओर वह दिल से कविता लिखता है और उसका दिमाग उसमें विचार प्रेषित करता है। मैं कहूँगा कि तेजेंद्र एक संपूर्ण साहित्यकार है। वह एक अनोखा शैलीकार भी है। उनकी रचनाओं में शेड और रंग कॉमन नहीं है।’ प्रेम से लबालब तेजेंद्र शर्मा का कथाकार-व्यक्तित्व अपने मूल्यांकन में भी सीमाहीन प्रेम के विस्तार की अपेक्षा रखते हैं। प्रवासी लेखक, प्रगतिशील लेखक जैसे दायरे में बँधकर देखे जाने के कायल वे नहीं…!

तेजेंद्र शर्मा ने साहित्येतर कार्य भी कई किए। उनकी रुचि की दिशाएँ भी कई हैं। वे खुद कहते हैं–‘साहित्य के अलावा मुझे स्पोर्ट्स विशेषकर क्रिकेट, टेनिस और बैडमिंटन में रुचि है। अब खेल तो नहीं पाता, मगर देखना, पढ़ना और सुनना तो हो ही जाता है। इसके अतिरिक्त मुख्यधारा के सिनेमा में मेरी खासी रुचि है। एक विचित्र बात यह है कि मुख्यधारा का साहित्य वह है जिसे पाठक नहीं मिलते, जबकि मुख्यधारा का सिनेमा वह है जो कि आम आदमी से जुड़ा है। मुझे खासतौर पर 1949 से 1972 के बीच का सिनेमा बहुत पसंद है। उन 23 वर्षों को मैं हिंदी सिनेमा का स्वर्णयुग कहता हूँ। हिंदी सिनेमा का बेहतरीन काम ब्लैक एंड ह्वाइट फिल्मों में हुआ है। गुरुदत्त, राजकपूर, बी.आर. चोपड़ा, व्ही. शांताराम, बिमल रॉय, ऋषीकेश मुखर्जी, महबूब खान, के. आसिफ, कमाल अमरोही जैसे कुछ अद्भुत फिल्मकार इस अवधि में अविस्मरणीय फिल्में बना गए। इसी काल में दिलीप कुमार, राजकपूर, देवानंद, शमी कपूर, राजकुमार, राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र, शशि कपूर, किशोर कुमार, महमूद, बलराज सहनी, नरगिस, वहिदा रहमान, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, आशा पारेख जैसे लीजैंड कलाकार अपनी अदाकारी का जौहर दिखा रहे थे। मुझे इस काल के फिल्मी गीत आज की मुख्यधारा की कविता के मुकाबले कई-कई गुणा बेहतर लगते हैं। शैलेंद्र, भरत व्यास, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूनी, कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी, आनंद बख्शी, प्रदीप, इंदीवर आदि कुछ ऐसे गीतकार हुए, जिन्होंने सरल शब्दों में जीवन की व्याख्या फिल्मी गीतों के माध्यम से की। मैं इन गीतों को गंभीरता से पढ़ता हूँ और लंदन में इन गीतकारों पर दो-दो घंटे का पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन प्रस्तुत करता हूँ। ये गीत आम आदमी को भाषा से जोड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। हम आज की मुख्यधारा के कवियों के कंधों पर हिंदी भाषा की कश्ती का बोझ नहीं रख सकते, जबकि ये फिल्मी गीतकार एक तरफ ‘गीत बनाके जहाँ को सुनाते हैं’ और ‘कोई ना मिले तो अकेले में गाते हैं।’ इसके अलावे तेजेंद्र शर्मा ने बी.बी.सी. हिंदी रेडियो में समाचार वाचन किया है, तो एक समय अनु कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अभय’ में नाना पाटेकर के साथ अभिनय भी किया। जीवन हो या फिर साहित्य, उसकी विविधता में उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को विस्तार मिलता गया है।

ऐसे बहुपधीन व्यक्तित्व के धनी कथाकार तेजेंद्र शर्मा के लेखन से मेरा सरोकार पुराना है, कोई तीन दशक पुराना! ‘सारिका’ बड़े चाव से मैं पढ़ा करता था, वहीं नब्बे के दशक में उनकी कोई कहानी पढ़ी थी। तभी से मेरे जेहन में तेजेंद्र शर्मा का कथाकार अपना दखल रखता आया है। करीब दस साल पहले दिल्ली दूरदर्शन में अपने मित्र डॉ. अमरनाथ ‘अमर’ के कक्ष में उनसे पहली बार रूबरू होने का अवसर मिला था। अमर जी ने उनसे मेरा परिचय कराया था, लेकिन वह इतना क्षणिक था कि तेजेंद्र जी की स्मृति में शायद ही वह परिचय शेष रहा हो! कायदे से उनसे मिलने-बतियाने का अवसर मिला पिछले वर्ष! यह अवसर हमें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने दिया। संस्थान ने 2011 की हिंदी सेवी सम्मान योजना के तहत मुझे गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार और तेजेंद्र जी को पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार देने की घोषणा की, जो हमें 27 अगस्त, 2014 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के हाथों प्राप्त हुए। इसी सम्मान को लेने के लिए हम दिल्ली में थे। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आई.आई.सी.) में हमें ठहराया गया था। संयोग से मेरा और उनका कमरा साथ ही लगा था। मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वहाँ ठहरा था और वे भी अपनी बेटी दीप्ति के साथ थे। तीन दिन हम वहाँ रहे। पहले ही दिन आई.आई.सी. के रेस्टोरेंट में उनसे मुलाकात हो गई। उस पहली ही मुलाकात में उनके प्रेम ने मुझे ऐसा बाँधा कि आज तक उससे मुक्त नहीं हो पाया! उनकी सरलता और सादगी मोहित करती है जबकि बातचीत का उनका लहजा गहरे अपनेपन से भर देता है। उन तीन दिनों के आई.आई.सी. प्रवास में हम कितनी ही बार मिले, साथ भोजन किया और बातचीत के क्रम में एक-दूसरे को परस्पर अभिन्न कर लिया। उनकी बेटी दीप्ति ने मेरी बेटी शैली को अपने स्नेह-बंधन में ऐसा बाँधा, कि लौटने के बाद केवल दीप्ति को देखने के लिए ही शैली ‘जमाईराजा’ सीरियल देखने लगी और उस सीरियल में दीप्ति के अच्छे अभिनय की तारीफ अपने दोस्तों से मुक्तकंठ करती। उस मुलाकात के बाद वे लंदन लौट गए और मैं पटना आ गया, लेकिन आभासी दुनिया में हमारा मिलना-बतियाना चलता रहा!

तेजेंद्र शर्मा जितने अच्छे कथाकार हैं, उतने ही बेहतर इनसान भी! उनके सोपानधर्मा विकास में उनके जीवन-संघर्ष और सकारात्मक जीवनदृष्टि का बड़ा योगदान रहा है। ब्रिटेन के तेजेंद्र शर्मा जैसे जीवंत कथाशिल्पी सहित तमाम भारतवंशी लेखकों को हिंदी साहित्य के इतिहास में सम्मानजनक स्थान देते हुए उसे समग्र रूप दिया जाना चाहिए। हिंदी के हित में तमाम भारतवंशी या प्रवासी लेखकों को हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में परिगणित किया जाना लाजमी भी है। कथाकार तेजेंद्र शर्मा का रचनात्मक व्यक्तित्व इतना सम्मोहक है कि हम उनसे दूर रहना भी चाहें, तो वे हमारी ओर बाँहें पसार मुक्तकंठ गा उठते हैं–‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक तुम्हारा है/यहाँ जो आ गया इक बार, बस हमारा है!’

कथाकार तेजेंद्र शर्मा के सृजन-संसार को ‘नई धारा’ का सलाम!


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Artist : Gustave Caillebotte
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शिवनारायण द्वारा भी

कई बार ऐसा होता है कि हम जो चाहते हैं, वह नहीं होता। बल्कि अक्सर ऐसा ही होता है। हम चाहते कुछ हैं और होता कुछ और है–चाहने से कुछ कम या फिर ज्यादा। हमारे चाहने की अपनी सीमा है, जिसके इर्द-गिर्द ही हम डोलते रहते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि हम अपनी सीमा के विस्तार से अंजान सीमित दायरे में ही अपने लिए कुछ चाहते हैं, जबकि वक्त-विधाता के हाथों मिलना बहुत ज्यादा होता है। हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे अवसर आते हैं। इसलिए अवसर को पहचान पाने का विवेक स्थिर करना बहुत जरूरी होता है। जीवन की दिशा उसी पर निर्भर होती है। दिशा सही हो, तो जीवन में सफलता दर सफलता मिलती चली जाती है। सफलता का अमीरी-गरीबी से कोई संबंध नहीं होता।