बे-इंसाफ का तोहफा

बे-इंसाफ का तोहफा

गोविंदपुर के निवासी रामनारायण का विचार था कि पढ़े-लिखे लोग कभी झूठ नहीं बोलते। वे लोग ज्ञानी और सभ्य होते हैं। अनपढ़ लोग ही ज्यादातर असभ्य होते हैं और उन्हें समाज के तौर-तरीकों का ज्ञान नहीं होता। इसी भावना से जब कभी उसके गाँव में कोई अफसर या पुलिस अधिकारी आता तो वह उनके साथ बड़े अदब के साथ पेश आता है। उसकी इज्जत करता और जरूरत पड़ने पर सेवा भी करता। अफसर ही नहीं बल्कि गाँव के लोग भी उसके इस शिष्ट व्यवहार पर खुश थे।

रामनारायण का गाँव गोविंदपुर शहर से पाँच कोस की दूरी पर बसा था। आजादी के बाद गाँवों में भी स्कूल-कॉलेज खुलते गये। सड़के बनीं, बिजली आ गई और गाँवों में भी आधुनिक सभ्यता की नींव पड़ने लगी।

रामनारायण भोला-भाला तो था ही इसलिए गाँव में यदि कोई तासिलदार या पुलिस अधिकारी आ जाता तो उसकी वेश-भूषा और तौर-तरीकें देख मन-ही-मन आह्लादित होता और सोचता कि मुझे भी अपने भाई को शिक्षा दिलाकर इस तरह एक अफसर बनाना है। उसने अपनी इच्छा अपने माँ-बाप के सामने जाहिर की। अपने बेटे की सूझ-बूझ पर माँ-बाप भी बहुत खुश हुये क्योंकि गाँवों के शरीफ लोग रामनारायण को बुद्धू मानते थे। ऐसे व्यक्ति के दिमाग में ऐसा विचार आया है वह निश्चय ही काबिले तारीफ है।

क्रमशः देश और समाज में बहुमुखी विकास होने लगा। देहात के लोग बिना व्यय और प्रयास के अपने बच्चों को अपने ही गाँवों में शिक्षा दिलाने लगे।

रामनारायण का छोटा भाई दिनेश पढ़ने में तेज था। अपनी लगन और मेहनत से वह एमबीए में अव्वल दर्जे में उत्तीर्ण हुआ। अनायास ही उसे अमरीका के वर्जीनिया स्टेट में नौकरी लगी। भारतीय मुद्रा में उसे लगभग एक लाख रुपए वेतन मिलने लगा।

दिनेश अब पचीस वर्ष का हो गया था। माँ-बाप ने रामनारायण को समझाया–बेटे, अब दिनेश की शादी की बात को सोचो। वह बेचारा विलायत में खाना-वाना बनाकर कितने दिन तक नौकरी करता रहेगा।

रामनारायण भी महसूस करने लगा कि विलंब किए बिना दिनेश की शादी करनी चाहिए। लेकिन उसे दिनेश की शादी को लेकर ज्यादा दौड़-धूप करने की जरूरत नहीं पड़ी। दिनेश को नौकरी लगने की खबर पाकर लोग स्वयं उसके घर के चक्कर लगाने लगे। आखिर रामनारायण ने अपने माँ-बाप की सम्मति लेकर शहर के एक नामी वकील की बेटी सरोजा के साथ रिश्ता कायम किया। धूमधाम से शादी मनायी गयी। दहेज के रूप में खासी अच्छी रकम के साथ कीमती गहनें प्राप्त हुए। दिनेश के परिवार के लोगों ने अनुभव किया कि उन्हें अपने मन की मुराद मिल गई।

देश में पंचवर्षीय योजनाओं के तहत ग्रामीण विकास के अनेक कार्यक्रम अमल होते हुए गोविंदपुर के निकट तुंगभद्रा बाँध की परियोजना चालू हुई। सिंचाई की सुविधा होने से रामनारायण की चालीस एकड़ की जमीन सोने की फसल उगलने लगी। कुछ ही वर्षों में रामनारायण गाँव के अमीर खानदानों में गिना जाने लगा। अब उसकी सालाना आमदनी हजारों की संख्या पार कर लाखों में पहुँच गई। अब वह गाँव के धनवानों की पंक्ति में गिना जाना लगा। इधर गाँवों का माहौल भी पूरी तरह से बदल गया था। शहर की सारी सुविधाएँ गाँवों को उपलब्ध थीं। नई सभ्यता ने देहाती जनता को सुजान बनाया। रामनारायण भी सामाजिक रीति-नीतियों से भली भाँति परिचित होता गया। अब उसके नाम के साथ ‘बुद्धू’ विशेषण के बदले ‘समझदार’ संज्ञा का प्रयोग होने लगा। कुल मिलाकर वह एक सज्जन की परिभाषा का पर्याय बन गया था। परिवार में खुशहाली था। समय बीतता गया। रामनारायण स्वयं अपने पुरुषार्थ पर प्रसन्न था क्योंकि उसके सामने कोई ऐसी समस्या नहीं थी जिसके लिए वह माथापच्ची करें। माता-पिता भी स्वस्थ और सुखी थे। वे अपने बेटे को गाँव के एक धनी के रूप में देख अतिशय प्रसन्न थे। उनका बेटा आश्रितों के साथ कर्मचारियों को भी समुचित मेहनताना देता था और अपनी कमाई से थोड़ा अंश दान-पुण्य भी करने लगा। अल्पकाल में उसके पास लाखों रुपए की पूँजी जमा हो गयी।

दिनेश अमरीका में कमाता खूब था। पर उसका खर्च भी उसी अनुपात में होता था। उसके भी बाल बच्चे हो गए थे। परिवार के खर्च के साथ पढ़ाई का खर्च भी दुगना हो गया था। तिस पर सप्ताहांत में सैर सपाटे के पीछे भी आशातीत व्यय होने लगा। उसका ससुर शिवशंकर भी इधर वकील से जज बन गए थे। जज साहब की आमदनी भी बढ़ती गयी। वे यदा-कदा अपनी बेटी मंजुला को रुपए पैसे के साथ गहने भी बनवाकर भेजा करने लगे। समाज में अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए जज साहब शहर के क्लब-मेंबर बने। रायल क्लब की सदस्यता के शुल्क एक लाख रुपए हो गया था। क्लब में ताश खेलने और शराब पीने की आदत आम बात थी। आमदनी के साथ खर्च भी बढ़ता गया और समाज में अपना स्तर ऊँचा बनाने के लिए आवश्यकता से अधिक खर्च करने लगे।

आमदनी के सिर पर जब ऐश का भूत सवार हो जाता है तो वह नाना प्रकार की कमाई के स्रोतों की खोज करने के लिए विवश हो जाता है। रायल क्लब के सदस्यों के बीच ताश खेलने और शराब का सेवन करना आम बात थी। वह स्टेटस का एक सिंबल भी बन गया था। शिवशंकर भी इसका अपवाद नहीं।

एक दिन संध्या के समय शिवशंकर ताश खेलते शराब की चुसकी लेने लगे और धीरे-धीरे मदहोश होते गये, तब बगल में बैठे एक साथी अफसर शराब के नशे में धुत होकर बड़बड़ाने लगा। उनके बीच घूसखोरी, भ्रष्टाचार, आतंक और आत्महत्या को लेकर चर्चा चल पड़ी। चर्चा के दौरान उसके साथी अफसर गिरीश ने कहा, ‘शिवशंकर जी, हमलोग जैसे शरीफों को भी बेटियों की शादियों में दहेज देना पड़ता है। दहेज प्रथा समाज के लिए एक अभिशाप है। दहेज के पीछे हमारे देश के अनेक परिवार तबाह होते जा रहे हैं। मेरी ही बात लीजिए। अपनी बेटियों की शादी में मैंने अपनी जमीन-जायदाद बेच डाली। मकान को गिरवी रखा। मेरे बैंक बैलेंस भी शून्य होता जा रहा। इधर कर्जदार की धमकी पर समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाने रखने के लिए मैंने मकान भी बेच डाला। अब मैं किराये के घर में रहने लगा हूँ। मेरे माँ-बाप गाँव में रहते हैं। उनके नाम पर जमीन-जायदाद के रूप में पैतृक संपत्ति है। उसे वे बेचने नहीं देते। वे कहते हैं कि मरने के बाद चाहे कुछ भी करो लेकिन हमारे जिंदा रहते इसको बेचने के लिए हम तैयार नहीं हैं। आप तो कानून के जानकार हैं। मुझे कोई उपाय तो बता दीजिए ताकि मैं इस दल-दल में फँसने से बच जाऊँ।

जज साहब ने शराब की एक और चुस्की ली और फिर सिगरेट का कश लेकर कहा ‘यार, तुम अपने माता-पिता को समझा बुझाकर जमीन जायदाद, घर और खलिहान बेच डालो, उनको शहर में अपने पास बुला लाओ। मामला खतम।’ 

‘लेकिन मेरे आका, दरअसल सवाल यह है कि वे जीते जी अपने पुरखों की संपत्ति को बेचने के लिए तैयार नहीं हैं। वास्तव में मुझे भी उनका यह सेंटिमेंट उचित लगता है। आखिर उनके भरण- पोषण के लिए भी तो कुछ सहारा चाहिए। जबकि मैं खुद अपने माँ-बाप की जिम्मेदारी नहीं लेता।’

‘अरे यार, तुम भी गोबर गणेश हो। ऐसा लगता है तुम्हारे दिमाग का दीवाला निकल चुका है। जीने के लिए तुम्हें जो तनख्वाह मिलती है क्या वह पर्याप्त नहीं है। उलटे तुम मकान का किराया भी चुकाते हो। ऐसी हालत में तुम अपने माँ-बाप को मनवा नहीं सकते तो तुम्हारा यह मामला कैसे हल होगा?’ जज ने डाँट बताई।

क्लब के अन्य सदस्य जो इन मित्रों का वार्तालाप ध्यान से सुन रहे थे उनमें से जयराम नामक एक सदस्य ने जो नशे में धूत था वह होश हवाश खोकर कुछ बड़बड़ाने लगा। ‘हाय मेरे दोस्त! आप भी कैसे भोलेभाले है। इस छोटी सी बात को लेकर माथापच्ची कर रहे हो। यह मामला तो बिलकुल साफ है। तुम लोग आए दिन ऐसे अदालत में नकली कई ऐसे फैसले करते हो। एक बात तो सोच लो। अदालत में कैसे कैसे मुकद्दमें दायर होते हैं। प्रतिदिन प्रॉपर्टी के जाली दस्तावेज आपकी पेशी में आते हैं। इसकी जाँच करके तुम फैसले सुनाते हो। क्या खुद अपने माँ-बाप के हस्ताक्षर करके उनकी जमीन-जायदाद को बेच डालकर खुद अपनी समस्या का हल नहीं कर सकते? उनके मकान मात्र रहने दो। माँ-बाप की संपत्ति पराये लोगों की थोड़े ही होती हैं। आज नहीं तो कल तुम ही लोगों को यह संपत्ति मिलेगी। अपनी मुसीबत से मुक्ति पाने के लिए कुछ दिन पहले ही बेच डालों। उसमें क्या फर्क पड़ता? बस अब तुम को थोड़ी सी खुरापात करनी होगी। बस इतना ही अपने माँ-बाप के हस्ताक्षर खुद कर लो। मैंने खुद ऐसा ही किया था। अब मेरे माँ-बाप भी भगवान को प्यारे हो गए हैं। मैं उस संपत्ति का मालिक बनकर मजा कर रहा हूँ।’

जयराम का सुझाव सुनकर जज साहब के दिमाग में हरकत होने लगी। उनके सामने अपने दामाद के माँ-बाप के चेहरे तैरने लगे। तब तक जज शिवशंकर साहब भी नशे में आ गए थे। उसके समधियों की संपत्ति पर हाथ साफ करने के लिए एक अच्छा खासा उपाय हाथ लगा था। फिर क्या था जज साहब ने न आगे सोचा और न पीछे। बस कुछ ही दिनों में अपने संबंधियों की जायदाद के दस्तावेजों की नकलें रजिस्ट्रार ऑफिस से मँगवा लीं। अपने मातहत काम करनेवाले क्लर्को से अपने समधि और समधिन के नकली हस्ताक्षर करवाए ताकि वह भविष्य में इस अपराध से न पकड़ा जाए। फिर क्या था चुपचाप सारी जमीन जायदाद बिकवाकर सारी रकम अपने बेटी-दामाद के नाम पर बैंक में जमा कर दिया और अपने इस कुकृत्य से सफल होने के एवज में संतोष की साँस ली।

रहस्य कभी छुपता नहीं। आखिर उसका भेद खुल गया। रामनारायण ने जज के विरुद्ध अदालत में मुकद्दमा दायर किया। विडंबना की बात है, जज के आसन पर विराजमान हो मुकद्दमों के फैसले सुनाने वाले शिवशंकर आज एक मुद्दई बनकर कटघरे में खड़े थे। सुनवाई शुरू हुई। न्यायाधीश ने मुद्दई शिवशंकर से पूछा–‘आप तो कानून के ज्ञाता हैं। फिर ऐसी हालत में यह मुर्खता क्यों की?’ शिवशंकर ने बचने की कोशिश करते हुए जवाब दिया–‘महानुभाव, यह हस्ताक्षर मेरे नहीं हैं आप नाहक मुझ पर शक कर रहे हैं’ 

‘फिर किसके हैं?’ 

‘रामनारायण के माँ-बाप के हस्ताक्षर मैंने अभी करवा दिया है। उनके हस्ताक्षरों से यह नकली हस्ताक्षर मेल नहीं खाते। इसका मतलब है आपने इन हस्ताक्षरों के नकली हस्ताक्षर करवाकर नारायण के माता-पिता की जमीन जायदाद बेच डाली। इसकी जाँच करने पर नकली हस्ताक्षर करनेवाले क्लर्कों ने अपनी गलती मान ली। इसलिए इस मामले में ज्यादा बहस या जिरह करने की जरूरत नहीं है। अतः मैं अदालत को शिफारिश करता हूँ कि इस मामले के अपराधी बने आपको अब अपने पद से बरखास्त कर दिया जाय। आपने लोभ में पड़कर न्यायाधीश के पवित्र पद को कलंकित कर दिया।’ जज फैसला सुनाकर अपने आसन से उठकर अपने चेंबर में चले गए। अपराधी शिवशंकर सिर झुकाकर अदालत से जब बाहर निकले तो द्वार के बाहर खड़े रामनारायण ने उसे ठोकते हुए कहा ‘आपने जज के पद पर रहते हुए जो बेइंसाफ किया उसका तोहफा मिल चुका है। ऐसे जज के संबंधी बनने पर मुझे शर्म आती है। किंतु आपको दंड स्वरूप फैसले के रूप में जो तोहफा मिला है वह सही इंसाफ है। लेकिन यह करतूत करके बेइंसाफ जज साबित हुए। जिंदगीभर आप इस कलंकी से मुक्त नहीं हो सकते। भोगो अपने अपराध का दंड। आगे कभी मुझे अपना चेहरा मत दिखाना।’


Artist: Anunaya Chaubey
© Anunaya Chaubey


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