घर

घर

मैं आजतक मकान में रहता था। अब बुढ़ापे के पड़ोस में आकर अपने घर में रहने जा रहा हूँ। तीन दशक सरकार की गुलामी करते बीत गए। आज यहाँ, कल वहाँ। मैंने कभी अपना तबादला रुकवाने की कोशिश न की और न कभी पैरवी ही की। सोचा–जब गुलामी करता हूँ तो फिर मनमानी कैसी! सरकार बहादुर जो हुक्म दे वह सर-आँखों पर। इसीलिए तो मैं खूब सताया भी गया। किसी जगह दो साल तक भी नहीं रह पाया। सभी मेरी ही बदली कराकर अपने मन के मुताबिक अपनी पोस्टिंग करा लेते। सब चेन मुझसे ही शुरू होते और कभी-कभी मुझ पर ही आकर रुक जाते। ऐसी हालत में कहीं भी कोई मकान बनाने में दिलचस्पी नहीं हुई। मकान बना भी देता तो उसे किराये पर चलाने का मुझे कभी जी नहीं चाहता। आखिर मकान अपने आराम के लिए बनवाता या किरायेदार की सुविधा के लिए? फिर किराये पर देने से मुझे फायदा? घर में न जोरू न जाँता? जिंदगीभर अकेला ही रहा, किसी से शादी जो न की। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी रहीं। वेतन के पैसे या पेंशन के पैसे किसी तनहा के लिए जिंदगी गुजार देने को काफी हैं।

सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद एक थके मुसाफिर की तरह अपने बसेरे की छाँह की तलाश हुई तो जीवन-बीमा तथा प्राविडेंट फंड के तमाम पैसे लगाकर एक छोटा घर बनवा लिया। जमीन बहुत पहले ही सस्ते मूल्य पर खरीद ली थी। सालभर सीमेंट, लोहा, ईंट तथा चिप्स जुटाते-जुटाते मैं परेशान-परेशान हो गया। कभी सोचता, यह आफत क्यों मोल ले ली! आराम तो एक सुंदर किराये का फ्लैट लेकर भी भरपूर मिल जाता। मगर वही–वही एक अपना अपना–यानी अपनी बीवी हो–अपने बाल-बच्चे हों–अपना घर हो–बराबर टीसता रहा। तो बीवी-बाल-बच्चे तो अब होने से रहे–खैर, अपना घर तो हो गया–मकान नहीं, घर। गेट पर बड़े ठाट से दो संगमरमर मढ़ गए। एक पाये पर घर का नाम ‘अनामिका’ तथा दूसरे पर घर के मालिक का नाम रामेश्वर प्रसाद। कहने को तो छोटा ही कमरा था मगर उसका नाम दिया ‘मास्टर्स बेडरूम’। खास अपने लिए बनवाया। मोजेक के फ्लोर, सटा हुआ बाथरूम–सारी सुख-सुविधाओं के साथ, कमरे में सुंदर बर्मा टीक का बड़ा-सा वार्डरोब–ऊपर लॉफ्ट तथा दीवाल के अंदर बिजली की वायरिंग। कमरा खूब हवादार है। पुरवा और पछेया दोनों हवाओं की बहार है।

गृह-प्रवेश की रात से ही बाबू रामेश्वर प्रसाद अपने बेडरूम में बड़े ठाट से सोने लगे। मगर उन्हें अनुभूति हुई कि उनका घर हरा है मगर भरा नहीं। सब सूना-सूना लगता है।…तो फिर…छोटा भाई राजेश बड़ी मुश्किल से एक कमरे के फ्लैट में अपनी बीवी-बाल-बच्चों के साथ गुजारा कर रहा है। वह इतना वेतन नहीं पाता कि एक बड़ा-सा फ्लैट ले सके। और उसका परिवार भी बड़ा है। चार-चार बच्चे। उसे ही यहाँ बुला लूँ। दोनों भाई आराम से रहेंगे। मुझे तो बस एक कमरा चाहिए। राजेश और चंदा की गृहस्थी और तीन कमरों में फैल जाएगी।

अलग किचन और पैंट्री है ही। दोनों तरफ चौड़ी बालकोनी, नीचे भी बरामदा।…राजेश अपने मकान-मालिक से तंग आ गया है। वह प्रतिदिन किराया बढ़ा देने की धमकी देता और घर में एक मरम्मत न कराता। उसकी निजी ख्वाहिश थी कि राजेश घर छोड़कर भाग जाए ताकि नए किरायेदार से उसे पगड़ी तथा ज्यादा किराया दोनों मिलें।

तो बड़े भाई के इस प्रस्ताव को राजेश ने सहर्ष स्वीकार किया और उसकी पत्नी ने, जो एक कुशल गृहलक्ष्मी है, अपनी गृहस्थी को किराये के फ्लैट से समेटना शुरू किया। ठेलों पर सामान ढुलने लगा और हर कमरे में उसके सामान करीने से सजाये जाने लगे। ऊपर का दूसरा कमरा छोटा-सा ड्राइंगरूम बना और नीचे का एक कमरा बच्चों के सोने का कमरा तथा दूसरा राजेश और चंदा का बेडरूम। पैंट्री में सब ऊलजलूल सामान भरे नहीं जा सके। खाली टूटे टीन के कनस्तर, डगरा-सूप, टूटी और अच्छी टोकरियों से लेकर जाँता, तराजू, सिलवट तक सभी सामन नए घर में आ गए। जंक लगे सामानों से लेकर गॉडरेज की आलमारी तथा फ्रिज तक कोने-अंतरों की शोभा बढ़ाने लगे। नए तथा पुराने का एक अच्छा मिश्रण तैयार हो गया। अचार के अनेक बोइयाम खिड़कियों पर सजा दिए गए और बुकनी मसालों से भरी शीशियाँ जहाँ ताखों पर जगह मिली रख दी गईं। लॉफ्ट भी जाड़े के कपड़ों से भर गए। टूटे-फूटे बक्से पलंग के नीचे आ गए। यानी घर का कोना-कोना भर गया। यदि कोई बाहर से आता तो ऐसा महसूस करता कि कोई एक सामान उसकी देह पर अब गिरा तब गिरा।

रामेश्वर प्रसाद को पहली बार अनुभव हो रहा है कि परिवार की क्या चहक होती है। जिंदगीभर रीता-रीता रहने से उनमें जो एक खालीपन आ गया था भरा-भरा लगता है। उन्हें खाने-पीने की भी सुविधा हो गई। घर में कुशल गृहिणी जो आ गई। राजेश भी खुश है कि मकान-किराया देने से उसे निजात मिली और बच्चे भी प्रसन्न हैं कि उन्हें खेलने की अफरात जगह मिल गई। इसी तरह जाने कितनी रातें कटीं–कितने दिन कटे और एक दिन रामेश्वर बाबू चारों धाम करने कुछ साथियों के साथ निकल पड़े। अपने कमरे की कुंजी चंदा को थमा गए।

यात्रा के प्रथम चरण में पुरी में पड़ाव रहा–दूसरे में मद्रास होते रामेश्वरम, फिर कन्याकुमारी–मदुराई–तिरुपति होते हुए द्वारिका की ओर बढ़े। फिर वहाँ से लौटते हिम्मत हार गए–इस साल अब बद्रिकाश्रम न हो सकेगा। इसलिए यात्रा से थककर चूर होकर घर लौट आए।

संध्या समय घर पहुँचे। राजेश और चंदा सिनेमा देखने गए हैं। बच्चे बालकोनी पर खेल रहे हैं। रामेश्वर प्रसाद धड़धड़ाते हुए अपने कमरे की चौखट पर पहुँचे और रिक्शेवाले से सामान कमरे में रखवाकर बड़े इतमीनान से आरामकुर्सी पर बैठकर अपने घर के हर सामान को देखने लगे तो कोई पहचान में ही नहीं आता। ऐं, मेरे सामान कहाँ गए?–न उनका लिहाफ न तकिया, न स्टैंड न बेड, न मेज न कुर्सियाँ। झपटकर वार्डरोब का दरवाजा खोला तो बहूरानी की साड़ियाँ उनमें सजी हैं और एक कोने में राजेश के सूट भी हैं। फिर इधर-उधर गौर कर देखा तो पता चला कि उनके ‘मास्टर्स बेडरूम’ में उनका एक भी सामान नहीं है। और अब यह कमरा दूसरों का हो चुका है। वह चौंककर बाहर निकले तो बच्चों ने हँसते हुए बताया–“मम्मी-डैडी अब इस कमरे में रहते हैं और आपका सामान गैरेज के ऊपरवाले कमरे में सजा दिया गया।” वह अपना सामान उठाए उस कमरे की ओर लपके–बत्ती जलाई। सभी सामान ठीक हैं–कोई गड़बड़ी नहीं। मगर कहाँ मास्टर्स बेडरूम और कहाँ गैरेज के ऊपरवाला कमरा! वह हैरत में हैं। आखिर ऐसा हुआ क्यों?…खैर, मेरे नहीं रहने से कुछ दिनों के लिए यह व्यवस्था बहूरानी ने कर दी हो–अब मेरे आने पर सब ठीक-ठाक हो जाएगा। किसी से कहने-सुनने की क्या आवश्यकता है! सब अपने-आप ठीक हो जाएगा। फिर रामेश्वर प्रसाद बड़े इतमीनान की साँस लेकर अपने पलंग पर लेट गए।

कुछ देर बाद राजेश और चंदा घर लौटे तो भाई को देखकर बड़े खुश हुए। बड़े भाई ने भी तीर्थ का प्रसाद उन्हें तथा उनके बच्चों को बड़े प्रेम से दिया। रात में रामेश्वर प्रसाद ने इतनी लंबी यात्रा के बाद आज पहली बार बड़ा स्वाद लेकर घर का खाना खाया। रात में जल्दी ही अपने पलंग पर सो रहे। नए कमरे में उन्हें बड़ा अजीब-सा लग रहा है–बहुत देर तक करवटें बदलते रहे तो कहीं नींद पड़ी। सोचा–आज तो आया ही हूँ, दो-चार दिनों में सब ठीक-ठाक हो जाएगा। वे खुद ही कमरे से हट जाएँगे–भोर हुआ–जाने कितने भोर हुए, रातें बीतीं; मगर न राजेश ने कोई बात चलाई न चंदा ने ही उनके कमरे को खाली करने का प्रयास किया। अजीब बात है–सब ठीक-ठाक पहले ही जैसा है–जैसे कोई बात ही न घटी हो। तब?…वही बात चलाएँ। उन्हें इस कमरे में बाथरूम का बड़ा कष्ट है। नीचे जाना पड़ता है। अकसर बत्ती गायब रहती है।

हफ्तों उधेड़बुन में रहने के बाद रामेश्वर प्रसाद ने एक दिन खाने की मेज पर चर्चा चलाई–“बहूरानी! कुछ मेरा भी तो खयाल करो! रात में सीढ़ियों से उतरकर नीचे बाथरूम में आना खल जाता है। मेरा कमरा अब तो…।” मगर दोनों आज भी और दिनों की तरह चुप रहे जैसे कुछ हुआ ही नहीं। इसके बाद तीनों चुपचाप खाना खाकर उठ गए। रामेश्वर प्रसाद के चेहरे पर टेंशन के चिह्न साफ-साफ उभर आए हैं। मगर राजेश और चंदा सर्वथा निस्पृह–निरपेक्ष! रामेश्वर प्रसाद परेशान नजर आते। उनके दिमाग में यह ठंढापन कुछ अँटता नहीं। आखिर क्यों? आखिर वे चाहते क्या हैं? दिन-पर-दिन गुजरते गए–महीनों बीत गए, मगर अनुज तथा अनुजपत्नी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं। इधर रामेश्वर प्रसाद घुट रहे हैं। वह विक्षिप्त-से हो रहे हैं। किसी भी तरह शांति नहीं। जीवनभर की कमाई लगाकर घर बनवाया और उसमें भी वह बेगाने जैसे रहने लगे। उनकी सुख-सुविधा के लिए किसी को भी कोई परवाह नहीं। सब कुछ अपना होते हुए भी वह सबसे दूर रह रहे हैं। अजब विडंबना है! वह अपनी परेशानी किससे कहें? सभी हँसेंगे। भाई-भवह को वह गर्दन में हाथ देकर घर से बाहर तो निकाल नहीं सकते, न उनसे पूरे मकान में रहने के लिए किराया ही ले सकते हैं। उन्हें कष्ट में रहते देखकर वही तो उन्हें बुला लाए थे। मगर क्या सोचा था और क्या हो रहा है!

आज रात खाना खाने के बाद रामेश्वर प्रसाद ने फिर बात उठाई “आखिर मेरे विषय में तुमलोग क्या सोच रहे हो? किसी याचक की तरह मैं तुमलोग से अपनी सुख-सुविधा के लिए अपने बेडरूम को खाली करने के लिए कितनी याचना करता जाऊँ और तुम दोनों मेरी एक न सुनो…।” तो चंदा ने तपाक से कहा–“भैया, आपके भाई को वह बेडरूम इतना पसंद है कि वह तो उसे कभी छोड़ेंगे नहीं। उन्हें उसमें बड़ा सुख मिलता है और झिर-झिर हवा रात में उनके बेड पर खूब आती रहती है। हाँ, यदि आप कहें तो इस ड्राइंगरूम को खाली करा दूँ। मगर इसमें फिर वही दिक्कत है–लगा हुआ बाथरूम नहीं है–।” फिर तीनों चुप हो गए। अटूट खामोशी। बात जहाँ थी वहीं जमकर रह गई।

यों ही महीनों बीत गए…कि एक दिन रामेश्वर प्रसाद के तीसरे तथा अंतिम भाई का पत्र आया कि उसका तबादला इसी शहर में हो गया है और वह जल्द ही यहाँ पहुँच रहा है। दोनों भाई बड़े खुश हुए कि तीनों अब एक साथ रहेंगे–मगर कुछ ही देर बाद बड़े भाई कुछ अन्यमनस्क-से हो गए तो राजेश ने पूछा–“तुम तो बड़े प्रसन्न नजर आ रहे थे मगर अब ऐसा क्यों हो रहे हो?” चंदा ने भी बड़ी परेशानी जाहिर की।

“नहीं, कुछ यों ही!”

“नहीं-नहीं, छिपाओ नहीं। तबीयत तो ठीक है न?”

“हाँ, तबीयत तो बिलकुल ठीक है–मगर सोच रहा हूँ कि जब मुझसे तुम दोनों का ऐसा बर्ताव हो रहा है तो मेरे सबसे छोटे भाई से पता नहीं कैसा रहेगा। इसलिए मैं उसे उत्तर दे देता हूँ कि अपने रहने के लिए कोई और जगह ठीक कर ले।” इतना कहकर रामेश्वर प्रसाद झट अपने गैरेजवाले कमरे में चले गए। दूसरे दिन उन्हें दोस्त के बेटे की बारात में काशी जाना था। सुबह नाश्ता कर अपने कमरे की कुंजी बहूरानी के हवाले की और झट रिक्शे पर सवार हो स्टेशन की ओर बढ़े।

दो दिनों बाद थके-माँदे लौटे तो देखा कि सारा घर बंद पड़ा है और कहीं किसी का पता नहीं। वह सन्न हैं। आखिर सब कहाँ भाग गए? सर खुजलाते हुए पास ही के किरानावाले के यहाँ बढ़े–शायद उसे कोई सूचना हो। उन्हें रिक्शे से उतरते देखकर किरानावाला इधर ही लपका चला आ रहा है। उसे देखते ही उन्होंने पूछा, “राजेश कहाँ है? तुम्हें कोई खबर है?”

“हाँ, छोटे भैया तो घर छोड़कर चले गए। अपना सब सामान भी ले गए। आपका सारा सामान ज्यों-का-त्यों रखा है। कुंजी मुझे दे गए हैं। यह लें–।”

“तो इतनी जल्दी क्या आ पड़ी थी?”

“कह रहे थे कि आखिर उनका भी तो कोई अपना मान है। खुलेआम आपने कहाँ उन पर यह इलजाम लगा दिया कि जब आपसे उनका बर्ताव इतना बुरा है तो भला आपके सबसे छोटे भाई से कैसा रहेगा? वह अपने मान की रक्षा के लिए घर-द्वार छोड़कर चले गए। मैंने उन्हें बहुत समझाया मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी; और बीवी जी–बाप रे! आग की टिकिया!”

उस रात–जमीन पर ही सही–रामेश्वर प्रसाद अपने मास्टर्स बेडरूम में बड़े आनंद से सोये। उन्हें पता ही नहीं चला कि बिजली कब जाती और कब आती। आखिर उस कमरे में पुरवा तथा पछेया दोनों की बहार जो है!

आकाशवाणी के सौजन्य से