अर्जियाँ

अर्जियाँ

परिवहन निगम की बस की खिड़की से खाई कुछ ज्यादा ही भयावह दिख रही थी। एक तरफ गगनचुंबी पहाड़ और दूसरी तरफ अंतहीन खाई। साँप जैसे आड़े-टेढ़े रास्ते में बस घुर्र-घुर्र चली जा रही थी। कई मोड़ों पर तो ड्राइवर स्पीड भी कम नहीं कर रहा था।

पहाड़ी ड्राइवरों की खतरनाक ड्राइविंग रास्ते का लुत्फ ही खत्म कर देती है। हर मोड़ पर लगता है अब गए कि तब। वैसे पहाड़ी ड्राइवर सबसे कुशल माने जाते हैं, उनकी बस का एक पहिया चाहे खाई में लटका हो लेकिन ड्राइवर निश्चिंत और बस सुरक्षित रहती है। अब यह बात शहर के पैसैंजर तो नहीं जानते ना! ऊँचे-ऊँचे देवदार और चीड़ के पेड़ लुभावने लग सकते थे, पर्वतों की शृंखलाएँ मन में गीत गुनगुनाने को उकसा सकती थी, अगर आशुतोष का मन खुश होता। पिछली शाम याद आते ही उसका मन उचाट हो गया।

आशुतोष को उल्टे सीधे कपड़े बैग में घुसाकर घर से निकलता देख, माँ पीछे-पीछे दौड़ी भी थी, ‘अरे आज ही कहाँ जा रहा है? तुझे तो दो दिन बाद जाना था ना?’
‘ना, आज ही जाना है, कुछ काम है’ आशु किसी को समझाने के मूड में नहीं था। ‘अरे खाना तो खा ले’ माँ पीछे-पीछे आ रही थी।

‘भूख नहीं है’ कह, बिना किसी से आँखें मिलाए वह घर से बाहर निकल जाना चाहता था। अभी चाची बैठक में ही थी। उसके जाने के बाद सब सहानुभूति दिखाएँगे, गुस्सा दिखाएँगे, या अटकलें लगाएँगे, वह कुछ नहीं देखना चाहता था।

‘क्या मतलब लड़की वालों ने मना कर दिया? चार महीने से जो ड्रामा चल रहा है उसका कोई मतलब है कि नहीं?’

सुबह-सुबह मोबाइल में सबसे पहले गुड मॉर्निंग का मैसेज अंजू का ही होता था। वह तो गनीमत है कि उसे इस तरह की चैटिंग वैटिंग पसंद नहीं, वरना उस लड़की ने कोई कसर छोड़ी थी क्या? अलग-अलग डिजाइन में ‘A’ को कॉमन रखकर ‘अंजू और आशुतोष’ लिख-लिख उसे भेजा करती थी। और वह बस अपना फेवरेट शालीन सी स्माइली भेज देता।

‘आप बहुत शर्माते हो।’

अंजू उलाहना देती पर उसकी घुड़कियों के बावजूद आशुतोष ज्यादा खुल नहीं पा रहा था। कारण था पिता जी के अनुशासन का डंडा, जो आज तक निषेध था। आज ठीक कैसे हो गया?

‘खबरदार, अगर किसी लड़की की तरफ आँख भी उठाई।’

पिता जी ढकी छुपी घुड़कियाँ नहीं देते थे।

‘टाँगे तोड़ दूँगा! करियर के समय बस करियर।’

पढ़ते-पढ़ते कभी हो गया। साथ ही पीसीएस की तैयारी भी कर रहा था। पिता जी के निर्देश से जो अध्यापक की पोस्ट के लिए अप्लाई किया, तो पता नहीं था कि नौकरी मिल ही जाएगी। नियुक्ति पत्र मिलते ही आशुतोष ने फैसला लिया कि ज्वाइन नहीं करेगा। ‘पिता जी मुझे पीसीएस के लिए तैयारी करने दीजिए।’

उसने हिम्मत करके बोल ही दिया।

‘दिमाग खराब हो गया है तेरा! घर बैठे-बैठे सरकारी नौकरी मिल रही है तो जनाब के नखरे देखो। कहाँ है नौकरियाँ? किसको मिल रही है नौकरियाँ? जो मिल रहा है उसे शालीनता से ग्रहण करो और नौकरी के साथ करते रहना तैयारी, चाहे जिसकी।’ पिता जी की प्रतिक्रिया उसे पहले से ही मालूम थी।

सरकारी नौकरी और भगवान का ओहदा करीब-करीब बराबर का ही होता है। दोनों को ही लात नहीं मारी जाती। चाहे कितनी भी दुश्वारियाँ क्यों न आएँ।

माँ आधे रोने आधे गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में चाची से पूछ रही थी, ‘अरे क्यों मना कर रहे हैं लड़की वाले? बता तो? कल तक तो सब ठीक ही था, उषा बहन जी से मेरी बात भी हुई थी।’

‘जीजी क्या बोलूँ मैं, लड़की कह रही है मास्टर से शादी नहीं करेगी।’

‘अरे यह क्या बात हुई? हमने कुछ छुपाया थोड़ी ही था। उन्हें तो पहले से पता था आशुतोष इंटर कॉलेज का मास्टर है।’

माँ जाने किसको और क्या समझाना चाह रही थी।

‘हाँ पर तब वह पीसीएस का रिटन पास करके भी तो बैठा था न! उन्हें पूरा विश्वास था कि हमारा आशु इंटरव्यू में जरूर पास होगा, कल जब से रिजल्ट आया है लड़की ने रो-रो के हलकान किया हुआ है। आशु के न निकल पाने से सबसे ज्यादा दुख अंजू को ही हुआ है बहुत अरमान थे उसके।’

चाची सिचुएशन का एंगल बदल चुकी थीं। उनके हिसाब से अंजू को धोखा हुआ है और जिम्मेदार आशुतोष है।

भीतर कमरे में बैठा आशुतोष सब कुछ सुनकर भी चुपचाप था। मन तो कर रहा था कि घर से बाहर जाकर कह दे–‘फिकर ना करो चाची, आपकी उस अंजू को कोई कमी नहीं होगी, चार दिनों में ही चैट कर-करके वह एक नया मुर्गा फँसा लेगी।’ लेकिन बिना कुछ बोले बैग में कपड़े ठूँस कर बाहर निकल आया।

बोर्ड की परीक्षा में कापियाँ जाँचने के लिए दो दिन बाद भवाली जाना था, सोचा आज ही निकल पड़ो।

आशुतोष को उस समय समझ नहीं आ रहा था कि उसे किस बात का शोक मनाना चाहिए। पीसीएस क्लियर न कर पाने का, शादी टूट जाने का या अपने सरकारी स्कूल के एक अदना से मास्टर होने का।

अचानक चटपटे आचार और पूरियों की सुगंध उसके नथुनों से टकराई। गर्दन घुमा कर इधर-उधर देखा तो पाया, उसके साथ वाली सीट के सामने एक औरत काँख में दो ढाई साल का बच्चा दबाए टिफिन खोले बैठी है। बच्चा काफी देर से अलग-अलग आवाजों में रोए जा रहा था। और बीच-बीच में माता को एक दो धौल भी धर रहा था। आखिरकार माता को समझ आ ही गया कि बच्चे के मुँह में कुछ ठूँसे बिना आगे की यात्रा संभव नहीं होनी।

पूरी में थोड़ा सा अचार चुपड़ लठिया बनाकर माँ ने ज्यों ही थमाया, बच्चा धोंकनी की आवाज के साथ खाने में व्यस्त हो गया।

अचानक आशुतोष को याद आया कि पिछली रात से उसने भी कुछ नहीं खाया है। लखनऊ से काठगोदाम जाने वाली वाघ एक्सप्रेस पकड़ने के लिए वह शाम को ही घर से निकल पड़ा था। टिकट तो उसने दो दिन के बाद का लिया था, अब जल्दी जा कर या तो टिकट का जुगाड़ करे, या बिना टिकट ट्रेन में बैठ जाए और वहीं बनवा ले टी.सी. के हाथ पाँव जोड़ कर। सुबह रोडवेज की ‘बस’ पकड़ने से पहले बस एक चाय पी सका था। सच तो यह है कि दुःख, रोष, शोक शुरू-शुरू में पेट की ज्वाला को क्षीण कर देते हैं, लेकिन अंत में भूख हर संताप को हराकर फुँफकारती हुई प्रकट हो ही जाती है। और इस बार कहीं ज्यादा प्रचंड और मारक होती है।

आशुतोष ने अपने भूख-प्यास से सूखे होंठों पर जीभ फेरी। बच्चा पूरियों से तृप्त होकर अब अचार खाने की जिद करने लगा था। इतने छोटे बच्चे को मसालेदार, मिर्ची वाला आचार देने से हर माता संकोच करती है, किंतु वह किसी तरह मानने को तैयार न था। हार कर माता ने अचार का बड़ा सा टुकड़ा पूरा का पूरा अपने मुँह में लेकर उसका सारा मसाला चाट लिया, ताकि उसमें नमक के सिवा कुछ न बचे। दो तीन बार इसी तरह चाटने के बाद अचार के मसाला विहीन, हल्के पीले और सफेद, कांतिहीन टुकड़े को माता ने बच्चे के हाथ में थमा दिया। अब बच्चा तन्मयता से अपने ‘कस्टमाइज्ड’ अचार को चाटते हुए प्रकृति का आनंद ले रहा था। मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए माँ भी जल्दी-जल्दी दो-चार कौर पूरी अपने मुँह में डालने लगी।

आशुतोष के पेट में बादलों की गर्जन तर्जन शुरू हो गई। ‘जाने बस कहाँ रुकेगी, बिना कुछ खाए अब रहा नहीं जा रहा।’ अपना ध्यान हटाने के लिए उसने मोबाइल निकाला और सोशल मीडिया की टोह टोंक में व्यस्त हो गया।

अंजू ने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया था। खैर, अब जरूरत भी क्या थी। संपर्क तो वह भी नहीं करना चाहता था। अनायास उसकी अभ्यस्त उँगलियाँ उसी प्रोफाइल पर जा अटकी जिसे वह घंटों निहार सकता था। कोई परिचय नहीं था। बस एक नाम…और एक फोटो। गर्दन तक का क्लोजअप, गहरी बड़ी-बड़ी आँखें, पहाड़ी आडू सा रंग, कमान सी भवें, गालों को टेक देती नाजुक मुलायम उँगलियाँ और उँगलियों में फँसी पेंसिल। यह फोटो आशुतोष के एकांत की, उदासी की, उमंग की, सब की साथी थी। उस फोटो को एकटक देर तक निहारना उसे बहुत सुहाता था। न तो कृत्रिम भाव भंगिमा, न ही कोई प्रसाधन, न ही मुस्कान, न चंचलता। शून्य सी शांति समेटे इस फोटो को आशुतोष अपने मन में भी समाए था। कितना सुंदर नाम है ‘सरयू’ जैसे सचमुच कोई नदी मानवी रूप लेकर चुपचाप जीवन की आपाधापी का दूर से अवलोकन कर रही हो।

नदी के तट पर बैठकर बहते पानी को निहारने से जो सुख मिलता है, आशुतोष को सरयू की यह तस्वीर वैसा ही सुख देती थी। विषाद के क्षणों में वह इन कोमल उँगलियों को अपने माथे पर महसूस कर सकता था।

‘वाइफ?’

अचानक यह प्रश्न सुनकर आशुतोष को आभास हुआ कि उसके साथ-साथ कोई और भी सरयू की फोटो बड़े ध्यान से देख रहा था। बगल में बैठा लड़का उससे दो चार साल छोटा ही होगा। आशुतोष उलझन में था, आखिर क्या जवाब दे। मुँह से ‘नहीं’ निकलते ही लड़के की आँखें चमक गईं।

‘आ, आ, आऽऽ गर्लफ्रेंड!’

आशुतोष हैरान था कि यह लड़का आखिर किस रिश्ते से उसे छेड़ रहा है। छोटी जगहों में प्रायः लोग प्राइवेट यानी निजी शब्द का उपयोग बस कुछ ही जगह करते हैं। जैसे प्राइवेट फर्म, प्राइवेट टैक्सी या बस और प्राइवेट नौकरी। प्राइवेट लाइफ जैसी कोई चीज का वजूद इनकी जानकारी में नहीं होता। हाँ ‘प्राइवेट बात’ यानी एक बार में सिर्फ एक को ही बताने वाली बात। जो नॉन प्राइवेट बात से ज्यादा गतिमान होती है। यहाँ किसी के साथ-साथ पेपर या मैगजीन पढ़ना और किसी के मोबाइल में झाँकना बुरा नहीं माना जाता। खचाखच भरी बस में अपने बच्चे को किसी की गोद में या बैग के ऊपर बिठा देना अति सामान्य बातों में गिना जाता था, या कहें तो मौलिक अधिकारों में गिना जाता था।

‘बहुत सुंदर है ये तो, जल्दी शादी-वादी कर डालो, नहीं तो रेलगाड़ी छूट जाएगी।’ और वह लड़का अपनी ही मजाक में फिस्स-फिस्स कर हँसने लगा।

आशुतोष ने मुस्कुराते हुए मोबाइल जेब में रख लिया। आज पहली बार आभासी दुनिया से बाहर सरयू किसी प्रसंग में थी। आज वह अचानक ज्यादा करीब लग रही थी। आशुतोष खिड़की से बाहर विशाल पर्वत शृंखलाओं और देवदार चीड़ के पेड़ों पर उतरती सूर्य की ताजा किरणों को देखने लगा।

अगले मोड़ पर सड़क चौड़ी हो गई। वहाँ कुछ दुकानें भी नजर आ रही थीं। वहीं पहाड़ से सटाकर ड्राइवर ने बस रोक दी और कंडक्टर ने एक जोर की हाँक लगाई।
‘चाय पकौड़े खा लो होऽऽ और मुफ्त का बिसलेरी भी पी लो जितना पीना है।’ उसका मतलब पहाड़ से नीचे आती छोटी-छोटी जल धाराओं से था जिसका मुकाबला किसी भी कंपनी का मिनरल वाटर नहीं कर सकता। आशुतोष सब के पीछे ऐसी ही एक जलधारा के पास पहुँचा। ठंडा पानी चेतना के साथ-साथ भूख भी बढ़ा देता है। बगल वाला लड़का भी उसके साथ पहुँचकर छपा-छप नाले में मुँह धोने लगा।

‘आप तो नए लग रहे हैं, यहाँ आलू के गुटके और रायता अच्छा होता है जरूर खाना, पकौड़ी तो सब जगह एक सी होने वाली ठैरी, नी भी खाओगे तो कोई बात नहीं।

लेकिन रायता-आलू छोड़ने जैसा नहीं है हाँ!’

अचार खाने वाला बच्चा भी शायद रायते के इंतजार में ही था। टेबल पर दोना देखते ही उसने पाँचों उँगलियों के धप्पे से अपनी माँ के साथ रायते की होली खेल डाली, अब माँ वापस नौले में जाकर अपने पेटू और उद्दंड बच्चे को और खुद को साफ कर रही थी।

‘हाँ साब!’

लड़के की उम्र दस से बारह साल की होगी। हाथ पैरों से हृष्ट-पुष्ट फुर्तीला, वह आर्डर लेने के लिए आतुरता के साथ आशु की तरफ देख रहा था।

‘आलू, रायता, पकौड़े…एक-एक प्लेट और एक चाय।’

आशुतोष ने ऑर्डर दे डाला। 50 आर्डर एक साथ स्मृति पटल पर रखकर काउंटर पर धड़ाधड़ पहुँचाना एक बारह साल के बच्चे की मानसिक उर्वरता का प्रमाण है। जाहिर है अगर यह स्कूल गया होता तो पढ़ाई भी बेहतर करता। चटपटे नाश्ते ने जब आशुतोष का आधा पेट भर दिया तो लड़का चाय देने आया।

‘स्कूल जाते हो?’ आशुतोष ने पूछा।
लड़का थोड़ा ठिठका और फिर सँभलकर बोला ‘जी साहब।’
‘तो अभी यहाँ कैसे हो?’
‘आज छुट्टी है साब।’
‘कल जाओगे?’
‘जी साब।’
‘कौन से स्कूल।’
‘नाइट स्कूल साब।’ बच्चा तोते की तरह बोल रहा था।
‘इतने छोटे होकर काम करते हो।’
‘यह अपना ही दुकान है साहब, वह काउंटर पर अपना बाप बैठा है।’

लड़का जबान से पहाड़ी नहीं लग रहा था, शायद बिहारी। पहाड़ी बाप का बिहारी बेटा! चाइल्ड वेलफेयर एसोसिएशन वालों के झमेलों से बचने के लिए रटे रटाए जवाब दे रहा था। तभी आशुतोष की नजर काउंटर पर बैठे बच्चे के कथित बाप पर पड़ी जो एकटक उसे ही देखे जा रहा था। आशुतोष को अपनी समाज कल्याण की भावना की हवा निकलती दिख रही थी। वह चुपचाप नाश्ता करने लगा। उसे फेसबुक पर बाल श्रम के विरोध में लिखी अपनी तमाम पोस्ट याद आने लगीं। लोगों ने भी जमकर उनका समर्थन किया था। तब उसे लगा था जनचेतना फैलाना भी क्या कोई कम बड़ा काम है? चेतना होगी तभी तो परिवर्तन होगा। परंतु आज जमीनी सच्चाई से दो-चार होते ही उसका इस बारे में सोचने का भी मन नहीं कर रहा था। परिवर्तन लाने वाले कोई दूसरे ही होते हैं ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। आशुतोष अपनी गहराती हीनता को झटक कर उठ खड़ा हुआ।

बस धीरे-धीरे गंतव्य की तरफ बढ़ने लगी। तृप्त आशु अब आराम की स्थिति में था। यकायक उसे याद आया कि उसने अपने दो दिन पूर्व आने की सूचना तो स्कूल को पहुँचाई ही नहीं! उसने फोन निकालकर टटोला। उसे एक नंबर दिया गया था, जिसे पहुँचने से पूर्व सूचना दी जानी थी, वही उसके रहने-खाने का इंतजाम देखने वाला था। हरीश रावत…हरीश रावत…हरीश रावत…मिल गया! अब क्या कहेगा वह? अगर वह कह दे कि आप जल्दी क्यों आए? आपकी बुकिंग तो दो दिन बाद है। कोई बात नहीं…कहीं होटल वोटल ढूँढ़ लेगा। एक बार बात कर लेने में कोई हर्ज नहीं।

‘ओहोऽऽ कौन से वाले सर हुए आप?’ हरीश रावत का संचार माध्यम बोलने और गाने के बीच की कोई अनोखी प्रणाली लग रही थी।

बोलचाल की भाषा में तान का उपयोग सिर्फ पर्वतीय क्षेत्रों में ही होता हो, ऐसा नहीं, उत्तर और पूर्व के अंचलों में भी यह खूब प्रयोग में लाया जाता है। दर असल जब कभी शब्दों के कंधों पर भावनाएँ सवार हो जाती हैं तो तान खुद ब खुद आ जाती है। तान दो व्यक्तियों को शब्दों से कहीं अधिक जोड़ देती है। इस विश्वास के साथ कि मैं अभी, इस समय, आपके समक्ष हर पहलू से उपस्थित हूँ।

‘मैं आशुतोष बंसल हूँ। लखनऊ से आ रहा हूँ।’ आशुतोष ने जवाब दिया। ‘अरे सर, आप जल्दी नहीं आ गए? कहो तो? आपको तो नरसों आना था, नी!’
अपने आने की कहानी को ‘कुछ काम था’ कहकर आशुतोष ने टाल दिया।

‘कोई दिक्कत है तो मैं होटल कर लूँगा।’

‘उसने हरीश रावत का बोझ कम करना चाहा।

‘ओहोऽ! दिक्कत कैसी कहा, आप शब सर लोगों के लिए ही तो कर रखे हैं कमरे। अभी साफ नहीं है, हो जाएँगे वह भी, कितनी देर लगती है!’
आशुतोष ने चैन की साँस ली। ‘ठीक है पहुँचता हूँ हरीश जी।’

‘आपने खाना भी तो नी खाया होगा फिर?’

रावत जी का प्रश्न सुनकर आशुतोष को अचानक अपनी माँ याद आ गई जिसे हर वक्त बस उसके खाने की चिंता लगी रहती थी। आशु खीज उठता। ‘आपको लगता है कि दुनिया की हर समस्या का समाधान खाना है। नहीं खाना मुझे खाना।’ और माँ चुपचाप आशुतोष का मुँह देखती रह जाती। दुनिया की तमाम असफलताओं, हीन भावनाओं और हारों से उपजे रोष को हम अधिकतर अपने सबसे करीबी पर उतारते हैं। जिनका बस चले तो हमारे दिलों का दुख अपनी हथेलियों से उलीच दें। आशुतोष ने माँ को फोन मिलाया–‘हाँ माँ भवाली पहुँचने वाला हूँ, …हाँ, खा लिया, …हाँ ठीक से खाया, नहीं सच बोल रहा हूँ, …आलू, रायता, पकौड़ी, चाय…अरे रोटी रात को खाऊँगा न!’ आशुतोष मुस्कुरा रहा था, ‘आप चिंता मत करो, मेरी बात हो गई है। सब इंतजाम कर रहे हैं, मैं ठीक हूँ, अब मैं बाद में बात करूँगा।’ आशुतोष ने फोन जेब में रख लिया।

हरीश जी औसत कद के फुर्तीले व्यक्ति निकले, जिन्होंने उसके पहुँचने से पूर्व ही उसके लिए निर्धारित कमरे को धो-पोंछकर तैयार कर दिया था। बिस्तर में सफेद चादर, तकिया, टेबल पर पानी का जग और एक जल्दीबाजी में बनाया गया पहाड़ी फूलों का एक बुके भी था। धन्यवाद हरीश जी, मैंने जल्दी आ कर आपको परेशान कर दिया। आशुतोष ने शिष्टाचार निभाया।

‘अरे कैसी बात कर दी ठैरी आपने सर! हम तो खाली ठैरे, अकेले बैठकर औरी हो जाता है कहा! और कैसे हैं शब लखनऊ में हालचाल? घर में शब ठीक होंगे।’ आशुतोष को समझ नहीं आ रहा था यह हरीश जी लखनऊ में किसका हाल-चाल पूछ रहे हैं। वह खुद उनसे आज पहली बार मिल रहा है और यह मेरे घर वालों की कुशल क्षेम पूछ रहे हैं।

‘हाँ सब ठीक है’ कह कर आशुतोष ने बात खत्म कर दी।

एक्सटर्नल एग्जामिनर के रहने का इंतजाम इस बार स्कूल के खाली स्टाफ क्वार्टर में ही कर दिया गया था। यह बात आशुतोष को अच्छी लगी। जिसकी मनःस्थिति नहीं थी कि किसी टीम-टाम, आडंबर वाली जगह में जाए जहाँ औपचारिक वातावरण हो। और अभी बाकी शिक्षकों के आने में भी समय था तो उसे पूरी उम्मीद थी, कम से कम दो दिन तो उसे मिल ही जाएँगे।

‘सर चाय में चीनी का परहेज तो नहीं करते हैं आप?’

हरीश जी थरमस में बनी चाय लेकर खड़े थे। आशुतोश के ‘नहीं’, कहते ही उन्होंने इत्मीनान से दो गिलास में चाय उड़ेल दी।

स्टील के गिलास में चाय पीना पहाड़ों में रिवाज नहीं, आवश्यकता है। चीनी मिट्टी के छोटे-छोटे कपों में चाय डालते ही ठंडी जो हो जाती है। आशुतोष सोच रहा था अगर उसे चीनी से परहेज होता तो हरीश जी क्या करते?

‘अभी तो पूरा दिन पड़ा है सर, आप रात के खाने तक क्या करेंगे? दिन में सोएँगे तो रात को नींद नहीं आएगी, घूम आओ आसपास। गोलजू का मंदिर है यहाँ। आपने भी तो नहीं देखा होगा? मैं तो रोज ही जाता हूँ। मेरे तो डॉक्टर, वकील, इजा, बाबू सब गोलजू ठैरे! कल मेरे कान में भोती पीड़ हो री थी। सब अस्पताल दौड़ते हैं, मैं गोलज्यू के पास दौड़ा। मैंने कहा… ठीक करते हो नहीं! गुस्सा आ जाने वाला हुआ ना! कान से फिर सिर में सड़कने वाला हुआ दर्द। पुजारी ने हजारी के पत्ते पीसकर कान में डाल दिए, हैग्यो, पाँच मिनट में ठीक!! घुड़क देने वाला हुआ मैं भगवान को भी!’

हरीश जी अपने भगवान को घुड़कने वाले अंदाज पर खुद ही मोहित लग रहे थे। हरीश जी की बातों से लग रहा था कि अगर उसने जाने कि हामी न भरी तो यहीं कथाओं और कहानियों के बीच शाम कट जाएगी। ‘आपने अच्छा बताया हरीश जी, मैं जरा आसपास घूम आता हूँ, फिर मौका मिले न मिले।’
प्रस्ताव मान लिए जाने से हरीश जी प्रसन्न दिख रहे थे।

आशुतोष नास्तिक नहीं था। पर आस्तिक भी नहीं था। दरअसल उसे खुद पता नहीं था कि वह क्या है। घर में माँ-पिता जी पूजा पाठ करते रहते, जिसमें उसका कोई खास रोल नहीं रहता था। किसी बड़ी पूजा से पहले बाजार से यदि कोई सामग्री आदि चाहिए होती तो ला देता, माँ प्रसाद देने आती तो किताब में नजरें गड़ाए-गड़ाए ही हथेली बढ़ा देता जिसमें माँ बताशा, पेड़ा, लड्डू जो भी प्रसाद हो रख देती और आशु खा लेता। वैसे उसे पूजा-पाठ का माहौल बहुत अच्छा लगता था। घंटी शंख की आवाज, धूप लोबान की खुशबू जो पकवानों की सुगंध के साथ मिलकर अनोखा माहौल बना देती थी।

चाय पीने के तकरीबन आधे घंटे बाद आशुतोष घोड़ाखाल के गोलू देवता के मंदिर की सीढ़ियों के नीचे खड़ा था। आसपास पूजा सामग्री, प्रसाद, घंटियाँ, चुनरी इत्यादि की कई दुकानें थीं। लोग खरीदारी कर रहे थे। सुबह की धूप लगभग गायब हो गई थी। सूरज कहीं सर के ऊपर ही होगा लेकिन बादलों ने उसे पूरी तरह से ढक दिया था। विशाल देवदार और चीड़ के पेड़ झूम झूम कर अपने मित्र मेघों का स्वागत कर रहे थे। पर्वती क्षेत्रों में मौसम भी मनमौजी होता है। वैभवशाली विशाल और मनमौजी प्रकृति मनुष्य को उसके कद का एहसास कराती रहती है। पर्वतीय जीवन होनी के आगे नतमस्तक और प्रकृति से एकाकार होता है।
आशुतोष को कुछ घंटे पूर्व की दुःखद घटनाओं की याद हो आई। पीसीएस में विफलता और विवाह प्रस्ताव का टूटना।

‘आज क्या खाया आपने?’

अंजू के बेतुके बेमानी सवालों से प्रायः आशु सकुचा जाता। जिससे कोई मित्रता नहीं, प्रेम संबंध नहीं उससे कैसे बात की जाती है यह वह नहीं जानता था। और वह भी तब जब सामने वाला अंतरंग होने की कोशिश करे।

‘खाना’ कहते ही अंजू के दस बारह हँसने, लोटपोट होने, आँखों में आँसू निकल कर खिलखिलाने वाले इमोजी आ जाते।

‘आप बड़े वो हो।’ अंजू के उलाहने पर आशुतोष हल्की सी स्मित वाले इमोजी भेज देता।

स्त्री छाया से कतई दूर आशुतोष के अनुभवहीन मन को आखिरकार ‘वो’ होना भा रहा था।

‘खाना तो सब खाते हैं आपने खाने में क्या खाया?’

अंजू अपने प्रश्न पर बरकरार थी।

‘पालक की सब्जी, तुवर की दाल और रोटी।’

लिखते वक्त आशुतोष को यह कतई भान नहीं था कि रोज-रोज प्यारी प्यारी बातों के साथ खाने का मेनू पूछने वाली चतुर अंजू दरअसल उनका लिविंग स्टैंडर्ड जाँच रही होती थी।

‘गरीबों वाला खाना खाते हैं बिल्कुल, बस इसकी ठीक-ठाक नौकरी हो जाए बाकी मैं सब सँभाल लूँगी’ अंजू नाखुश थी।

‘अपनी एक पिक भेजिए न।’ रिश्ता तय हुए मुश्किल से दो-चार दिन भी नहीं हुए थे कि अंजू ने आशुतोष से तस्वीर की माँग कर डाली। बहुत दिनों तक टालने के बाद आशुतोष ने कॉलेज के ग्रुप से एक फोटो भेज दी, जिसमें वह अन्य दो लड़कों के साथ खड़ा मुस्कुरा रहा था।

‘आप तो बिल्कुल बुद्धू हो, मुझे सेल्फी चाहिए अभी इसी वक्त खींची हुई, आपके कैमरे से…देखिए ऐसी।’ और अंजू ने अपनी एक बिस्तर पर लेटी फोटो भेज दी, जिसमें उसकी कमर तक का हिस्सा साफ दिख रहा था।

तकिए में बिखरी केश राशि, आधी खुली आँखें और पाउट वाली चंचल मुख मुद्रा। औसत नाक नक्श वाली अंजू को सौंदर्य का अवलंब भले ही न मिला हो, किंतु अविवाहित कन्या का सुगठित शरीर उसके पास भी था, जिसे अपने दुपट्टे का त्याग कर उसने बड़ी नजाकत से, सही कोण से अपने कैमरे में कैद भी कर लिया था। आशुतोष के गाल और कान गरम हो गए। झट मोबाइल बंद करके वह सीधा बैठ गया। लेकिन पंद्रह मिनट बाद फिर फोन उठाकर उसी फोटो को चोरों की तरह देखने लगा।

अंजू के पाँच और मैसेज पड़े हुए थे।

‘अरे मैंने फोटो माँगी और आप गायब! जाइए मैं आपसे बात नहीं करूँगी।’

और तीन लाइन भर के गुस्से वाले तमाम इमोजी उसे अंजू के तापमान का एहसास करा रहे थे। आशुतोष कर्ज खाए गरीब किसान सा महसूस करने लगा। उसने बड़ी कोशिशों से अंजू का एंगल कॉपी कर एक सेल्फी ली और भेज दी। उसे क्या पता था कि अंजू पीछे लटके साधारण परदों, असंख्य बार धुली चादर, सस्ते फर्नीचर, अति साधारण साज सज्जा और उसकी पहनी हुई टी-शर्ट पर नाक मुँह चढ़ा रही होगी।

‘देख लो इनका रहन-सहन।’

चिढ़ी हुई चिंताग्रस्त अंजू ने माँ को आशुतोष की सेल्फी दिखाई।

‘अरे एक बार पीसीएस क्लियर हो जाए फिर तू थोड़ी न रहेगी वहाँ’ माँ ने समझाया। बस यही एक बात थी जो अंजू को हर रोज सुबह आशुतोष को गुड मॉर्निंग का मैसेज भेजने को प्रेरित करती थी।

पास ही एक मारुति वैन के रुकने से आशुतोष की तंद्रा भंग हुई, जिसमें से उसकी कैपेसिटी से ज्यादा प्राणी निकलते ही जा रहे थे, निकलते ही जा रहे थे। पाँच बच्चे और तीन चार पतले दुबले नौजवान जब गाड़ी से बाहर कूद चुके तो कुछ मोटी गुदगुदी स्त्रियाँ निकलीं, जिनकी गोद में शायद वह सारे अग्रिम पंक्ति के यात्री बैठे होंगे। जगह ज्यादा घेरने वाली सवारियों को अक्सर यह बलिदान देना पड़ता है।

तभी पर्वतीय दुल्हन की वेशभूषा में सुसज्जित एक कन्या वैन से उतरी, जिसके पीछे कोट-पैंट और हाथ में कंकड़ बाँधे एक पतला दुबला युवक था। हाथ में बँधा कंकड़ इस बात का सबूत था कि युवक नववधू का नववर है। जिस तरह से बच्चों की पोशाकों में कुशल दर्जी भविष्य में बढ़ने वाली लंबाई के लिए मार्जिन छोड़ दिया करते थे, उसी तरह की कलाकारी दिखाते हुए दूल्हे के दर्जी ने उसके भविष्य में फैल सकने वाले शरीर के लिए खासा मार्जिन छोड़ दिया लगता था। भविष्य में फिट होने वाला सूट वर्तमान में किसी हैंगर में अपने मालिक के हृष्ट-पुष्ट वर्जन के इंतजार में टँगा सा लग रहा था। दोनों के माथे अनेक लोगों के लगातार टीकाकरण से लालम लाल हो गए थे।

तभी वैन के पास एक और जीप रुकी, जिसमें बाकी बचे हुए सगे-संबंधी एवं मित्रगण थे जो शायद वैन में घुसने में विफल हो चुके होंगे। जीप से एक पंडित जी भी उतरे, जिन्होंने उतरते ही जोरदार शंख ध्वनि और घंटियों की आवाज से गोलू देवता को अपने आने की सूचना दी। जय गोल्ज्यू!!! की नाद के साथ टोली मंदिर की असंख्य सीढ़ियों की ओर चल पड़ी। आशुतोष भी उनके पीछे-पीछे मंदिर की ओर चलने लगा। तभी एक दुकानदार ने आवाज लगाई।

‘खाली हाथ आप कहाँ जा रहे हो सर, भगवान का अभिषेक ले जाओ, नहीं तो मुराद कैसे पूरी होगी आपकी?’

व्यापार से आशुतोष को कोई शिकायत नहीं थी। व्यापार मेहनत का काम होता है। लेकिन जब वह किसी को किसी की भावनाओं, अभिलाषाओं, डर और आकांक्षाओं को भुनाते देखता तो घृणा से भर उठता।

‘भाई मैं पूजा करने नहीं पिकनिक मनाने जा रहा हूँ।’ यह शब्द शायद आशुतोष ने जानबूझकर दुकानदार को चिढ़ाने के लिए कहे थे।
‘ठीक है सर, जैसा करते हो फिर। लेकिन यह दो फूल ले जाओ इसका कोई पैशा नहीं है। गोलू के पैर में चढ़ा देना।’

दुकानदार ने जबरन आशुतोष के हाथ दो फूल पकड़ा दिए। आशुतोष झेंप गया। लेकिन उसने दृढ़ निश्चय कर रखा था कि वह दुकानदार के पैंतरों से कतई शर्मिंदा नहीं होगा और न ही बेवकूफ बनेगा, इसलिए उसने फूल लिए और बिना एक भी पैसा दिए मंदिर की तरफ बढ़ गया।

अब तक शादी की टोली काफी सीढ़ियाँ लाँघ चुकी थी। सीढ़ियों की दोनों ओर लगी रेलिंग में घंटियाँ टँगी हुई थीं और साथ ही बँधी थीं रंग-बिरंगी चुन्नियाँ। बाँज, चीड़, साल, जामुन के लहराते जंगल घंटियों को हवा के वेग से छेड़े जा रहे थे। एकाएक आशुतोष की नजर पेड़ों पर विराजमान बंदरों पर पड़ी, जो प्राइम मिनिस्टर के बॉडीगार्ड की तरह हर आने-जाने वाले इनसान की पैनी नजरों से जाँच कर रहे थे। आशुतोष को हिमाचल के जाखू मंदिर की याद हो आई।

फोन जेब में है…, धूप का चश्मा नहीं पहना…, और न ही कोई खाने की चीज है उसके पास, आशुतोष ने चैन की साँस ली। हाथ में पकड़े दो फूल अगर बंदर झपट भी ले जाएँ तो उसको कोई मलाल नहीं होगा। जाखू मंदिर में कार से उतरते ही कैसे एक बंदर झट उसके कंधे पर बैठ कर उसका धूप का चश्मा ले उड़ा था, सोचकर ही आशुतोष को झुर्झुरी हो आई। और थोड़ी देर बाद जब एक आदमी ने उसे चश्मा दिला देने की पेशकश की तो उसे समझ आ गया कि यह ट्रेंड बंदरों का नाट्य मंचन भर है। आदमी ने पैसे के एवज में कुछ चने इत्यादि का लालच देकर दूर पहाड़ की चोटी पर बैठे बंदर को चश्मा वापस देने के लिए राजी कर लिया। पाँच रुपये के चने के 50 रुपये देकर और आगे मंदिर में बंदरों से बचने के लिए डेढ़ सौ रुपये के किराये का डंडा लेकर आशुतोष ने मंदिर में प्रवेश किया था। लेकिन यहाँ के अनुभवी बंदर सिर्फ खाने-पीने की सामग्री के फिराक में थे सो उन्होंने आशुतोष को काम का न पाकर जाने दिया।

स्वच्छ आबो हवा, धूप अगरबत्ती की खुशबू, संपन्न प्राकृतिक छटा और रह-रहकर बजती घंटियाँ, इस मनोरम वातावरण को आत्मसात करता आशुतोष जूता स्टैंड में जूते उतारकर मंदिर के प्रांगण में बनी मुंडेर पर बैठ गया। ज्यादा भीड़ नहीं लग रही थी। शादी वाली टोली भी ऊपर पहुँच कर बिखर गई लगती थी। वर-वधू को लेकर कुछ बड़े, पुजारी के साथ मुख्य मंदिर में पूजा आरती में व्यस्त थे। पुजारी जी और साथ आए पंडित जी का समवेत मंत्रोच्चार वातावरण में खासा स्पंदन पैदा कर रहा था। दूल्हा हर 10-15 सेकंड बाद दुल्हन की तरफ देख लेता था। पीछे खड़ी महिला की किसी बात पर सब हँस पड़े। दुल्हन भी अपनी बड़ी सी नथ को हाथों में सँभाले मुस्कुरा रही थी। वर-वधू के चेहरे से प्रसन्नता टपक रही थी।

लेकिन आशु को कुछ और भी दिखा और वह था दोनों के चेहरों पर दमकता आत्मविश्वास। वह आत्मविश्वास, जो स्वीकारे जाने से आता है, अपनाए जाने से आता है। पीसीएस की लिखित परीक्षा पास करने के बावजूद आशुतोष जिसे जुटा नहीं पा रहा था। वह खुद को प्रेम में मिले धोखे से भी दुःखद स्थिति में पा रहा था। प्रेम में अगर व्यय है तो पहले आय भी तो है! सबकी बात मान लेने के बावजूद उसे जो तिरस्कार मिला आशुतोष उसके दंश से दूर जाना चाहता था। यह ऐसा समय था जब उसे परिचित से ज्यादा अपरिचित माहौल की जरूरत थी। जहाँ किसी को उसके सुख-दुःख से कोई सरोकार न हो। आत्मविश्वास भी अजीब चीज है, कभी तो बोतल का ढक्कन खोलने भर से आ जाता है तो कभी मुश्किल परीक्षा पास करने पर भी नहीं आता।

आशुतोष को असहाय और बेबस सा लगने लगा। तो क्या उस लड़की को मुझ में एक भावी पदाधिकारी के अलावा कुछ भी पसंद करने लायक नहीं लगा? अभी तक उसने लड़कियों को रिजेक्ट कर दिए जाने की अनेक कहानियाँ सुनी थी जिसमें लड़की को परंपरागत चाय का ट्रे लेकर पार्टी के समक्ष प्रस्तुत होना पड़ता था, और अपने सलीके, हुनर, सौम्य व्यवहार और सौंदर्य आदि से भावी ससुराल पक्ष को सम्मोहित करना पड़ता था कि उससे अच्छी लड़की आपके लड़के के लिए बनी ही नहीं है। थोड़ी बहुत झोलझाल लड़की का पिता दान दहेज में पूरी कर देता। उसने सोचा था कि वह ऐसी अमानवीयता कभी नहीं करेगा लेकिन वह खुद भी कभी ऐसी स्थिति में आ सकता है यह तो उसने कभी सोचा ही नहीं।

अंजू के शादी के लिए मना करने की वजह और समय दोनों ही उसे एहसास करवा रहे थे कि सामाजिक रूप से उसकी कीमत दो कौड़ी की भी नहीं।
ब्राह्मण दक्षिणा वाला मंत्र जोर-जोर से पढ़ा जा रहा था। यह इशारा था जजमान के लिए कि अब हमारा हिस्सा हमें दे दिया जाए। जेबों में हाथ डाले जा रहे थे, दोनों पंडित और पुजारी को दक्षिणा दान देने के बाद जोड़े ने आशीर्वाद के लिए माथा टेक दिया। एक हाथ से नोट जेब में रख दूसरे हाथ से पुजारी आशीर्वाद दे रहा था। दुनिया की जहालत पर अफसोस करते हुए आशुतोष ने मुँह फेर लिया। आखिरकार कोई यह कैसे मान सकता है कि हमारे जैसा ही एक आदमी हमें भगवान से डायरेक्ट, शुद्ध, खरा आशीर्वाद दिलाने की हैसियत रखता है?

मंदिर का प्रांगण खूब साफ और खुला खुला था। झक्क सफेद फर्श पर बच्चे उत्पात मचा रहे थे। तभी शादी वाली टोली ने एक अच्छा सा कोना पकड़ अपनी चादर बिछा दी। साथ लाए डब्बे पैकेट खोलकर दस्तरखान बिछाया जा रहा था। तभी एक फुर्तीला नौजवान पेड़ों की तरफ लपका और तिमुले के पेड़ से चौड़े चौड़े पत्ते तोड़ लाया। उसी को प्लेट बनाकर और थोड़ा सा मोड़ कर सकोरा बना खाना बाँटने लगा। आशुतोष मंडली के क्रियाकलापों में इतना खो गया कि उसे महसूस ही नहीं हुआ कि मंडली के सदस्यों ने भी उसके ताड़ने को नोटिस में ले लिया है। एक बड़े से पत्ते में पूरी, मिठाई और कुछ अन्य चीजें लेकर जब एक बच्ची उसके सामने आ खड़ी हुई तो वह चौंक गया। आशुतोष शरमा गया ‘अरे नहीं, मैं खा कर आया हूँ।’

तभी बुजुर्ग सी एक महिला ने बड़े स्नेह से कहा, ‘ले लो बेटा प्रसाद को मना नहीं करते।’

आशुतोष ने झेंप कर पत्ता थाम लिया और उठकर मंदिर के पीछे की तरफ मुंडेर में बैठ गया। मंदिर में सब तरफ छोटी-छोटी घंटियाँ बँधी थीं। साथ में थी कुछ लाल गुलाबी चुनरियों से बँधी अर्जियाँ। ऊपर वाले के सामने झोली फैला कर आँख मूँद कर माँगना तो आम बात है, यह तो हर धर्म में होता है, लेकिन इस मंदिर में लोग अपनी बात बकायदा लिखकर टाँगते हैं। वह भी सिर्फ हिंदी में ही नहीं बल्कि दुनिया भर की भाषाओं में। आशुतोष को मन ही मन हँसी आ रही थी।
‘हद है! एकदम सरकारी दफ्तर बना रखा है। अर्जी दो, घूस दो, और इंतजार करो!’

टन टन टन टन की आवाज हुई तो आशुतोष ने देखा एक सोलह-सत्रह साल का लड़का चुनरी के साथ अर्जी बाँध रहा है। लड़के ने जींस पहन रखी थी। लेकिन उसे टिकाए रखने में वह शारीरिक रूप से असमर्थ था। उसके टखनों और नितंबों की गोलाई में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था। सो बेल्ट के आखिरी छेद का इस्तेमाल करने के बावजूद, पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बेल्ट के कसाव पर भारी मालूम हो रहा था। आशुतोष को लड़के की दुर्दशा पर दया आने लगी। लेकिन उसने महसूस किया कि खुद लड़के को अपनी धृष्ट बेलगाम जींस से कोई खास शिकायत नहीं थी। हद से नीचे जाती पैंट को उसने एक बार भी सँभालने का प्रयास नहीं किया। लड़का हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदा रहा था। उसके मुड़ते ही आशुतोष ने देखा लड़के के चेहरे पर चिंताओं के बादल घूम रहे हैं। हथेली से आँख के आँसू पोंछ उन्हीं आँसुओं को जैल की तरह प्रयोग में लाकर लड़के ने सामने के बाल सँवार लिए,जो बाकी बालों से कुछ स्पेशल, कुछ पृथक रंग के थे। अँग्रेजों सी गोरी चमड़ी सबके नसीब में नहीं होती किंतु आज कल अँग्रेजों से सुनहरे बाल आसानी से पाए जा सकते हैं। सो अपने आँसुओं से सेट की गई सुनहरी जुल्फों को लड़के ने अपनी पतली गर्दन को जोरदार झटका देकर उचित स्थान पर पहुँचा दिया और मंदिर की परिक्रमा करने निकल पड़ा।
आशुतोष संशय से लड़के की पैंट को निहार रहा था, जो हर कदम के साथ उतर जाने की धमकी दे रही थी। और लड़के को फिक्र थी तो सिर्फ अपनी सुनहरी कलगी की।

आशुतोष पुराने फैशन के बारे में सोचने लगा। राजेश खन्ना की लंबी कलमें, एक रंग की कमीज और पैंट, अमिताभ बच्चन के कनछुपा स्टाइल के लंबे बाल, बेल बॉटम, फूलदार कमीजें और लंबे नुकीले कॉलर। परंतु उस समय भी यदि कोई जाँघों में पैंट बाँधकर चलने का उपक्रम करता तो आशुतोष को अजीब ही लगता। लड़के के आँखों से ओझल होते ही आशुतोष को उसके द्वारा बाँधी गई चिट्ठी पढ़ने की उत्सुकता हुई।

आखिर इस उमर और इस शृंगार पिटार के व्यक्ति को क्या समस्या हो सकती है? कुछ देर तो लड़के के घूमते हुए वापस आ जाने के डर से आशुतोष बैठा रहा, और जब वह आश्वस्त हो गया कि लड़का जा चुका है, तो वह प्रसाद के पत्ते को वहीं छोड़ आगे बढ़ गया, जिसे पास में ताक लगाए बंदर ने बड़े करीने से अपने एक हाथ में बैलेंस किया और बाकी तीन से कुलाँचे भरता हुआ पेड़ पर जा बैठा।

किसी की चिट्ठी पढ़ना बुरी बात है। उसने बचपन से यही सीखा था। किंतु पिछले दो दिनों के वज्रपात ने उसे विद्रोही बना दिया था। बचपन की सब सीखें, सदाचार, व्यवहार सब खोटे मालूम दे रहे थे। आशुतोष खड़ा होकर चिट्ठी पढ़ने लगा। वहाँ अनेक और पत्र भी टँगे थे, कोई हिंदी में तो कोई बंगला, गुजराती आदि भाषाओं में भी थे। किंतु आशुतोष का ध्यान बस उसी पत्र ने आकृष्ट किया जिसके प्रेषक को उसने साक्षात देखा था।

पत्र लेखक का नाम संतोष बहुगुणा था। अर्जी में उसका पूरा पता, फोन नंबर और रोल नंबर भी लिखा हुआ था, ताकि भगवान उसके धोखे में किसी दूसरे का भला न कर दें। आशुतोष को हँसी आ गई ‘कैसे-कैसे नमूने हैं इस दुनिया में।’ उसने मोबाइल से अर्जी की एक फोटो ले ली अपने दोस्त नीरज को दिखाने के लिए।
आशुतोष ने अर्जी पढ़ना शुरू किया।

‘पास करा देना गोल्जू! पेपर तो जैसे हुए हुए ही आपको तो पता ही ठैरा, क्या बताऊँ, दिन में जैसे ही पढ़ने बैठा ट्विंकल का फोन आ गया। रो-रो के औरी कर रखा था उसने। आमा गुजर गई कहा उसकी। मैंने कहा मेरे पेपर हैं करके, ओरी बौई गई! ‘नहीं आओगे तब देखना’ कहने लगी। उसकी आमा को श्मशान तक पुजा के आया गोलजू, दिल का मामला ठहरा! इजा को जाने कैसे पता चल गया मैं श्मशान से आ रहा हूँ करके। उसने एक लोटा गोमूत्र डाल दिया मेरे सिर में। पापा ने भी औरी धधोड़ दिया। किसका पढ़ना, कैसा पढ़ना, गोमूत्र की बदबू से सारा मुँह पक गया ठैरा मेरा। रात सोचा अब पढ़ता हूँ करके, लाइट ही चली गई। गोलजू, कुऽऽछ नहीं लिख पाया पेपर में। अब तुम ही कुछ चमत्कार करो महाराज। घंटी चढ़ाऊँगा। जय गोलू देवता!!!’

संतोष बहुगुणा ने अपनी परीक्षा में असफल होने का सारा दोष केवल एक दिन, यानी परीक्षा से एक दिन पहले घटी घटनाओं के सिर मढ़ दिया था। जैसे, अगर उसे उस एक दिन पढ़ने को मिल जाता तो वह महान पंडित बन जाता। आशुतोष के भीतर का शिक्षक गुस्से से पछाड़ें खाने लगा।

‘स्साले सारा साल तो पढ़ते नहीं और फिर ऐसे टुच्चे बहाने बनाते हैं कि मन करता है कमीनों को पेपर में बैठने से पहले ही फेल का रिजल्ट पकड़ा दूँ।’

मंदिर के पुजारी को पास आता देख आशुतोष थोड़ा सँभलकर खड़ा हो गया। शायद उसने आशुतोष को चिट्ठी पढ़ते हुए देख लिया हो, शायद वह आपत्ति करें। तभी पुजारी पास आकर बोला–‘क्या पढ़ रहे हो आप। यहाँ तो ऐसे भोत लोग आने वाले ठैरे। न्याय का दरबार हुआ ये।’

‘और तुम ऐसे अंधविश्वासों को हवा देते हो, ताकि तुम्हारी दुकान चलती रहे!’ आशुतोष ने मन ही मन सोचा।

‘आओ पिठिया लगा लो पहले, परिक्रमा करते रहना बाद में।’

कहता हुआ पुजारी मुख्य मंदिर की तरफ बढ़ चला। आशुतोष ने प्रण किया कि वह पाँच रुपये भी नहीं निकालेगा। चाहे पुजारी कितनी ही बातें क्यों न बनाएँ। मुख्य मंदिर में पुजारी ने उसे बैठने का इशारा किया।

‘कोई रुमाल है तो ढक लो सिर, नी तो हाथ ही रख लो।’

‘आशुतोष ने अपने सर पर हाथ रख लिया। कुछ मंत्रोच्चार के साथ पुजारी ने उसके माथे में बड़ा सा लाल टीका लगा दिया। आशुतोष ने हाथ में पकड़े दोनों फूल थाली में रख दिए। थाली वापस रखते हुए पुजारी जी बोले–‘घूमने आए होंगे नी आप?’

आशुतोष उसे कुछ भी बताने के मूड में नहीं था सो टालने के लिहाज से उसने हाँ में सर हिला दिया।

‘अरे यहाँ तो रोज ही आते हैं लोग अपनी अर्जियाँ लगाने दूर-दूर से’

बात को दक्षिणा से दूर ले जाने के लिहाज से आशुतोष ने पूछा–‘अभी कुछ देर पहले एक लड़का लगा रहा था वह चिट्ठी जिसे मैं पढ़ रहा था, संतोष नाम का।’
‘अरेऽ संतोष! फाइनल हुआ ना उसका।’ पुजारी जी संतोष को जानते थे।

‘उसकी जींस।’ आशुतोष ने कंफर्म करना चाहा कि वे उसी संतोष की बात कर रहे हैं।

‘अरे उसकी पैंट तो सदा बगी ठहरी। मैंने कितनी बार कहा इजाऽ…इसके बदले तू भलो-भल पेजाम क्यों नहीं पैरता लास्टिक डालके तो यह तो लेटेस्ट फैशन है कह कर निकल जाने वाला हुआ। वैसे और कोई व्यसन नहीं हुआ संतोष को। नहीं तो अत्तर गाँजा की लत तो यहाँ आम हुई। सबकी मदद को तैयार रहता है संतोष। शादी, बारात, जनेऊ, नामकंद भागदौड़ सब संतोष की हुई। मोटरसाइकिल हुई ना उसके पास! वैसे मोटरसाइकिल तो आजकल सभी के पास हुई, लेकिन काम के वक्त सब बहाना बना देते हैं होऽ…एक संतोष कबै नै नि कुन। मंदिर का भंडारा भी संतोष के जिम्मे ठहरा यहाँ।’

आधी हिंदी आधी कुमाऊनी में संतोष का लेखा-जोखा देते पुजारी जी मंदिर की सँभाल भी करते जा रहे थे।

आशुतोष को समझ में आ रहा था कि मटरगश्ती आवारागर्दी में पड़े लड़के का मन पढ़ाई से उठ चुका है। पंडित जी अपनी रौ में बोले जा रहे थे, ‘धिनाली भी तो खूब हुई इनके घर में। धिनाली समझते हो?’

जब आशुतोष ने न में सर हिलाया तो पुजारी जी बोले, ‘गाय, भैंस। दो गाय हुई, दो भैंस। सुना है आज कल भैंस ब्या री तो एक कटड़ा भी गिन लो। सब का चारा पानी संतोष लाने वाला हुआ अपनी मोटरसाइकिल में धरके। कुट्टी, सानी, पानी पिलाना, गोबर सारना, सब कर देता है कहाऽ! आज कल के लड़के नी तो, देखी रखा होगा आपने।’

आशुतोष कहना चाह रहा था रूप रंग से तो वह आज कल के लड़कों का रोल मॉडल लग रहा था।

‘उसके बाल’…बस इतना ही कह कर आशुतोष चुप हो गया।

‘अरे हाँ!’

बाल का जिक्र आते ही पुजारी जी हो, हो कर हँसने लगे

‘अरे वह एक लौंडा है नईम उसका दोस्त, जब से उसने सैलून खोला है सारे प्रयोग संतोष पर ही करता है। एक बार तो इसका मुँह जलाकर बानर जैसा कर दिया ठहरा उसने।’

‘सॉरी अंकल ब्लीच ज्यादा हो गई, ब्लीच ज्यादा हो गई चिल्ला रहा था बल जब बहुगुणा जी दोनों को धधोड़ रहे थे।’ और पुजारी जी उस घटना को याद कर हँस-हँस बेहाल हो गए।

‘एक दिन तो कान छिड़ा लाया नईम के सलून से। कुंडल भी ठैरा। उस दिन तो संतोष की इजा ने उसकी झाकरी ऐसी लूछी क्या बताऊँ! सुनहरे वाले बाल तो निकलने ही वाले थे। वह तो गाँव वालों ने छुड़ा दिया। बरपंद में छेड़ते हैं न कान। उस नईम ने कर दिया ठहरा इसका जनेऊ।’ और पुजारी जी फिर हँसने लगे। उन्हें संतोष प्रकरण में खूब रस आ रहा था। किंतु उस हँसी में उपहास जरा भी नहीं था।

‘ऐसा ही हुआ संतोष, किसी को ना नी कह सकने वाला हुआ। सीधा ठहरा। जैसा जिसने कहा, कर दिया।’

पीछे से श्रद्धालुओं को खड़ा देख आशुतोष हट गया। और पुजारी जी आरती की थाली उठा नवागंतुकों को टीका करने में व्यस्त हो गए।

आशुतोष मंदिर के किनारे बनी मुँडेर में बैठ गया जहाँ से खाई साफ दिख रही थी। खाई से उगे लंबे दरख्तों का तना मंदिर की सतह तक पहुँच रहा था। यों लगता था जैसे कोई दीवार के पीछे से उचक कर भीतर देखने का प्रयास कर रहा हो। बहती हवा बालों को सहला रही थी। आशुतोष ने जेब से मोबाइल निकाला और अभ्यस्त उँगलियों ने उसे अपनी मंजिल तक पहुँचा दिया। अब वो ध्यान न भी दे तो क्षण भर में वह इस प्रोफाइल में ही होता था। आशुतोष सरयू की प्रोफाइल फोटो को बड़ा कर मुँडेर से टेक लगा कर बैठ गया। जैसे कोई राहगीर पल भर सुस्ताना चाहता है घने दरख्त के साये में। सरयू उसका निजी रहस्य थी। उसका निजी पाप। उसका निजी सुख। तपती दोपहरी में दो घूँट पानी।

सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए आशुतोष सोच रहा था, आज का दिन तो बीत गया–अब कल वह क्या करेगा? क्योंकि पेपर की जाँच आदि तो परसों से ही शुरू होगी। जल्दी पहुँचकर आशुतोष ने हरीश के लिए परेशानी तो खड़ी कर ही दी होगी। लेकिन हरीश जी ने बड़े प्रेम से उसका यथोचित इंतजाम करवा दिया था।

रात का खाना आशुतोष ने हरीश जी के साथ उसके क्वार्टर में ही खाया। अगर उसे पता होता कि उन्होंने ऐसा इंतजाम किया है तो वह कहीं बाहर ही खा कर आ जाता। परंतु जब तक मालूम पड़ता बहुत देर हो चुकी थी। आशुतोष संकोच से भर गया। सच कहें तो उसे थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था। लेकिन हरीश जी बार-बार जीने

मरने की कसम दे रहे थे, और उनके जोर देते वक्त शरीर को अष्टावक्र की भाँति मोड़ देने के दबाव का आशुतोष सामना न कर पाया।

घर का बना सुंदर सुपाच्य पहाड़ी खाना, शायद आशुतोष को अभी यही चाहिए था। खाना खाकर आशुतोष अपने कमरे में लौट आया।

यात्राओं से हम कुछ भूलते नहीं, न ही अपने हालात बदल पाते हैं, बस वस्तुस्थिति को ठीक-ठीक देखने के लिए दूर चबूतरे पर जा बैठते हैं। एक-दूसरे कोण से एक दूसरी रोशनी में जिंदगी को परखने के लिए।

कभी-कभी आशुतोष का मन करता है कहीं नहीं जाए बस माँ की गोद में सर रख कर लेटा रहे देर तक। उसकी सूती, बार-बार धुली मुलायम धोती में मुँह ढक कर बस पड़ा रहे। ऐसे में माँ उससे कुछ नहीं पूछती थी। कभी-कभी उसकी आँख से एक-दो आँसू गिर कर माँ की टाँगों को गीला भी कर देते, तब भी वह धीरे-धीरे उसके बाल सहलाते हुए उसे कोई पुराना किस्सा सुनाती, अपनी जिंदगी से या अपने आस-पड़ोस से। जिसको सुनते सुनते आशुतोष बीच में कुछ पूछ बैठता, और खुद ही महसूस करता कि तमाम किस्से कहानियों की नाल से बाँधकर माँ उसे अवसाद से दूर ले गई है। माँ उसके शांत चेहरे को देखती और पूछती ‘सेवईं खाएगा?’ और दुनिया के झमेले, दुनिया के मेले बन जाते। कसक कम हो जाती और प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा।

उसने भले ही उन चिट्ठियों को न पढ़ा हो फिर भी वह उनमें छिपे दर्द को महसूस कर सकता था। अचानक पीसीएस का असफल प्रयास और अंजू की अमानवीय स्वार्थपरता कम खल रही थी।

आशुतोष ने समय देखने के लिए कलाई पर नजर डाली तो घड़ी नदारद थी। उसे याद आया बंदरों से बचाने के लिए उसने घड़ी और मोबाइल मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जेब में रख लिए थे। तुरंत उठकर आशुतोष ने जेब चेक की घड़ी वहाँ भी नहीं थी। कहाँ गई घड़ी? जरूर गिर गई लगता है। एक और नुकसान। लेकिन गिरने की आवाज तो होनी चाहिए थी! आशुतोष उधेड़बुन में लग गया। जरूर मोबाइल निकालते हुए, या जब वह पुजारी जी से टीका लगवाने मंदिर के द्वार पर बैठा था, हाँ, शायद वहीं जेब से फिसल गई हो, इसलिए आवाज भी नहीं हुई। आशुतोष को अपनी लापरवाही पर खीज हो आई। अब तो मिलने से रही। कहाँ सोच रहा था कि पाँच रुपये भी नहीं चढ़ाएगा, कहाँ घड़ी दान कर आया।

आशुतोष ने मोबाइल में समय देखा और उसकी अभ्यस्त उँगलियों ने उसे फिर से सरयू के सामने बिठा दिया। सरयू उसकी फेसबुक में फ्रेंड नहीं थी। आशु बस इतना जानता था कि वह एक कवयित्री थी, और किसी की वॉल में लिखी उसकी कविता और उसके मायावी चेहरे ने उसे बाँध लिया था। तब से आशुतोष सरयू का लिखा पढ़ने और उसकी एक झलक देखने के लिए फेसबुक नियमित रूप से देखने लगा। इसे शायद स्टॉक करना कहते हैं, लेकिन आशुतोष को यह शब्द बेहद नागवार था, क्योंकि उसे कोई उम्मीद नहीं थी, कोई अपेक्षा नहीं थी, सरयू तो उसके बाग का एक फूल थी जिससे बस एक यही उम्मीद होती है कि वह आबाद रहे। आशुतोष की नजरें सरयू की आँखों से होती हुई उसके होंठों पर ठहर गईं। जिसमें दबी पेंसिल उसे मंटो का फेमस पोज याद दिला रही थी। ऊपर के होंठ कुछ ज्यादा गहरे रंग के थे, और नीचे के हल्के गुलाबी और मुड़ी हुई पंखुड़ी का उभार लिए हुए। पेंसिल पर पड़ता होंठों का दबाव आशुतोष की धड़कनें बढ़ाने लगा। उसने धीरे से करवट लेकर आँखें बंद कर लीं।

सुबह आशुतोष पशोपेश में था।

‘क्या घड़ी के खोने के विषय में हरीश जी को बताया जाए?’

खामखाँ तमाशा बन जाएगा। वह उनकी और परेशानी नहीं बढ़ाना चाहता था। चाय पी के उसने खुद ही मंदिर का एक चक्कर लगाने की सोची। शायद घड़ी कहीं पड़ी हुई मिल जाए। मंदिर पहुँचकर आशुतोष की रही सही आशा भी जाती रही। दिन की शुरुआत देवदर्शन से करने वाले श्रद्धालुओं का खासा जमावड़ा था। आशुतोष कोने-कोने में नजरें घुमाता घूमने लगा। मन में सोच रहा था घड़ी यदि किसी बंदर के हाथ आ गई होगी तो फिर भी मिलने का चांस है, लेकिन कहीं किसी इनसान को मिल गई तो फिर तो गई समझो। सभी संभावित जगहों पर तलाशने के बाद आशुतोष थक हार कर बैठ गया। वह जहाँ बैठा था वहाँ से मुख्य मंदिर साफ दिखाई दे रहा था।

पंडित के सामने बैठा जोड़ा कोई पूजा करवा रहा था। गोद में नवजात शिशु को देखकर आशुतोष ने अंदाजा लगाया कि यह पूजा उसी के लिए होगी। बगल में एक पाँच-छह साल की छोटी बालिका खड़ी थी, जो शायद उनकी पहली संतान थी। बालिका अवश्य ही खीजी हुई थी। वह पूजा में व्यस्त माता-पिता को लगातार ठोके जा रही थी। कभी माँ की पीठ मुकियाती, तो कभी पिता को धक्का देकर उठाने का प्रयास करती। बीच-बीच में उसका ऊँचा स्वर पंडित जी के मंत्रोच्चार को भी दबा देता। माँ ने गोद में पकड़े शिशु को आगे किया। पंडित जी उसे टीका करने लगे। बच्ची का सुर और चढ़ने लगा। तभी पंडित जी बोले, ‘अरे! तू तो देवी है, देवी थोड़े न रोती है। इधर आ, इधर आ।’

और बच्ची को खींचकर गोद में बिठा लिया। लेकिन बच्ची सँभाले नहीं सँभल रही थी। पंडित जी ने चढ़ाए गए मिठाई के डब्बे से एक बड़ा सा लड्डू उसके हाथ में रख दिया। और बोले–‘देख अभी तेरे लिए क्या रखा है मैंने।’

बच्ची अब काफी शांत लग रही थी। पुजारी जी ने उसे बगल में बिठाया और पीछे रखे कपड़ों की पोटली से एक सुंदर सी चुनरी निकाल कर उसके सर में ओढ़ा दी। चुनरी काफी बड़ी थी। बच्ची लगभग पूरी ही ढक गई। बस दिख रही थी तो उसकी आँसुओं से धुली आँखें, और चमचमाता मुँह।

‘अरे देखो तो कैसी देवी जैसी लग रही है!’

पंडित जी बोले–‘आ तुझे टीका लगा दूँ।’

माँ बाप भी कुछ क्षण के चैन से खुश थे। टीका लगाए बच्ची अपने काली रूप से गौरा रूप में आ चुकी थी। माँ-बाप प्रणाम करके उठ गए। बच्ची गोटा लगी चुनरी ओढ़े लड्डू खाते हुए माता-पिता के पीछे-पीछे चल पड़ी।

तभी पुजारी जी की नजर आशुतोष पर पड़ी।

‘अरे आप आज भी आए हैं? क्यों कुछ रह गया क्या आपका।’

पुजारी जी के पूछने के ढंग से आशुतोष को संदेह हुआ, बोला, ‘कल मैंने अपनी घड़ी कहीं गुमा दी सोचा शायद यहाँ गिरी हो।’

‘अरे मुझे तो पहले ही लगा था, आपकी ही होगी।’ पुजारी जी ने घड़ी निकालकर सामने रख दी। आशुतोष मन ही मन कृतज्ञता से भर गया।
‘धन्यवाद बहुत-बहुत मैंने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी।’

‘आप यहाँ बैठे थे न कल, यहीं मिली मुझे।’ कहकर पुजारी जी ने आशुतोष को माथा आगे करने का संकेत किया, टीका लगाकर झट हाथ में प्रसाद रख दिया।
सेंटर में परीक्षा कॉपी जाँचने का आज पहला दिन था। कमरे में अपनी टेबल पर बैठे शिक्षक दिए गए बंडलों को खोल रहे थे। जाँच के लिए कौन सी कॉपी कहाँ जाएगी यह किसी को पता नहीं होता। एक बार जँचने के बाद कॉपी दोबारा जाँची जाती, ताकि कोई गलती न हो। दो एग्जामिनर के द्वारा जँची कॉपी जमा हो जाती। उसके बाद ही शिक्षक सेंटर से बाहर जा सकते हैं। शांत माहौल में काम हो रहा था। यदा-कदा बच्चों की कॉपी से निकल रहे सौ, दो सौ के नोट कमरे का माहौल हल्का कर देते।

‘अरे मिश्रा जी अकेले न गटक जाइएगा, फ्लैट हमको भी खरीदना है भाई!’ पांडे जी बोले।

मिश्रा जी दो सौ रुपये चमकाते हुए बोले, ‘अरे फिक्र क्यों करते हैं पांडे जी, सौ-सौ के दो नोट हैं, इसमें तो पेंट हाउस आ जाएगा।’
हँसी ठट्ठे में थोड़ी देर माहौल हल्का हो जाता। तभी कोई गुस्से से चिंघाड़ा, ‘यह देखो हरामियों को! सालों को साल भर बिना पानी बरसात देखे पढ़ाओ, और यह हमसे मजाक करते हैं!!’ श्रीवास्तव सर सच में नाराज लग रहे थे।

‘क्या हुआ सर?’ मिश्रा सर ने पूछा। श्रीवास्तव सर हिंसा के मूड में थे।

‘यूनिफॉर्म मोशन और नॉन यूनिफार्म मोशन का डिफरेंस पूछा है तो लिख रहे हैं ‘एक बार मैंने स्कूल के कपड़ों में पॉटी कर दी थी, वह था यूनिफॉर्म मोशन, और घर में जब मैं चड्डी उतार कर पोटी करता हूँ तो उसे कहते हैं नॉन यूनिफार्म मोशन।’

श्रीवास्तव सर का तमतमाया चेहरा देखकर किसी को भी जोर से हँसने का साहस न हुआ।

‘यह बच्चे नहीं पाप हैं पाप!’ और श्रीवास्तव सर काफी देर तक बड़बड़ाते रहे।

पांडे जी बोले, ‘बेटा करे बकैती, सूखी जाए खेती।’

लगभग सभी के सिर दो सेकेंड के लिए कॉपियों से ऊपर उठ गए।

‘आएँ! ये कौन सा मुहावरा है पांडे जी? पहले तो नहीं सुना।’

पांडे जी आत्मविभोर होकर बोले–‘हम ही बनाए हैं अभी-अभी।’

पांडे जी की आत्मनिर्भरता गजब की थी। वह मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी खुद की बनाई इस्तेमाल करते थे। कॉपी चेक करते-करते आशुतोष ठहर गया। प्रश्नों के उत्तर के बीच छोटे-छोटे अक्षरों में गोलू देवता को लिखी उसी अर्जी की नकल थी। नाम, पता रोल नंबर, और पास करा देने की दरख्वास्त।

लड़के का पास होना मुश्किल था। पूरा निचोड़ लेने के बावजूद 33 परसेंट आना नामुमकिन था। वैसे शिक्षकों को यह निर्देश होता है कि जितना संभव हो बच्चों को पास कर दिया जाए, लेकिन संतोष बहुगुणा असंभव की श्रेणी में आता था। आशुतोष मन ही मन हँस पड़ा, ‘भगवान ने तेरे साथ मजाक ही कर दिया बेटा जो तेरी कॉपी मेरे जैसे के पास आई।’

आशुतोष की नजरों के सामने सुनहरी कलगी और बहती जींस लटकाए संतोष घूम गया। और दिखने लगीं हवा में फड़फड़ाती तमाम अर्जियाँ।

हजारों अर्जियाँ
हजारों दुख
हजारों उम्मीदें
हजारों पुकार।

उसे दिखाई दिया दोस्त के प्रयोगों की मार झेलता संतोष बहुगुणा जो सबकी पुकार की हद में था, बिना किसी अर्जी के।

उसे दिख रहा था सुदूर पहाड़ों में बना वह छोटा सा मंदिर जो आस्था की डोर बाँध कर तिनकों को बिखरने नहीं देता।

उसे दिख रहे थे चीड़ और देवदार के मजबूत वृक्ष, जो बिना सहारे अतल गहराइयों से उग आए हैं, भुरभुरी मिट्टी को थामने, और अपने कंधों में कोमल लताओं को बिठाकर झूला झुलाने।

उसे याद आती है अपनी माँ की गोद का एकाधिकार छिन जाने से दुखी एक छोटी बच्ची…लाल चुनरी…और बिना अर्जियों के संवेदनाएँ बाँटता एक पुजारी।
आशुतोष ने अपना ध्यान वापस उत्तर पुस्तिका की तरफ लौटाया।

‘न! पास होने के कोई आसार नहीं।’

कुछ देर सोचने के बाद उसने पहले से जाँची जा चुकी एक कॉपी निकाली, और सबसे ज्यादा मार्क का न्यूमेरिकल संतोष की कॉपी में उतारने लगा। घूमते हुए एचएम उसकी कुर्सी पर आकर रुक गए–‘रिश्तेदार?’ एचएम ने पूछा।

आशुतोष ने ना में सिर हिलाया। कुछ क्षण दोनों एक दूसरे को देखते रहे फिर एचएम धीमे से आगे बढ़ गए।

नीचे टैक्सी रुकी हुई थी और आशुतोष मंदिर के प्रांगण में बैठा एक कागज के पन्ने पर कुछ लिख रहा था। एक अर्जी, लेकिन ये अर्जी किसी ऊपर वाले के लिए नहीं थी, ये अर्जी दुनिया की सुंदरता में उसकी आस्था का उत्सव थी। उन कागजों के फड़फड़ाने से उपजी ऊर्जा को वह महसूस कर रहा था। असंख्य अर्जियों के बीच अपनी अर्जी टाँग संतोष वापस बैठ कर जूते मोजे पहनने लगा। तभी उसने देखा, उसकी लिखी अर्जी तीन लड़कियाँ झुंड बनाकर पढ़ रही हैं। आशुतोष पर नजर पड़ते ही उनकी मुस्कुराहट हँसी में बदल गई। आशुतोष भी मुस्कुरा पड़ा। उसने जवाब में हँसते हुए हाथ हिलाया और मंदिर की सीढ़ियाँ उतरने लगा।


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वंदना जोशी द्वारा भी