बड़ा फर्क है प्रेम करने और निभाने में

बड़ा फर्क है प्रेम करने और निभाने में

हिंदी को जिन उपन्यासों ने नए मुकाम पर पहुँचाया, उनमें शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चाँद’, सुरेंद्र वर्मा का ‘मुझे चाँद चाहिए’, कामतानाथ का ‘कालकथा’, चित्रा मुद्गल का ‘आवां’, कमलेश्वर का ‘कितने पाकिस्तान’, काशीनाथ सिंह का ‘रेहन पर रग्घू’, मैत्रेयी पुष्पा का ‘अल्मा कबूतरी’, चंद्रकांता का ‘कथा सतीसर’, ममता कालिया का ‘बेघर’, नासिरा शर्मा का ‘शाल्मली’, अखिलेश का ‘निर्वासन’ और वीरेंद्र जैन का ‘डूब’ शामिल हैं, लेकिन मैत्रेयी पुष्पा ने चार महत्त्वपूर्ण उपन्यास–‘इदन्नमम्’, ‘चाक’, ‘कही ईसुरी फाग’ और ‘अल्मा कबूतरी’ लिखकर जितना नाम कमाया, उतना कोई न कमा सका। समकालीन स्त्री रचनाकारों में चित्रा के ‘आवां’ और मैत्रेयी के ‘चाक’ को शीर्ष स्थान हासिल है। स्त्री देह और मन को आजाद करने का जो आंदोलन पश्चिम में देर तक चला, मैत्रेयी हिंदी में उसकी प्रतिनिधि हैं, जिसकी शुरुआत कृष्णा सोबती और मन्नू भंडारी की रचनाओं में काफी पहले हो गई थी, जिसे मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ‘पंचकन्या’ ने नई दृष्टि दी।

मैत्रेयी पुष्पा स्त्रीवादी कथाकार मानी जाती हैं, सुधा अरोड़ा की तरह। वैसे ठेठ स्त्रीवाद के दर्शन कृष्णा सोबती की ‘मित्रो मरजानी’ से लेकर मनीषा कुलश्रेष्ठ के ‘पंचकन्या’ तक में बहुतायत से उपलब्ध हैं। ‘आपहुदरी’ की सर्जक रमणिका गुप्ता में तो वे अपने चरम पर मिलते हैं, जिसकी झलक संजीव की कहानी ‘मानपत्र’ और उदय प्रकाश की उपन्यासिका ‘पीली छतरी वाली लड़की’ तक में सहज रूप से देखी जा सकती है। शायद इसलिए मैत्रेयी पुष्पा मानती हैं कि स्त्रियों को पुरुषों और पुरुषों को स्त्रियों के सुख-दुख समझने चाहिए और रचनाकारों को स्त्री-पुरुष दोनों की जीवन स्थितियों और सुख-दुख को सृजन का आधार बनाना तो चाहिए, लेकिन स्त्रियों और दलितों की बात प्रामाणिक तरीके से वही कह सकते हैं। वह चाहे ‘दुलाई वाली’ की सर्जक एक बंग महिला उर्फ राजेंद्र बाला घोष रहीं, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल अथवा मैत्रेयी पुष्पा, पुरुष लेखकों ने किसी के भी कृतित्व को सहजता से नहीं लिया, लेकिन धीरे-धीरे कृष्णा सोबती, अलका सरावगी और मृदुला गर्ग को साहित्य अकादेमी पुरस्कार के साथ मन्नू भंडारी, चित्रा मुदग्ल, सुनीता जैन और चंद्रकांता को व्यास सम्मान मिलने से वह असहजता दूर हो रही है। मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘इदन्नमम्’, ‘चाक’ और ‘अल्मा कबूतरी’ को धीरे-धीरे ही सही, हिंदी समाज ने स्वीकार कर लिया। ‘इदन्नमम्’ तक तो ठीक, लेकिन ‘चाक’ और ‘अल्मा कबूतरी’ पर बहुत हाय तौबा हुई। गौर से देखेंगे तो ‘ललमुनिया’ से चर्चा में आई मैत्रेयी  की रचनाओं में कहीं भी दोहराव नहीं मिलेगा। उन्होंने नित-निरंतर नई जमीन तोड़ी और समाज के विभिन्न वर्गों से किसिम-किसिम के पात्र उठाकर उन्हें आसमानी ऊँचाइयाँ दे दीं। ‘इदन्नमम्’ और ‘चाक’ की तो फिर भी अच्छी-बुरी चर्चा हुई, लेकिन ‘अल्मा कबूतरी’ को तो लोगों ने समाजशास्त्रीय अध्ययन कह कर किनारे ही कर दिया, जबकि साहित्य को समाज का दर्पण माना जाता है। इसी तरह लोगों ने कामतानाथ के महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘कालकथा’ को भी ठिकाने लगाने की कोशिश की, लेकिन ‘काल कथा’ और ‘अल्मा कबूतरी’ जैसे उपन्यास आसानी से ठिकाने नहीं लगा करते। आइए, मैत्रेयी से उनके जीवन और साहित्य पर कुछ बातें कर लेते हैं।

                          पुरस्कारों की मारा-मारी के बीच चुपचाप लेखन रत रहते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से ‘महात्मा गाँधी सम्मान’ पाने के बाद आपको ‘नई धारा’ द्वारा ‘उदय राज सिंह स्मृति सम्मान’ मिला तो कैसा लगा?

साहित्य, कला और संस्कृति के नाम पर न तो पुरस्कारों-सम्मानों की कमी है और न ही लेने वालों का अकाल है। हाँ, यह देखने का समय किसी के पास नहीं है कि पुरस्कार पाने वाला उसका अधिकारी है या नहीं, जिस योग्यता और कुशलता के लिए पुरस्कार-सम्मान निर्धारित किया गया है। तभी तो ऐसा भी हो जाता है कि जिस लेखक-कवि को पुरस्कार दिया जा रहा होता है, उसकी पुस्तक वैसी योग्यता नहीं रखती। पुरस्कार प्राप्ति के बाद उस पुस्तक का नाम तक याद नहीं रह पाता। यह भी होता है कि किसी विशेष लेखक को ध्यान में रखकर पुरस्कार देना होता है। कई बार संस्तुतियाँ भी समीकरण बिठाकर भेजी जाती हैं। ऐसा इसलिए कह रही हूँ कि मैं कुछ पुरस्कारों-सम्मानों की निर्णायक समितियों में रही हूँ। कई बार वहाँ अजीब हास्यास्पद स्थितियाँ देखने को मिलती हैं। ऐसे में चुपचाप लेखनरत न रहा जाए तो क्या किया जाए, यही रास्ता सच्चा लगता है। जब लेखन के क्षेत्र में आई तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे कभी पुरस्कार मिलेंगे। इच्छा नहीं थी तो उम्मीद भी क्योंकर होती , लिखना ही सब कुछ था, मगर लगभग पहली ही पुस्तक ‘चिन्हार’ को हिंदी अकादमी, दिल्ली का साहित्यिक कृति पुरस्कार मिल गया। राशि थी ग्यारह हजार रुपये। इसके बाद दूसरी किताब ‘बेतवा बहती रही’ को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ मिला। ‘इदन्नमम्’ उपन्यास उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक से पुरस्कृत हुआ। इन पुरस्कारों के लिए मेरा चयन कैसे हुआ, आज तक नहीं जानती। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से ‘महात्मा गाँधी सम्मान’ मिला। उस समय उसकी राशि दो लाख थी, जो मेरे लिए महत्त्वपूर्ण नहीं। महत्त्वपूर्ण होता है सम्मान। ‘नई धारा’ का सम्मान भी महत्त्वपूर्ण है, जिसे पाकर मैं ही क्या, कोई भी खुश होगा।

साहित्यिक पुरस्कारों की राजनीति को लेकर क्या सोचती हैं?

साहित्यिक पुरस्कारों की राजनीति पर सोचने का समय निकाल तो सकती हूँ, लेकिन निकालती नहीं। इतने समय में कोई रचनात्मक कार्य हो जाए तो बेहतर है। फिर कह रही हूँ कि मुझे पता था कि कहानी-उपन्यास लिखूँगी तो इनाम भी मिलेंगे। हाँ, अब देखती हूँ कि पुरस्कारों को लेकर जो मारामारी है, उतनी लेखन की गुणवत्ता बढ़ाने की होती तो इन दिनों हमें इस समय के धर्मवीर भारती, राजेंद्र यादव, बाबा नागार्जुन और फणीश्वरनाथ रेणु जैसे रचनाकार देखने को मिलते, लेकिन उनकी जैसी गहराई वाली रचनाओं का अकाल है। फेसबुक, वाट्सएप और ट्विटर के जमाने में समय का टोटा पड़ा रहता है। फिर इतने ही समय में लिखने रचने का काम भी करना है और जो कर लिया है, उसको छपाना भी है। पुरस्कार के जरिये चर्चा में आना सबसे आसान है। सो, लेखन को उठाने-गिराने के लिए लोग राजनीति की गोद में जा गिरते हैं। चुपचाप लिखने वाला ही आज सही सृष्टा है।

पहली रचना और पहली किताब कब और कैसे छपी?

पहली रचना छपने का समय किसी भी लेखक के लिए सबसे प्यारा और महत्त्वपूर्ण समय होता है। मेरे लिए भी रहा। ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में पहली कहानी ‘आक्षेप’ छपी, जिसे मैंने हिमांशु जोशी को सौंपा था। वह 8 अप्रैल, 1990 का दिन था, जब मेरे लेखन का सार्वजनिक रूप से जन्म हुआ। आगे चलकर किताब छपाने के लिए हिमांशु जोशी ने ही किताबघर प्रकाशन का नाम सुझाया था। वैसे जिस तरह से मेरी कहानियों पर पाठकों के पत्र आ रहे थे, उनसे निराशा जैसी कोई बात मेरे आसपास नहीं थी। आश्चर्य भी होता है कि जब कथाएँ पाठकों पर अपना असर दिखा रही हैं तो कुछ संपादकों ने मुझे हतोत्साहित क्यों किया था? तब से आज तक मैं यही मानकर चल रही हूँ कि रचना की सरल भाषा, मामूली लोगों की जिंदगी और हमारी किस्सागोई पाठकों के लिए सुरुचिपूर्ण पाठ प्रस्तुत कर सकती है। बेशक मैं अपने बारे में यही कह सकती हूँ कि विद्वत्ता का आडंबर मुझे न पढ़ने में रास आता है, न सुनने में और न ही लिखने में।

अपनी ढेर सारी किताबों में किसे सर्वश्रेष्ठ मानती हैं?

बड़ा टेढ़ा सवाल है यह। किसी माँ से पूछिए कि तीन-चार बच्चों में से कौन सा सबसे अच्छा है? मेरे ख्याल में माँ को अपना वही बच्चा सबसे ज्यादा अच्छा प्यारा लगता है जिसकी तारीफें करने वाले बहुत कम होते हैं। ‘इदन्नमम्’, ‘चाक’, ‘अल्मा कबूतरी’…अक्सर लोग इन तीन उपन्यासों की गिनती करने के बाद मेरे बाकी आठ उपन्यासों का नाम तक नहीं लेते, लेकिन ‘कही ईसुरी फाग’ भी अपनी शैली, कलेवर और कथ्य में कम नहीं। एक लोककवि ईसुरी अपनी फागों की नायिका रजऊ के नख-शिख का वर्णन करते हुए पढ़ने और सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर लेता है, लगभग नशे जैसी हालत में ले जाता है, लेकिन उपन्यास उसी नायिका को परकीया से निकालकर जोगिन बना देता है–प्रेम और देशप्रेम के लिए। सन् 1857 के झाँसी युद्ध में शहीद रजऊ का आख्यान है ‘कही ईसुरी फाग’, जो लोककवि ने नहीं कहा, पर उपन्यास ने दर्ज किया। दर्ज होना चाहिए, क्योंकि अभी भी बहुत-सी ऐसी रचनाएँ आपको मिलेंगी, जहाँ पुरुष के लिए स्त्री केवल सौंदर्य की पुतली है, उसकी तारीफें ही उसका जीवन ध्येय है। कर्म में उतरना उसके लिए अनिष्ट है। ऐसी धारणाओं को प्रश्नांकित करना ध्येय होना चाहिए ताकि समानता का पटल बन सके।

आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ के पीछे की अंतःकथा क्या है?

‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ से पहले आत्मकथा की किताब ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ छपी थी, जिसके छपने पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, जैसा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ के छपने पर हुआ। कारण साफ था कि ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ में माँ मुख्य भूमिका में थी। माँ का चरित्र है, पाठकों ने उन्हें मेरी आत्मकथा की नायिका माना, सही मायने में हीरोइन। स्त्री का जीता-जागता संघर्ष लोगों के सामने घटित हुआ हो जैसे। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ मैं लिखना नहीं चाहती थी। जरूरत भी नहीं थी, लेकिन जिन्होंने ‘कस्तूरी कुंडल बसै’ पढ़ा, ज्यादातर लोगों ने मेरे सामने माँग रख दी कि अब लिखकर यह बताऊँ कि लेखिका कैसे बनी? बड़ी दुविधा थी, बड़ा असमंजस। पति से पूछा, ‘आत्मकथा’ का दूसरा भाग लिखूँ तो उनका उत्तर था, ‘क्या जरूरत?’ समझ गई कि आत्मकथा के दूसरे भाग में माँ-बेटी नहीं, पति-पत्नी के किरदार होंगे, जो अपनी असलियत में दर्ज किए जाएँगे। यह बात मुझसे ज्यादा डॉ. साहब समझ रहे थे। कोई भी पुरुष अपनी पत्नी को अपने घर के दबे-छुपे कोने क्यों उघाड़ने देगा? ऐसा स्त्रियाँ भी प्रायः नहीं चाहती रहीं, फिर मैं क्यों चाहती हूँ? उन स्त्रियों का आग्रह मुझे लिखने के लिए उकसा रहा था और मैं भी आपबीती लिख डालने के लिए भीतर से उद्विग्न थी। कब-कब से जुड़े अनुभव, वर्षों से जो बातें मन में सँजोई हुई थीं, वे अब अच्छी-खासी कथा बन गई हैं, खोल दूँ उस व्यथा कथा को या सुहाने सपनों को बता दूँ कि पति और मीत में क्या अंतर होता है, लिख दूँ कि संवेदना, सहृदयता और प्रेम किसी भी नाते-रिश्ते पर भारी पड़ते हैं। कह दूँ कि प्यार छूट तो जाता है, पर टूट नहीं जाता। उस पत्र को भी उजागर कर दूँ, जिसने कविता में प्रेम प्रेषित किया था। यह भी कि स्त्री जो कुछ सोचती है, वह करती नहीं और जो कुछ करती दिखती  है, वैसा ही कुछ सोचती नहीं। विवाह निभाना होता है, प्रेम किया जाता है। निभाने और मन से अपनी इच्छा के अनुसार प्रेम करने में फर्क होता है, जो दूसरों को दिखता नहीं। सब सोचा, सब लिखा। चुपचाप लिखा। एकांत में लिखा। इतना और ऐसा लिखा कि हृदय के सारे कलुष धुल गए। किताब छपकर आई। पहली पेशी पति के दरबार में। जो होना हो, सो हो जाए। तलवार की धार पर चलने जैसा अनुभव। साहस की पराकाष्ठा, जैसे पति नहीं, सामने अक्षैहिणी सेना खड़ी थी। अपने निर्णय पर अडिग थी। जो लिखा, सच लिखा। ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ राजेंद्र का दिया शीर्षक है, जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व का कुछ ऐसा ही विश्लेषण किया था।

किताबों के छपने का सिलसिला कभी टूटने नहीं पाता। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निभाने के साथ इतना कुछ कब और कैसे लिख लेती रहीं।

तुम कहते हो कि मेरी किताबों के छपने का सिलसिला थम नहीं पाता, लेकिन ऐसी बात तो नहीं है। कुछ अंतराल तो किताब से किताब के बीच में रहता ही है। हाँ, मैंने तेजी से लिखा है,  क्योंकि पैंतालीस साल की उम्र में लिखना शुरू किया था। जब अनुभव हों और उनको रचने की कला और क्षमता हो तो उपन्यास लिखने में ज्यादा वक्त नहीं लगता, मगर सब कुछ ऐसा ही नहीं था। बहुत कुछ सीख भी रही थी, जिसके लिए बहुत-सी किताबें पढ़ रही थी। पढ़ाई-लिखाई के साथ घर की जिम्मेदारियाँ भी निभा रही थी। नौकरी नहीं करती थी, इसलिए घरेलू कामों से निजात नहीं थी। मैंने हमेशा वह समय चुना, जब मेरे लिखने के कारण घर के लोगों को परेशानी न हो। उनकी सहूलियतों में रुकावट न आए। अगर ऐसा होता तो कलह भी हो सकती थी, जिसके कारण ज्यादा से ज्यादा समय व्यर्थ हो जाता। मेरा मानना यह भी है कि लिखने में तब ज्यादा देर होती है, जब हम थीम खोजते फिरते हैं। जब हमारे पास कहने के लिए वह कथा नहीं होती, जो पाठकों के लिए अनसुनी हो। मैं गाँव की पृष्ठभूमि से आई हूँ और यहाँ साहित्य में स्त्री को लेकर शहरी बाजे बज रहे थे। जाहिर है कि गाँव की स्त्रियों और पुरुषों की अछूती कहानियाँ अपना असर दिखाने लगीं। मैं ज्यादा किरदार लाने में मशगूल होती चली गई और किताबों पर किताबें छपती रहीं।

आपकी ग्यारह श्रेष्ठ कहानियाँ और तीन श्रेष्ठ उपन्यास कौन-से हैं?

फिर टेढ़ा सवाल! ग्यारह श्रेष्ठ कहानियों की गिनती। अच्छा यह बताइए कि ग्यारह की गिनती कराकर बाकी कूड़ेदान में डाल दूँ? मैं उन कहानियों के नाम देती हूँ, जो लोगों को अच्छी लगी और मैं भी उन्हें श्रेष्ठ मान रही हूँ–‘तुम किसकी हो बिन्नी’, ‘रास’, ‘राय प्रवीण’, ‘फैसला’, ‘सेंध’, ‘ललमनिया’, ‘ताला खुला है पापा’, ‘बारहवीं रात’, ‘मुस्कुराती औरतें’, ‘बिछुड़े हुए’ तथा ‘रिजक’। उपन्यास हैं–‘इदन्नमम्’, ‘चाक’, ‘अल्मा कबूतरी’ (पाठकों की पसंद), लेकिन मेरा चौथा उपन्यास ‘कही ईसुरी फाग’ मुझे ज्यादा पसंद है, जिसमें प्रेम जब विस्तार लेता है तो समाज ही नहीं, देश के लिए युद्ध तक फैलता चला जाता है।

कहानियों की तुलना में आपके उपन्यासों की ही चर्चा अधिक क्यों हुई?

नहीं जानती कि कहानियों के मुकाबले उपन्यासों की चर्चा ज्यादा क्यों हुई? हो सकता है कि कहानी पर ठहरने की स्थिति को जल्दी से जल्दी लाँघ गई और उपन्यासों को मुख्य लेखन की तरह ले लिया। कहानियाँ गौण होती चली गईं। चर्चा में उपन्यास ही रहे। कहानियों पर उदासीनता दिखाने का कुछ दोष मेरा भी है। यह भी कि उपन्यास का कैनवास इतना समय और स्थान घेर लेता है कि बाकी चीजों की सुध-बुध ही बिसरा जाती है।

समाज पर साहित्य कोई प्रत्यक्ष प्रभाव डाल पाता है क्या?

यह गारंटी नहीं कि साहित्य तुरंत ही समाज पर अपना प्रभाव दिखाने लगेगा। शायद यह होता भी नहीं। साहित्य के लिए पाठकों और समीक्षकों के पास ऐसी नजर होती है, जो रचना को कूट-पीस कर छानती रहती है जो प्रासंगिक हैं। कोई मसला आता है तो उनकी लेखनी यादों में कौंध जाती है। नागार्जुन भी ऐसे ही रचनाकार हैं। इतना अवश्य है कि साहित्य का असर धीमी गति से होता है। धैर्य और संयम रचनाकार का भी गुण होता है। जो समाज की पड़ताल गहराई से करेगा, उसी का रचा असर दिखाएगा। अब्राहन लिंकन का अपने बेटे के टीचर के नाम लिखा पत्र आज भी असर दिखा रहा है। कालजयी कृतियाँ वे ही कहलाती हैं, जो समाज पर अपना असर छोड़ती हैं।

टीवी पर धारावाहिक के रूप में ‘इदन्नमम्’ देखकर कैसा लगा?

‘मंदा हर युग में’ नाम से धारावाहिक के रूप में टीवी पर ‘इदन्नमम्’ आ रहा है। समाज पर असर डालने का दम है, तभी न इसे लिखे बाइस साल हो गए। इसके बावजूद समसामयिक मुद्दे आज भी वही हैं। मुझे क्या, किसी भी लेखक को अपने सिरजे हुए किरदारों को सजीव रूप में देखकर अच्छा ही लगेगा।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चलते साहित्य खतरे में क्यों लगता है?

साहित्य पर खतरा कहाँ से आ गया, खतरा होता तो उपन्यास टीवी के पर्दे पर क्यों आता? कहानियों पर फिल्में क्यों बनतीं? माना कि इंटरनेट के जरिये फेसबुक और वाट्सएप मनुष्य का काफी समय ले रहे हैं, लेकिन ये संसाधन ज्यादा से ज्यादा उपयोगी भी तो हैं। यह हम पर है कि हम उनका उपयोग सकारात्मक कामों के लिए करते हैं या नकारात्मक रूप में। साहित्य के लिए खतरा तो टीवी को भी बताया गया था, लेकिन साहित्य खत्म हुआ क्या?

कुछ है, जो आपको मिलना चाहिए था, पर नहीं मिला, मसलन साहित्य अकादेमी पुरस्कार अथवा व्यास सम्मान, उसे लेकर क्या सोचती हैं?

साहित्य अकादेमी पुरस्कार और व्यास सम्मान आदि की कितनी उपयोगिता है, मुझे नहीं मालूम। हाँ, इतना जरूर मालूम है कि इनके लिए मारामारी मचती है। कोई सम्मान ऐसे मिले तो उसे मैं अपमान मोल लेना मानती हूँ। व्यास सम्मान जिस क्रम से मिला, कृष्णा सोबती ने उसे स्वीकार ही नहीं किया।

कहते हैं साहित्य और कला सृजन में स्त्री और पुरुष का भेद मिट जाता है। स्त्री होने के नाते इस बारे में आप अपनी बात कुछ खुलकर कहेंगी क्या?

सृजन लिंग भेद, जाति भेद, वर्ण भेद और वर्ग भेद से परे माना जाता है, लेकिन इस मान्यता पर प्रश्नचिह्न तब लगा, जब कुछ नए विमर्श लेकर राजेंद्र यादव ‘हंस’ के जरिये सामने आ गए। दलित विमर्श ने प्रमाणित किया कि वर्ण और वर्ग भेद का अच्छा-खासा स्वामित्व रहा है साहित्य में। दलितों की जो बात सवर्ण लेखकों ने लिखी, वो ठीक वही नहीं थी, जो अब दलित अपनी कलम से लिखने लगे हैं। इसी तरह स्त्री का हृदय भी पुरुषों की कलम द्वारा उस तरह नहीं खुला, जिस तरह स्त्रियों ने खुद लिखकर मन में दबा-छिपा दिलेरी के साथ उजागर किया। यह माना तो जा सकता है कि साहित्य और कला सृजन में स्त्री-पुरुष का अंतर कैसा, लेकिन हमारे समाज में भेदभाव की जो गाँठें हैं, वे इस अंतर को चिन्हित करती हैं, वरना कोई सवर्ण ‘जूठन’ क्यों नहीं लिख सका, जिसे ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखा। तुलसीराम ने ही क्यों ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ को अपनी कलम से उतारा, बिल्कुल उसी तरह किसी पुरुष ने ‘मित्रो मरजानी’ क्यों नहीं लिखी या स्त्रियों जैसे उपन्यास और आत्मकथाएँ क्यों नहीं लिख सके। यह अनुभव और अनुमान के फर्क का नतीजा है कि सृजन में स्त्री-पुरुष की कलम-कूची का अंतर आता ही है।

किन लेखकों और उनकी आत्मकथाओं ने प्रभावित किया?

मुझे रेणु ने बेहद प्रभावित किया। भाषा के प्रयोग के मामले में वे मेरे गुरु हैं। गोर्की की आत्मकथा ‘माँ’ ने भी प्रभावित किया। इस्मत चुगताई की आत्मकथा ‘कागजी है पैरहन’ कई बार पढ़ी और ‘टेढ़ी लकीर’ भी। महाश्वेता देवी का ‘न हन्यते’ उपन्यास है या आत्मकथा, मेरे लिए खुद से अलग करने वाली कृति नहीं।

जीवन की कोई घड़ी, जिसे लेकर सोचती हों, काश! वह न आती?

क्या भूलूँ क्या याद करूँ, जीवन में वह घड़ी ही याद आती है, जिसे मैंने खुद न्योत कर बुलाया-शादी। माँ मना करती रही, लेकिन मैं शादी के लिए अड़ी रही, वह भी अरेंज मैरिज। लव मैरिज कर सकती थी, पर नहीं की। मुझे तो किसी भी तरह की शादी नहीं करनी थी, लेकिन अनाथ और असहाय-सी जिंदगी ने शादी की ओर धकेल दिया। वैवाहिक जीवन में यों तो कोई विशेष दु:ख नहीं गिना सकती, लेकिन बंधनों के बाड़ सबसे बड़े दु:ख रहे–उन्हें लाँघने के भय। दहशतों ने शिकंजा कस लिया और मैंने मन ही मन विवाह संस्था के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। तलाक लेना, अलग हो जाना ही विवाह संस्था का विरोध नहीं होता, वैवाहिक जीवन में रहते हुए उन बंधनों को हटाते जाना सबसे बड़ा प्रतिरोध है, जिसमें मेरा सारा जीवन लग गया। पितृसत्ता को बदलने का बीड़ा उठा लिया कि बदलाव अपने ही घर से शुरू हो और यह भी सच है कि अपने घर-परिवार की परंपराओं-मर्यादाओं के खिलाफ चलकर भी घर में बने रहना, घर को बनाए रखना स्त्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। शादी न होती तो मुझे बहुत-सी सामाजिक बुराइयों का पता ही न चलता।

आने वाली अपनी किताब के बारे में कुछ बताएँगी?

आनेवाली किताब राजेंद्र यादव के बारे में है ‘वह सफर है कि मुकाम था–मेरी नजर में राजेंद्र यादव।’ इसमें वही प्रसंग हैं, जहाँ-जहाँ राजेंद्र ने अपनी जिंदगी में मुझे शामिल किया। जहाँ मैं शरीक नहीं, उसके बारे में कुछ क्यों लिखूँ?


Image: Maitreyi Pushpa Wikipedia.org
Image Source: Wikimedia Commons
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Note : This is a Modified version of the Original Artwork


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बी.पी. नारायण द्वारा भी