चरित्रहीन

चरित्रहीन

रूपमती जब पहाड़ से उतरकर अपने काहिल पति तथा गोद में एक बच्चा लिए पटना आई तो महानगर की भीड़भाड़ में खो-सी गई। कहाँ बागमती के किनारे बसी उसकी झोपड़ी–शांत और स्वस्थ वातावरण और कहाँ पटने की तंग गलियाँ और उमड़ती भीड़ से भरती चौड़ी सड़कें। एक सेकेंड भी गफलत हो जाए तो या तो रिक्शे से टकरा जाए या मीनी बस के नीचे पिच जाए। यदि बागमती की भीषण बाढ़ उसके गाँव तथा झोपड़ी को बहाकर अपने पेट में लील न गई होती तो आज वह पटने की गलियों में–सड़कों पर दूर-दूर ठोकरें नहीं खाती। अजब है नियति का फेरा! एक क्षण में उसके खेत-खलिहान और मवेशी नदी की चपेट में आ गए। यह तो भगवान का शुक्र है कि वह समय पर अपने पति तथा बच्चे को लेकर भाग निकली वरना आज वह भी औरों के साथ पानी की कब्र में सड़ती रहती। ऊँचे पहाड़ की नारी धरती के तान-तेवर से बिलकुल अनभिज्ञ थी। मगर पेट तो पालना ही था। भूखे बच्चे को स्तन से दूध निकालकर किसी तरह पिलाकर जिलाना ही था और काहिल पति को भी दो जून भोजन जुटाकर देना ही था। रात में फुटपाथ पर सोती और दिन में कई घरों में चौका-बर्तन कर पेट भर लेती। अपने पति बीरबहादुर को एक चाय की दुकान पर जूठे गिलास साफ करने तथा ग्राहकों को चाय देने के लिए रखवा दिया। इससे कम-से-कम इतने पैसे मिल जाते कि फुटपाथ होटल में बैठकर वह भी अपनी क्षुधा शांत कर लेता। कुछ दिनों ऐसा सिलसिला चला मगर जब शीतकालीन मौसम की ठंढक बढ़ी तो फुटपाथ पर सोकर गुजारा करना मुश्किल हो उठा। रातभर पेड़ तले, अपने ही जैसे अन्य आगंतुकों के साथ, आग तापते-तापते शीत निवारण करती। बीरबहादुर लेदरा ओढ़े ठिठुरता रहता और गोद का बच्चा उसके पेट में समाकर शांत रहता। उसकी ऐसी पतली हालत देखकर चित्रा सिनेमा का दरबान रामभजन सिंह उस पर पिघल पड़ा। वह रोज उसे अपने मालिक के घर जाकर दोनों शाम चौका-बर्तन करते हुए देखता और आँखें लड़ाने का प्रयास भी करता। इसका आभास रूपमती को हो चुका था। मगर आज आँखें मिलाने के साथ-ही-साथ दिल मिलाने का भी वह प्रयास करने लगा। अकेले में उसके प्रति हमदर्दी के डोरे डालते आखिर खुल ही पड़ा–“रूपमती, ओ रूपमती!”

“जी”,

“क्यों इस तरह अपने को गला रही हो? जाड़े का यह आलम और तुम्हारी देह पर चिथड़ों का यह अंबार–मुझे यह देखा नहीं जाता।”

वह शरमा गई।

“शरमाओ नहीं, मेरे सामने तो अपने को खोलो।”

“तो आखिर आप चाहते क्या हैं?”

“यही कि उस बकलोल को छोड़कर मेरे घर में बस जाओ। जो रूखा-सूखा मैं खाता हूँ वही तुम्हें और तुम्हारे बच्चे को भी खिलाऊँगा।”

वह मुस्कुराती निकल भागी। रामभजन सिंह ने देखा कि तीर निशाने पर बैठ गया। रामभजन सिंह ने अपनी मूँछों पर ताव दिया और उधर रूपमती अपने आप में डूब गई। आखिर कबतक वह अपनी देह गलाकर दो प्राणियों की रक्षा करती रहेगी! उसकी लंबी उम्र तथा बच्चे की सारी उम्र कैसे कटेगी–किसी किनारे तो उसे लग ही जाना है और यह मरदुआ तो कभी कुछ कमाएगा नहीं–देह से काहिल और मन से नशाखोर। जो खाने से बचता उसका गाँजा पी जाता। उसके बटुए से भी पैसे चुराकर पी जाता।”…तो उसका क्या होगा? एक प्रश्नचिह्न!

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तो एक दिन रामभजन सिंह की गोटी लाल हो गई। रूपमती उसकी शहर की रखैल बनकर उसके घर में आकर बस गई। गाँव के लिए अलग बीवी-बाल-बच्चे थे ही। उसका बच्चा राजू भी दिन दुगुना-रात चौगुना खूब दूध पी-पीकर बढ़ने लगा। बीरबहादुर को भी सिनेमा में ही चाय की दुकान मिल गई और फाटक पर सोने-रहने के लिए एक तंग कोठरी। अब गाँजा पीने की उसे पूरी सहूलियत मिल गई–बस इतने से ही वह बहुत खुश था। बीवी दूसरे का घर बसा ही चुकी है। उसकी कंचन काया पर मांसल पेशियाँ उभर आई हैं और खाने-रहने के भरपूर सुख से दुःख के दिनों की झुर्रियाँ मर-मिट गई हैं। उस कंचन काया पर कंचन के गहने और टेसलाल रंग की रंग-बिरंगी डिजाइनदार साड़ी और ब्लाउज चार चाँद लगाते रहते हैं।

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एक दिन राजू बड़ा सजीला जवान निकला। स्कूल में नाम लिखाया गया मगर सिनेमा के रंगीन वातावरण में वह पलकर जवान हुआ था–हर हॉल में शो फ्री! भला उसे पढ़ने में मन लगे! बस चिचरी पार कर–सबको चरका दे नई साइकिल उठाकर निकल भागता। बगल की झोपड़ी में कोई हसीन लड़की–सीता रहती है पितृविहीन, मगर माँ उसके साथ ही रहती है। दोनों घर-घर कमाकर अपना पेट पालती हैं। कहीं बच्चों की निगरानी तो कहीं चौका-बर्तन। घर-घर के जूठन पर माँ-बेटी का पेट पल जाता। मगर सीता है बड़ी मनचली। राजू और दोस्तों का वहाँ जमघट जमता। तिनपतिया खेला जाता–भद्दे मजाक होते–और राजू उसे भगाकर सिनेमा दिखाने ले जाता। कभी-कभी माँ आपत्ति करती तो बेटी बरस पड़ती–“अरी, तुम्हें अपना कोई ठिकाना है कि मेरा ठिकाना ढूँढ़ रही हो? अपने दिन भूल गई? किस-किस के साथ न भागी तुम! उस दिन मुन्नी मौसी न तुम्हारी कहानी सुना रही थीं। राजू एक भला लड़का है। उसके साथ मैं सिनेमा जाती हूँ तो कौन बुराई करती हूँ? वह कभी-कभार मुझे रसभरी जलेबियाँ खिला देता है तो कौन गुनाह कर बैठता है? राघो तो तुम्हें आज भी सिनेमा दिखाने ले जाता है, कभी गोश्त-पूड़ी भी खिलाता है।”

“तो सीता, तू मेरी ही तरह जाने कितने घाटों का पानी पीना चाहती है?”

“धत–राजू पर मुझे पूरा भरोसा है।”

“देख, कहीं धोखा न खा जाना। मैं मरदों द्वारा बड़ी सताई गई हूँ।”

राजू और सीता दोनों जवानी के पौर पर पहुँच रहे हैं इसलिए उन्हें जोश है–होश नहीं। सिनेमा, ताश, रात में घुमक्कड़ी, यह सतत जारी रहा–कोई रोक-टोक नहीं–कोई पूछताछ करनेवाला नहीं। और एक दिन वही हुआ जो होनेवाला था। सीता गर्भवती हो गई। मगर वह गंगा पी गई–किसी से कुछ भी कहा नहीं। उसकी माँ भी उसकी इन हरकतों से अनभिज्ञ रही। फिर शक-सुबहा होने के पहले वह टाटा अपने मामा के यहाँ चली गई। माँ ने उसे खबर कर दी कि इस बार सीता की शादी भी वहीं कहीं अच्छे लड़के से ठीक कर देना। टाटा में कमाता हो–पूरा कमासुत हो।

कुछ दिन वहीं कट गए। मगर यह बात छिपती कितने दिन! मामी ने चोर पकड़ लिया। मामा-मामी ने मिलकर उसकी खूब पिटाई की और उसकी माँ को खबर भिजवाई कि इस पाप के घड़े को शीघ्र वापस ले जाए। सीता की माँ को यह खबर मिली तो उसने खाट पकड़ ली। इस कलमुँही ने उसे कहीं का न रखा। उसे खोर-खोर कर वह मार रही है। वह किधर जाए–क्या करे! चारों ओर अँधियारी। मामा ने देखा कि सीता की माँ नहीं आ रही है तो वह खुद एक दिन पटना जाकर उसकी बेटी को वहाँ पहुँचाकर टाटा उलटे पाँव भाग आया। पाप की इस गठरी से उसे किसी तरह निजात तो मिली।
बेटी को देखकर माँ बुक्का फाड़-फाड़ कर रोने लगी। बेटी भी बुत बनी बैठी है। आसपास की झुग्गी की अन्य औरतें भी वहाँ जुट गईं और अपने-अपने प्रस्तावों से वातावरण को और भी दूषित बना दिया। छाती पीटती हुई सीता की माँ को सभी ने सांत्वना दी, चुप कराया और उसे लेकर रूपमती के घर चल पड़ीं। तय यह हुआ कि रूपमती और राजू को पकड़कर सीता और राजू की शादी करा दी जाए। मगर भीड़ को देखते ही रूपमती उखड़ गई–“इस छिनाल को मेरे बेटे के मत्थे मढ़ने की कोशिश न करो। मेरा सिंह जब खूँखार हो जाएगा तो तुम्हें कुचलकर धर देगा। कलमुँही! मेरे बेटे पर लांछन न लगा। भाग यहाँ से।” वह दरवाजा बंद करने लगी तो सीता की माँ ने गुहार किया–“मुझे एकबार राजू से तो मिला दे। उस पर मुझे आज भी भरोसा है। वही मेरी बेटी का उद्धार करेगा।”

“भाग यहाँ से! बड़ी चली है मेरे बेटे से मिलनेवाली! वह यहाँ कहाँ रहता है? वह तो कलकत्ता में नौकरी करता है। पटना छोड़े उसे जमाना हो गया।”

“हाय-हाय, रूपमती! मुझसे झूठ न बोलो। तुमने उसे यहीं कहीं छिपाया है।”

“अरी, चल-हट, नहीं तो तुझे पिटवाकर बाहर निकाल दूँगी।”

“हूँ, बड़ी चली हो मुझे पिटवानेवाली। चलो-चलो–रूपमती यों रास्ते पर नहीं आएगी। राजू को कहीं छिपा दिया है और झूठ बोल रही है।”

सीता की माँ लौट पड़ी। सभी औरतें अपनी-अपनी झोपड़ी में लौट गईं।

रूपमती का यह रुख देखकर सीता की माँ को गहरी चोट लगी। उसे कभी भी विश्वास न था कि रूपमती इतनी चालबाज निकलेगी कि अपने बेटे को इस तरह छिपा देगी। आज वह डूब-उतरा रही है। कोई रास्ता नहीं सूझता है। इधर दिन पर दिन लदते जा रहे हैं–कि शाम को रामपति ने सुझाया–“देख सीता की माँ! इस तरह हाथ पर हाथ रखकर बैठने से काम नहीं चलेगा। चलो, कोतवाल साहब की जनाना से मिला जाए और उन्हीं से आरजू-मिन्नत की जाए कि बेड़ा पार करा दें। उनके यहाँ तुम कमाने भी जाती हो। है बड़ी धर्मात्मा औरत। शायद भगवान जाग उठे।”

सीता की माँ को यह बात जँच गई और दोनों कोतवाल साहब के घर पहुँचीं। उनकी पत्नी ने सारी कथा सुनी और उनका नारीत्व जाग पड़ा। रात में कोतवाल साहब जब फुर्सत में अपने लॉन में आकर बैठे तो उनकी पत्नी ने सीता की दुर्गति का किस्सा सुनाया। कोतवाल साहब पहले तो झिझके मगर पत्नी के इसरार पर राजू को पकड़वाकर किसी तरह शादी करा देने का उन्होंने पक्का इरादा कर लिया। दूसरे दिन से पुलिस सजग हो गई। पहले राजू का पिता बीरबहादुर पकड़ा गया और हाजत में उसकी खूब पिटाई की गई। दूसरे दिन रूपमती भी पकड़ी गई और दो-चार बेंत उस पर भी लगे। उसने बिलबिलाकर राजू को खोज निकालने का वादा किया। फिर शादी भी हो जाएगी। सीता की माँ को मुँहमाँगी मुराद मिल गई। पुलिस के आतंक ने सभी को रास्ते पर ला दिया। फिर एक दिन राजू अंडर ग्राउंड से निकाला गया और सीता की माँ को बुलाकर रूपमती ने कहा–“मेरे पास पैसे नहीं कि मैं राजू की शादी का खर्च वहन करूँ। तुम सब खर्च उठाकर किसी दिन पंडित बुलाकर दोनों की शादी श्रीराम-जानकी के मंदिर में विधिवत करवा दो, फिर पटनदेवी जाकर दोनों को दर्शन करा देना और रात में दोनों पक्ष के लोगों को जो जुरे खिला देना।” सीता की माँ के पैर जमीन पर पड़ते ही न थे। राजू के लिए सारे कपड़े सिलवाए और सीता के लिए साड़ियाँ खरीदीं। रामपति ने प्रसाद तैयार किए। मंदिर में सत्यनारायण की कथा के उपरांत सिंदूरदान का रस्म समाप्त हुआ। सीता राजू की विधिवत पत्नी बन गई और अपने ससुराल बाकायदा चली गई।

हफ्ता-दस दिन तो ठीक से गुजरे मगर एक दिन रामभजन सिंह रूपमती पर उखड़ गया–“देखो रूपमती, तुझे मैंने अपने ऐश-आराम के लिए पाला है–न कि इस बला को पालने के लिए। जब से सीता यहाँ आई है मेरे ऐशो-आराम में खलल पहुँचती है। इसे यहाँ से कल ही अपनी माँ के यहाँ रवाना कर दो। साथ में राजू को भी भेज दो। वह अपना कमाए-खाए और नई पत्नी का भी बोझ उठाए। मेरे घर में यह पाप की गठरी नहीं रह सकती। देखो, कल यह काम पूरा हो जाए वरना मुझसे बुरा कोई न होगा।” इतना कहकर वह अपने काम पर चला गया।

रूपमती रामभजन सिंह के मिजाज से वाकिफ थी! वह आग है या पानी। फिर अपना भी मोल अब वह समझ रही है। वह रूपमती किसी जमाने में थी अवश्य। मगर आज तो सिन ढल रही है। गालों पर झुर्रियाँ उभर आई हैं और लटों पर सफेदी छा रही है। उसने दूसरे ही दिन राजू और सीता को उस घर से चलता किया। सीता की माँ के यहाँ उनका सामान भी पहुँचवा दिया। अब वह अपने रूप और शृंगार के लिए पहले से ज्यादा सजग रहने लगी। आखिर रूप की हाट की वह सजग पारखी जो थी!

आकाशवाणी के सौजन्य से