फिर वही शाम

फिर वही शाम

शाम को कॉलेज से लौटकर रोज की तरह डॉ. सुहासिनी डाक देखने लगी तो एक लिफाफे पर दृष्टि टिक गयी…किसका पत्र होगा? प्रेषक के स्थान पर भी कुछ नहीं लिखा था। पत्र खोलकर उत्सुकतावश पढ़ने लगी तो संबोधन पर आँखें ठहर सी गयीं…‘प्रिय मुस्कान!’ और अनायास ही मन विगत की ओर भाग चला। लिखनेवाले का नाम तक देखने की इच्छा नहीं हुई क्योंकि वो जानती थी उसे मुस्कान कहकर पुकारने वाले सैकड़ों में नहीं हैं। केवल ‘वो’ ही उसे मुस्कान कहकर पुकारती थीं। दस वर्षों का लगातार साथ…फिर दो वर्षों का विछोह…कोई अता-पता नहीं…कोई फोन या पत्र नहीं और अचानक घर-द्वार बेचकर न जाने वो सपरिवार कहाँ गुम हो गयी थीं? वो सोच में पड़ गयी, मेरे पास उनका कोई पता नहीं था…पर उनके पास तो मेरा स्थायी पता था न? किस-किस से नहीं पूछा था मैंने उनके बारे में, पर कोई सही जानकारी नहीं मिल पायी थी कि उनका घर क्यों बिका? उनका फोन नंबर क्यों बंद है? और आज दो वर्ष बाद उनका पत्र। उसने जल्दी से पत्र खोला और पढ़ने लगी, पीड़ा का दस्तावेज परत दर परत खुलने लगा और सुहासिनी हत्प्रभ रह गयी।

‘प्रिय मुस्कान! हाँ, जानती हूँ बहुत नाराज़ हो! वर्षों तुम से अलग रही…कोई खोज-खबर ही नहीं ली…आत्मा से जुड़ा रिश्ता क्या ऐसा होता है, यही सोच रही हो न? पर मुस्कान! भीषण झंझावात में घिरा व्यक्ति हर क्षण बस उससे बाहर निकलने के प्रयास में ही जुटा रहता है’ आस-पास की अच्छी-बुरी किसी भी बात का उस पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता…ये एक निर्विवाद सत्य है…। तुम तो हमारे नीरस शुष्क पतझड़ से जीवन में ‘बाहर’ सी आ गयी थीं। जीवन का मधुर स्पंदन कैसा होता है, मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने तुम से ही तो सीखा था। आज भी वो शाम भुलाए नहीं भूलती जब अपने ‘गृहप्रवेश’ के दिन तुम से पहली बार मिली थी।

‘ये सुहासिनी जी हैं, हमारी पड़ोसी…।’ मेरे पति सुहास प्रभाव ने हमारा परिचय करवाया था। मैं दोनों के नामों में इतना साम्य देखकर मन ही मन हँस पड़ी थी। ‘भाईसाहब! भाभी तो बहुत सुंदर हैं…और आपके बच्चे कितने प्यारे हैं…।’ तुमने स्नेह से मुझे अंक में भींच लिया था। उस आलिंगन की उष्मा आज भी महसूस करती हूँ मुस्कान! बहुत जल्दी ही हम दोनों के परिवार आपस में घुल-मिल गये थे और रक्षाबंधन के दिन हमारा प्रेम एक महत्त्वपूर्ण रिश्ते में बदल गया था। सुबह-सुबह कॉलबेल बजी थी…दरवाजा खोला…तो देखा हाथ में पूजा की थाली और राखी लेकर तुम सामने खड़ी हो।

‘भाईसाहब कहाँ हैं? कहिये बहन राखी बाँधने आयी है।’ तुमने मीठी मुस्कान के साथ कहा तो मैं एकबारगी हड़बड़ा सी गयी। अपने पति के तुनकमिजाज अक्खड़ स्वभाव से मैं अपरिचित कहाँ थी। सोचा तुम इतने प्यार से आयी हो…कहीं ये मना कर दें या बाहर ही नहीं आएँ तो…? या फिर ये कहलवा दें कि वो घर पर नहीं हैं, तो मैं कैसे तुम्हारा सामना करूँगी…। तुम्हें बैठने को कहकर मैं भीतर जा ही रही थी कि वो अचानक बाहर आ गये। रिश्ते, पर्व-त्योहार या अन्य किसी भी संवेदनात्मक अनुभूति को बेकार समझने वाले सुहास का अगला कदम क्या होगा? यह प्रश्न हम सभी को सहमा गया था। पर हुआ बिलकुल विपरीत। तुम्हारा स्नेह पगा स्वर गूँजा, ‘भाईसाहब! कलाई आगे बढ़ाइये!’ और सुहास यंत्रवत वही करते गये जो तुमने कहा। टीका हुआ…मिठाई खिलाई…राखी बाँधी और झुक गयी तुम सुहास के कदमों में, ‘भाईसाहब! पाँच बहनें हैं हम…एक भाई के लिए सदा तरसती रही हूँ। आपसे पहली बार जब मिली थी न…तभी, जब आप हमारे घर ‘फावड़ा’ और ‘कुदाल’ माँगने आये थे…आपका नया घर बन रहा था न…तभी आपके चेहरे में अपने पिता की झलक देखी थी मैंने…वही आँखें, वही अनुशासन की दमक से कौंधता चेहरा। ऐसी अनुभूति हुई जैसे ईश्वर ने पड़ोसी के रूप में बड़ा भाई भेज दिया है।’ 

‘आपके जैसी इतनी पढ़ी-लिखी इतनी स्नेहिल बहन का भाई होना सौभाग्य की बात है। मेरी भी कोई बहन नहीं है…आज बहन मिल गयी…ईश्वर का धन्यवाद!’ सुहास के इस कथन ने फिर हमें चौका दिया था। तंद्रा टूटी सुहास के इस कथन से, ‘मुँह क्या देख रही हो…जाओ शगुन के रुपये लाकर दो।’ उस दिन से हमारा नेहबंध और दृढ़ होता चला गया। मेरी दोनों बेटियों नेहा और मेघा की तो तुम सब कुछ थीं। ‘माँ! बुआ जी कितनी अच्छी हैं…’ दिन में बीसियों बार सुनती थी मैं। कोई भी मुश्किल होती…चुटकियों में तुम उसका हल निकाल देतीं। सुहास को कहीं आना-जाना पसंद नहीं था। मेघा और नेहा तो अपनी सहेलियों के घर भी पापा से छिपकर जाती थीं। जब तक घर में रहते सेना का कठोर अनुशासन घर में व्याप्त रहता। हम तो ऐसे ही जीने के आदी हो गये थे…कि तुम पुरबा बयार सी हमारे जीवन में आयी। ‘भाई साहब! आज ऑफिस से सीधे घर आइयेगा…भाभी और बच्चे यहीं हैं…एक साथ नाश्ता करेंगे।’ तुम सीधे सुहास को फोन कर देती…और वो आ भी जाते। सच, स्नेह और मनुहार की भाषा किसको नहीं बदल देती है। तुम्हारे साथ हमारा कहीं भी जाना सुहास को खलता नहीं था। हम खूब मस्ती किया करते थे…याद है न…तरह-तरह के पकवान बनाना कभी पिकनिक पर चले जाना तो कभी घर पर ही एक साथ फिल्में देखना…बच्चों के साथ बच्चा ही बन जाती थी तुम। कितना प्यार करते थे सुहास तुम्हारे पति और बेटी स्वप्ना से। स्वप्ना के साथ-साथ मेघा और नेहा भी अपने पापा से खुलने लगी थीं। मैं उन चारों को एक साथ शतरंज या लूडो खेलते देखकर दंग रह जाती थी। सुहास उस क्षण दूसरे ही सुहास होते थे। समय के प्रवाह में सब कैसे बह गया मुस्कान!’ सुहासिनी ने अपनी भींगी पलकें पोंछकर उस क्षण को मानो आत्मा में जीवंत पाया जब भाभी ने उसे ‘मुस्कान’ नाम दिया था। ‘ये सुनिये-सुनिये कहकर क्यों पुकारती हैं भाभी…आपकी ननद का एक नाम भी है…सु…हा…सि…नी।’ एक दिन उसने कहा तो वो स्नेह से बोलीं, ‘तुम्हें मुस्कान कहूँगी…बार-बार तुम्हारे भैया का नाम नहीं पुकार सकती न…शायद उन्हें अच्छा न लगे। मीठी मुस्कान वाली…सुहासिनी।’

आँसू पोंछकर वो आगे पढ़ने लगी…‘हमारा जीवन एक सुंदर मार्ग पर गतिमान था कि अचानक नियति ने अपना पत्ता फेंका। कितनी दुःखी थी तुम और हम सब भी जब इनका ट्रांसफर कोलकाता हो गया था।

‘भाई साहब! रिटायरमेंट में तीन साल ही तो बचे हैं…ऐसे में घर-द्वार छोड़कर बाहर जाना क्या ठीक होगा? मत लीजिये प्रमोशन, बैंक मैनेजर नहीं बनेंगे तो कौन सा गलत घट जाएगा? यहीं रहिये।’ तुमने कहा था। पर सुहास तो सुहास थे न, हमें कोलकाता जाना ही पड़ा…नये सिरे से नयी जगह जीवन को आगे बढ़ाना पड़ा। अपने प्यारे घर को किराये पर लगाकर भारी मन से हम कोलकाता तो आ गये, पर सच कहती हूँ मुस्कान! एक पल को भी खुश नहीं रह पायी…गलत आखिर घट ही गया…एक-दो महीने बाद से ही इनकी तबीयत खराब रहने लगी। बुखार, बदहजमी, पेट दर्द जैसी समस्याओं से जूझते ये काफी चिड़चिड़े होते जा रहे थे। मैंने कई बार तुम्हें बताना चाहा, पर तुम्हारे भैया ने ही मना कर दिया। फोन पर बातें होती रहीं…तुम्हारी राखी समय से पहुँचती रही…मेघा या नेहा से अपनी कलाई पर राखी बँधवाते तुम्हारे भैया दस वर्षों के प्रगाढ़ रिश्ते को बार-बार याद करते थे। ‘जरूर ये पिछले जन्म का कोई रिश्ता है। ईश्वर ने मेरे जीवन में इतने मधुर रिश्ते की कमी पूरी कर दी है…नहीं तो मैं जान ही नहीं पाता बहन-भाई का रिश्ता होता कैसा है? सुहासिनी का स्नेह मुझे एक ऐसी डोर से बाँध गया है जो कई जन्मों तक बंधी रहेगी…।’ तुम्हारा फोन आता तो बीमारी में भी उठकर बैठ जाते…आवाज में सधा हुआ भारीपन लाकर बात करते…जिससे तुम्हें उनके कष्ट का तनिक भी भान ना हो। ‘रक्षाबंधन का उपहार है उसे मेरी तरफ से, कि वो हमेशा खुश…सुखी रहे। मेरे कारण उसकी आँखों से आँसू न बहे।’ उनका स्पष्ट तर्क था, मैंने प्रतिवाद किया था, ‘बाद में जब उसे पता चलेगा तो क्या वो हमें माफ करेगीं? ‘मैं अपने जीते जी उसे कुछ नहीं बताने दूँगा। मेरे न रहने पर उसके आँसू जरूर बहेंगे…पर मैं तो नहीं देखूँगा न!’ मैं मौन रह गयी थी। हमें कठोर मनाही थी कि हममें से कोई तुम तक उनकी बीमारी की बात न पहुँचाए। हमारे परिवार को न जाने किसकी नजर लग गयी थी। तुम्हारे भैया धीरे-धीरे काफी कमजोर होते जा रहे थे। लंबा-चौड़ा स्वस्थ शरीर सूखकर काँटा होता जा रहा था…लीवर कैंसर का अंतिम स्टेज…उफ! कैसे कहूँ कितनी पीड़ा भोगने पर विवश थे वो…और मेरे कानों में हर वक्त तुम्हारे कहे शब्द गूँजते रहते। याद है न मुस्कान! कभी-कभी तुम्हारे भैया के कठोर अनुशासन और कटु व्यवहार से खिन्न होकर मैं कह उठती थी, ‘न जाने रिटायरमेंट के बाद इनके साथ कैसे रहूँगी? अभी कम से कम बैंक तो जाते हैं, आठ-दस घंटे शांति से रहती हूँ…जब पूरे दिन घर पर ही होंगे तो कैसे मैनेज करूँगी पता नहीं। एक संडे बर्दाश्त नहीं होता।’ तुम तुरंत टोक देती, ‘ऐसा मत कहिए भाभी। कई बार कही हुई बात विधाता लॉक कर देते हैं…देखिएगा तब तक भैया का व्यवहार जरूर सामान्य हो जाएगा।’ और मेरा दुर्भाग्य देखो, विधाता ने मेरी बात ‘लॉक’ कर ली। रिटायरमेंट से छह महीने पहले ही भीषण पीड़ा झेलते तुम्हारे भैया ने जब आखिरी साँस ली…वो शाम थी 15 मई, 2012 की शाम…सात बजकर पैंतीस मिनट पर वो हम सबको बिलखता छोड़कर चले गये। 15 मई…! कितनी धूमधाम से तुम इस दिन को मनाया करती थी…तुम्हारा मनुहार प्रेम समर्पण मुझे और तुम्हारे भैया की आत्मा को अद्भुत स्नेह से आर्द्र कर देता था…‘भाभी शादी की सालगिरह इतनी फीकी…मैं कुछ नहीं जानती आज आपको मेंहदी लगाकर पूरे शृंगार के साथ तैयार होना होगा…भैया भी तो देखें शादी के इतने वर्षों बाद भी आप कितनी सुंदर लगती हैं।’

‘नहीं मुस्कान! उन्हें तड़क-भड़क पसंद नहीं…इतने वर्षों तक कुछ किया नहीं है अब इस उम्र में…।’ मैं सकुचा उठी थी। ‘उम्र? कौन सी उम्र हो गयी आपकी…वैसे भी खुशियाँ मनाने की, उन्हें जीने की कोई उम्र कहाँ होती है…जब चाहे अपनी मुट्ठी में खुशियाँ भर लो…सब अपने हाथ में होता है।’ और तुमने वही किया जो तुम चाहती थी…15 मई, 1999 की वो शाम मेरे जीवन की अविस्मरणीय शाम बन गयी। सुबह-सुबह घर आकर तुमने सुहास से कहा, ‘भाई साहब! आज आपकी शादी की सालगिरह है न? मेरी असीम शुभकामनाएँ लीजिए और प्लीज शाम को सात बजे तक घर जरूर लौट आइयेगा…हाँ! हाँ पता है क्या कहना है…ये सब आपको पसंद नहीं…इतने दिन सेलिब्रेट नहीं किया तो अब क्या करना…है न? भाभी भी यही कह रही थीं…पर क्या मेरी खुशी के लिए आज का दिन सेलिब्रेट नहीं करेंगे?’ और फिर…स्नेह से मेरे हाथों में मेंहदी रचाती बच्चों के साथ मिलकर तरह-तरह के पकवान बनातीं…मेरा शृंगार करती तुम जैसे मेरी आत्मा में गहराई तक उतर गयी थी। दोनों परिवारों ने मिलकर खुशियाँ बाँटी थीं…आइने में अपना ही रूप मुझे अनोखा लगा था…और सुहास की मीठी स्निग्ध दृष्टि में कौंधता वो आश्चर्य मिश्रित प्रेम पगा भाव…आज भी हृदय में संचित है। कुछ ऐसे क्षण जीवन में होते हैं जो दुर्लभ होते हैं। तुम्हारे कारण मेरी मुट्ठी में भी कई दुर्लभ क्षण हैं मुस्कान! एक दूसरे के सुख दु:ख में साथ निभाते सभी मानो एक परिवार बन गये थे। क्या भूल पाऊँगी कमर दर्द के कारण बिस्तर पर पड़ने पर की गयी तुम्हारी सेवा? तुम्हारा स्नेह?

क्या कभी भूल पाऊँगी ‘तीज’ ‘वटसावित्री’ या ‘जीवितपुत्रिका’ व्रतों का पारण? तरह-तरह के पकवानों के साथ तुम व्रत तोड़ते समय सामने खड़ी मिलती थी। हाँ! जानती हूँ तुम्हारे मन में सवाल उठ रहे हैं…इतना आत्मिक स्नेह था तो कभी संपर्क करने की कोशिश क्यों नहीं की? नियति मुस्कान! नियति! कोलकाता से कुछ ही दिनों में तुम्हारे भैया का तबादला मुंबई हो गया था। जाते समय ट्रेन में ही वो महत्त्वपूर्ण बैग चोरी हो गया जिसमें सारे महत्त्वपूर्ण कागजात मोबाइल और डायरियाँ थीं…मेरा दुर्भाग्य…! तुमसे क्या, सभी अपनो से एक क्षण में संपर्क टूट गया था। फिर परिदृश्य इतनी तेजी से बदला कि मात्र छह महीनों में तुम्हारे भैया ने बिस्तर पकड़ लिया…उनकी सेवा में लगे हम सबको एक पल का चैन ही कहाँ था…लीवर ट्रांसप्लांट के लिए ब्रोकर की मदद से अपना प्यारा घर बेचने पर विवश होना पड़ा। वही घर जिसे तुम्हारे भैया ने इतनी जतन से बनाया था…वही घर जिसने तुमसे रिश्ता जोड़ा था…कई खंडों में आत्मा टूटी है मुस्कान! इनसान नियति के हाथों की कठपुतली मात्र है और कुछ नहीं। तुम ही कहो जिस घर को तुम्हारे भैया ने प्राणार्पण से बनाया था…उसे खुद आकर कैसे दूसरे के हाथों सौंप देती?

आज तुम्हारे भैया को गये इक्कीस दिन हो गये…तुम्हारी दोषी हूँ अंतिम दर्शन भी नहीं करवा पायी…उनकी इच्छा थी, और मैं मजबूर थी मुस्कान! हमेशा से तुमसे मन की पीड़ा सुख-दु:ख बाँटती आयी थी न…तो इस अपार पीड़ा को भी तुम्हारे सामने खोलकर रखने पर विवश हूँ कि मेरे जीवन में फिर वही शाम आयी…जो कभी द्वार पर बंदनवार सजाए शहनाइयों की गूँज के साथ मेरी माँग में सिंदूर सजा गयी थी…पर इस बार उसका रूप भयावह था…वही 15 मई की शाम…रोशनी की चकाचौंध की जगह घटाटोप अंधकार…वैसी ही भीषण वर्षा…संबंधियों का हुजूम…मंगलगीतों की जगह स्नेहीजनों का रुदन…आनंद के स्थान पर भय…और हथेलियों पर मेंहदी की जगह रिक्तता का अहसास…जिस हाथ को उन्होंने उस तिथि में पकड़ा था उसी तिथि में उसे छुड़कर वो अनंत में विलीन हो गये। इस शाम का घाव मन पर आजीवन बना रहेगा…आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है मुस्कान! पुराने घर के पते के आधार पर ये पत्र डाल रही हूँ। मुंबई का पता और मोबाइल नंबर भी भेज रही हूँ…। जीवन में एक-दो ऐसे रिश्ते होते हैं जिनकी अहमियत सुख और दुःख में समान होती है। क्योंकि वो रक्त संबंध से नहीं आत्मा के संबंध से जुड़े होते हैं। हम ऐसे ही पवित्र रिश्ते की डोर से बंधे हैं। तभी तो तुम्हारे भैया ने तुमसे अपनी हालत छुपायी…और मैं अपना पीड़ित मन लेकर फिर तुम्हारे सामने हूँ…आ जाओ मुस्कान! एक बार फिर मुझे तुम्हारी जरूरत है। इससे पहले कि मैं खंड-खंड होकर बिखर जाऊँ, मुझे अपने आत्मिक स्नेह से समेट लो।

तुम्हारी भाभी

पत्र पढ़कर फूट-फूट कर रोती सुहासिनी ने तुरंत फोन मिलाया…भा…भी!

‘मुस…कान…न!’

दोनों के बीच सारे शब्द तिरोहित हो गये, केवल सिसकियाँ थीं कि रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। बाहर वर्षा का शोर बढ़ता जा रहा था और शाम गहरा रही थी।


Image: Evening
Image Source: WikiArt
Artist: Aleksey Savrasov
Image in Public Domain

निरूपमा राय द्वारा भी